भारती
बड़े संगठनात्मक परिवर्तन और सरकारी सहायता बीएसएनएल को दे सकते हैं नव जीवन

प्रसंग- बीएसएनएल को जीवंत करने की सरकार की पहल और आईआईएम अहमदाबाद द्वारा सुझाए गए सुझावों पर चर्चा।

पिछले कुछ वर्षों से भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) घाटे में चल रहे हैं। दूरसंचार बाज़ार में जियो के प्रवेश और बीएसएनएल के 4जी की दौड़ में सम्मिलित न हो पाने से यह कंपनी अपने ग्राहक खोते जा रही है और इसका घाटा बढ़ता जा रहा है। पिछले तीन वर्षों में बीएसएनएल की राजस्व आय में लगातार गिरावट हुई है, 2016-17 में 31,533 करोड़ और 2017-18 में राजस्व आय 25,071 करोड़ से 2018-19 में 19,308 करोड़ पर आ गई है।

बाज़ार में बीएसएनएल

ऐसे में सरकार के पास दो विकल्प बचते हैं- पहला यह कि इन कंपनियों का निजीकरण किया जाए और दूसरा यह कि करदाताओं के कुछ पैसे इनमें निवेश कर इन कंपनियों को जीवंत किया जाए। 4जी के प्रवेश के बाद बाज़ार में प्रतिस्पर्धा बढ़ जाने और वर्ष के अंत तक होने वाली 5जी स्पेक्ट्रम नीलामी के चलते दूरसंचार कंपनियाँ अपनी संपत्ति इसमें निवेश नहीं करना चाहेंगी और इसलिए घाटे में चल रही बीएसएनएल के लिए शायद ही कोई क्रेता हो।

ऐसे में सरकार दूसरे विकल्प की ओर ही रुख करती नज़र आ रही है। दूरसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि वे बाज़ार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित कर सरकार पर अतिरिक्त भार लिए बिना बीएसएनएल व एमटीएनएल के पुनरोत्थान के लिए कार्य करेंगे। साथ ही इन कंपनियों को जीवंत करने के लिए 73,787 करोड़ रुपये का अनुदान प्रस्तावित है।

दूरसंचार विभाग का कहना है कि यदि एन दोनों कंपनियों को बंद किया जाता है तो 1.2 लाख करोड़ रुपये का खर्च होता। ऐसे में खैरात दिए जाने का प्रस्ताव बुद्धिमता वाला लगता है लेकिन कंपनी के ह्रास का कारण केवल 4जी तकनीक में इसका प्रवेश न होना नहीं रहा है, बल्कि इसकी संगठनात्मक संरचना और प्रतिस्पर्धा हेतु हतोत्साहित कर्मचारी भी रहे हैं। ऐसे में इसकी संरचना में परिवर्तन किए बिना इसपर सरकारी पैसा खर्च करना पानी में पैसा बहाने के समान होगा।

बाज़ार में बने रहने के लिए बीएसएनएल को 4जी की तत्काल आवश्यकता है। बीएसएनएल की स्थिति में सुधार लाने हेतु आईआईएम अहमदाबाद के प्राध्यापकों- प्रोफेसर रेखा जैन, प्रोफेसर विशाल गुप्ता और प्रोफेसर अजय पांडे ने एक रिपोर्ट तैयार की है। 4जी लाइसेंस सामान्यतया 20 वर्ष की वैधता के लिए दिए जाते हैं लेकिन अंतरिम रिपोर्ट में सुझाया गया है कि इसे कुछ शर्तों के आधार पर पाँच वर्षों के लिए 2100 मेगाहर्ट्ज़ रेंज में 5 मेगाहर्ट्ज़ 4जी दिया जाए और कंपनी द्वारा संतोषजनक सुधार दिखाए जाने के बाद ही इसकी वैधता बढ़ाई जाए। सुझाई गईं शर्तें कुछ इस प्रकार हैं-

