भारती
धारा 370 के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा है पहली प्राथमिकता

जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद कम से कम चार तरह के प्रभावों-परिणामों की प्रतीक्षा हमें करनी होगी। सबसे पहले राज्य में व्यवस्था के सामान्य होने की प्रतीक्षा करनी होगी। केंद्र और राष्ट्रपति की अधिसूचना को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की शुरुआत हो चुकी है। इसलिए हमें न्यायिक समीक्षा की प्रतीक्षा करनी होगी। तीसरा सुरक्षा-व्यवस्था पर कड़ी नज़र रखनी होगी और चौथा इसपर वैश्विक प्रतिक्रिया का इंतज़ार करना होगा।

तत्काल रूप से सुरक्षा का स्थान सबसे ऊपर रहेगा, क्योंकि इसमें ढील हुई, तो परिस्थितियों पर नियंत्रण पाने में दिक्कत होगी। पाकिस्तान की रणनीति एक तरफ कश्मीर मामले के अंतर-राष्ट्रीयकरण में है और दूसरी तरफ भारत में हिंसा भड़काने में। यह हिंसा कश्मीर में हो सकती है और दूसरे हिस्सों में भी।

पाकिस्तान मानकर चल रहा है कि इस वक्त अमेरिका का दबाव भारत पर डाला जा सकता है। पर उसके अनुमान गलत साबित होंगे, क्योंकि भारत पर अमेरिकी दबाव एक सीमा तक ही काम कर सकता है। कश्मीर के मामले में अब कोई भी अंतर-राष्ट्रीय दबाव काम नहीं करेगा। यह प्रसंग 1948 से अंतर-राष्ट्रीय फोरम में जाने के कारण ही पेंचीदा हुआ था। 

ट्रंप, पाकिस्तान और कश्मीर

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में एक से ज़्यादा बार मध्यस्थता की बात करके उसके हौसले को बढ़ा दिया था। ट्रंप ने दूसरी बार भी इस बात को दोहराया, पर पिछले सोमवार को 370 से जुड़े निर्णय के बाद वे मौन हो गए हैं। अमेरिकी सरकार ने अपने औपचारिक बयान में इसे भारत का आंतरिक मामला बताया है। इतना ही नहीं अमेरिकी विदेश विभाग की वरिष्ठ अधिकारी एलिस वेल्स इस्लामाबाद होते हुए भारत आई हैं। अनुच्छेद 370 के फैसले के बाद पाकिस्तानी राजनय की दिशा फिर से भारत की तरफ मुड़ी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान

भारत को अब ब्लैकमेल करना उतना आसान नहीं है, जितना पाकिस्तान में समझा जाता है। पाकिस्तान खुद फटेहाल है। उसकी आर्थिक स्थिति खराब है। सिर पर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की ब्लैक लिस्ट का साया है। इमरान खान हाल में अमेरिका में एक साक्षात्कार में बताकर आए हैं कि देश में अब भी 32,000-40,000 आतंकवादी सक्रिय हैं। वे ऐसी उम्मीद क्यों कर रहे हैं कि वे दुनिया को प्रभावित कर पाएँगे? उनकी साख लगातार गिर रही है और छवि मिट्टी में मिल चुकी है। 

कश्मीर के प्रतिबंध

जैसा कि गृहमंत्री ने संसद में कहा था कि कश्मीर में प्रतिबंध निषेधात्मक हैं। वे इसलिए नहीं है कि स्थिति खराब थी, बल्कि इसलिए हैं कि स्थिति खराब होने न पाए। स्थितियाँ सुधरीं तो प्रबंध हटते जाएँगे। आगामी सोमवार को ईदुज्जुहा है। संभावना है कि इस अवसर नागरिकों के आवागमन पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया जाएगा या कम कर दिया जाए।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने बुधवार को राज्य के नागरिकों और सुरक्षा बलों से अलग-अलग मुलाकातें करके स्थिति का आँकलन किया है। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से प्राप्त रिपोर्टों के आधार पर सरकार कोई निर्णय करेगी।

