भारती
असम राइफल्स-आईटीबीपी विलय : क्यों सेना के विरोध के बावजूद नौकरशाह पक्ष में

असम राइफल्स को रक्षा मंत्रालय के परिचालन नियंत्रण से बाहर करने के गृह मंत्रालय के प्रस्ताव ने सेना की मुश्किलें फिर से बढ़ा दी हैं। 184 वर्ष पुरानी असम राइफल्स दीर्घ अवधि से दोहरे नियंत्रण से पीड़ित रही है- यह गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण और रक्षा मंत्रालय के परिचालन नियंत्रण के अधीन है।

गृह मंत्रालय ने एक प्रारूप तैयार किया है जिसमें इसके परिचालन नियंत्रण को गृह मंत्रालय को सौंपकर आईटीबीपी के साथ विलय का प्रस्ताव रखा गया है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गृह, सुरक्षा, वित्त और विदेश मंत्रियों की उपस्थिति में सुरक्षा पर कैबिनेट समिति इसपर अंतिम निर्णय लेगी।

सेना मंत्रालय के इस प्रस्ताव के विरोध में इसलिए है क्योंकि यह उस टुकड़ी के अंत के रूप में होगा जिसने कई विवाद क्षेत्रों में ख्यातियाँ और वीरता पदक अर्जित किए हैं और पूर्वोत्तर में भी विद्रोहों का उत्तर देने में सक्रिय भूमिका निभाई है।

असम राइफल्स में 46 बटालियन और 65,000 सैनिक हैं जिसमें से 80 प्रतिशत सेना से लिए जाते हैं।

असम राइफल्स और सेना में साझी परिचालन प्रकृति और संस्कृति है और यह एक अच्छा युद्धक बल है। यह बल चीन के साथ 1962 के सीमा युद्ध में लड़ाई कर चुका है। साथ ही श्रीलंका में आईपीकेएफ के संचालन का हिस्सा भी रह चुका है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनेक मिशनों समेत हर जगह इसने उत्तम प्रदर्शन किया है।

“क्योंकि इसके अधिकांश अधिकारी सेना से लिये जाते हैं, तो असम राइफल्स सेना के साथ मिलकर पूर्वोत्तर के सीआई ग्रिड में वैसे ही काम करता है जैसे कश्मीर में सेना के साथ राष्ट्रीय राइफल्स।”, कोलकाता में पूर्वी कमांड मुख्यालय के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने बताया।

म्यांमारी सेना के साथ कोलकाता स्थित पूर्वी कमांड मुख्यालय में भारतीय सेना का समन्वय

यदि असम राइफल्स गृह मंत्रालय के अधीन चला जाएगा तो इसमें सैन्य अधिकारी नियुक्त नहीं किए जाएँगे। इससे बल की युद्धक क्षमता में कमी आएगी। और सेना के साथ सफल सीआई ऑपरेशन करने के लिए जो समन्वय आवश्यक है, वह भी नहीं रह जाएगा।

“पूर्वोत्तर में असंख्य सफल सीआई ऑपरेशनों और सफलतापूर्वक विद्रोहों को दबाए जाने का मुख्य कारण असम राइफल्स और भारतीय सेना के बीच तालमेल ही रहा है।” कोलकाता में तैनात सेना के एक ब्रिगेडियर रैंक के अधिकारी ने कहा।

लेकिन गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली शक्तिशाली आईपीएस लॉबी को इसकी चिंता नहीं है। उनके लिए तो बस यह है कि असम राइफल्स के गृह मंत्रालय के अधीन जाकर आईटीबीपी के साथ विलय हो जाने से उनके लिए इस बल में पदों के द्वार खुल जाएँगे।

सीआरपीएफ, आईटीबीपी, एसएसबी, सीआईएसएफ, बीएसएफ और एनएसजी की तरह असम राइफल्स फिर एक केंद्रीय सैन्य पुलिस बल (सीएपीएफ) बन जाएगा जिनके उच्च पदों पर आईपीएस अधिकारी होते हैं।