  1. पूंजी व्यय में कटौती के लिए बीएसएनएल को टावर साझा करना और पट्टे पर देना होगा। साथ ही इस क्षेत्र व उपभोक्ता विशिष्ट शुल्क दर लानी चाहिए।
  2. पाँच वर्षों के लाइसेंस के बाद 15 वर्ष की लाइसेंस वृद्धि दिए जाने पर अन्य दूरसंचार कंपनियों को इसपर आपत्ति नहीं होगी क्योंकि इस प्रकार सबके समान बीएसएनएल को भी 20 वर्ष का ही लाइसेंस मिलेगा।
  3. तीसरे वर्ष के बाद बीएसएनएल का हर सर्कल आत्म-निर्भर बने।
  4. अतिरिक्त मानव संसाधन के प्रबंधन हेतु दूरसंचार विभाग इसकी सहायता करे और यह अपनी संगठनात्मक नीतियों और संरचना में सुधार करे।
  5. बीएसएनएल को 4जी, 5जी आदि के भविष्य में मिलने वाले स्पेक्ट्रम इसके प्रदर्शन पर निर्भर करेंगे।

विभिन्न कंपनियों का लाभ

इस रिपोर्ट की समन्यवयक आईआईएम अहमदाबाद की प्राध्यापिका रेखा जैन ने स्वराज्य  से चर्चा में इस रिपोर्ट के सुझावों को रेखांकित करते हुए निम्न प्रस्ताव रखे हैं-

पहला, 2015 में किए गए मूल्यांकन के अनुसार बीएसएनएल के पास लगभग 60,000-70,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की भूमि है, साथ ही दूरसंचार विभाग से मिलने वाली कुछ भूमि और भवनों को भी जल्द बीएसएनएल को दिया जाए। प्राध्यापिका का सुझाव है कि इस भूमि के मुद्रीकरण का दायित्व किसी अन्य कंपनी (जैसे एनबीसीसी, आदि या निजी एजेंसी) को सौंपा जाए, न कि दूरसंचार विभाग के अधिकारियों पर छोड़ा जाए जिससे कंपनी अनुपयोगी भूमि से धन अर्जित कर सके और भूमि का भी प्रभावी ढंग से उपयोग हो सके। इस कार्य में एक और बाधा आ सकती है कि सारी भूमि बीएसएनएल या दूरसंचार विभाग के नाम पर नहीं है।

दूसरा, बीएसएनएल टावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीटीसीएल) को बीएसएनएल से अलग करके सभी टावर दिए जाएँ। एक पृथक इकाई बनने से यह कंपनी कई परियोजनाओं पर काम कर सकती है और इसे 8 प्रतिशत का राजस्व साझा भी नहीं करना पड़ेगा जिससे इसकी बोलियाँ प्रभावी बन सकेंगी (यूएएस लाइसेंस के अधीन एक इकाई की तरह काम करने से बीएसएनएल को किसी भी गतिविधि के लिए 8 प्रतिशत राजस्व साझा करना पड़ता है जिसके कारण इसके द्वारा लगाई गई ऊँची बोली इसे प्रतिस्पर्धा से बाहर कर देती है)।

तीसरा, बीटीसीएल के अधीन एक फाइबर इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी चालू की जाए जो शुरुआती दौर में एक विभाग की तरह काम करे और बाद में एक पृथक कंपनी बने। ब्रॉडबैंड, ऑप्टीकल फाइबर नेटवर्क और एफटीटीएच (फाइबर टू द होम) की बढ़ती माँग के बीच बीएसएनएल इससे लाभ कमाने पर काम कर सकती है।

चौथा, शुरू में बीटीसीएल के अधीन और उसके बाद एक पृथक कंपनी की तरह बीएसएनएल अपनी परियोजना आधारित इकाई चालू करे जो ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा, सैन्य बलों हेतु नेटवर्क, दुर्गम स्थानों से संयोजकता आदि जैसे देश की रणनीति के लिए महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर कार्य करे। इन परियोजनाओं को सेवा उपभोक्ता वित्त पोषित करेंगे और बीएसएनएल के कर्मचारियों का विशिष्ट परियोजनाओं हेतु स्थानांतरण करने से संसाधन खर्च बच पाएगा। अलग इकाई होने से 8 प्रतिशत राजस्व साझा नहीं करना होगा जिससे इसकी बोलियाँ प्रतिस्पर्धात्मक होंगी।

पाँचवा, पाँच साल के लिए 1,875 करोड़ रुपये अथवा 10 वर्षों के लिए 3,750 करोड़ रुपये के लाइसेंस शुल्क पर बीएसएनएल को 4जी आवंटित किया जाए और इसे बहाल करने में होने वाले पूंजी खर्च को बीएसएनएल टावर साझाकरण और सेवा प्रबंधन मॉडल से कम करने पर कार्य करे। हर सर्कल अपनी व्यापार योजना, त्वरित निर्णय प्रणाली, आवश्यक मानव संसाधन को चिह्नित करने और आईटी प्रणाली संशोधित करने पर कार्य करके तीसरे वर्ष से आत्मनिर्भर बने।

