भारती
अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर इस दार्शनिक शासक को श्रद्धांजलि

एक अच्छा नेता वह होता है जिसके पाँव धरती पर गड़े हों। एक असाधारण नेता वह होता है जिसके पाँव धरती पर गड़े हों और आँखें आकाश में क्षितिज पर हों। आज जब वाजपेयी जी की पहली पुण्यतिथि है, हम पाते हैं कि यह हमारा सौभाग्य रहा कि हमें ऐसे असाधारण नेतृत्व का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

राष्ट्र एक चलता हुआ चक्र है जो निरंतर गतिमान रहता है। राष्ट्र की गति निरंतर और स्मृति लघु होती है। आमतौर पर साहित्यिक संवेदना तथा बौद्धिक विचार और सत्ता में एक दूरी रहती है। चाणक्य और चंद्रगुप्त, पंडित नेहरू और दिनकरभिन्न व्यक्ति होते हुए अपनी अपनी संवेदनाओं और अभिलाषाओं से जुड़े होते हैं। 

रियल पोलीटिक या ज़मीनी राजनीती का साहित्य से एक दुराव-सा रहता है। यहाँ कुछ लोग जो बुद्धिजीवियों के राजनैतिक तंत्र के उपयोगी यंत्र बन जाने के विरोध से इस विषय पर एक उहापोह में स्वयं को फँसा हुआ पाएँगे, परंतु मैं प्रयास करता हूँ। 

साहित्य सत्ता में संवेदना का संरक्षक है। साहित्य नीतियों में नैतिकता का मानदंड निर्धारित करता है। समस्या बुद्धिजीवियों के राजनीति में आने से नहीं है, वरन उनके छुप-छुप के आने से है। समस्या उनसे हैं जो कूटनीति के कुटिल हाथों को किराए पर कलम सौंप देता है। साहित्यकार सत्ता में आए तो राजनीति के सूखे नेत्रों में स्वप्न श्वास लेने लगते हैं। नेता की साहित्यिक समझ उसकी राजनीति को इतिहास के परिप्रेक्ष्य और भविष्य की संभावनाएँ देती है।  

जब हम अटल जी के व्यक्तित्व को देखते हैं तो उसकी विजय राजनीतिक जय-पराजय की परिधि से बाहर जाती है। एक कवि का विशिष्ट गुण विपरीत परिस्थितयों में अपने स्वप्न और सिद्धांत पर विश्वास को अडिग रखने का साहस होता है। राजनेता वाजपेयी की दृढ़प्रतिज्ञता कवि के इसी साहस और ज़िद का प्रतिबिंब है।

एक राजनातिक मरुभूमि से निकाल कर विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी की नींव डालना एक सपनों में विश्वास रखने वाली साहित्यिक शख्सियत के लिए ही संभव था। इसी बौद्धिक साहस ने हर पराजय के बाद भारतीय जनता पार्टी को और अधिक सशक्त बना कर खड़ा किया, जब उन्होंने तेरह दिन के प्रधानमंत्री के रूप में तब तक का सबसे असहिष्णु विपक्ष देखा। 

कवि हृदय की कोमलता उनकी कमज़ोरी कभी नहीं बनी। विपरीत इसके वैचारिक स्पष्टता ने उन्हें एक सैद्धांतिक ढृढ़ता, सांस्कृतिक चेतना और एक सार्वजनिक संवेदना प्रदान की जिसका पहला विस्तार आपातकाल के बाद देखने को मिला, जब जनसंघ जनतंत्र की रक्षा के लिए एक क्रूर तानाशाही सत्ता के समक्ष विपक्ष की रीढ़ बन कर खड़ा हुआ और हर कोने से स्वर उठा- 

“अटल बिहारी बोल रहा है, इंदिरा शासन डोल रहा है।” 

इसी सैद्धांतिक ईमानदारी को परिलक्षित करते हुए शैली  ने लिखा था-

“कवि उन दर्पणों के विशालकाय प्रतिबिंब जिनपर भविष्य प्रतिबिंबित होता है।… एक अप्रत्यक्ष वैश्विक विधायिका के विधायक होते हैं।”

जब प्रधानमंत्री वाजपेयी राजधानी में मेट्रो रेल की परिकल्पना प्रस्तुत करते हैं, अटल आवास योजना, प्रधानमंत्री सड़क योजना की बात करते देखते हैं, हम ऐसे भविष्यदृष्टा को देखते हैं जिसके हृदय में पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के लिए संवेदना एवं स्वप्न दोनों हैं। 

अपनी संवेदना, अपने जन-स्नेह के कारण अटल जी की दृढ़ता में दरक नहीं पड़ती। उनके संकल्प में संदेह की परछाईं नहीं है, जब वे परमाणु परीक्षण को स्वीकृति देते हैं, या कारगिल युद्ध में स्पष्ट ह्रदय और विश्वास के साथ विजय के लिए उतरते हैं। यह अटल, नैतिक है, निर्भीक है, अटल है। यह अटल सत्ता का व्यापार नहीं करता और यह कहता हुआ सिंहासन ठुकरा कर चल देता है-

“सरकारें आती रहेंगी, जाती रहेंगी; लोकतंत्र बचा रहना चाहिए।“

कन्हैयालाल मुंशी, डॉ राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल की विरासत के मिटा दिए जाने के बाद वाजपेयी जी में भारत भूमि ने एक ऐसा राजनेता पाया जो एक गौरवपूर्ण स्वाभिमान के साथ अपनी भारतीय हिंदू जड़ों को समर्पित था। छद्म धर्मनिरपेक्षता को डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा नेहरू के विरोध के बावज़ूद किये गए सोमनाथ के उद्घाटन के बाद दूसरा सशक्त उत्तर शायद अटलजी के स्वर में ही मिला जब उन्होंने लिखा- हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय

संभवतः भारतीय राजनीति से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक मुखौटे लगाने की परंपरा की समाप्ति की भूमिका अटल जी ने ही प्रारंभ की। उन्होंने उस भारत को स्वीकार्यता दी जिसमे एक बिस्मिल या लाला लाजपत राय हिंदू होकर और एक अशफ़ाक़ मुस्लमान होकर भी देशभक्त और धर्मनिरपेक्ष हो सकते थे। 

उन्होंने जालीदार टोपी और झूठे जनेऊ से भारतीय राजनीति को मुक्त किया जिसे आज हम नरेंद्र मोदी की सफलता और राहुल गांधी की हताशा में देखते हैं। सुकरात  ने लिखा था-

“जब तक दार्शनिक ज्ञान और राजनैतिक शक्ति का एकीकरण नहीं होता समस्याओं का समाधान न तो राष्ट्र के लिए, न ही मानवता के लिए संभव है।”

अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में हमें वही दार्शनिक-शासक प्राप्त हुआ जिसकी परिणति आज हम नरेंद्र मोदी शासन में, धारा 370 से मंगल मिशन से चंद्रयान से सिटी मेट्रो, हर दिशा में भारत के साहसिक एवं महत्वाकांक्षी नव-निर्माण में देख रहे हैं।