भारती
बंगाल द्वारा की जा रही केंद्र की अनिवार्य अवज्ञा को शीघ्र कैसे रोका जा सकता है

ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस 2011 में जब से बंगाल में सत्ता में आई है, तब से केंद्र और राज्य सरकार में कई मुद्दों पर मतभेद देखने को मिला है।

और 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों में नई दिल्ली की बागडोर जाने के बाद से ये मतभेद अधिक तीक्ष्ण ही हुए हैं। बनर्जी ने केंद्र सरकार के लगभग हर कार्य का विरोध किया है और अपनी चलाने का प्रयास किया है।

चाहे वह स्वत्थ भारत मिशन हो, आयुष्मान भारत की स्वास्थ्य बीमा योजना, निर्धनों और सीमांतों के लिए मुफ्त अनाज या और कोई कल्याणकारी योजना, बंगाल हमेशा केंद्र सरकार के विरोध में ही खड़ा रहा है चाहे फिर क्षति स्वयं उसी की हुई हो।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल को इन योजनाओं के अंतर्गत न लाने का निर्णय लिया है और ऐसे करके वे राज्य के करोड़ों निवासियों को कई बड़े लाभों से वंचित रख रही हैं।

नीति आयोग, अंतर-राज्य परिषद और अन्य ऐसी संस्थाओं की कई बैठकों में भी न जाने को ही बनर्जी ने चुना है। राज्य के नौकरशाहों को भी केंद्र सरकार की राज्यों के साथ नियमित प्रशासनिक बैठकों में बहुत कम बार जाने दिया गया है।

पिछले वर्ष जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सत्ता में लौटी तो नई दिल्ली में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका पाने की बनर्जी की आशाओं पर पानी फिर गया जिसके बाद से केंद्र सरकार के प्रति उनका विरोध और प्रबल हो गया।

कई मुद्दों पर उन्होंने केंद्र के विरुद्ध अभियोग चलाया है और नई दिल्ली का बंगाल के प्रति “सौतेले” व्यवहार का रोना भी रोती रहीं हैं। बनर्जी ने केंद्र सरकार पर राज्य को आवश्यक वित्त आवंटित न करने का भी आरोप लगाया है।

वे पिछले नौ वर्षों से बंगाल पर 2.56 लाख करोड़ रुपये के ऋण को चुकाने पर रोक लगाने की माँग करती आई हैं। उनका दावा है कि यह ऋण पिछली वामपंथी मोर्चे की सरकार ने लिया था और उसे चुकाने का दायित्व उनपर नहीं आना चाहिए। यह बात अवश्य है कि उन्होंने अपव्ययिता और नासमझ लोकलुभावन योजनाओं से इस ऋण को बढ़ाने में योगदान दिया है।

कोविड-19 ने उन्हें केंद्र सरकार के विरुद्ध खड़े होने का एक और अवसर दे दिया है। उन्होंने ज़ोरदार तरीके से दो अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय दलों (आईएमसीटी) के बंगाल दौरे का विरोध किया, उनकी सहायता नहीं की और सुनिश्चित किया कि वे बाधाओं का सामना करें।

आईएमसीटी के साथ आवश्यक सूचनाएँ साझा नहीं की गईं। केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए कई परामर्शों को उन्होंने महत्त्व नहीं दिया और कथित रूप से आँकड़ों के साथ छेड़छाड़ की ताकी ऐसा लगे कि बंगाल में महामारी नियंत्रण में है।

इन सबने एक खतरनाक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय समझौतों के तहत जो आवश्यक सामान भेजे जाने थे, उन ट्रकों को बंगाल ने एकतरफा तरीके से रोक दिया। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भारत-नेपाल, भारत-भूटान और भारत-बांग्लादेश सीमाओं पर ट्रकों को आने-जाने की अनुमति देने के लिए राज्य सरकार को पत्र लिखा और केंद्र सरकार को अनुपालन रिपोर्ट भेजने को कहा।

बंगाल ने अनुपालन रिपोर्ट तो नहीं ही भेजी और ट्रकों को रोकना भी जारी रखा तथा जो चालक बांग्लादेश पहुँच गए थे उन्हें वापस भारत आने भी नहीं दिया।

मंगलवार शाम को केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला ने बंगाल के मुख्य सचिव राजीव सिन्हा को याद दिलाते हुए पत्र लिखा कि लॉकडाउन उपायों के नए दिशानिर्देशों के अनुसार राज्य पड़ोसी देशों में जाने वाले कार्गो को रोक नहीं सकते हैं।