छठा, संगठनात्मक सुधार हेतु सुझाया गया है कि

  • सेवानिवृत्ति आयु को 60 से घटाकर 56 किए जाने से अधिक बचत की जा सकती थी लेकिन चर्चा के बाद 58 की आयु निश्चित की गई है। इससे अगले छह वर्षों में लगभग 14,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। और यदि सातवाँ वेतन आयोग लागू किया जाए तो उसके बाद भी लगभग 8,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकेगी।
  • 55 वर्ष से अधिक आयु वाले कर्मचारियों हेतु स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) लाई जाए। इससे लगभग 11,000 करोड़ रुपये बचाए जा सकेंगे। बीएसएनएल को इस हेतु 4,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे।
  • निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) में उन व्यवासायिकों को सम्मिलित किया जाए जिन्हें बड़े व्यापार चलाने का अनुभव हो। साथ ही किसी शैक्षणिक संस्थान से एक विशेषज्ञ को भी नियुक्त किया जा सकता है। प्रदर्शन आधारित पद्धति को अपनाया जाए, योग्यता आधारित नियुक्तियाँ हों और शीर्ष अधिकारी कंपनी के लाभ या घाटे के लिए जवाबदेह हों।

सातवाँ, बीएसएनएल ने अगले दो वर्षों के लिए अपने संचालन व्यय की आधी राशि के ऋण की माँग की है लेकिन इसे विशेष सहायता दिए जाने के बजाय सर्कल आधारित व्यापार योजनाओं और लक्ष्य पूर्ति के आधार पर सहायता दी जाए।

आठवाँ, बीएसएनएल के निजीकरण के विचार को थोड़े समय के लिए त्याग दिया जाए। पिछले कुछ वर्षों में सरकार की ऐसी योजना सफल नहीं हुई है। यदि पाँच वर्षों में इन सुझावों पर कार्य करके बीएसएनएल अपनी स्थिति में सुधार कर पाया तब इसके निजीकरण पर विचार किया जा सकता है।

नौवाँ, बीएसएनएल के बोर्ड निर्णयों की समीक्षा हेतु एक स्वतंत्र तंत्र लाया जाए जिसमें सरकारी प्रतिनिधित्व कम हो। बीएसएनएल को जारी रखने का निर्णय इसके प्रदर्शन पर निर्भर करता है, ऐसे में कंपनी के प्रयासों की यह समीक्षा सहायक सिद्ध होगी।

“4जी आवंटन और वीआरएस लाने के लिए सरकार तैयार होगी लेकिन अहम संगठनात्मक सुधारों जैसे कार्यप्रणाली बदलना, बोर्ड को प्रभावी बनाना, सर्कल प्रमुखों को जवाबदेह बनाने जैसे कार्यों में परेशानी आ सकती है।”, प्राध्यापिका रेखा जैन ने कहा।

ऐसी स्थिति में हम अपेक्षा नहीं कर सकते कि बीएसएनएल बाज़ार की प्रतिस्पर्धा को झेल पाएगा। दूरसंचार विभाग भी इसके लिए अधिक सहायक सिद्ध नहीं हुआ है। इस प्रकार बेहतर यह होगा कि एक सरकारी उपक्रम की तरह यह ई-गवर्नेंस, सैन्य बलों और दुर्गम क्षेत्रों (पूर्वोत्तर व पहाड़ी इलाके) में सेवाएँ प्रदान करे जहाँ सरकार इसकी निश्चित ग्राहक होगी।

जवाबदेही के बिना परिणाम देखने को नहीं मिलते हैं। उच्च स्तर के अधिकारी इसके लाभ-हानि के लिए जवाबदेह हों। अपनी कार्यपद्धति को दिशा विशिष्ट बनाकर एक सरकारी संस्था की बजाय बीएसएनएल एक व्यावसायिक संस्था की तरह कार्य करे तो ही उभर सकता है। यदि पाँच वर्षों में संतोषजनक प्रगति देखने को नहीं मिलती है तो सरकार को परियोजना इकाई तक ही इसकी सेवाएँ सीमित कर देनी चाहिए और चरणबद्ध तरीके से इसे बंद भी किया जा सकता है।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।