भारती
सेना राज्य की आवश्यकताओं में सबसे महत्त्वपूर्ण है- तिरुवल्लुवर के कुरल भाग 37

प्रसंग- 9 अगस्त 1969 के स्वराज्य अंक में प्रकाशित कवि तिरुवल्लुवर के सेना और शौर्य पर चयनित कुरलों का हिंदी अनुवाद।

सेना

1. एक राज्य में जो चीज़ें होनी चाहिए उनमें से सबसे आवश्यक है एक अच्छी सेना।

2. जब शत्रु का संख्याबल अधिक व शत्रु शक्तिशाली हो तो अन्य सैन्य टुकड़ियों की तुलना में पुरानी और अच्छी परंपरा वाली टुकड़ी की निडरता पर अधिक विश्वास किया जा सकता है।

3. भूतकाल में विजयी कार्रवाइयों से सेवा कर जिन सैन्य टुकड़ियों ने अपने शौर्य और स्वामि-निष्ठा का साक्ष्य दिया है, वे सेना का महत्त्वपूर्ण अंग हैं।

4. एक टुकड़ी का नाम तब ही बरकरार रहता है जब वह सबसे आक्रमक हमलों को झेल जाती है।

5. वीरता, सैन्य गौरव, शिष्टता की परंपरा और विश्वसनीयता चार गुण हैं जो एक टुकड़ी को अजेय बनाते हैं।

6. एक सेना को अव्यवस्थित हुए बिना हमले को झेलना और उससे आगे बढ़ना आना चाहिए।

7. सैनिक साहसिक न हों और उनमें निरोध की अधिक शक्ति न हो लेकिन सेना की सही व्यवस्था प्रायः सफलता दिलाती है।

8. अगर राजा दुराचार और सैनिकों के वेतन में देरी न करे तो वह अपने प्रति सैनिकों का प्रेम बनाए रखता है तथा उन्हें परित्याग व निर्धनता से भी बचाता है।

9. अगर सेना में वीर और अच्छे सैनिक हों परंतु सेनापति अच्छी न हों तो सेना नहीं टिक पाती है।

शौर्य

कुरल की शिक्षाप्रद भाषा-शैली की बजाय निम्न कुरलों में ज्वलंत काव्य देखने को मिलता है।

10. मेरे सेनापति को चुनौती न दो। कई उनके विरुद्ध खड़े हुए लेकिन अब पत्थर पर उनके नाम अंकित हैं।

उपरोक्त कुरल से हमें पता चलता है कि हुतात्माओं के नाम पाषाण पर स्मारक के रूप में अंकित करने का प्रचलन था।

11. हाथी पर मारे गए भाले का निशाना चूकना, जंगल में दौड़ते हुए खरगोश पर निशाना लगाने से बेहतर है।

उपरोक्त कुरल में बताया गया है कि एक सैनिक के लिए निर्बल और असहाय पर हमला अशोभनीय है। हार माने हुए शत्रु पर प्रहार न करने का भी प्रचलन था।

12. रणभूमि में सैनिक को निर्दयी होना चाहिए लेकिन जब शत्रु संकट में हो तो उसकी सहायता करना योद्धा के तलवार की धार है।

उपरोक्त कुरल का आशय है कि संकट में पड़े शत्रु के प्रति दया दिखाना उसपर शीघ्र विजय दिलाता है। निम्न कुरल में गहरे घाव के बावजूद युद्ध जारी रखने के गुण पर प्रकाश डाला गया है।

13. हमलावर हाथी को भाला मारने के बाद नायक अगले हाथी पर निशाना साधने के लिए नया शस्त्र खोजता है, तब ही उसे आभास होता है कि एक भाला उसकी देह में भी बिंधा हुआ है और उसे ज्ञात भी नहीं था। अपने शरीर में लगे शस्त्र को वह मुस्कुराते हुए निकालता है और उसी शस्त्र को धारण कर लेता है।

14. एक वीर योद्धा की आँखों में एक बार यदि शत्रु के प्रति क्रोध की ज्वाला जग जाती है तो फिर भाला लगने पर भी वे आँखें नहीं झपकतीं क्योंकि आँखें मूंदने का अर्थ होगा रणभूमि से भागना।

15. भूतकाल का स्मरण करने पर एक योद्धा उन दिवसों को खोया हुआ समझेगा जब उसे युद्ध में एक भी घाव नहीं लगा था।

16. चुनौती का सामना करते हुए यदि नायक प्राण को खतरे में डाले तो विफलता के लिए कोई उसे दोष नहीं दे सकता। विफलता गलती नहीं है, प्राणों को दाँव पर लगाना ही प्रतिज्ञा की पूर्ति करता है।

17. रोते हुए संबंधियों के बीच वृद्धावस्था और रोग के कारण मरने का क्या लाभ? उस मृत्यु के लिए प्रयास करना चाहिए जिसमें अश्रु दूसरे प्रकार के हों, जिस राजा की सेवा में वीरगति को प्राप्त हुए उसकी आँखों से बहते हुए आभार और सराहना के आँसू।

अगले अंक में जारी…

पिछला भाग- आक्रामक कार्रवाई उपयुक्त स्थान पर अच्छी होती है, अन्यथा दूसरे माध्यम- कुरल भाग 36