भारती
ऐप से निजता को खतरा? आरोग्य सेतु के उपयोग के लाभ इसके संभावित खतरों पर भारी

कोविड-19 के खतरों, श्रेष्ठ व्यवहारों और परामर्शों के विषय में जानकारी देने के लिए सरकार की आरोग्य सेतु ऐप का उपयोग लगभग 10.16 करोड़ भारतीय कर रहे हैं, ऐप से प्राप्त सूचना के अनुसार।

ऐप की एक दूसरी उपयोगिता यह है कि संपर्क अनुरेखण (कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग) के माध्यम से यह संभावित कोविड-19 रोगियों के विश्वसनीय चिह्नों का पता लगाकर उपभोक्ताओं को रियल टाइम सूचना प्रदान करती है जिससे वे स्वयं को संदिग्धों के संपर्क में आने से बचा सकें।

1 मई को सरकार ने कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए राज्यों के लिए दिशानिर्देश व आदेश जारी किए थे जिनका पालन 4 मई से शुरू होने वाली 14 दिनों की अवधि याननी लॉकडाउन के तीसरे चरण में करना है।

इन दिशानिर्देशों में सरकारी व निजी कर्मचारी जो कार्यस्थल से आते-आजे हैं, उनके लिए आरोग्य सेतु ऐप को डाउनलोड करना अनिवार्य बताया गया है।

देखें कि ये ऐप कौन-से डाटा इकट्ठा करती है- नाम, फोन नंबर, आयु, लिंग, स्थान, व्यवसाय और यात्रा वृत्तांत। सरकार द्वारा ऐप के अनिवार्य उपयोग के दिशानिर्देश के बाद कई निजता एक्टिविस्टों ने हर समय व्यक्ति की लोकेशन ट्रैक करने और संग्रहित किए जा रहे डाटा के उचित संचयन न होने पर आशंका व्यक्त की है। उनका कहना है कि यह एक निगरानी करने वाले राज्य-तंत्र जैसा होगा।

आइए देखें कि क्या सरकार वैधानिक रूप से ऐसा कर सकती है। जस्टिस केएस पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारतीय संघ मामले के 2017 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने एक टेस्ट रखा था जिसके अनुसार अपने नागरिकों की निजता में हस्तक्षेप को सरकार को न्यायाचित सिद्ध करना होगा।

यह टेस्ट है कि सरकार की कार्रवाई वैधानिक होनी चाहिए, किसी वैधानिक आवश्यकता या उद्देश्य की पूर्ति के लिए होनी चाहिए और इस लक्ष्य की प्राप्ति का साधन ऐसा हो कि किसी के अधिकार पर असंगत प्रभाव न पड़े।

महामारी अधिनियम 1897 बीमारी को नियंत्रित करने के लिए सरकार को ‘आवश्यक’ कदम उठाने की अनुमति देती है जिसके लिए सरकार आवश्यक कानून को पारित कर सकती है।

तर्क दिया जा सकता है कि संक्रमण की कड़ी को तोड़ने के लिए लोगों को क्या करें, क्या नहीं के प्रति संवेदनशील बनाना, उन्हें सही जानकारी देना और संक्रमण के खतरे के आँकलन के लिए संपर्क अनुरेखण करना ‘आवश्यक’ है जिसे इस प्रकार की ऐपों की आधुनिक तकनीक का उपयोग करके किया जा सकता है।

तर्कसंगत होने का अर्थ हुआ कि अधिकारों को सीमित करने के लाभ इससे होने वाली हानि से अधिक हों। सीधे शब्दों में कहा जाए तो अधिकारों को सीमित करना ऐसा करने के उद्देश्य और अधिकारों की रक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों से न्यायोचित ठहराया जा सकता है।

हाल ही में फ्रांसीसी नैतिक हैकर ने ऐप की प्रोग्रामिंग में एक त्रुटि ढूंढकर करोड़ों नागरिकों के निजी डाटा की असुरक्षा पर चिंता व्यक्त की थी। इसकी प्रतिक्रिया में सरकार ने एक आधिकारिक आश्वासन जारी कर कहा कि ऐसा कुछ नहीं है। सरकार ने उपभोक्ताओं को कोई त्रुटि मिलने पर आगे आकर सूचित करने के लिए प्रोत्साहित भी किया है।

दूसरी ओर एक अन्य प्रश्न स्मार्टफोन की सर्वव्यापकता पर खड़ा हुआ है। कुछ लोगों का कहना है कि सरकार के ये दिशानिर्देश प्रभावशाली कैसे हो पाएँगे जब हर भारतीय के पास स्मार्टफोन है ही नहीं। हो सकता है हर भारतीय के पास स्मार्टफोन न हो लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि जिनके पास स्मार्टफोन हैं उनके लिए तकनीक का उपयोग करके इन उपायों को प्रभावशाली नहीं बनाया जा सकता है।

एक ओर जहाँ इसमें कोई संदेह नहीं है कि आरोग्य सेतु ऐप के संदर्भ में निजता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मध्य संतुलन पर प्रश्न उठेंगे, वहीं हमें स्वयं से एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न भी पूछना चाहिए कि विकल्प क्या है?

