भारती
आत्मनिर्भर भारत का क्या अर्थ होना चाहिए, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए क्या करें-न करें

“आत्मनिर्भर भारत” के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान को कम या अधिक आँकने की संभावना है। लाइसेंस-अनुमति राज, आयात प्रतिस्थापन नीति, अनुपयुक्त उत्पादन स्तर और दरिद्र गुणवत्ता को जिन लोगों ने झेला है, वे भयभीत हैं कि हम पुनः उस राह पर चल देंगे।

स्वदेशी विचारधारा के लोग मानते हैं कि अपने उत्पादकों के मूल्य पर हम वैश्विक हितों के विषय में सोच रहे हैं। वे हमारी आत्मनिर्भरता को और स्वदेशी बनाना चाहते हैं, कम नहीं।

समस्या है कि आत्मनिर्भर शब्द मस्तिष्क में विभिन्न चित्रों और विचारों का सृजन करता है। इसको विस्तृत रूप से समझाया भी नहीं गया है, हालाँकि मोदी सरकार के कुछ मंत्रियों ने कहा है कि हम 1991 के पूर्व वाली आयात प्रतिस्थापन नीति पर नहीं लौटेंगे जो एक बड़ी भूल थी।

इस शब्द को समझने के लिए इसकी दो आवश्यकताओं को समझें। आत्मनिर्भर का अर्थ हुआ कि भारत में उपभोक्ता वर्ग की बड़ी अर्थव्यवस्था का उपयोग करके देश को घरेलू और निर्यात बाज़ारों की माँग पूरी करने में सक्षम बनाया जाए। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हर उत्पाद या सेवा में हम आत्मनिर्भर बनें क्योंकि यह तुलनात्मक लाभ के विरोध में काम करेगा।

तीन प्रमुख क्षेत्रों- कृषि, विनिर्माण और सेवाओं की बात करें तो हम कृषि और सेवाओं में आत्मनिर्भर हैं लेकिन विनिर्माण में कुछ नहीं है। कृषि और सेवाओं में हम अपनी आत्मनिर्भरता कम करके विश्व स्तर और प्रतिस्पर्धा के विषय में सोच सकते हैं। वहीं विनिर्माण में हमें अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी, साथ ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा से बाहर भी नहीं होना है।

हम अगला चीन नहीं बन सकते हैं जो विश्व का कारखाना है क्योंकि विश्व व्यापार का वातावरण अधिक संरक्षणवादी हो गया है लेकिन हम कई उत्पादों में घरेलू माँग को पूरा करने के साथ वैश्विक स्तर पर मूल्य के मामले में प्रतिस्पर्धा दे सकते हैं।

वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण की हिस्सेदारी 15-18 प्रतिशत है जिसे बढ़ाकर हमें कम से कम 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य करना चाहिए। यदि विचार केवल आयात प्रतिस्थापन का है तो इसे करने का कोई लाभ नहीं है।

निरंतर विफल होती आई हमारी औद्योगिक नीति का नया स्वरूप है आत्मनिर्भर भारत। लाइसेंस-अनुमति राज से शुरू करके हम आयात प्रतिस्थापन पर आए और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को नई ऊँचाइयाँ दीं, हम विफल हुए।

1991 के बाद लाइसेंस-अनुमति राज ने विनियामक राज का रूप धर लिया और निहित स्वर्थों के साथ बने नियमों ने लाइसेंस-अनुमति राज की भूमिका ही निभाई। हम पुनः विफल हुए।

हमने पूंजी नियंत्रण में छूट दी लेकिन भूमि और श्रम जैसे अन्य कारकों को मुक्त नहीं किया जिस कारण से भारी स्वचालन और पूंजी लागत के साथ कुछ क्षेत्रों में विनिर्माण सफल हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया में हमने अपने बैंकों को लूटकर पूंजीवादियों को संपन्न कर दिया।

विनिर्माण क्षेत्र में हम किसी प्रकार का वैश्विक स्तर या प्रतिस्पर्धा प्राप्त नहीं कर पाए। रत्न, आभूषण और दवा उद्योग कुछ अपवाद हैं। लेकिन इन क्षेत्रों में भी इनपुट भारी आयात पर निर्भर है। पूर्ण आत्मनिर्भरता का विचार छोड़ दें तो इन क्षेत्रों में हम आत्मनिर्भर हैं।

