भारती
बलबन की आतंकी हुकूमत दिल्ली से बंगाल तक- भारत में इस्लाम की पड़ताल भाग-4

प्रसंग- लेखक की इतिहास पड़ताल की शृंखला के इस भाग में पढ़ें बलबन के शासन में इस्लाम का फैलाव।

भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इस्लाम का इतिहास खूनखराबे और कत्लेआम से भरा हुआ है। मूल विचार की तह में हम बाद में जाएँगे, लेकिन ‘इस्लाम’ के नाम पर जाे विचार अरब से बाहर आया, वह सिर्फ आतंक के ज़ोर पर आया। कभी किसी ने सुना कि इस्लाम के प्रचार के लिए कोई ‘भिक्षु’ या ‘संन्यासी’ अरब से निकले? यह अवधारणा ही नहीं है। इस्लाम का विचार अरब के बाहर हर कहीं सिर्फ सत्ता पर कब्जे के लिए निकला इसलिए हर कहीं ‘इस्लाम की फौज’ के जिक्र ही तारीख में मिलते हैं, किसी शांतचित्त और त्यागी संन्यासी प्रचारक के नहीं।

यह ऐसा विचार था, जिसने अपने रास्ते में आने वालों पर हर तरह के जुल्म और दहशत को कानूनी और मजहबी वैधता दे दी। इसलिए यह विचार जिस किसी भी संस्कृति से टकराया, उसके मानने वालों की कल्पना में भी नहीं था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है। छल-कपट, धोखा, लूटमार, आगजनी, कत्लेआम, औरतों-बच्चों को गुलाम बनाना, पुराने चर्च-मंदिरों को तोड़कर उनकी जगह इबादतगाहें बनाना और यह सब एक बार सत्ता पर कब्जे के बाद इत्मीनान से फैलते हुए।

दिल्ली पर कब्ज़े की पहली ही सदी में झाँककर देखिए। वह भारी तोड़फोड़, आगजनी, उथल-पुथल और खूनखराबे की सदी थी। वे जानते थे कि इतनी पुरानी रवायतों वाले इस मालामाल मुल्क में सिर्फ आतंक के ज़ोर पर ही टिकना मुमकिन है। कोई और रास्ता नहीं है।

वही चार-पाँच सदियों का उनका कुलजमा तजुर्बा था और वे सूखे पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में लौटने के लिए ‘रिटर्न-टिकट’ लेकर नहीं आए थे। जैसे भी मुमकिन हो उन्हें कब्जा करके यहीं अपनी सल्तनतें कायम करनी थीं। तो गुलाम वंश के सुलतानों के आतंकी राज की शुरुआत में ही उनके आपसी खूनखराबे ठीक वैसे ही हम देखते हैं जैसे लूट के माल के बटवारे पर डाकुओं के गिराेह आपस में भिड़ें।

जब एक गुलाम दिल्ली का सुलतान हो सकता था तो दूसरे गुलामों में कौन-सी कमी थी। ऐबक के बाद उसके गुलाम शमसुद्दीन इल्तुतमिश ने 26 साल राज किया। उसके अगले 30 साल में इल्तुतमिश की चार औलादें तख्त पर आईं और एक दूसरे को मारकर खत्म हो गईं। इस दौरान बलबन नाम का एक नायब तस्वीर में आता है, जो इल्तुतमिश का ही एक खरीदा हुआ गुलाम था। नायब मतलब आज के प्रधानमंत्री के सामने गृहमंत्री के पद के बराबर। जब कभी सुलतान दिल्ली से बाहर होता, नायब कामकाज संभालता।

सुलतान बनने के बाद बलबन ने पहली बार दिल्ली की इस्लामी हुकूमत को राज्य प्रायोजित आतंक का एक सख्त आवरण दिया। 1266 में दिल्ली पर उसका कब्ज़ा हुआ। करीब 20 साल राज किया। उसका उसूल था-

आम लोगों में हुकूमत का डर इतना गहरा होना चाहिए कि कोई कभी विरोध की सोच भी न सके।

ये कैसे होगा? उसने अपने आसपास कारिंदों की कई पुख्ता कतारें खड़ी की। हाजिब, जो हर समय दरबार में बड़े असरदार लोगों को भी ठीक से खड़ा करवाते थे और चौकन्ने रहते थे कि आम लोग सुलतान के पास तक न फटकने पाएँ। जानदार, जो उसके बॉडीगार्ड थे। नकीब, जो सुलतान की सवारी के आगे ऊँची आवाज़ में चिल्लाते चलते थे। ऐसी अलग-अलग जिम्मेदारियों में 10 श्रेणियों के हथियार बंद लोगों की भीड़ उसके आसपास होती थी।

