भारती
मांस का सेवन जीवन के प्रति मृदुता और हृदय में करुणा के विरुद्ध है- कुरल भाग 10

मांस का सेवन न करें

वह व्यक्ति कैसे करुणामयी हो सकता है जो दूसरे प्राणियों के मांस का उपभोग अपना मांस बढ़ाने के लिए करता है?

मांस का सेवन जीवन के प्रति मृदुता और हृदय में करुणा के विरुद्ध है। कोई कितना भी तर्क दे लेकिन प्रकृति इस विपरीतता के अनुकूल काम नहीं करती। यदि आपको मांस खाना ही है तो करुणा की बात करना छोड़ दें।

हाथ में चाकू धारण करने वाला कसाई अपने हृदय में करुणा को स्थान नहीं दे सकता है। और ऐसा ही उस व्यक्ति के लिए है जिसने कुछ मसालों के साथ दूसरे प्राणी का मांस खाने में सुख पाने के लिए अपने मस्तिष्क को तैयार कर लिया है।

जिसे मांस का स्वाद पसंद है, वह एक कसाई है, भले ही इस व्यवसाय को कितनी ही हीन दृष्टि से देखा जाए। मांस खाने और पशु हत्या में कोई अंतर नहीं है।

जो मांस किसी को मारकर मिला हो, उसे खाना सबसे बड़ी मूर्खता है। मांस खाना करुणा के सिद्धांत के पूर्णतः विपरीत है। मांस खाकर आप अहिंसा के सिद्धांत को बढ़ावा देने की बजाय दूसरों को हत्या करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

हत्या न करने के सिद्धांत को तोड़ने के लिए दूसरे को विवश करना करुणा भाव के विपरीत है। इसलिए वे लोग जो स्वयं हत्या नहीं कर सकते, उन्हें मांस खाने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि यह मांस हत्या करके ही प्राप्त हुआ है। यह उनके विरोध का एक तरीका है जो लोग मांस खाते हुए अहिंसा का पाठ पढ़ाते हैं, और उनके विरोध में भी है जो तर्क देते हैं कि भोजन नियमों को करुणा भाव से नहीं तौलना चाहिए।

यदि लोग निर्णय कर लें कि वे भोजन के लिए किसी की हत्या नहीं करेंगे तो प्राणियों की हत्या का कोई व्यापार नहीं करेगा, न ही कोई इसे अपना व्यवसाय बनाएगा।

यह उस तर्क का उत्तर है कि मांस बेचना भी एक रोजगार है और यदि हम पहले से मारे गए प्राणी को खाएँ तो इसमें कोई पाप और करुणा की क्षति नहीं है।

मांस क्या है? किसी दूसरे प्राणी के शरीर पर एक घाव का क्रूर और अभद्र सूचक ही तो है। जो व्यक्ति यह समझता है, वह इसका सेवन कैसे कर सकता है?

कवि कहते हैं कि कितना विचित्र है कि लोग ऐसी घृणित और क्रूर वस्तु को भोजन मानते हैं।

सहस्त्रों हवन करने से अधिक पुण्यकारक है किसी प्राणी को मारकर उसे खाने की क्रिया को त्याग देना।

उस व्यक्ति की पूजा सभी प्राणी करते हैं जो पशु हत्या करने से बचता है और मांस का सेवन नहीं करता।

कवि मूक प्राणियों की भावनाओं का वर्णन ऐसे करते हैं जैसे ईश्वर का कोई स्वरूप पृथ्वी पर उनकी रक्षा के लिए आया हो।

भूखे व्यक्ति से अपना भोजन बाँटें और सभी प्रकार के प्राणियों की सहायता करें। किसी भी प्राणी की हत्या का कारण बनने से बचें।

जीवन अमूल्य है लेकिन अपना जीवन बचाने के लिए भी किसी और प्राणी का जीवन न लें।

अगले अंक में जारी…