भारती
बरनी की वह रिपोर्ट जब गुलामों के बाज़ार में मुगल भी बिके- भारत में इस्लाम भाग 22

इतिहास की अज्ञानता से हमें आज भी मुस्लिम हुक्मरानों को एकमुश्त मुगल कहने की आदत है। बोलचाल में लोग अक्सर यह कहते हुए सुने जाते हैं कि मुगलों के समय मंदिर तोड़े गए। हिंदुओं को मुसलमान बनाया गया। मुगल ऐसे थे। मुगल वैसे थे।

जबकि सच यह नहीं है। मुगलों के भारत पर कब्ज़े का समय शुरू होता है बाबर से। सन् 1526 में। यानी अलाउद्दीन खिलजी के मरने के भी 210 साल बाद मुगल कब्ज़ा करते हैं। लेकिन मुगलों के झपट्‌टे काफी पहले से जारी थे। मुगल भी लुटेरे हिंसक टिडि्डयों की एक अलग प्रजाति थे।

खिलजी के समय में मुगल भी लगातार इस लुटे-पिटे मुल्क पर लगातार हमले कर रहे थे। भारत की समृद्धि के किस्से उन तक भी पहुँचे ही होंगे और वे खानाबदोश जाहिल हज़ारों की तादाद में लाहौर तक और लाहौर से दिल्ली तक धावे मार रहे थे। वे जानते थे कि लुटेरों का एक झुंड जब लाहौर और दिल्ली में लूट के माल पर कब्ज़ा करके मौज कर रहा है तो हममें क्या कमी है? हम भी उतने ही बड़े बेरहम और जाहिल हैं।

खिलजी ने इनमें से ही कुछ मुगलों के जत्थों को पकड़कर मुसलमान बना दिया गया था, जो नवमुस्लिम कहलाते थे। ये दिल्ली में ही बसा दिए गए थे और खिलजी की लुटेरी फौज में शामिल हो गए थे। यानी भारत आने वाले शुरुआती मुगल भी पहले मुसलमान नहीं थे। उन्होंने भी गले पर रखी तलवार को देखकर अपनी जान की खैर के लिए कलमे पढ़े थे।

भारत पर कब्ज़े के लिए मुगलों और खिलजियों का यह खूनी फसाद लुटेरों के दो गिरोहों की आपसी छीना-झपटी थी। भारत की अब दोहरी पिसाई शुरू हुई। मुगलों के साथ झगड़ों में जीत हासिल करने के बाद खिलजी उनके साथ क्या सलूक कर रहा था, दिल्ली से जनाब जियाउद्दीन बरनी बता रहे हैं

जब भी मुगल देहली और उसकी विलायतों पर हमले करते थे तो वे हार जाते और तलवार के घाट उतार दिए जाते। उन्हें बंदी बनाया जाता। इस्लामी झंडों को कामयाबी हासिल होती। कई हज़ार मुगलों की गर्दनों को रस्सियों में बंधवाकर देहली लाया जाता था। उन्हें हाथी के पैरों के नीचे कुचलवा दिया जाता।

मुगलों के सिरों के चबूतरे और मीनार बनवाए जाते। मुगलों की लाशों से क्या शहर, क्या जंग का मैदान हर जगह गंदगी फैल गई। इस्लामी सेना मुगलों पर इस कदर भारी हो गई कि एक मुसलमान सवार सौ मुगल सवारों का मुकाबला करके भगा देता था।”

अब हम अली बेग और तरताक से मुलाकात करते हैं। खिलजी के समय भारत पर झपट्‌टे मार रहे मुगलों के ये दो सरदार थे। अली बेग को तो चंगेज़ खां का बेटा ही कहा जाता था। अली बेग अपने साथ 40,000 मुगल लुटेरों को लेकर पहाड़ों के किनारे-किनारे अमरोहा के इलाके तक आ गया था।

अमरोहा यानी आज के उत्तर प्रदेश का एक शहर। मुरादाबाद, मेरठ, बुलंदशहर और बिजनौर का इलाका, जो दिल्ली पर इस्लामी कब्ज़े के बाद लगातार रौंदा गया है। इन हमलों का मतलब था कि भारत की लूट पर मुगल अब अपना भी दावा पेश कर रहे थे।