अगर ऐसी कोई ऐप हो ही नहीं तो क्या हम उच्च खतरे वाले क्षेत्रों में जब सब्ज़ी या किराना लेने जाएँ तो उससे पहले अपनी अंगुलियों पर कोई जानकारी न होने से सहज हैं?

क्या सरकार संपर्क अनुरेखण करके बीमारी के फैलाव को नियंत्रित करने के लिए किसी तकनीक का उपयोग करे ही नहीं और केवल रोकथाम ज़ोनों की सूची प्रकाशित करे एवं क्वारन्टाइन घरों के बाहर नोटिस ही छापे?

अगर विकल्प है किसी निजी इकाई द्वारा विकसित ऐप का तो क्या हम अपना निजी डाटा उस इकाई के पास जाने देंगे जो भारतीय कानून के अधीन केवल सीमित रूप से ही उत्तरदायी है?

जस्टिस बीएन श्रीकृष्णा कमिटी रिपोर्ट ने माना कि निजी इकाइयों पर लागू होने वाले सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और नियमों की पहुँच निजी डाटा की विभिन्न श्रेणियों की सुरक्षा के मामले में बहुत सीमित है।

न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्णा

इसके अतिरिक्त, निजी इकाइयों के लिए वैधानिक संरचना को भी लागू करने में कठिनाई होती है क्योंकि अधिनियम के अधीन अधिनिर्णायक तंत्र में नियुक्तियाँ देरी से होती हैं।

हालाँकि, निजी डाटा सुरक्षा विधेयक 2019 व्यक्तिगत जानकारी के संचयन, उपयोग और उजागर करने के लिए कड़े नियम प्रस्तावित करता है। साथ ही यह व्यक्ति को उनके डाटा में परिवर्तन या डाटा हटाने के कुछ अधिकार भी देता है लेकिन यह अब तक मात्र एक विधेयक है, अधिनियम नहीं इसलिए उसका कोई वैधानिक प्रभाव नहीं है।

तर्क दिया जा सकता है कि आरोग्य सेतु जैसी राज्य के स्वामित्व वाली ऐप का उपयोग करने के नुकसान हैं लेकिन ये नुकसान इसका उपयोग न करने या वास्तविक उत्तरदायी न होने वाली निजी इकाई के ऐप का उपयोग करने से होने वाले नुकसानों से कम ही हैं।

हाल में हुई स्प्रिंकलर की पराजय दर्शाती है कि न्यायव्यवस्था सरकार को उत्तरदायी बना सकती है और ऐसा किया भी जाएगा यदि नागरिकों के निजता के मौलिक अधिकार को खतरा होगा।

स्प्रिंकलर लोगो

कोविड-19 रोगियों के डाटा का स्थानांतरण यूएस आधारित कंपनी स्प्रिंकलर को करने के विवादास्पद मामले में केरल उच्च न्यायालय ने केरल सरकार को कई निर्देश दिए जिससे डाटा निजता की सुरक्षा की जा सके।

जो भी निर्देश दिए गए थे, उनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण है कि न्यायालय ने राज्य सरकार को कहा कि वह सभी डाटा को मिला दे, उससे नामों को हटा दे और तब ही स्प्रिंकलर को दे।

एक ओर जहाँ डाटा सुरक्षा के लिए हमें सरकार को उत्तरदायी ठहराना चाहिए, वहीं दूसरी ओर हमें इस तथ्य के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए कि यदि हम स्वेच्छा से अपना डाटा साझा करें तो हम इस महामारी को नियंत्रित करने में बहुत बड़ी सहायता करेंगे।

व्यापार, जीविका और अर्थव्यवस्था को पुनः शुरू करने के लिए महामारी को नियंत्रित करना सबसे आवश्यक है। अंततः यह एक सौदा है जहाँ हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या हम संकट की घड़ी में सहायता करने के लिए तैयार हैं।

अक्षया सुरेश और पार्वती नायर चेन्नई आधारित एक लॉ फर्म में क्रमशः साझेदार और सहयोगी हैं। उनके विचार व्यक्तिगत हैं व किसी संस्था का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।