1980 के दशक में लाइसेंस-कोटा सीमाओं में कुछ छूट देने वाली इंदिरा गांधी की नीतियों से हमने निर्यात प्रसंस्करण ज़ोन और विशेष आर्थिक ज़ोन की स्थापना (जो अपेक्षा से कम सफल रहे), से लेकर यूपीए की नई विनिर्माण नीति (जो शुरू नहीं हो पाई) और मोदी के मेक इन इंडिया (जिसके कुछ ही परिणाम देखने को मिले हैं) तक औद्योगिक नीतियों के कई संस्करणों को अपनाकर देखा है।

इनमें से कोई भी नीति विनिर्माण क्षेत्र में हमें प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने में सहायता नहीं कर पाई, हमारी सुई वहीं अटकी रह गई। इस प्रकार आत्मनिर्भर भारत विनिर्माण नीति का नया संस्करण है जिसे मेक इन इंडिया 2.0 भी कहा जा सकता है।

क्या यह मेक इन इंडिया 1.0 से बेहतर कार्य कर पाएगी? यह काम कर सकती है यदि इससे जुड़े सभी भागों को बाधारहित किया जाए। इसका अर्थ हुआ कि निम्न क्षेत्रों में बड़े परिवर्तन करने होंगे-

पहला, बंदरगाह आधारित विनिर्माण क्षेत्रों की ओर हमें बढ़ना होगा ताकि कम साधन के उपयोग से लागत बचाई जा सके। वर्तमान में भारतीय बंदरगाहों से यूएस के पूर्वी तट तक सामान पहुँचाने में 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार हमें 21-28 दिन लगते हैं, वहीं चीन को 14।

सड़क परिवहन में हमारी लागत 7 डॉलर प्रति किलोमीटर है, वहीं चीन की 2.4-2.5 डॉलर, श्रीलंका की 3 डॉलर और बांग्लादेश की 3.9 डॉलर। साधन लागत को कम किए बिना हम चीन से बाहर निकल रही आपूर्ति शृंखलाओं को आकर्षित नहीं कर पाएँगे। इसके लिए आवश्यक है सड़क, रेलवे और बंदरगाह इंफ्रास्ट्रक्चर (आधारभूत ढाँचे) को बेहतर करने की।

दूसरा, राज्यों को अपने प्रयास बढ़ाने होंगे। 1991 से अधिकांश सुधार दिल्ली के नेतृत्व में हुए हैं लेकिन राज्य मूर्छित पड़े हुए हैं। भूमि, बिजली, श्रम और इंफ्रास्ट्रक्चर सभी को बड़े सुधारों की आवश्यकता है, अधिकांश सुधार राज्य स्तर पर हो सकते हैं।

नगर इंफ्रास्ट्रक्चर की हालत बुरी है और संपत्ति कर (विशेषकर स्टाम्प शुल्क और अनुमति हेतु अतिरिक्त शुल्क) अचल संपत्ति को क्रय हेतु अयोग्य बना रहे हैं। जब सही किराए पर कार्यालय के स्थान नहीं मिलेंगे तो आप बड़ी कंपनियों को कैसे आकर्षित करेंगे। आत्मनिर्भर बनने के लिए सुधारों का केंद्र राज्य सरकार और नगर प्रशासन होने चाहिए।

तीसरा, हमारा विवाद निपटान तंत्र बहुत बुरा है। वर्षों तक याचिका कियए बिना अनुबंध लागू करना असंभव है। पुलिस, कानूनी और न्यायिक तंत्र भ्रष्टाचार और विलंब से ग्रसित है। व्यापार करने की वर्ल्ड बैंक की पिछली सूची में भारत 163वें स्थान पर था और संपत्ति पंजीयन में 154वें स्थान पर।

भारत में संपत्ति पंजीयन में 58 दिन और संपत्ति के मूल्य का 7.8 प्रतिशत लगता है। व्यावसायिक विवादों के निपटान में 1,445 दिनों का समय लगता है, लगभग चार वर्ष और यदि उच्चतर न्यायालयों में अपील हो तो उसका समय अलग। प्रतिस्पर्धा केवल उत्पाद बनाने और यातायात की भौतिक लागत में नहीं है बल्कि भारत में कार्य करने के छुपे हुए मूल्यों में भी है।