खिलजी यह कैसे बर्दाश्त कर सकता था। उसने एक ‘इस्लामी फौज’ इनको निपटाने के लिए भेजी। अमरोहा के पास ही दोनों लुटेरी फौजें टकराईं। खुदा ने इस्लामी फौज को फतह दी। बरनी की रिपोर्ट है

अली बेग और तरताक नाम के दोनों सरदार बंदी बना लिए गए। उनकी गर्दनें बांधकर दिल्ली लाया गया। अलाउद्दीन के सामने पेश किया गया। अमरोहा के आसपास हुई लड़ाई में खिलजी ने 20,000 मुगलों को कत्ल करा दिया है। इनके घोड़े भी दिल्ली लाए गए हैं।

चौतरा-ए-सुभानी पर दरबार हुआ है। दरबार से इंद्रप्रस्थ तक दो कतारों में फौज के विजेता खड़े किए गए हैं। आज इतनी भीड़ है कि एक गिलास पानी 20 जीतल और आधे तनके में मिल रहा है। अली बेग और तरताक को उसके साथ ज़िंदा बांधकर लाए गए मुगलों और उनकी धन-संपत्ति सहित खिलजी के सामने पेश किया गया। उसी दरबार में दिन की रोशनी में सबके सामने उन्हें हाथियों के पैरों के नीचे कुचलवा दिया गया। उनके खून की नदी बहती सबने देखी।”

मुगलों के इस कत्लेआम जैसे ही दृश्य कुछ साल पहले दिल्ली ने देखे थे, जब पहाड़ी इलाकों से 250 प्रतिष्ठित परिवार के हिंदुओं को बांधकर लाया गया था और उन्हें तुर्कों की तलवार ने दो टुकड़े करके काट डाला था और तब यह कहा गया था कि दिल्ली के लोगों ने सार्वजनिक रूप से मौत की ऐसी सजाएँ इससे पहले कभी नहीं देखी थीं।

खिलजी ने इल्तुतमिश के समय का वह रिकॉर्ड तोड़ दिया था। लेकिन यह सिलसिला थमा नहीं। मुगल भूखे टिडि्डयों की तरह आते ही रहे। वे खिलजी के लिए स्थाई सिरदर्द थे और ये दोनों प्रजातियाँ मिलकर भारत को घुन की तरह खोखला कर रही थीं।

अली बेग और तरताक को खत्म करने के बाद दूसरे ही साल मुगल सेना और किसी कनक नाम के सरदार के साथ इस्लामी फौज का खीकर में मुकाबला हुआ। कनक को भी ज़िंदा पकड़ लिया गया। उन्हें भी हाथियों के पैरों तले कुचलवाया गया।

इस समय भी युद्ध के मैदान से लेकर दिल्ली तक बंदी बनाए गए मुगलों का बड़ा हत्याकांड हुआ। उनके कटे हुए सिरों से बंदायू दरवाजे पर एक मीनार खड़ी की गई। वह मीनार आज तक खड़ी है, जो अलाउद्दीन खिलजी की याद ताजा करती है।, बरनी के ही शब्द हैं।

मालामाल हिंदुस्तान उजाड़ इलाकों के जाहिल मुगलों को भी लगातार खींचता रहा। वे हज़ारों के जत्थों में आते रहे और मरते-कटते रहे। ऐसा कोई साल नहीं था, जब कोई न कोई बड़ा हमला न होता रहा हो। खिलजी गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के संपन्न हिंदू राज्यों से जो कुछ लूट रहा था, उस दौलत की दम पर ही वह इन मुगलों से मुकाबला कर रहा था।

आप देखिए कि दो दुर्दांत लुटेरों की हज़ारों की संख्या में ताकतवर फौज किसकी दम पर पल रही थी और कौन पिस रहा था? कौन इसकी कीमत चुका रहा था? भारत के उस भयावह अतीत की कल्पना करके भी आप सिहर जाएँगे।

