भारती
मिनहाज़ सिराज की रेल से बख्तियार-पुर जंक्शन तक का सफर- भारत में इस्लाम भाग 7

बिहार का एक बड़ा शहर है बख्तियारपुर। रेलवे का एक पुराना जंक्शन। ये बख्तियार कौन है, जिसके नाम पर एक ऐसे राज्य के बड़े शहर का नामकरण हुआ, जहाँ की ज़मीन से दो धर्म दुनिया को मिले। बौद्ध और जैन धर्म की ज़मीन है बिहार।

गौतम बुद्ध और भगवान महावीर की चहलकदमी से आबाद रही होगी कभी। इन दोनों महान राजपुत्रों के अनगिनत प्रसिद्ध अनुयायी हुए हैं। उनके अपने परिजनों के नाम भी सब जानते हैं। ये नाम इतने हैं कि बिहार के हर छोटे-बड़े शहर के नाम इन पर हों जाएँ तो नाम कम नहीं पड़ेंगे। 24 तो तीर्थंकर ही हैं। बुद्ध के संघ में सैकड़ों श्रद्धेय नाम बाद की चार सदियों तक मिलेंगे। अशोक से लेकर कनिष्क तक सारिपुत्त से लेकर बसुमित्र तक। मगर बख्तियार में कुछ खास होना चाहिए, जो इन सबमेें नहीं था।

जनाब मुहम्मद बख्तियार खिलजी साहब आखिर किस लोक से अवतरित हुए थे और ऐसा क्या कारनामा कर दिखाया था, जिस वजह से उनके पाक नाम पर महान भारत का एक शहर अपना शानदार परिचय दुनिया को दे रहा है? क्या वह बुद्ध और महावीर से भी बढ़कर था? क्या उसने ऐसा कुछ किया था, जो चाणक्य, चंद्रगुप्त और अशोक की चमक को भी फीका कर दे? बिहार वालों ने अगर अपने एक शहर का नाम बख्तियारपुर रख छोड़ा है तो बिलाशक वह कोई पहुँचा हुआ इंसान ही होना चाहिए! हो सकता है कोई फरिश्ता हो!

मुहम्मद बख्तियार की पुख्ता शिनाख्त के लिए आइए मिनहाज़ सिराज के पास चलते हैं। मिनहाज़ सिराज अकेला आदमी है, जो बिहार की धरती पर आए इस अनजान आदमी के बारे में सबसे ज्यादा मालूमात रखता है। उसके पास बख्तियार की पूरी कुंडली मिलेगी। हो सकता है इतनी जानकारी खुद बिहार के पास नहीं होगी और होगी भी तो मिनहाज़ से ही मिली होगी।

हम सीधे 800 साल पहले मिनहाज़ सिराज के पास चलते हैं। वह इस वक्त ग्वालियर में है और यह सन् 1231 का वक्त है। ग्वालियर पर इल्तुतमिश का जबर्दस्त हमला हुआ है। इस्लाम के फौजियों ने इस शहर को भूखे-भेड़ियों की तरह घेर रखा है। वे दूर-दूर तक झुंडों में बदशक्ल लकड़बग्घों जैसे घूम रहे हैं। दिल्ली से ग्वालियर के रास्ते पर भारी चहल-पहल है। तरह-तरह की अफवाहें उड़ी हुई हैं। दहशत बढ़ रही है।

मगर इस जानलेवा हो-हल्ले के बीच एकदम अलग एक शख्स हर दिन फौज को जोश से भरने वाली तकरीर देने में लगा है। वह इस्लाम की ऐसी-ऐसी फतहों की कहानियाँ सुनाता है कि थकेहारे, बेदम और जाहिल फौजियों की आँखों में खून उतर आए। यह आवाज़ मिनहाज़ सिराज की है। वह है तो एक कलमनवीस। लिखने-पढ़ने का काम करता है।