सवारी के समय ये इतना भयानक शोर करते थे कि दो कोस तक इनकी आवाज़ घबराहट पैदा कर देती थी। सीसतानी पहलवानों की तनख्वाह 60,000-70,000 जीतल थी। ये खौफनाक कमांडो की तरह नंगी तलवारें चमकाते हुए बलबन के काफिले में घोड़ों के बराबर साथ चलते थे। उसने दरबार में आने वालों के लिए कदमबोसी या खाकबोसी की शुरुआत की।

इसका मतलब, बलबन के सामने आने वाला हर कोई उसके चरण चुबंन करेगा। और आज बुत या वंदे मातरम् को लेकर जो लोग कहते हैं कि इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता, उन सबके पुरखों को बलबन के चरण चूमते हुए कभी इस्लाम का यही उसूल याद आया हो, ऐसा एक भी उदाहरण इतिहास में नहीं है। जम्हूरियत उनके डीएनए में नहीं थी। वे सिर्फ आतंक की भाषा समझते थे।

इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी उस विकट दौर की झलक दिखाने में कदम-कदम पर हमारी मदद करता है, जिसका नाना हुस्माउद्दीन बलबन के दरबार में ऊंचे ओहदे पर था। बलबन के सामने दूर-दूर से आए हिंदू राजे-महाराजों को भी खाकबोस यानी जमीन का चुंबन करना होता था।

कई मौकों पर दरबार के डरावने माहौल में वे हैरत और डर से बेहोश तक हो जाते थे। दो सौ कोस तक के लोग बलबन की रुतबेदार सवारी को देखने इकट्‌ठा होते थे। दिल्ली में दरबार का ऐसा दबदबा पहली बार देखा गया। उसका मानना था-

खौफ के बिना हुकूमत मुमकिन नहीं है। खौफ के लिए ताकत और रुतबा बेहद जरूरी हैं।

बलबन को जियाउद्दीन बरनी ने दीन का पक्का इंसान बताते हुए बड़ी इज्ज़त बख्शी है। वह बताता है कि सुलतान बनने के बाद बलबन इस्लामी शरिया के खिलाफ किसी भी काम में नहीं फटका। वह राेज़े-नमाज़ का पाबंद हो गया। वह जुम्मे और जमात की नमाज़ में हाज़िर रहता। हज के महीनों में वह पूरी रात नमाज़ पढ़ता।

सफर के दौरान या महल में वह कुरान के अलग-अलग भाग पढ़ता रहता। बिना वजू के कभी नहीं रहता। आलिमों की मौजूदगी के बिना भोजन तक नहीं करता और भोजन के वक्त आलिमों से इस्लाम की मुश्किलों पर सवाल करता। जुम्मे की नमाज़ के बाद वह मौलानाओं से मिलता।

किसी आलिम का इंतकाल हो जाता तो सुलतान जनाजे को कंधे देने आता। जनाजे की नमाज़ पढ़ता और तीजे की रस्म में शिरकत करता। उनके घरवालों को इनाम-इकराम में गाँव और वजीफे देता। रौबदार सवारियों के दौरान किसी मस्जिदमें तजकीर होती देखता तो उतरकर ज़रूर सुनता। सेना के काज़ियों को हर्मान की उपाधियाँ दे रखी थीं (मक्का-मदीना को हर्मान कहा जाता है)।

बलबन की बेरहमी जैसी फुटकर मिसालें 700 सालों तक हर सुलतान, बादशाह, नवाब और निज़ाम ने देश में हर कहीं दिखाईं, लेकिन उसकी सल्तनत में हिंदुस्तान ने जैसे एकमुश्त दारुण दृश्य देखे, वैसे दूसरे नमूने दिल्ली की मुस्लिम हुकूमत में बहुत कम दिखाई दिए हैं।

दिल्ली के दक्षिण में मथुरा, गुड़गाँव, अलवर और भरतपुर का इलाका मेवों का था- मेवात। वे तब धर्मांतरित नहीं हुए थे। वे अपनी हिंदू परंपराओं के अनुयायी, मेहनतकश, प्रभावशाली और संगठित थे। बलबन के समय मेवों पर होने वाले हमलों को तर्कसंगत ठहराने के लिए कई तरह की तोहमतें मढ़ी गईं। जैसे-वे लूटपाट करते हैं। कत्ल करते हैं।

अब ज़रूरी था कि सुलतान अपना फैसला सुनाए। सुलतान बनने के पहले ही साल में उसने एक्शन लिया। मेवों के इलाकों में बेतहाशा जंगल कटवाए। बड़ी तादाद में मेवों का कत्ल कराया गया। उनके बीवी-बच्चों को बंदी बनाकर लाया गया। मेवाें के उजाड़ दिए गए इलाकों में पहली बार हाथ में चाबुक फटकारते अफगानों की नियुक्ति की गई। राजस्थान और हरियाणा के आज के मुस्लिम मेवों में से किसी को पता नहीं अपने ऊपर गुजरी इस आफत का कोई इल्म होगा या नहीं!