एक बार फिर सिवालिक की पहाड़ियों के इलाके में 30-40,000 मुगलों ने धावा बोला। लूटपाट और कत्लेआम मचा दिया। अब की बार खिलजी ने इस्लामी फौज को हुक्म दिया कि जब मुगल फौजें नदी पर पानी पीने आएँ तो उन्हें काट डालें।

इस्लामी सेना ने रास्ते रोक दिए। नदी पर शिविर लगाए। मुगल सिवालिक का बड़ा इलाका बरबाद करने के बाद जब नदी पर पहुँचे तो वे और उनके घोड़े प्यास से परेशान थे। इस्लामी फौज कई दिनों से यहाँ घात लगाए थी। बरनी के पास पक्की खबर है-

“हाथों की अपनी दसों उंगलियाँ मुँह में डालकर मुगल पानी की भीख मांगते देखे गए। उनकी औरतों और बच्चों को भी बंदी बना लिया गया। इस्लामी फौज को बहुत बड़ी फतह हासिल हुई।

कई हज़ार मुगलों को गले में रस्सियाँ डलवाकर, नरानिया के किले में भिजवा दिया गया। उनकी औरतें और बच्चे दिल्ली लाए गए। वे दिल्ली के गुलामों के बाजार में हिंदुस्तानी गुलाम औरतों और गुलाम बच्चों की तरह बेच दिए गए। मलिक खास हाजिब को नरानिया के किले की तरफ रवाना किया। वहाँ बंदी बनाकर रखे गए सारे मुगलों को तलवारों से काट दिया गया। उनके खून की नदी बह निकली।

दिल्ली में सजा गुलामों का बाज़ार

जियाउद्दीन बरनी की इस रिपोर्ट पर ध्यान दीजिए। दिल्ली में गुलामों का बाज़ार सजा है। हम पहली बार दिल्ली में ऐसे किसी बाज़ार में पहुँचते हैं, जहाँ युद्ध में जीतने वाली तुर्कों की फौजें गुलाम औरतों-बच्चों की सप्लाई में लगी हैं। यहाँ हर उम्र के गुलाम मौजूद हैं।

हर तरह की शक्ल-सूरत वाले गुलाम। वे भारत के पराजित हिंदू राज्यों से लूट के माल में लाकर बेचने के लिए इन बाज़ारों में धकेल दिए गए हैं, जहाँ दलालों का भी एक ताकतवर नेटवर्क रोजगार से लग गया है। मुगलों के औरतों-बच्चों को पहली बार इस बाज़ार में लाया गया है।

बरनी को अलग से बताना पड़ रहा है कि उन्हें हिंदुस्तानी दासियों और बच्चों की तरह बेचा जा रहा है। इसका मतलब यही है कि अब तक हिंदुस्तानी औरतें, बच्चियाँ और बच्चे ही बेचे जाते थे, अब मुगलों की औरतों और बच्चों को भी नए नस्ल के माल की तरह पेश किया गया है।

तुर्कों के कब्ज़े में भारत में पनप रहे इस नए कारोबार में भी बरनी के स्त्रोत वाकई कमाल हैं। एक काबिल बिज़नेस रिपोर्टर की तरह उसे इन बाज़ारों के बारे में खासी जानकारी है। घोड़ों के बाज़ारों से होकर वह सीधा गुलामों के बाजार का रुख करता है।

बाज़ार तो बाज़ार है, जहाँ सब कुछ बिकता है। जैसे घोड़े और वैसे ही गुलाम। काफिरों के मुल्क में क्या फर्क पड़ता है। सब लूट का सामान ही तो है। ज़मीन पर कब्ज़ा है, माल बिक रहा है। कीमतों को बेकाबू होने से रोकने के लिए खिलजी की सरकार जो फैसले ले रही है, उसपर बरनी की बराबर नज़र है।

हिंदुस्तान के दूर-दराज इलाकों में लगातार हो रहे हमलों से लूट के दीगर माल के साथ काफिर औरतें, बच्चे भी बड़ी तादाद में ढो-ढोकर दिल्ली लाए जा रहे हैं। इस्लामी फौजों के लिए यह गनीमत का माल है। इन्हें बेचकर फिर अपनी जेबें भरिए। इनके खरीददार भी कम नहीं हैं।

