भारती
नैतिकता का पालन किए बिना आई सफलता, सफलता के रूप में शोक है- कुरल भाग 32

प्रसंग- सभा कार्य और नैतिकता पर 19 जुलाई 1969 के स्वराज्य अंक में प्रकाशित तिरुवल्लुवर के चयनित कुरलों का हिंदी अनुवाद।

सभा कार्य

एक मंत्री को केवल राजा के साथ नहीं बल्कि परिषद के साथ भी काम करना होता था। निम्नलिखित कुरलों में एकत्रित सभाजनों के अनुसार अपने वक्तव्य को रखने पर सीख दी गई है।

1. वे लोग भाषण कला के महारथी होते हैं जो सभागणों के स्वभाव और मनोदशा के अनुसार अपने शब्दों को चुनकर अपनी बात को व्यक्त करते हैं।

2. अच्छे और सफल भाषण के लिए श्रोताओं की ग्रहणशीलता और स्वभाव की जानकारी के अलावा वक्तव्य के विषयों की अच्छी समझ आवश्यक है।

3. दीप्तिमान लोगों के सामने उज्ज्वल रहें। यदि श्रोताओं में सामान्य लोग हैं तो अपने ज्ञान को पीछे रखकर आम व्यक्ति की तरह बात करें।

4. वरिष्ठ लोगों की सभा में स्वयं पर नियंत्रण रखकर उनसे पहले बोलने से बचना ही समझदारी है।

5. युद्ध में प्राण की आहुति देने वाले लोगों को ढूंढना आसान है लेकिन सभा में बोलने का साहस रखने वालों को ढूंढना कठिन।

6. जो व्यक्ति साहसी न हो, उसके हाथ में तलवार का क्या उपयोग है? उसी प्रकार सभा के समक्ष बोलने में डर जाने वाले व्यक्ति का ज्ञान उपयोगी नहीं है।

नैतिक विधान

कुरल राज्य के कार्यों में नैतिक विधानों के पालन पर ज़ोर देते हैं।

7. जो कार्रवाई नैतिक विधान के अनुसार न हो, उससे बचें।

8. अच्छे मनुष्य जिसकी निंदा करते हैं, वह न करें, भले ही वह आपकी भूखी माँ को रोटी देने के लिए आवश्यक हो।

9. नैतिकता का पालन किए बिना आई सफलता, सफलता के रूप में शोक है।

10. धोखे और दलत साधन से प्राप्त की गई राज्य की समृद्धि कच्चे घड़े में पानी भरने के समान है।

आदर्शवाद में व्यवहारिकता के मिश्रण का उदाहरण तिरुवल्लुवर के अगले कुरल में झलकता है।

11. वह नहीं करें जिसके लिए आपकी समझ कहती है कि बाद में पछताना पड़ सकता है। लेकिन अगर आप ऐसा कर ही चुके हैं तो बेहतर होगा कि अगली बार ऐसा करने से बचें।

अगले अंक में जारी…

पिछला भाग- किसी व्यक्ति की हर योग्यता एक तरफ और प्रभावशाली भाषण की कला एक तरफ- कुरल