इतिहास उसका पसंदीदा विषय है। वह इतिहास ही लिखता है। यूँ भी कह सकते हैं कि वह जिसे इतिहास समझता है, वही लिखता है। वह खानदानी आदमी है। मोहम्मद गोरी की सेना में उसका बाप काज़ी था। काज़ी मतलब शरिया अदालत का चीफ जज। उसके घर में मिनहाज़ की पैदाइश 1193 की है। यह वही साल है, जब गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर दिल्ली पर कब्ज़ी जमाया था।

अपने बाप के घर से मिनहाज 1226 में दिल्ली के लिए रवाना हुआ था। दो साल बाद जब उसने दिल्ली में कदम रखे तब यहाँ शम्सुद्दीन इल्तुतमिश की हुकूमत थी। इल्तुतमिश के ग्वालियर पर हमले का साल 1231 है। मिनहाज़ यहीं है।

वह सुलतान के शिविर में इस्लाम की बेमिसाल फतहों की कहानियाँ सुनाता है। ऐसे जोशीले भाषण कि काफिरों के खिलाफ जंग के मैदान में इस्लामी लड़ाकों का खून उबाल पर बना रहे। रमजान-मुहर्रम में हर दिन भाषण और बाकी महीनों में हफ्ते में एक दिन। ग्वालियर के एक ही झपट्‌टे के दौरान उसने 95 भाषण दिए।

ग्वालियर पर फतह की खबरों ने दिल्ली तक माहौल गरमा दिया। मिनहाज़ सिराज ग्वालियर का पहला काजी नियुक्त हुआ। इस्लामी कानून लागू करने के लिए अब एक साथ उसके पास कई अहम जिम्मेदारियाँ थीं। वह लेखक भी था इसलिए अपने पसंदीदा विषय इतिहास में ही घूमता रहता। वह एक जगह टिका नज़र नहीं आता।

जल्दी ही ग्वालियर से दिल्ली गया और अवध होकर बंगाल तक घूमता रहा। जब उसने ग्वालियर छोड़ा तो किताबों के दो बड़े बक्से भी दिल्ली भेजे गए। एक पल के लिए मत भूलिए कि यह गुलाम वंश के बेरहम सुलतानों का दौर था। कुतबुद्दीन एबक और इल्तुतमिश से लेकर बलबन और मुइज्जुद्दीन कैकुबाद के रोंगटे खड़े कर देने वाले कारनामों की सदी।

मिनहाज़ ने तो ऊँचे ओहदों पर रहकर उनकी हुकूमतें देखीं और बहुत सारे ऐसे लोगों के बीच वह रहा, जो एक तरह से दिल्ली पर कब्ज़ा करने वाले “पहले बैच’ के हमलावर तुर्क थे। उसके पास सब तरफ की ब्रेकिंग न्यूज़ थीं।

अपने मुस्तकबिल की तलाश में बख्तियार खिलजी ने दिल्ली छोड़कर बंगाल का रुख किया था। तब के बंगाल में आज का पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और ओडिशा का भी कुछ हिस्सा था।

यह इतना बड़ा इलाका था, जिसमें आज का एक आजाद मुल्क बांग्लादेश है और हिंदुस्तान के दो बड़े सूबे भी समाए हुए हैं। टैगोर ने मेरा सोने सा बंगाल तब कहा जब वह सदियों का लुटा-पिटा टूटा-फूटा सामने था। आठ सौ साल पहले बख्तियार के आसपास दौलत की लूटमार के जो नज़ारे हैं, उनमें आप हकीकत में देख पाते हैं कि सोने सा बंगाल होना कहते किसे हैं?