आईपीएस अधिकारी के लिए एक सीएपीएफ में पद आरामदायक माना जाता है, ऐसा जिसमें वेतन मिले लेकिन कार्य अधिक न हो। “वे कार्यालय का आनंद लेते हैं और यहाँ के लाभ राज्य पुलिस बल से कई अधिक होते हैं। उन्हें अधिक कार्य नहीं करना पड़ता, ना ही वे अपने जवानों को विवाद स्थलों पर भेजते हैं।” सेना के अधिकारी ने बताया।

सीएपीएफ में पुलिस अधिकारियों को डेप्युटी इंस्पेक्टर जेनरल (डीआईजी) से लेकर महानिदेशक तक पद मिलते हैं।

“अधिकांश रूप से कार्यालय में काम रहता है। सीएपीएफ में हवाई-जहाज़ और हेलिकॉप्टर जैसे कई संसाधन होते हैं जिसका दुरुपयोग करने के लिए नियुक्त आईपीएस अधिकारी जाने जाते हैं। वे भव्य जीवनशैली, बड़े बंगलों का आनंद लेकर सुखद जीवन व्यतीत करते हैं।”, बल के उत्तर बंगाल फ्रंटियर मुख्यालय से डीआईजी श्रेणी से सेवानिवृत्त हुए बीएसएफ अधिकारी ने बताया।

आमतौर पर आईपीएस अधिकारी सीएपीएफ में नियुक्ति तब चाहते हैं जब वे सत्तारूढ़ राजनेताओं या राज्य की व्यवस्था के अनुकूल नहीं ढल पाते या कभी विवादों में उलझ जाते हैं।

“आईपीएस अधिकारी सीएपीएफ में पोस्टिंग तब तक चाहते हैं जब तक उनके राज्य में स्थिति अनुकूल न हो जाए या जब तक वे गृह मंत्रालय या केंद्र में बेहतर पद प्राप्त नहीं करें। सीएपीएफ में पद आरामदायक है जहाँ कम दायित्वों के साथ अधिक लाभ मिलते हैं।”, असम-मेघालय कैडर के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने बताया।

आईटीबीपी जैसे सीएपीएफ में भी उस बल के सैनिक और अधिकारी ही असली काम करते हैं- जैसे सीमाओं की सुरक्षा और चीनी सैनिकों द्वारा घुसपैठ का विरोध- आईपीएस अधिकारी नहीं।

आईटीबीपी की एक टुकड़ी

आईटीबीपी में आईपीएस अधिकारी अशरण्य सीमाओं पर शायद ही कभी जाते हैं और जाते भी हैं तो लघु निरीक्षण के लिए। इसी प्रकार नक्सल प्रभावित राज्यों या कश्मीर घाटी में तैनात बीएसएफ या सीआरपीएफ में नियुक्ति आईपीएस अधिकारी शायद ही कभी ज़मीन पर वास्तविक संचालनों में सम्मिलित होते हैं क्योंकि वे डीआईजी जैसे उच्च पदों पर ही विराजमान होते हैं।

पूर्वोत्तर में लंबे समय से तैनात होने और इसकी अधिकांश इकाइयों के स्थिर होने के कारण (नियमित सेना बटालियन के विपरीत) असम राइफल्स ने काफी भौतिक संसाधनों को जमा कर लिया है।

इन क्षेत्रों के मुख्यालय (डीआईजी, अभी एक सेना ब्रिगेडियर एक क्षेत्र का प्रभारी होता है) और महानिरीक्षणालय (इसका प्रमुख आईजी, अभी एक सेना का मेजर-जनरल) अच्छी जगहों पर स्थित होते हैं। डीआईजी और वरिष्ठ पदों को कई सुविधाएँ मिलती हैं। इसके अलावा कई वीरता पुरस्कार प्राप्त बल में अधिकारी होने का गौरव भी।

