भारती
सेनाओं की बदलती भूमिका में सीडीएस की नियुक्ति क्या योगदान दे सकती है

भारतीय सेना के सह-प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल मनोज मुकुंद नरवाने इस महीने के अंत में जनरल बिपिन रावत से सेनाध्यक्ष का कार्यभार संभालेंगे, जो 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। थलसेना की इस नियुक्ति के बाद अब इस बात का इंतजार है कि देश की तीनों सेनाओं के लिए घोषित सर्वोच्च पद चीफ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद पर किसकी नियुक्ति होगी। अधिकांश रूप से इस पद के लिए निवृत्तमान सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत का नाम लिया जा रहा है। 

इस पद के लिए उपयुक्त पात्र का चयन करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की अध्यक्षता में एक कार्यान्वयन समिति का गठन किया था, जिसे सीडीएस पद की भूमिका, उसकी नियुक्ति और उससे जुड़ी अन्य बातों को परिभाषित करने का काम दिया गया था।

इस समिति ने अपनी सिफारिशें रक्षा मामलों से संबद्ध कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) को सौंप दी हैं। सीडीएस की नियुक्ति भारतीय रक्षा-व्यवस्था के अंतर्गत एक बड़ी परिघटना होगी और इसे भावी रणनीतियों की दृष्टि से देखा जा रहा है। खासतौर से ऐसे समय में जब हम पाकिस्तान और चीन की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं। 

दो तरह की चुनौतियाँ

भारतीय सेनाएँ इस समय आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से गुज़र रहीं हैं। फिलहाल इस काम के सिलसिले में चुनौतियाँ दो तरह की हैं। एक, नागरिक प्रशासन के साथ समन्वय की और दूसरे तीनों सेनाओं के समन्वय की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल स्वतंत्रता दिवस के अपने उद्बोधन में कहा था कि शीघ्र ही सीडीएस की नियुक्ति कर दी जाएगी। यह नियुक्ति इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि केंद्र सरकार को सैनिक मामलों में सलाह देने के एकल केंद्र (सिंगल पॉइंट) की भूमिका सीडीएस की होगी, जो अभी नहीं है। 

रक्षा-प्रणाली की दृष्टि से इसे बहुत महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। सीडीएस का देश के नाभिकीय अस्त्रों पर प्रशासनिक नियंत्रण होगा और इसकी भूमिका तीनों सेनाओं की शक्ति के समेकन की होगी। माना जाता है कि इसके साथ देश की सेनाओं की एकीकृत कमान (यूनिफाइड थिएटर कमांड) का मार्ग प्रशस्त होगा, जैसा अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी सेनाओं में है। भविष्य की रक्षा-चुनौतियों को देखते हुए सेनाओं के बीच गहन समन्वय की आवश्यकता को समझा जा रहा है। 

अब वह समय नहीं रहा, जब सेनाएँ अलग-अलग दिशाओं में रणनीतियाँ बनाती थीं। बेशक युद्ध-कौशल, तकनीक और उनकी विशेषीकृत भूमिका का भी महत्व है, इसलिए इस पद की जिम्मेदारी जटिल और महत्वपूर्ण है। खासतौर से यह देखते हुए कि भविष्य के रक्षा परिदृश्य में जल, थल और आकाश के अलावा स्पेस और सायबर स्पेस का प्रवेश भी हो गया है और स्पेशल ऑपरेशंस के रूप में नई रणनीति भी सामने आई है। 

करगिल युद्ध की देन 

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद की परिकल्पना लॉर्ड माउंटबेटन के ज़माने से की जा रही है। सन 1982 में तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल केवी कृष्णराव ने इस पद के सृजन का सुझाव दिया था। वास्तव में इसकी ज़रूरत सन 1999 के करगिल युद्ध में महसूस की गई, जब ऊँची पहाड़ियों पर बैठे घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए वायुसेना और थलसेना के समन्वय की आवश्यकता हुई।

कारगिल युद्ध स्मारक

युद्ध के बाद के सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में बनी करगिल समीक्षा समिति ने भी इस पद के सृजन की अनुशंसा की, जिसके बाद बने मंत्रिसमूह ने 2001 में सलाह दी कि सीडीएस का गठन किया जाए। 

ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन 2000 में प्रधानमंत्री ने किया था। उसने अपनी रिपोर्ट में पैरा 6.5 में कहा, ‘चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (सीओएससी) के अबतक के कार्य से यह बात उजागर हुई है कि सरकार को सिंगल पॉइंट सलाह देने और तीनों सेनाओं के बीच युद्ध नीति, योजना और ऑपरेशनल मसलों में पर्याप्त कमजोरी उजागर हुई है।’ जीओएम ने यह सुझाव भी दिया कि सीडीएस फोर स्टार अधिकारी होना चाहिए, जिसे तीनों सेनाओं से लिया जाए। 

