भारती
मलिक काफूर के असर में आए खिलजी का बेटों सहित खात्मा- भारत में इस्लाम भाग 25

अलाउद्दीन खिलजी के आतंकी राज का अंत आ गया। वह बीमार पड़ा। वह पूरी तरह मलिक काफूर के प्रभाव में था। उनके बीच नाजायज़ संबंधों पर जियाउद्दीन बरनी ने खूब कहासुनी की है। काफूर उसका नायब तो था ही। उसे विजारत और फौज का मुखिया भी बना दिया गया।

बीमारी की हालत में अलाउद्दीन की बेरहमी और सख्ती दस गुना ज्यादा बढ़ गई। उसने अपने बड़े बेटे खिज्र खां को अपना उत्तराधिकारी बना दिया था। बेगमें लूट की बेहिसाब दौलत की चकाचौंध में महंगी दावतों में ही मसरूफ थीं।

काफूर अपना खेल शुरू कर चुका था। उसने खिज्र खां को कैद करवाकर ग्वालियर के किले में भिजवा दिया। उसके ससुर अलप खां को बिना किसी अपराध में मरवा दिया गया। एक दिन अलाउद्दीन खिलजी के मरने की खबर आई।

बरनी ने लिखा है कि कुछ लोगाें को यकीन है कि बीमारी की हालत में उसकी हत्या की गई। दूसरे दिन उसने मलिकों, अमीरों और दूसरे अहम लोगों को राजभवन में बुलाया। वह अलाउद्दीन खिलजी से एक ऐसे फरमान पर दस्तखत ले चुका था, जिसके अनुसार खिज्र खां को उत्तराधिकार से वंचित करने और पाँच साल के शहाबुद्दीन को उत्तराधिकारी नियुक्त करने का आदेश था।

अब शहाबुद्दीन एक कठपुतली सुलतान हो गया। ताकत अब मलिक काफूर के हाथों में थी। काफूर ने मलिक संबल को एक खास काम के लिए लगाया। उसे खिज्र खां की आँखें निकालनी थीं। बरनी लिख रहा है

“पहले दिन खिज्र खां के भाई शादी खां को सीरी के राजभवन में अंधा कर दिया गया। खिज्र खां की माता को कष्ट देने लगा, जो कि मलिका-ए-जहां कहलाती थी। उसकी सारी धन, सपंत्ति, जेवर, जवाहरात सब छीन लिए।

खिज्र खां के मददगारों को बरबाद कर दिया गया, जो कि बहुत बड़ी संख्या में थे। मुबारक खां अर्थात् सुलतान कुतबुद्दीन, जो खिज्र खां का ही हमउम्र था, एक कोठरी में बंद करा दिया गया। किसी कारण वह अंधा होने से बच गया क्योंकि किसी ने उसे समझाया कि ऐसा करने से अलाउद्दीन के भरोसेमंद लोग उसके खिलाफ हो जाएँगे।

 हम एक बार फिर अमीर खुसरो के पास चलते हैं। अपने आसपास घट रही घटनाओं का ब्यौरा दर्ज करने का उसका तरीका गजब है। वह तारीख पहले लिखता है। उसने अलाउद्दीन खिलजी की मौत की तारीख लिखी है- 4 जनवरी 1316। वह बता रहा है

खिज्र खां का पतन शुरू हो गया। खिज्र खां ने तय किया कि सुलतान की सेहत के लिए वह पैदल हतनापुर जियारत को जाएगा। जब सुलतान की सेहत सुधरने को हुई तो वह पैदल निकला। इसी बीच मलिक नायब ने अलप खां की हत्या करा दी।

खिज्र खां के नाम से एक संदेश भिजवाया कि वह अमरोहा चला जाए। बिना आदेश के दिल्ली न आए। उससे शाही निशान भी वापस ले लिए गए। वह दुखी मन से अमरोहा पहुँचा। तब फिर यह आदेश जारी हुआ कि उसे ग्वालियर के किले में कैद कर दिया जाए।

अब आगे का हाल महाकवि अमीर खुसरो ही बताएँगे– “सुलतान की मौत के बाद उसके मृत शरीर को दफन होने के पहले ही उसे सुंबुल को यह हुक्म देकर रवाना किया कि वह खिज्र खां की आँखों में सलाई फेर दे। सुंबुल के सहायकों ने शहजादे को पटक दिया। उसकी आँखों में सलाई फेर दी गई। इसके बाद सुंबुल काफूर के पास देहली पहुँच गया। काफूर ने उसे खासतौर पर सम्मानित किया, धनसंपत्ति दी गई।

अब आप एक-एक दिन की घटना पर गौर कीजिए। अलाउद्दीन की मौत के बाद मलिक काफूर सबसे ताकतवर है। उसने एक-एक करके खिलजी के बेटों को कैद करवाया। अंधा कराया। लेकिन खिलजी के खास सेवादार लोग जिंदा थे और वे यह सब बरबादी अपनी आंखों से हर दिन देख रहे थे।