इतिहास में ताका-झाँकी करने वाले थोड़े-बहुत महान भारतीयों को भी बख्तियार के नाम से सिर्फ इतना ही इल्म होगा कि इस मुस्लिम हमलावर ने सबसे पहले सदियों पुराने शानदार नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों को तबाह कर डाला था। बिहार में यह तबाही ठीक उसी समय फैली जब दिल्ली के महरौली इलाके में पुराने 27 मंदिरों को गिराया जा रहा था। मिनहाज़ सिराज ने बख्तियार का “बायोडाटा’ तैयार किया है। मुलाहिज़ा फरमाइए-

“वह गोर और गर्मसीर के खिलजी कबीले से अलग होकर मुहम्मद गोरी के दरबार में पहुंचा। उसे दीवाने-अर्ज में एक छोटा सा पद दिया गया। (दीवाने-अर्ज एक विभाग था, जिसका काम युद्ध की मुकम्मल तैयारियों काे पूरा करने का था।)

बख्तियार को यह ऑफर अपनी काबिलियत के मुकाबले में कुछ हल्का लगा। उसने इसे कुबूल नहीं किया और दिल्ली की तरफ रुख किया। दिल्ली में तो उसे इस मामूली से ओहदे के काबिल भी नहीं समझा गया। उसे यहाँ कोई पद नहीं मिला। तब वह बंदायू पहुँचा, जहाँ कोई नौकरी उसे मिल गई। उसके पास एक शानदार घोड़ा और कुछ हथियार थे। बदायूँ से वह अवध की तरफ चला गया और मलिक हुसामुद्दीन की नौकरी में लग गया।”

तब के हिंदुस्तान में चारों तरफ फैले काफिर हिंदू राजाओं के खिलाफ लगातार लड़ाइयाँ ही एकमात्र ऐसा उद्योग बन गई थीं, जो लगातार फल-फूल रहा था और जिनमें लूटमार के बेहिसाब मौके खुल गए थे। निजी तौर पर जो जितनी ताकत दिखाने की हैसियत में होता, उसके लिए तरक्की के दरवाजे सुलतान के तख्त तक भी ले जा सकते थे।

बख्तियार ऐसा ही एक जुनूनी आदमी था, जिसके पास दूसरे तुर्कों की तरह खोने के लिए कुछ था नहीं और वे रिटर्न टिकट लेकर आए नहीं थे। उन्हें हर हाल में यहीं रहना था। वे मेहनत-मज़दूरी जानते नहीं थे। पढ़े-लिखे थे नहीं। उनका किसी भी तरह के ढंग के काम से कोई लेना-देना नहीं था। वे शक्ल से एकदम जाहिल और खौफनाक थे। 

बख्तियार ने अवध में रुककर यहीं के ठिकाने से बिहार में बड़े धावे मारने शुरू किए। मिनहाज़ बताता है-

“शुरुआती बहादुरी से ही उसे भीवली या भगवत नाम की एक जगह का अधिकार मिल गया (यह आज के मिर्जापुर जिले की चुनार तहसील में कहीं है। गंगा किनारे चुनार के किले में पृथ्वीराज चौहान के समय की एक शानदार बावड़ी अब भी है। दूर-दूर तक सब पर कब्जे शुरू हो चुके थे।)।

वह मुनेर और बिहार में धावे मारता और बहुत सा माल लूटकर लाता। इस तरह उसके पास बहुत से घोड़े, हथियार, फौजी साजो-सामान और दौलत जमा हो गई। लूटमार से दौलत इकट्‌ठा करने में ही वह इतना प्रसिद्ध हो गया कि खिलजियों के कबीले उसके पास इकट्‌ठा हो गए। तब दिल्ली में सुलतान कुतबुद्दीन को भी उसकी खबर हुई…।”

दिल्ली में जम चुके हमलावर हुक्मरानों की नजर में काबिलियत का पैमाना क्या होगा? हमले, कत्ले-आम, लूटमार, बेरहमी और क्या? दिल्ली में बख्तियार की भारी इज्जतअफजाई हुई। सुलतान ने उसे खिलअत भेजी। यह एक किस्म की सरकारी मान्यता थी कि वह जो करना चाहता है, खुलकर करे। अपनी पूरी ताकत पूरी आजादी से आजमाए। मिनहाज़ की “ब्रेकिंग न्यूज़ है