आज ‘मॉब-लिंचिंग’ शब्द के अल्पबुद्धि आविष्कारक देखें कि उन्हें यह भारी-भरकम शब्द कहाँ खर्च करना चाहिए। असल मॉब-लिंचिंग, जब हर तरह के हथियारों से लैस एक उन्मादी भीड़ किसी पूरे इलाके पर शिकारी कुत्तों की तरह झपट रही थी और एक के बाद दूसरे इलाके में वही कर रही थी। एक के बाद दूसरे सुलतान की अगुवाई में और एक के बाद दूसरी हर सदी में हर कहीं। अनगिनत बेगुनाहों की हत्याएँ, अनगिनत औरतों-बच्चों का गुलाम बनाने की घटनाओं से इतिहास भरा पड़ा है।

सही मायनों में सरकार संरक्षित ‘मॉब-लिंचिंग’ के दुनिया में ऐसे नमूने सिर्फ हिंदुस्तान में ही मुमकिन थे। बलबन के साथ आज के उत्तरप्रदेश के कटेहर इलाके में आइए। यह रामपुर, बरेली, बंदायू, संभल, मुरादाबाद और अमरोहा का इलाका है, जिसे बलबन के समय कटेहर कहा जाता था। अपनी बदजुबानी के लिए बदनाम के एक सेकुलर राजनेता आज़म खान के पुरखों का इलाका, तब का कटेहर।

सदियों से कटेहर इलाके के हिंदू राजा भी तब तक प्रभावशाली लेकिन बिखरे हुए थे और संभवत: पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद दिल्ली के बदलते रंग-ढंग दूर से देख-सुन भी रहे होंगे। बलबन दिल्ली के आसपास भविष्य में चुनौती की कोई संभावना भी नहीं छोड़ना चाहता था। तब गंगा पार करके वह खुद निकला और अपने 5,000 जोशीले फौजियों को कटिहेर को मिट्‌टी मिलाने का हुक्म दिया। जियाउद्दीन बरनी उसका हिसाब लिखता है

“सभी पुरुषों काे कत्ल कर दिया गया। औरतों और बच्चों के सिवाय किसी को नहीं छोड़ा गया। आठ-नौ साल के लड़के भी काट डाले गए। कुछ दिनों तक सुलतान कटेहर में ही रहा और भीषण नरसंहार करता रहा। यहाँ तक कि कटेहर के लोगों के लहू की नदी जमीन पर बहा दी। हर गाँव, जंगल और खेत के सामने लाशों के ढेर लगा दिए। उनकी बदबू गंगा के किनारों तक पहुँचती थी। कटेहर का हाल देखकर आसपास के इलाकों के लोग भी काँप उठे। कटेहर के सारे गाँव लूटकर तहस-नहस कर दिए गए। इस लूटमार ने सुलतान की सेना को दौलतमंद बनाकर लौटाया।”

बलबन की फौजों ने जिन औरतों-बच्चों को गुलामों की तरह बांधकर इस इलाके से निकाला होगा, वे बाद में किनके हाथों में पड़ी होंगी? उन्हाेंने आने वाले सालों में अपने मासूम बच्चों, नाती-पोतों को कौन सी आपबीतियाँ सुनाई होंगी? बलबन की हैवानियत का सबसे भयानक नज़ारा बंगाल ने देखा।

जब हम बलबन के समय के बंगाल की बात कर रहे हैं तो यह याद रखें कि तब आज का बांग्लादेश, पश्चिम बंगाल और बिहार एक साथ थे। यह दिल्ली से इतना दूर एकमात्र ऐसा इलाका था, जिस पर गुलाम वंश के सुलतानों की पहली ही पीढ़ी में कब्जा किया जा चुका था। ऐबक के साथी सरदारों ने यहाँ भयानक धावे बोले थे और दिल्ली के मातहत अपनी सल्तनतें बना ली थीं। दिल्ली से दूरी के कारण ये लोग जल्दी ही स्वतंत्र सुलतान बन जाते थे और अपने सिक्के चलाने लगते थे।

बलबन के समय तुगरिल नाम का तुर्क बंगाल का वाली बनाया गया था। वह लखनौती से राज करता था, जहाँ कभी प्राचीन बंगाल के हिंदू राजवंशों का राज रहा था। दिल्ली के सुलतान अपने मातहत ऐसे लोगों से सतर्क रहते थे, जो अपनी ताकत बढ़ाने लगते थे या जिनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगती थी। तुगरिल को इसीलिए विद्रोही माना गया।