चित्र श्रेय- ब्रजेश कुमार सिंह

उधर पाकिस्तान से जो प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं, वे बेहद भड़काऊ हैं। पाकिस्तान ने भारत के साथ राजनयिक संबंधों का दर्जा कम करने की घोषणा की है। भारत के उच्चायुक्त को वापस जाने के लिए कहा गया है। पाकिस्तान के नए उच्चायुक्त को इस महीने भारत आना था, जो अब नहीं आएँगे। द्विपक्षीय व्यापार बंद हो जाएगा, दोनों देशों के आपसी समझौतों की समीक्षा होगी और पाकिस्तान इस मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाएगा। इस्लामी देशों के संगठन ने पाकिस्तान के पक्ष में पहले ही बयान जारी किया है।  

कुल मिलाकर उसकी दिलचस्पी भारत पर वैश्विक दबाव बढ़ाने की है। प्रधानमंत्री इमरान खान ने मंगलवार को संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में साफ कहा कि अब पुलवामा जैसी घटनाएँ और होंगी और दोनों देशों के बीच युद्ध भी हो सकता है। इसका अर्थ है कि जो आतंकवाद परोक्ष रूप से संचालित किया जा रहा था, वह अब सीधे-सीधे चलाया जाएगा। पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा ने कहा है कि कश्मीरियों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हम किसी भी हद तक जाएँगे।

रऊफ़ अज़हर की गतिविधियाँ

इमरान खान और जनरल बाजवा की धमकियों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। जिस वक्त इन धमकियों की खबरें आ रहीं थीं, उसी समय यह खबर भी आई कि जैश के प्रमुख मौलाना मसूद अज़हर का भाई रऊफ़ अज़हर रावलपिंडी में बैठकें करने के बाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में पहुँच गया है।

उसके नियंत्रण रेखा के करीब आने का अर्थ है कि पाकिस्तानी आईएसआई ने किसी बड़ी साजिश का खाका तैयार किया है। भारतीय सूत्रों का कहना है कि देश के इंफ्रास्ट्रक्चर या आर्थिक गतिविधियों के केंद्रों पर हमले हो सकते हैं। भारतीय इंटेलिजेंस सूत्रों का कहना है कि जैश की एक टीम बनाई गई है, जो मुंबई को निशाना बना सकते हैं। 

पाकिस्तानी धमकियों को बंदर घुड़की मान भी लें, पर सीमा पार से चल रहे छद्म युद्ध में तेज़ी आए तो विस्मय नहीं होना चाहिए। पाकिस्तानी सैनिक-प्रतिष्ठान की दिलचस्पी अपना महत्त्व बनाए रखने में है। प्रधानमंत्री इमरान खान उसके काबू में है। जोश और तैश की बातें करके वे अपने देश के लोगों को भरमाना चाहते हैं, ताकि आर्थिक विफलताओं से उनका ध्यान हटे। वहाँ पाले-पोसे जा रहे आतंकवादी संगठन अब खुलकर खेलेंगे। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान परस्त संगठनों की हरकतों पर अब नज़रें रखनी होंगी। खबरें हैं कि पाकिस्तान ने हज़ारों लोगों को तैयार करके कश्मीर में भेजने की योजना बनाई है।  

अफगान घटनाक्रम

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जरनल में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि धारा 370 के बारे में भारत सरकार के निर्णय का असर अफगानिस्तान में चल रही शांति प्रक्रिया पर भी पड़ेगा। अखबार की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अफगानिस्तान से जुड़े घटनाक्रम को देखते हुए भी शायद भारत सरकार ने कश्मीर की स्वायत्तता के सिलसिले में बड़ा कदम उठाया है। कश्मीर में सुरक्षाबलों की संख्या बढ़ाने और अमरनाथ यात्रा को स्थगित करने के फैसले बदलते घटनाक्रम को देखते हुए किए गए हैं। 