“इस प्रकार दिल्ली की जानिब से इज्जत हासिल करके जनाब बख्तियार ने बिहार पर चढ़ाई की और इस इलाके को रौंदकर रख दिया। दो सालों तक उसने बिहार के कई इलाकों पर हमले किए। वह दो सौ सवारों को लेकर बिहार के किले के दरवाजे पर जा पहुँचा।

बंगाल की यात्रा के दौरान लखनौती में मिनहाज़ सिराज एक ऐसे आदमी से मिला था, जो बख्तियार के साथ बिहार की बरबादी में साथ रहा था। उसका नाम है- समसामुद्दीन। यह शख्स अपने सगे भाई निजामुद्दीन के साथ बख्तियार की लुटेरी फौज में थे। दोनों ही फरगना के रहने वाले थे। (यह तीन सौ साल बाद दिल्ली पर कब्ज़ा करने वाले मुगल हमलावर बाबर का मूलस्थान है। ताज्जुब नहीं कि बाबर ने अपने उस उजाड़ इलाके से पहले दिल्ली पर हमले और लूट में शामिल हो चुके कुछ तजुर्बेकारों से यहाँ के किस्से सुन रखे हों)।

 बिहार के जिस किले के दरवाजे तक जा पहुँचने का ज़िक्र मिनहाज़ ने किया है, उस खबर का स्त्रोत यही समसामुद्दीन है, जो उस समय ‘स्पॉट’ पर मौजूद था। बिहार के लोगों के लिए आज भी नींद उड़ा देने वाली इतिहास की सबसे अहम जानकारी का सबसे भरोसेमंद स्त्रोत। बिहार में वह किले का दरवाजा कहां का है, जहाँ खिलजियों की दाढ़ में खून लगा था। 

यह नालंदा की ‘लाइव स्टोरी’ है। सदियों पुराना यह विश्वविद्यालय इतने बड़े इलाके में फैला था कि बख्तियार के जाहिल जांबाज़ इसे ही बिहार का किला समझ रहे थे। मिनहाज़ सिराज की रिपोर्ट

“जब हमलावर किले के दरवाज़े पर पहुंचे तो जंग शुरू हो गई। इन दोनों भाइयों ने बड़ी बहादुरी दिखाई। मुहम्मद बख्तियार खिलजी किले के पीछे के फाटक पर पहुँच गया और किले पर कब्ज़ा कर लिया तो उन्हें बेहिसाब दौलत वहाँ मिली।

उस जगह के निवासियों में बहुत बड़ी तादाद ब्राह्मणों की थी। वे लोग अपने सिर मुंडाए रहते थे। वे सबके सब मारे गए। वहां उनको बहुत बड़ी तादाद में किताबें मिलीं। जब यह किताबें मुसलमानों ने देखीं तो उन्होंने कुछ हिंदुओं को बुलवाकर उन किताबों को पढ़वाना चाहा, लेकिन सारे ही जानकार मारे जा चुके थे। किताबों से ही यह पता चला कि वह पूरा किला और शहर एक विद्यालय था। हिंदवी में बिहार विद्यालय को कहते हैं।”

जिसे बख्तियार की फौज एक किला समझ रही थी, वह दरअसल नालंदा विश्वविद्यालय ही था। वह सिर घुटाए भिक्षुओं को ब्राह्मण लिख रहा है। बख्तियार खिलजी का यह पहला बड़ा कारनामा था, जो सुलतान कुतबुद्दीन एबक से इज्जत और मान्यता हासिल करने के बाद दोगुने जोश के साथ किया गया था।