अब हज़ार सुतून के महल में रात के वक्त पहरेदारी करने वाले सक्रिय हुए। कुछ पैदल सैनिक एक रात पूरी तैयारी से दाखिल हुए। अलाउद्दीन की मौत के 35 दिन बाद इन्होंने एक दिन महल में ही मलिक काफूर की हत्या कर उसका सिर काट डाला। जियाउद्दीन बरनी के अनुसार खिज्र खां और शादी खां को अंधा करने का बदला ले लिया गया।

मलिक काफूर की मौत के बाद कुतबुद्दीन मुबारक को खिलजी की जगह पर बिठाया गया। वह खिज्र खां का भाई था। लेकिन उसकी नज़र देवल दी पर थी। उसने देवल दी को दरबार में भेजने की मांग की। खिज्र खां ने मना कर दिया। उसका यह जवाब उसके अंत का बहाना बना।

कुतबुद्दीन ने सर सिलाहदार को बुलाकर ग्वालियर जाकर उनके सिर कलम कर देने का हुक्म दिया। एक मामूली हिंदू ने एक तलवार से खिज्र खां की हत्या कर दी। उसके बाद उसके भाई शादी खां और शहाबुद्दीन को भी मार डाला गया। इस हत्याकांड से औरतों ने रोना शुरू कर दिया। मारने के बाद ग्वालियर के किले में विजय मंदिर नामक बुर्ज में दफना दिया गया। जनवरी से मार्च 1316 के बीच यह सब हो गया।

शहाबुद्दीन कौन था, जो कुछ दिन के लिए खिलजी की जगह पर बैठाया और फिर कैद में जिसे मार डाला गया। एसामी के ब्यौरे कुछ अलग जानकारी दे रहे हैं- मलिक नायब ने सुलतान का अंतिम समय देखकर एक सभा आयोजित की। उमर खां को सुलतान घोषित कर दिया, जो कि रामदेव की बेटी का बेटा था और जिसकी उम्र छह साल कुछ महीने की थी। उसकी पदवी शहाबुद्दीन घोषित की गई। वास्तव में मलिक नायब ही बादशाह था, शहाबुद्दीन नाममात्र के लिए था।

जिन चार पैदल सैनिकों ने मलिक काफूर की हत्या की, एसामी ने उनके नाम भी बताए हैं- मुबश्शिर, बशीर, सालेह और मुनीर। इन्होंने मिलकर उस रात मलिक काफूर और उसके तीन-चार करीबियों को मौत के घाट उतार दिया।

अगले दिन कैद में बंद मुबारक खां को बाहर निकालकर शहाबुद्दीन का नायब बनने के लिए कहा गया। वह दो महीने ही नायब रहा और फिर शहाबुद्दीन को कैद कर खुद ही सुलतान बन गया। करीब चार-पांच महीने के खूनखराबे में अलाउद्दीन खिलजी के ज्यादातर बेटे अंधे बनाकर मार डाले गए। सिर्फ मुबारक खां बचा, जो कुतबुद्दीन मुबारक शाह के नाम से सुलतान बना। वह सिर्फ चार साल ही रह पाया। इस दौरान उसने गुजरात, देवगिरि और तेलंगाना पर हमले कराए।

 दिल्ली पर इस शख्स का कब्ज़ा था। इनकी शान में एसामी ने लिखा है- “जब सुलतान कहीं जाता था तो उसकी रानियाँ उसके साथ होती थीं। वह हमेशा शराब के नशे में मस्त रहता था। रमणियाँ और नौजवान लड़कियाँ उसके पीछे और दाहिनी तरफ चला करती थीं। जहां भी काेई सुदंर स्थान आता, वे रुक जाते थे। फौरन भोग-विलास शुरू हो जाता था। चार साल तक जब तक वह बादशाह रहा, दिन-रात इसी तरह भोग-विलास में डूबा रहा।”

मोरक्को से आए इब्नबतूता ने भी दिल्ली में इस खूनी तख्ता पलट के विवरण लिखे हैं। वह बता रहा है- “अलाउद्दीन खिलजी के बेटों के नाम हैं- खिज्र खां, शादी खां, अबू बकर खां, मुबारक खां और शहाबुद्दीन। अलाउद्दीन की मौत के बाद मलिक नायब ने शहाबुद्दीन को सिंहासन पर बैठाया।

दो भाई अबू बक्र खां और शादी खां को अंधा करके ग्वालियर में कैद करा दिया। वहाँ पहले से मौजूद खिज्र खां को भी अंधा करा दिया गया। कुतबुद्दीन मुबारक को भी कैद किया, लेकिन वह अंधा नहीं   किया गया। जब मलिक काफूर को मार डाला गया तो कुतबुद्दीन ने शहाबुद्दीन को सिंहासन से हटाया और उसकी उंगलियां कटवाकर ग्वालियर में बाकी भाइयों के पास भेज दिया गया।”