हर तरह का माल है। हर तरह की कीमतें हैं। जेब में जैसा माल, खरीदने के लिए वैसे गुलाम। बोलियाँ लग रही हैं। सौदे तय हो रहे हैं। इससे बेहतर सौदा क्या होगा कि बाज़ार में कहीं एक पसंदीदा काफिर लड़की मिल जाए, जिसकी उम्र भी कम हो, नौजवान हो, खूबसूरत हो, खुशमिजाज हो, दिल को खुश करने वाली खिदमत में हुनरमंद हो। कोई ऐसा लड़का मिल जाए, जो घर के दस काम करे और वक्त-ज़रूरत मालिश भी कर दे या मालिक की हिफाज़त के लिए अपनी जान भी दे दे।

लड़कियों का रेट 20 से 40 तनका

बरनी कीमतों की लिस्ट पढ़ रहा है, मोबाइल फोन स्विच ऑफ करके सुनिए- “किसी मालदार कारोबारी की हिम्मत नहीं है कि वह गुलामों के इस बाज़ार में आ सके और किसी भी तरह किसी गुलाम को देख सके। यहाँ साधारण कामकाज कर सकने वाली (कारी कनीज) का भाव 5 से 12 तनके तय किया गया है।

एक खूबसूरत गुलाम लड़की (किनारी कनीज) के लिए 20 से 40 तनके तक चुकाने होंगे। गुलाम लड़कों के रेट अलग हैं। एक गुलाम मर्द के लिए 100-200 तनके काफी होंगे। लेकिन शर्तें लागू हैं। कभी ऐसा भी माल आ सकता है, जैसा पहले किसी दुकानदार या खरीददार ने देखा ही न हो तो उसकी कीमतें अलग से तय होंगी और नियम भी अलग से लागू होंगे।

मसलन कोई ऐसा गुलाम आ जाए जिसका मूल्य 1000-2000 तनके होता तो खिलजी के जासूसों के डर से मजाल है कि कोई उस महंगे माल को हाथ लगा दे। कोई खरीद ही नहीं सकता है। खूबसूरत गुलामों के बेटों के भी भाव तय हैं- 20 से 30 तनके। जो बच्चे किसी काम के लायक नहीं हैं, लेकिन कहीं से पकड़कर ले आए गए हैं, वे 7-8 तनकों में जितने चाहिए उतने ले जाइए। थोड़ा-बहुत कामकाज जिन्हें आता हो, ऐसे गुलामों की कीमत 10-15 तनके है।”

ऐसा नहीं है कि बरनी मुझे ही मिला। आज़ाद भारत के इतिहासकारों ने भी इतिहास लिखते समय उससे जानकारियाँ ली हैं। लेकिन उन्हाेंने अलाउद्दीन खिलजी में एक सुलतान की महानता के दर्शन कर लिए और उसकी बाज़ार नीतियों का ऐसा महिमामंडन किया, जैसा खुद बरनी ने भी नहीं किया।

सेक्युलर भारत के इतिहासकारों ने ऐसे जाहिर किया कि दिल्ली में तय किए गए खिलजी के नियम पूरे हिंदुस्तान को एक आर्थिक महाशक्ति बना रहे थे। शेयर मार्केट उछाल पर था। विदेशी पूंजी निवेश जमकर शुरू हो गया था। रोजगार के अनंत अवसर मिल रहे थे। हिंदुस्तान के कोने-कोने में खिलजी की आर्थिक नीतियों ने क्रांति पैदा कर दी थी। डिजिटल और स्किल इंडिया तभी हो चुका था।

जबकि हकीकत बहुत घिनौनी है। सिर्फ दिल्ली के बाजारों पर ही उसका कठोर नियंत्रण था। बाकी मुल्क में तो उसकी लुटेरी फौजें लगातार रौंदने में ही लगी थीं। उसकी बाजार नीतियों के बारे में विदिशा, देवगिरि, चित्तौड़, रणथंभौर, सिवाना, जालौर में भी किसी को कुछ पता नहीं होगा, जो उसने लगातार लूटे थे।