वह इस फतह के बाद बेहिसाब लूट का माल लेकर सुलतान के दरबार में हाजिर हुआ। सुलतान इस कदर खुश हुआ कि भरे दरबार में बख्तियार की शानदार इज्जत अफजाई हुई। यह नज़ारा देखकर दिल्ली के बाकी दरबारी बख्तियार से जल-भुन गए। एक जलसे में बख्तियार पर तंज कसे गए। उसे राज भवन में एक हाथी से लड़ने पर मजबूर कर दिया गया।

बख्तियार ने हाथी की सूंड पर गदा मारकर उसे भगा दिया। सुलतान ने इस कामयाबी पर उसे ढेरों इनाम दिए और अपने अमीरों को हुक्म दिया कि वे भी उसे ईनाम दें। वे तोहफे बख्तियार ने वहीं दरबारियों में बांट दिए और बिहार की तरफ लौट गया। देखिए बिहार से कितना गहरा नाता हुआ बख्तियार का?

नालंदा एक आवासीय बौद्ध विश्वविद्यालय था, जो करीब 600 सालों से ज्ञान के सबसे बड़े केंद्र के रूप में बिहार की आन, बान, शान का बेमिसाल नमूना था। करीब 10,000 विद्यार्थी और 3,000 आचार्य बौद्ध भिक्षु वहां रहते थे। मशहूर चीनी यात्री व्हेनसांग सातवीं सदी में यहाँ आकर खुद पढ़ा और फिर पढ़ाया भी।

नालंदा विश्वविद्यालय के आज दिखाई देने वाले खंडहर उसके असली आकार की एक छोटी सी झलक ही पेश करते हैं, जहाँ क्लासरूम से लेकर होस्टल के रूम तक आज भी सब दिखाई देते हैं। इस किलेनुमा विश्वविद्यालय में तीन बहुमंजिला इमारतें सिर्फ लाइब्रेरी की थीं, जहां हजारों पांडुलिपियों का जखीरा मौजूद था। नालंदा की खुदाई में राख की परतें मिलीं हैं, जिनमें जले हुए अनाज भी हाथ आए हैं। राख की परत में और न जाने क्या-क्या खाक हो गया। महीनों तक ये इमारतें आग के शोलों में दहकती रही थीं।

इस भीषण तबाही के बाद इस पूरे इलाके पर बख्तियार खिलजी खौफ का ही दूसरा नाम हो गया। उसके चर्चे बंगाल के पार आज के असम तक जा फैले। मिनहाज सिराज के ब्यौरों में नालंदा की तबाही एक शुरुआती दर्दनाक कहानी भर है। इसके बाद बेखौफ बख्तियार आज के बंगाल में नादिया (नबद्वीप) में राय लखमनिया के राज्य का रुख करता है। बिहार के लिए इतना ही काफी था। हज़ारों साल की विरासत मिट्‌टी में मिला दी गई थी। नई पहचानों के साथ अपने ही लोगों की एक नई जमात जड़ें जमाने लगी। पुरखे गड्डमड्‌ड हो गए।

अखंड बंगाल के समस्त देवी-सज्जन ध्यान दें कि मिनहाज ने उनके लिए क्या लिख रखा है-

“लखमनिया 80 सालों से राज्य कर रहा था। वह गर्भ में ही था, जब उसके पिता की मृत्यु हो गई थी। राजमुकुट माता के पेट पर रख दिया गया था। हिंदू राजा उसके वंश को बहुत इज्ज़त देते आए हैं और वह हिंद का खलीफा समझा जाता है।

एक खास घड़ी में लखमनिया की पैदाइश तय करने के लिए उसकी माँ के दोनों पैर बांधकर सिर नीचा करके लटका दिया गया था। ऐसा उसकी माँ ने ही ज्योतिषियों की सलाह पर किया था कि वह किस घड़ी पैदा होगा तो 80 साल राज्य करेगा। उसके पहले हुआ तो बहुत अशुभ होगा। माँ ने उस घड़ी तक प्रसव को रोककर रखा। लखमनिया ने अपने राज्य में किसी कमज़ोर पर कभी कोई अत्याचार नहीं किया। कोई उससे कुछ मांगता तो वह दानी कम से कम 1 लाख का दान करता था…।”