पत्र में भल्ला ने लिखा, “पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा आवश्यक वस्तुओं की एकतरफा रूप से आवाजाही रोकने पर भारत सरकार का अधिक नुकसान होगा क्योंकि ये वैधानिक रूप से अनुबंधित अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के तहत किया जा रहा है।”

भल्ला ने सिन्हा को चेतावनी दी कि ऐसा करके पश्चिम बंगाल सरकार “आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत गृह मंत्रालय के निर्देशों का उल्लंघन” और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 253,256 और 257 के उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार होगी।

भल्ला ने राज्य प्रमुख सचिव को बांग्लादेश जाने वाले ट्रकों को अनुमति देकर मंगलवार शाम तक ही अनुपालन रिपोर्ट सौंपने को कहा था लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है। बुधवार को बंगाल के गृह सचिव अलपन बंदोपाध्याय ने मीडिया को बताया, “मुद्दे को पूर्ण रूप से संबोधित किया जाएगा।”

कुछ वर्ष पहले जब यूपीए सत्ता में थी तब प्रस्तावित तीस्ता पानी साझाकरण समझौता का विरोध करके ममता बनर्जी ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को बड़ा निराश किया था। इस समझौते पर हस्ताक्षर न हो पाना द्विपक्षीय संबंधों में सबसे बड़ी खलल रही लेकिन वे बांग्लादेश को उसके अधिकार देने के विरोध से डिगी नहीं।

दिसंबर 2016 में ममता बनर्जी ने एक भद्दा दावा किया था कि उनकी सरकार को हटाने के लिए सेना तैनात की गई है। राज्य सचिवालय में उन्होंने “लोकतंत्र की रक्षा” के लिए 33 घंटे व्यतीत किए थे। हालाँकि उनका दावा पूर्ण रूप से गलत निकला लेकिन उन्होंने जो खतरा और हानि पहुँचाई उसकी गणना नहीं हो सकी।

इससे भी अधिक यह कि मायावती, केजरीवाल और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने ममता बनर्जी के इस गलत दावे का समर्थन किया था। “यह दर्शाता है कि ममता बनर्जी द्वारा सेना जैसे श्रद्धेय संस्थान पर बिना सोचे-समझे किया गया गैर-ज़िम्मेदार और गलत दावा भी देश को कितना नुकसान पहुँचा सकता है।”, एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा।

इसलिए उन्होंने आगे कहा कि अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार ऐसा कड़ा कदम उठाए जो बंगाल को ऐसी खतरनाक और गैर-ज़िम्मेदाराना हरकतें करने से हतोत्साहित करे। बंगाल मुख्यमंत्री को देश के संघीय ढाँचे और देश के संस्थानों को नीचा दिखाने तथा भारत की एकता व अखंडता एवं अन्य देशों से संबंधों को क्षति न पहुँचाने दिया जाए।

ऐसे में बहुत लोग चाहेंगे कि अनुच्छेद 356 की सहायता से राष्ट्रपति शासन लगाया जाए लेकिन यह उचित नहीं होगा। क्योंकि हो सकता कि ममता बनर्जी यही चाहती हों।

उनके लिए अपने दायित्वों से हाथ धो लेने का यह सुनहरा अवसर होगा और वे महामारी संकट समेत इस झंझट से बच जाएँगी जो मख्य रूप से उन्होंने ही खड़ा किया है। इससे उन्हें वह करने का अवसर मिलेगा जिसमें वे श्रेष्ठ हैं, आंदोलन करने में। वे अपने आपको शहीद की तरह प्रदर्शित करेंगी जो उन्हें बहुत सहानुभूतियाँ दिलाएगा और हो सकता है कि वे सत्ता में पुनः लौट भी आएँ।

इसकी जगह केंद्र सरकार को अनुच्छेद 355 का उपयोग करना चाहिए जो राज्य को संविधान के अनुसार चलने का निर्देश दे। कुछ अन्य प्रवाधान भी हैं जिनके सहारे तृणमूल सरकार को हटाए बिना नई दिल्ली बंगाल पर कार्रवाई कर सकता है।

यदि मामले को बढ़ने दिया जाए तो भारत की अखंडता और संस्थानों को नीचा दिखाने का बंगाल को और असवर मिलेगा जो नई दिल्ली को किसी भी कीमत पर होने नहीं देना चाहिए।

जयदीप मज़ूमदार स्वराज्य में सहायक संपादक हैं।