चौथा, विशेष उद्योगों को हम प्रोत्साहित कैसे करें, इसपर पुनर्विचार करना होगा। आत्मनिर्भरता का अर्थ उद्योग में आत्मनिर्भर बनना नहीं है, बल्कि उन उद्योगों को बेहतर करना है जहाँ हम वैश्विक प्रतिस्पर्धी हन सकें।

उदाहरण स्वरूप, भारत के पास विश्व का सबसे बड़ा बॉक्साइट भंडार है जिससे हमार नीति निर्माताओं ने निर्णय किया कि हम एलुमिना और एलुमिनियम बनाएँ। लेकिन एलुमिनियम बनाने की 50 प्रतिशत लागत बिजली की होती है और भारत में उद्योग के लिए बिजली विश्व में सबसे महंगी है।

ऐसे में स्पष्ट रूप से भारतीय कंपनियों को सस्ती बिजली वाले देशों जैसे कनाडा या ऑस्ट्रेलिया में एलुमिनियम बनाना चाहिए, न कि भारत में। लेकिन हम स्टील का निर्माण कर सकते हैं क्योंकि हमारे पास इसके लिए आवश्यक कच्चे धातु और कोयला दोनों हैं। हमें स्टील का निर्यात करना चाहिए, इसके कच्चे धातु का नहीं।

रक्षा लागत से अधिक सुरक्षा का क्षेत्र है और इसमें हमें पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर बनना होगा। रसायन-शास्त्र में हमारी निपुणता के अनुसार दवा उद्योग में हमें न सिर्फ आत्मनिर्भर बल्कि एक बड़ा निर्यातक भी होना चाहिए।

लेकिन शोध एवं विकास केंद्र हमें पश्चिम में स्थापित करने चाहिए क्योंकि वहाँ नए तत्वों की खोज और बौद्धिक संपदा संरक्षण का अच्छा माहौल है। वैज्ञानिक कार्यबल के अभाव में हम लघु अवधि में भारत में दवा का शोध एवं विकास नहीं कर सकते, अन्यथा इसका परिणाम सॉफ्टेवयर सेवाओं जैसा होगा।

सार्वजनिक परिवहन की हमारी आवश्यकता को देखते हुए हमें बस, ट्रक और रेल डिब्बों में विश्वगुरु होना चाहिए था लेकिन हमने कार की ओर रुख किया। दो-पहिया वाहन हमारी सड़कों पर भरे हुए हैं जो व्यक्तिगत यातायात का प्रमुख साधन हैं।

चमड़ा और कपड़ा उद्योग में हम आगे बढ़ सकते हैं लेकिन फुटवियर (जूते आदि) में चमड़ों का प्रचलन कम होता जा रहा है और बिना चमड़े वाले जूते यूरोप और अमेरिका की 3-डी प्रिंटिंग व अन्य पूंजी आधारित उद्योगों में सरलता से बन सकते हैं।

इस प्रकार हमारे चमड़ा उत्पादों को शीर्ष दर्जे का और मूल्य संवर्धित बनना होगा। कपड़ा उद्योग में अवसर अधिक है यदि हम साधन और श्रम लागत को कम करके स्वचालन अधिक कर पाएँ।

इसी तर्क से गैर-विनिर्माण यानी कृषि और सेवा क्षेत्र में भी हम आगे बढ़ सकते हैं।

कृषि के लिए अच्छा है कि हम कृषि उत्पाद बाज़ार समिति (एपीएमसी) और आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कर रहे हैं जिससे पहले तो कृषि उत्पाद का एक राष्ट्रीय बाज़ार बनेगा और फिर हम मनमने नियंत्रणों से मुक्त निर्यात बाज़ार को विकसित कर सकते हैं।

यह बात अवश्य है कि हम जितनी फसलें उगा रहे हैं, वे सभी हमें उगानी चाहिए लेकिन हमें अधिक पानी की माँग करने वाली चावल और गन्ने को कम करके गेहूँ, मोटे अनाज, नकदी फसल और बागवानी पर अधिक ध्यान देना चाहिए। चावल का निर्यात करके हम एक तरह से जल अभाव झेल रहे उप-महाद्वीप से जल का निर्यात कर रहे हैं।