कुतबुद्दीन मुबारक सुलतान बनते ही सबसे पहले दिल्ली से देवगिरि की 40 दिन की यात्रा पर निकला। इब्नबतूता ने बताया है कि जब वह रास्ते में ही था तो उसके कुछ अमीर बगावत पर उतारू हो गए थे। वे उसके भतीजे और खिज्र खां के 10 साल के बेटे को सिंहासन पर बैठाना चाहते थे। वह उस समय सुलतान के ही पास था।

जब सुलतान कुतबुद्दीन को इस साजिश की खबर हुई तो उसने अपने भतीजे के पाँव पकड़कर उसका सिर पत्थरों से टकराकर भेजा निकालकर मार डाला। मलिक शाह नाम के एक अमीर को ग्वालियर इस आदेश से भेजा कि वह वहां इस बालक के बाप और चचाओं को खत्म कर दे।

तब ग्वालियर के किले का काज़ी था जैनुद्दीन मुबारक। उसने बाद में इब्नबतूता को उस दिन का घटनाक्रम बताया। जिस दिन दोपहर के पहले मलिक शाह ग्वालियर पहुँचा तब काज़ी खिज्र खां के पास ही बैठा था। जब खिज्र खां को मलिक शाह के आने की खबर पता चली तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

जब अमीर शहजादे की कोठरी में पहुँचा तो शहजादे ने उससे पूछा कि तुम यहाँ क्यों आए हो? उसने उत्तर दिया- आखुंद आलम के काम से। शहजादे ने फिर पूछा कि मेरी जान की तो हिफाजत है? मलिक शाह ने उसे भरोसा दिलाया।

उसके बाद उसने कोतवाल से किले के 300 सैनिकों को बुलवाया। सबके सामने सुलतान कुतबुद्दीन मुबारक का आदेश पढ़ा गया। सबसे पहले वे शहाबुद्दीन के पास पहुँचे। उसकी हत्या की गई। उसके बाद शादी खां और अबू बक्र खां को मारा गया।

खिज्र खां के पास जब वे पहुँचे तो वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था। उसकी मां भी उसके साथ थी। उसे बंद कर दिया गया। खिज्र खां को भी कत्ल करा दिया गया। लाश को बिना नहलाए दफना दिया गया। इब्नबतूता ने 1327 में खिज्र खां की माँ को भी देखा था।

ये भयानक हत्याकांड दो हिंदू राजवंशों की तीन ऐसी महिलाओं के सामने हुए, जिनके बारे में इसके आगे हमारे पास कोई ब्यौरा नहीं है। वे इसी कत्लोगारत में कहीं खो जाती हैं। इनमें पहली है देवगिरि के राजा रामदेव की बेटी, जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने सुलतान बनने के पहले की भयावह लूट में अपने हरम में लाकर रखा था। छह साल का शहाबुद्दीन इसी से पैदा हुआ था।

दूसरी महिला है गुजरात के राजा कर्ण की रानी कमला दी, जिसे सुलतान बनने के बाद गुजरात पर हुए हमले में लूट के माल के साथ दिल्ली लाया गया था। और तीसरी किरदार है राजा कर्ण और कमला दी की मासूम बेटी देवल दी। हम नहीं जानते कि दिल्ली और ग्वालियर में मचे इस खूनखराबे के बाद ये तीन बदकिस्मत औरतें इतिहास के किस अंधेरे में खो गईं? इनकी जिंदगी कैसी कटी, कोई नहीं जानता।

अब खुसरो खां नाम का एक नया शख्स नज़र आने लगता है। वह कुतबुद्दीन मुबारक के उतना ही करीब आता है, जितना मलिक काफूर कभी अलाउद्दीन खिलजी के करीब था। इसी खुसरो खां ने तेलंगाना, देवगिरि और गुजरात पर हमले जारी रखे।

किसी भी सुलतान के समय फिर से हमले और वसूली एक स्थाई सिलसिला बन चुका था। कुतबुद्दीन मुबारक शाह नशे और ऐशोआराम में मस्त हो चुका था। एसामी ने इस  खुसरो खां को गुजरात मूल का ही बताया है, जो पराव जाति का था। 1320 में खिलजी के वंश का खात्मा इसी खुसरो खां के हाथों से होना तय था।

अगले भाग में हम खुसरो खां के समय दिल्ली का हाल देखेंगे। धर्मांतरित हिंदुओं ने एकजुट होकर एक बार फिर दिल्ली में ताकत दिखाई है। वे कुछ समय के लिए खुद तख्त पर जा बैठे। हम जातीय नरसंहार का घृणित नमूना भी देखेंगे।

पिछला भाग- लूट रही जारी- कर्नाटक और तमिलनाडु में सोने के मंदिर तबाह (भारत में इस्लाम भाग 24)

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com