बख्तियार खिलजी 18 सवारों के साथ नबद्वीप पहुँचता है और एक साजिश के तहत यह अफवाह फैलाई जाती है कि एक बड़ी फौज पीछे आ रही है। अपनी पहचान छुपाकर वह नगर में धोखे से दाखिल हुआ। लोगों ने उसे कारोबारी समझा, जो घोड़े बेचने आए हैं। राय लखमनिया के महल के सामने पहुँचकर सबने अपनी तलवारें खींच लीं। कोई वजह नहीं थी। बस एक और जंग शुरू हो गई।

राय लखमनिया तब भोजन के लिए महल में बैठे ही थे। राजमहल के परिसर में हुए इस अचानक हमले से मचे हाहाकार ने उसे चौकन्ना कर दिया। जब तक वह खुद आकर देखता महल के भीतर कई लोग मार डाले गए। सोने-चांदी के बरतनों में परोसा गया लजीज भोजन फरगाना के सम्सुद्दीन ने अपनी आँखों से देखा था।

राय लखमनिया भूखा ही अपनी जान बचाकर भाग निकला। उसके राज्य का खजाना, हाथी, घोड़े, महल, औरतें, बच्चे, लाव-लश्कर पर बख्तियार ने कब्जा कर लिया। मुसलमानों को इतनी दौलत मिली कि उसका ज़िक्र ही मिनहाज़ की नज़रों में नामुमकिन है। ये मिनहाज़ सिराज के दिल दहलाने वाले ब्यौरे हैं, जो आगे हमें बताता है-

“मुहम्मद बख्तियार ने नबद्वीप पर कब्जा जमा लिया। फिर उसे बरबाद करके छोड़ दिया और उस जगह पर, जो अब लखनौती के नाम से मशहूर है, अपनी राजधानी बनाया। उसने फिर आसपास के सूबों पर कब्जे जमाए। हर जगह अपने नाम के सिक्के चलाए। उसकी और उसके अमीरों की कोशिशों से मदरसे और मस्जिदें बनने लगीं। बंगाल की लूट के माल में से बहुत कुछ उसने सुलतान कुतबुद्दीन को भी भेजा।”

नालंदा और नबद्वीप की बरबादी के बाद भी उसके कत्ल, कब्जे और लूट की कहानी चलती रही। तलवार के जोर पर इस्लाम के फैलाव की यह ताकतवर शुरुआत थी। लालच और डर से जैसे भी हो, धर्मांतरण का संक्रमण यहाँ भी तेज़ी से फैला।

हमें हैरत नहीं होनी चाहिए कि कुछ ऐसे भी स्थानीय मुसलमान आज मिल जाएं, जो बड़े फख्र से मुहम्मद बख्तियार से अपनी बल्दियतें जोड़ते हों। बहुत मुमकिन है कि अपने बदकिस्मत हिंदू पुरखों का पता उनकी याददाश्त से साफ ही हो गया हो या वे ऐसा जाहिर करें कि उनका मूल निवास प्रमाणपत्र तो फरगाना का है।

बिहार की गुमशुदा याददाश्त में नालंदा और विक्रमशिला जैसी महान विरासत मिट्‌टी के टीलों में खोई रहीं लेकिन मुहम्मद बख्तियार खिलजी का नाम बड़ी हिफाजत से महफूज रह गया। कितनी अजीब बात है कि बिहार के जागरूक, प्रबुद्ध और कृतज्ञ नागरिकों ने आजादी के 72 साल बाद भी अपने एक पुराने शहर को उसके नाम पर बनाए रखा है- बख्तियारपुर जंक्शन!

नालंदा की 800 साल पुरानी लाश के दर्शन के लिए आज भी हम नालंदा के हत्यारे के नाम से चमक रहे इसी बेसुध शहर से होकर गुज़रते हैं।

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विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com