सेना के अधिकारियों का कहना है कि आईपीएस लॉबी बिना विशेषाधिकारों के योग्य नहीं होते हुए भी उन्हें पाना चाहती है। सेकंड लेफ्टिनेंट पद के पद से ही सेना के अधिकारी असम राइफल्स के सैनिकों को नेतृत्व करते हैं, जैसा कि अन्य सैन्य टुकड़ियों में होता है।

“असम राइफल्स में वही अनुशासन, लोकाचार, संस्कृति, प्रशिक्षण, बलिदान की भावना और युद्ध के प्रति तत्परता है जो सेना में विद्यमान है। यदि असम राइफल्स गृह-मंत्रालय के अधीन चला जाता है और आईपीएस अधिकारी बड़े पदडों पर नियुक्त हो जाएँगे तो यह सब नहीं रहेगा।” सेवानिवृत्त मेजर जनरल ने कहा।

उदाहरण के लिए इस वर्ष के जनवरी से शुरू की गई भारतीय सेना के ‘ऑपरेशन सनराइज़’ नामक संयुक्त ऑपरेशन की श्रृंखला में असम राइफल्स सम्मिलित रहा है।

म्यांमार सेना के सहयोग से शुरू किए गए इस ऑपरेशन के परिणामस्वरूप म्यांमार में पूर्वोत्तर विद्रोही समूहों के कई ठिकानों को नष्ट कर दिया गया है और इन संगठनों से संबंधित कैडर सीमा के दोनों ओर से गिरफ्तार किए जा रहे हैं।

अगर असम राइफल्स का नेतृत्व आईपीएस अधिकारी करते तो इससे दोनों बलों के बीच सहयोग गंभीर रूप से कम होता। पुलिस को सामान्य कानून और व्यवस्था कर्तव्यों, अपराध का पता लगाने और आईपीसी और सीआरपीसी के प्रावधानों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।

“आईपीएस अधिकारी लड़ाई या सीआई ऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित नहीं होते हैं इसलिए आईपीएस अधिकारियों के अधीन असम राइफल्स को रखना और आईटीबीपी के साथ बल का विलय करना निश्चित ही खतरनाक है।”, पूर्वी कमान मुख्यालय में सेवारत एक सेना अधिकारी ने बताया।

“यह पूर्वोत्तर में सीआई ग्रिड में एक बड़ा शून्य पैदा कर सकता है और निश्चित रूप से विद्रोही संगठन इससे फिर संगठित करने और जीवंत होंगे।”, अधिकारी ने आगे कहा।

यह भी विडंबना ही है कि आईपीएस एक ऐसे बल का नियंत्रण चाहता है, जो सीआई ऑपरेशनों पर सटीकता से काम करता है क्योंकि आईपीएस अधिकारियों के नेतृत्व में पूर्वोत्तर राज्यों के पुलिस बल अपने राज्यों में विद्रोह को नियंत्रित करने में विफल रहे हैं।

“अगर राज्य की पुलिस ने उग्रवाद से निपटने के काम में कोई ठोस काम नहीं किया है, तो वे एक ऐसे बल का नेतृत्व करने में कैसे सक्षम होंगे जो इस खतरे से निपटते आई है?”, सेना के अधिकारी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।

सेना के शीर्ष नेतृत्व ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को दिखाने के लिए एक प्रेज़ेंटेशन तैयार की है, जिसमें वे न केवल असम राइफल्स को रक्षा मंत्रालय के कुल नियंत्रण में लाने का कारण बताएँगे, बल्कि पाकिस्तान और तिब्बत सीमाओं पर नियुक्त आईटीबीपी और बीएसएफ की टुकड़ियों के ऑपरेशनल कमांड की भी मांग करेंगे।

सेना मुख्यालय का कहना है कि आईटीबीपी और बीएसएफ द्वारा संरक्षित सीमाओं के कुछ हिस्सों में समस्या है और बार-बार वहाँ गड़बड़ी देखी गई है। इसलिए सेना को भारत-पाक और भारत-तिब्बत सीमाओं में तैनात बीएसएफ और आईटीबीपी इकाइयों का संचालन सौंपना रणनीतिक समझदारी है।