बलबन के लिए यह नाकाबिले-बर्दाश्त था कि उसका कोई गुर्गा उसके लिए चुनौती बने। तुगरिल की अक्ल ठिकाने पर लाने के लिए बलबन ने दो बार सेनाएँ बंगाल में भेजीं। तुगरिल की तैयारी जबर्दस्त थी और लूट के माल के जिस जोश से बलबन भरा हुआ था, वही जोश तुगरिल को भी ताजादम किए था।

बलबन की दोनों सेनाएँ हारकर लौटीं। इन्हें हराने में बंगाल के हिंदुओं ने भी तुगरिल का साथ दिया था। पराजित सेनाओं में एक का सरगना बलबन का खास अमीन खां था, जो अवध प्रांत का मुक्ता था। गुस्सैल बलबन ने इस हारे हुए अमीन खां को अवध के दरवाजे पर ही फांसी पर लटकवाया और खुद यह कसम खाकर दिल्ली से निकला कि तुगरिल को खत्म करके ही लौटेगा।

यह मुहिम पूरे तीन साल चली। बलबन ने एक भारी फौज के साथ कूच किया। तुगरिल अपने परिवार, औरतों-बच्चों और लखनौती की सेना के साथ जाजनगर की तरफ निकला, जो आज के नौआखली के पास कहीं है। बलबन की फौज के अग्रिम दस्ते ने बंजारों की मदद से उसे एक जगह घेर लिया, जहाँ वह खुद को महफूज़ समझकर रुका हुआ था।

ताबड़तोड़ उसे पकड़ा गया, उसका सिर काटकर लाया गया। साथ में उसका खजाना, बीवी-बच्चे, हाथी, भरोसेमंद अधिकारी, गुलाम और उनके परिवार, कुल मिलाकर 3,000 लोग पकड़े गए। इन सबको लेकर बलबन लौटकर लखनौती आया। लखनौती के दो मील से लंबे मुख्य बाजार में दोनों तरफ फाँसी के फंदे लगवाए गए और तुगरिल के बेटे, दामाद, आला अधिकारी, कर्मचारी, गुलाम, सेनापतियों को सरेआम लटकाया।

एक ऐसा दरवेश भी इनमें शामिल था, जो तुगरिल का करीबी माना जाता था। ये कलंदर हाथ-पैरों में लोहे के कड़े और जंजीरें टांगे रहता था। एक बार तुगरिल ने उसे तीन मन सोना दिया था। उस दरवेश ने इस सोने से अपने और अपने साथियों के लिए सोने के कड़े और जंजीरें बनवाईं थी। वे यही पहनते थे। बलबन के पहले बंगाल ने कभी सरेआम मौत की सजा के ऐसे आतंक भरे दृश्य नहीं देखे थे। जियाउद्दीन के नाना हुसामुद्दीन को लखनौती की शहनगी यानी प्रबंधन का काम सौंपा गया था। वह इन सब घटनाओं का चश्मदीद है।

तुगरिल के बचे हुए कैदियों को दिल्ली लाकर ऐसे ही दंड दिए गए ताकि सबकाे सबक मिले। ये जो तुगरिल की फौज के जिंदा बचे हुए औरतें-बच्चे होंगे और वे जो बाद में आतंक के लगातार बढ़े फैलाव में लखनौती और पूरे बंगाल में नई पहचानों के साथ सामने आए हुए लोग होंगे, उनके वंशज आज के पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और बिहार में किन शक्लों में पहचाने जाएँ?

जबकि हम देखते हैं कि इल्तुतमिश या बलबन के वंश अगले 50 सालों के भीतर ही खत्म हो गए। उनका नामलेवा नहीं बचा। वे हमलावर हुक्मरान तो एक दूसरे के खूनखराबों में ही खत्म होते चले गए। तो आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश और बचे हुए हिंदुस्तान के मुसलमानों की बल्दियतें पीछे किनसे जुड़ती हैं?

लखनौती का राज बलबन ने अपने बेटे मेहमूद को सौंपा, जिसे बुगरा खां भी कहा गया। तीन साल के इस खूनखराबे के बाद बंगाल से दिल्ली लौटते हुए बलबन से बुगरा खां से कहा

बड़े बाज़ार में इस दंड और हत्या को याद रखना। मेरी बात मत भूलना कि यदि हिंद, सिंध, मालवे, गुजरात, लखनौती और सुनार के इकलीमदारों में से कोई भी दिल्ली के बादशाह के विरुद्ध विद्रोह करेगा और तलवार खींचेगा तो उसको, उसके बीवी-बच्चों, दोस्तों, रिश्तेदारों, कर्मचारियों और समर्थकों को यही सजा दी जाएगी, जो तुगरिल के लोगों को दी गई।

यह दिल्ली से बंगाल तक इस्लाम के नाम पर आतंकी राज के शुरुआती पाँच-छह दशकों के दिल दहलाने वाले दृश्य हैं, जो दस्तावेजों पर दर्ज हैं।

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विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com