चावल केवल जल से परिपूर्ण गंगा और नर्मदा की घाटियों में उगाया जाना चाहिए, दक्षिण में अधिक नहीं। निर्यात निरर्थक हैं, अन्यथा इनमें कुछ मूल्य संवर्धन हो जैसे बासमती चावल। भौगोलिक संकेतों के आधार पर हम ब्रांड बना सकते हैं जैसे सूरती कोलम, सीहोर गेहूँ, आदि लेकिन कच्चे चावल का निर्यात धीरे-धीरे कम करके शूनिय कर देना चाहिए।

हम चीनी के आयात पर भी विचार कर सकते हैं जिससे हम मूल्य संवर्धित चीनी उत्पादों (कैंडी, लेप या चीनी प्रतिस्थापन उत्पाद) का निर्यात कर सकें। मूल्य संवर्धित और ब्रांडेड खाद्य उत्पादों का निर्यातक भारत को बनना चाहिए, न कि कच्चे अनाज, फल और सब्ज़ी का।

सेवाओं के मामले में भी हमें राष्ट्रीय होने की बजाय अंतर्राष्ट्रीय बनना चाहिए। हम विश्व के सबसे बड़े अपतटीय गंतव्य हैं लेकिन बौद्धिक संपदा (आईपी) विकसित करके हम अपना मूल्य बढ़ा सकेंगे, न कि श्रम क्रय-विक्रय सेवा से।

इसका अर्थ हुआ कि भारत को विदेश में कंसल्टिंग और आईपी कंपनियों की खरीद में निवेश करना चाहिए और कम मूल्य वाली आईटी श्रम सेवाओं के निर्यात पर कम निर्भर रहना चाहिए। आईटी सेवाओं में हमें कम आत्मनिर्भर बनना होगा और वैश्विक कौशल व आईपी में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी क्योंकि वर्तमान में इन बढ़ते क्षेत्रों में हमारे पास कोई विशेषता नहीं है।

एचसीएल टेक की तरह आगे बढ़ा जा सकता है जैसे उसने लोटस नोट्स समेत आईबीएम के कुछ आईपी उत्पादों को खरीदा था। 15 वर्ष पहले जो भारत के मूल्य संवेदनशील बाज़ार में आईबीएम का स्थान था, वह आज लेनोवो का है।

पाँचवा, जिन क्षेत्रों में भारत के पास कौशल है लेकिन संसाधन नहीं, वहाँ हम लगभग सही कर रहे हैं जैसे रत्न और आभूषण उद्योग में लेकिन निस्संदेह रूप से हमें उच्च मूल्य वाले हीरों की श्रेणी में काम करना चहािए जहाँ वर्तमान में इज़रायल और बेल्जियम का वर्चस्व है।

हमें श्रम आधारित छोटे रत्न और आभूषण बाज़ार तो चाहिए ही लेकिन हमें स्वचालन भी बढ़ाना होगा और वैश्विक ब्रांडों को भी स्वयं को आपूर्ति शृंखला में ऊपर उठाने के लिए खरीदना होगा। वर्तमान में हम रत्न और आभूषण बाज़ार में टुकड़ों पर जी रहे हैं लेकिन यहाँ हमारा नारा आत्मनिर्भर नहीं विश्व को भारत पर निर्भर बनाने का होना चाहिए।

छठा, हमें एक उद्योग समूह और कुछ विशेषज्ञता प्राप्त नौकरशाहों की आवश्यकता है जो समय-समय पर हर उत्पाद समूह की शुल्क संरचनाओं- आंतरिक (जीएसटी) और बाहरी (कस्टम और अन्य शुल्क)- की जाँच करते रहें जहाँ कई बार उलटी संरचना होती। उलटी शुल्क संरचना का अर्थ है कि कई बार कच्चे माल व इनपुट पर शुल्क अधिक लगता है और अंतिम उत्पादों पर कम होता है जो भारत में विनिर्माण को अव्यवहार्य बनाता है।

उलटी शुल्क संरचनाओं को हमें निर्णय लेकर समाप्त करना चाहिए ताकि हम न सिर्फ आत्मनिर्भर बल्कि जिन क्षेत्रों में हम तुलनात्मक रूप से लाभ की स्थिति में हैं, वहाँ वैश्विक प्रतिस्पर्धी भी बन सकें।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।