हम बरनी का शुक्रिया अदा करेंगे कि उसने ईमानदारी से दिल्ली के हर बाजार की जानकारी भी अपने पास रखी। हमें गुलामों की मंडी में भी लेकर गया। लेकिन हमारे इतिहासकारों ने कभी यह नहीं बताया कि इन बाजारों में बिक क्या रहा था? ये गुलाम औरतें-बच्चे लाए कहाँ से जा रहे थे? यही एक अच्छे रिपोर्टर की खासियत है कि वह अपने आसपास की हर घटना की गहराई में जाए। चीज़ों को 360 डिग्री पर देखे। हर तफसील नोट करे।

बरनी अपने समय का एक बेहतरीन खोजी पत्रकार है। उसकी इन्वेस्टिगेशन की काबिलियत कमाल की है। इसकी एक वजह यह भी है कि बरनी के खानदान के लोग खिलजी के करीबी और ऊँचे ओहदों पर रहे हैं। आज की ब्यूरोक्रेसी की तरह मंत्रालयों और सचिवालयों में उसके भी ऊँचे स्त्रोत हैं, जो अंदर की खबरें उसे देते हैं।

वह सारा विवरण शब्दश: दर्ज करता है। उसके पास हर सवाल के जवाब हैं। उसकी तैयारी गजब की है। खिलजी के समय में वह आज के मैगसेसे अवार्ड के लिए एकदम काबिल जर्नलिस्ट है। उसे मरणोपरांत यह अवार्ड दिया जा सकता है।

मुझे अक्सर गुलामों के बाज़ार में बिकती नज़र आई मजबूर काफिर औरतें और बच्चियाें के बेबस चेहरे याद आ जाते हैं। वे जाने कहाँ की होंगी। कोई लुटेरा फौजी उन्हें पकड़ लाया होगा और अपने हिस्से के सवाब के लिए खुद हर मुमकिन दुर्व्यवहार कर चुकने के बाद 10-20 तनके के लिए यहाँ पटक गया होगा।

मालदार तुर्क और खिलजियों के सरदार से लेकर मामूली नौकर-चाकर भी उन्हें खरीदकर ले जाते होंगे, जिनकी खिदमत में ही उनकी बाकी उम्र कटती होगी। उनके बच्चे भी होते ही होंगे। सदियों तक पैदा हुए उन गुमनाम बच्चों की वह तादाद कहाँ गई?

जब मैं लगातार गर्भवती हुईं उन बेबस जवान काफिर और मुगल लड़कियों के रूखे-सूखे चेहरे ज़ेहन में ताज़ा करता हूँ तो आज के जिलानी-गिलानी, आज़म-आज़मी, अब्दुल्ला-औवेसी, उस्मानी-शेरवानी, शाज़ी-काज़ी, दाऊद-सलेम, खान-सलमान-सुलेमान, ज़रीना-शबाना, आमिर-इरफान-इमरान, अफजल-मकबूल और हाफिज-लखवी जैसे अनगिनत चेहरे सामने टेलीविज़न स्क्रीन पर मंडराने लगते हैं। कोई पर्सनल लॉ बोर्ड का चेहरा है, कोई एक्शन कमेटी का, कोई बॉलीवुड का, कोई सियासत का, कोई मजहब का, कोई मीडिया, कोई माफिया का, कोई दहशत का।

आज़ाद हिंदुस्तान में सरहद के दोनों तरफ सदियों की नाजायज़ किलकारियों की रौनक है! और क्या मज़ाक है कि पाकिस्तान में वे खुद को गज़नवी, गौरी और बाबर से अपना नाम जोड़कर इतराते हैं!! जैसे कोई खुद को ही गाली देकर खुश हो जाए!!!

अगली बार देखते हैं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के आसपास रूहानी माहौल में क्या चल रहा है? भारत की महान सूफी परंपरा के पुरोधा इंसानियत का कौन सा पैगाम लेकर आए हैं। वे किसकी कामयाबी और फतह के लिए दिन-रात अल्लाह की इबादत में लीन हैं?

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विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com