इसके बाद नरेश चंद्रा समिति (2012) और लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेकतकर कमेटी (2016) ने भी इसी आशय की सलाह दी। इसके बाद 2017 में रक्षा से संबद्ध कैबिनेट कमेटी (सीसीएस) ने सीडीएस की नियुक्ति के संदर्भ में विमर्श की प्रक्रिया शुरू की।

इस पद को लेकर कई प्रकार की भ्रांतियाँ रही हैं। सेनाओं के भीतर और बाहर भी। एक अंदेशा यह था कि यह पद बेहद शक्तिशाली हो जाएगा, दूसरा अंदेशा तीनों सेनाओं के प्रमुखों की स्वायत्तता को लेकर था। इस तरह एक लंबे विमर्श के बाद तमाम अंदेशों और संभावनाओं को सामने रखते हुए सीडीएस की नियुक्ति का समय करीब आ गया है।  

इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ 

सिद्धांततः इस बात को काफी पहले ही स्वीकार कर लिया था, और करगिल समीक्षा समिति की सिफारिशों को मानते हुए इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) का गठन 23 नवंबर, 2001 को कर भी दिया गया था, पर सीडीएस की परिकल्पना ज्यादा विषद है। तीनों सेनाओं के बीच समन्वय की परिकल्पना उसके भी पहले से मौजूद है। अब देखना होगा कि देश के पहले सीडीएस का व्यावहारिक स्वरूप क्या होगा। देश में रक्षा-प्रणाली मुख्यतः रक्षा-सचिव केंद्रित है।

वर्तमान रक्षा सचिव अजय कुमार

तीनों सेनाओं के सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी किसी न किसी रूप में नागरिक और सैनिक-प्रशासन के बीच रिश्तों को लेकर अपनी राय व्यक्त करते रहे हैं। वे मानते हैं कि भारतीय सेनाएँ नागरिक प्रशासन के अधीन हैं, पर इस बात को ठीक से परिभाषित करने की आवश्यकता है। इस सिलसिले में वे अपने सुझाव भी देते रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि पर्याप्त अधिकार और दायित्व के साथ सीडीएस की नियुक्ति से एक बड़ी ज़रूरत पूरी होगी। 

अभी कुछ सवाल हैं। क्या सीडीएस की प्राथमिक भूमिका देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में रक्षामंत्री के माध्यम से प्रधानमंत्री और सरकार के मुख्य सलाहकार की होगी? क्या इस सिलसिले में प्रशासनिक नियमों में बदलाव किया जाएगा? कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी के संदर्भ में सीडीएस की भूमिका क्या होगी?

ऐसा माना जा रहा है कि सीडीएस की भूमिका नीतिगत होगी। उसे नीतिगत नियंत्रण, नीतिगत दिशा और नीतिगत दृष्टि के लिहाज से देश की सशस्त्र सेनाओं के ‘हैड’ के रूप में देखा जाएगा, पर ऑपरेशनल रेडीनेस का जिम्मा सेनाध्यक्षों के पास ही रहेगा। 

कठोर प्रक्रिया

सेनाओं संगठनात्मक संरचनाएँ काफी कठोर होती हैं। उनमें बदलाव लाने का काम भी समय लेता है। देश में अंडमान निकोबार कमांड की स्थापना को दो दशक होने वाले हैं। अब जो बदलाव हो रहा है, वह गुणात्मक रूप से ज्यादा बड़ा है।

अमेरिका में यूनिफाइड कॉम्बैटेंट कमांड की संरचना दूसरे विश्वयुद्ध के समय से है, पर उसमें निरंतर सुधार-संशोधन होता रहा है। हाल में सायबर और स्पेस कमांड उसमें बनी हैं। अमेरिकी सेना का कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा है और वह वैश्विक दायरे को सामने रखते हुए ही गठित हुई है। भारतीय सेनाओं की भूमिका भी बढ़ती जा रही है। हमें सैनिक संरचनाओं और संगठनात्मक स्वरूप को भी भविष्य के नज़रिए से देखना चाहिए। 

सीडीएस का गठन पहली बार हो रहा है, इसलिए पहले सीडीएस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि उन्हें रास्ते बनाने होंगे और परंपराएँ स्थापित करनी होंगी। सीडीएस के पद पर कुशल प्रशासक, दूरदृष्टा और भविष्य पर निगाह रखने वाले व्यक्ति की ज़रूरत है। उन्हें तीनों सेनाओं के विश्वास को जीतना होगा, साथ ही उनका हौसला बढ़ाना होगा। दूसरी तरफ हमें नव-नियुक्त सीडीएस के अपना समर्थन देना चाहिए। वे एक नए दौर की शुरुआत जो करने जा रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।