पाकिस्तान की दिलचस्पी शांति-वार्ता के बहाने अफगानिस्तान में फिर से पैर जमाने की है। जिस तरह से 1980 के दशक में उसने अफगान मुजाहिदीन का इस्तेमाल कश्मीर में किया था, तकरीबन उसी तरीके से या किसी नए तरीके से वह कश्मीर में फौजी हस्तक्षेप करेगा।

पिछले 30 वर्षों में आईएसआई ने कश्मीर में कई तरह के प्रयोग किए हैं। कम से कम 20 आतंकी समूह अलग-अलग नामों से घाटी में सक्रिय रहे हैं। इनमें हिज्बुल मुजाहिदीन, लश्करे तैयबा और जैशे मोहम्मद के नाम सबसे आगे हैं। चूँकि इनपर अब अंतर-राष्ट्रीय पाबंदियाँ हैं, इसलिए पाकिस्तान अब वैकल्पिक तरीकों को खोज रहा है। 

आतंकी संगठनों के बदलते नाम

भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसियों ने हाल में हिज्बुल मुजाहिदीन के एक जेहादी के 17 मिनट के फोन वार्तालाप को टैप किया है, जिससे पता लगा है कि पाकिस्तान ने अब अंसार गज़वातुल हिंद नाम के एक नए संगठन को आगे बढ़ाया है, जिसमें हिज्बुल मुजाहिदीन के ही लोग हैं। आतंकी संगठनों के नाम बदलते रहते हैं।

मूलतः इसके पीछे अलकायदा है। इस संगठन को ज़ाकिर मूसा चला रहा था, जो मई के महीने में मारा गया। भारतीय सुरक्षा बलों ने हाल में घाटी में सक्रिय आतंकियों में से काफी का सफाया कर दिया है, पर अंदेशा इस बात का है कि पाक अधिकृत कश्मीर में बड़ी संख्या में नए रिक्रूटों को तैयार किया गया है, जिन्हें मौका लगने पर नियंत्रण रेखा पार कराई जाएगी।

नियंत्रण रेखा

पिछले कुछ समय से नियंत्रण रेखा पर लगातार चल रही भारी गोलाबारी इस बात का संकेत कर रही है कि घुसपैठ की कोशिशें जारी हैं। घुसपैठ का यह समय भी है, क्योंकि शरद ऋतु के बाद ऊँची पहाड़ियों पर बर्फ पड़ने लगेगी। हाल में पाकिस्तान की बॉर्डर एक्शन टीम (बैट) के कुछ लोग सीमा पार करके भारतीय क्षेत्र में घुस आए थे, जिनमें से चार भारतीय क्षेत्र में ही मारे गए। जनरल बाजवा के बयान के बाद से पाकिस्तानी गोलाबारी और तेज़ हुई है।

भारतीय सेना की उत्तरी कमान के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल रणबीर सिंह ने पिछले मंगलवार (6 अगस्त) को सुरक्षा एजेंसियों की साझा कोर समिति की बैठक में बताया कि दस दिनों से लांचिंग पैड पर आतंकियों की उपस्थिति बढ़ रही है। नियंत्रण रेखा के पास मौजूद शिविरों में आतंकवादियों की संख्या बढ़ रही है संघर्ष विराम के उल्लंघन की संख्या भी। 

अफगानिस्तान में पाकिस्तानी रणनीति को विफल करने के लिए भी कश्मीर पर भारतीय नियंत्रण को दृढ़ करने की आवश्यकता है। कुछ समय तक वहाँ सुरक्षा-संबद्ध प्रतिबंधों की जारी रखना होगा। खासतौर से इंटरनेट का इस्तेमाल करके आतंकी संगठन अपनी गतिविधियों का संचालन करते हैं। दूसरी तरफ आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने और शांतिप्रिय नागरिकों को प्रोत्साहन देने के कार्यक्रमों की ज़रूरत भी है। यह दूरगामी कार्यक्रम है। फिलहाल सुरक्षा उपायों पर ध्यान देना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी संपादक हैं।