भारती
आधार से मतादाता सूची को जोड़ने के लाभ, जटिलताएँ और सावधानियाँ

नागरिकों की सही पहचान की प्रक्रिया के साथ-साथ मतदाताओं की भी सही पहचान करने की दिशा में सरकार ने कदम बढ़ाए हैं। केंद्रीय विधि मंत्रालय ने चुनाव आयोग को मतदाता पहचान पत्र से आधार को जोड़ने का काम फिर से शुरू करने की अनुमति दे दी है। ऐसा करते हुए सुरक्षा उपायों यानी जानकारी को सुरक्षित रखने के काम को भी ध्यान में रखने का सुझाव दिया है। इस संदर्भ में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और आधार अधिनियम, 2016 में तदनुरूप संशोधन करने होंगे। 

इसके पहले आयोग ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 23 में उपधारा (4) जोड़ने की सलाह दी थी, जिसमें मतदाता की पहचान के लिए ‘आधार का सहारा लेने की बात थी। विचार यह भी है कि जिनके पहचान पत्र पहले से बन गए हैं, उनकी पुष्टि के लिए भी आधार का सहारा लिया जाए। इस विषय पर प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, जो जल्द ही कैबिनेट कमेटी के सामने पेश किया जाएगा। संभावना है कि बजट सत्र के दूसरे चक्र में इस विधेयक को संसद में प्रस्तुत किया जाएगा। 

चुनाव आयोग की सलाह

चुनाव आयोग ने दिसंबर 2019 में शासन को सुरक्षा उपायों की एक विस्तृत सूची भेजी थी, जिसमें बताया गया था कि किस तरह से आवेदन और इंफ्रास्ट्रक्चर के स्तर पर इसका ध्यान रखा जाएगा और व्यक्तिगत डाटा को लीक होने से बचाया जा सकेगा।

अगस्त 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्ति की निजता को उसके मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया था। इसके बाद सितंबर 2018 में न्यायालय ने आधार की वैधानिकता को स्वीकार करते हुए भी शासन को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि व्यक्ति के निजी जीवन की सूचनाओं की रक्षा की जाए। इसी बात को सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग से सुरक्षा उपायों के सुझाव माँगे भी गए थे। 

पिछले वर्ष अगस्त में आयोग ने विधि सचिव को पत्र लिखकर वोटर आईडी से आधार लिंक करने के लिए कानूनी बदलाव का प्रस्ताव किया था। आयोग का कहना है कि वे इसके जरिए वोटर लिस्ट को ‘साफ’ करना चाहते हैं। यानी जिन मतदाताओं के नाम एक से ज्यादा जगह पर दर्ज हैं या जो नाम फर्जी हैं, उन्हें हटाया जा सके।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।

प्रक्रिया में लगे अड़ंगे

चुनाव आयोग ने फरवरी 2015 में आधार को मतदाता फोटो पहचान पत्र से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की थी। अगस्त 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने आधार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), एलपीजी और केरोसीन वितरण के उपयोग तक सीमित कर दिया, जिसके कारण यह प्रक्रिया रुक गई।

सितंबर 2018 में आधार पर सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम आदेश आने के बाद चुनाव आयोग ने अपनी इस प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की मांग की, जिसकी अब अनुमति मिल गई है। पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव के समय देश में करीब 90 करोड़ वोटर थे, जबकि करीब 125 करोड़ लोगों के पास आधार कार्ड हैं। आधारऔर पैन को लिंक करने के लिए 31 मार्च 2020 तक की अवधि दी गई है। 

आयोग के सामने अब कुछ चुनौतियाँ हैं। पहली चुनौती है मतदाता सूचियों में भरे फर्जी नामों की सफाई और दूसरी चुनौती है उनकी पहचान के तरीके की परिभाषा। आधार का सहारा लेने पर तीसरी चुनौती उन जानकारियों को सुरक्षित रखने की होगी, जो आधार से जुड़ी हैं। चूँकि भविष्य में जनसंख्या रजिस्टर और नागरिकता रजिस्टर की संभावनाएँ भी हैं, इसलिए आधार और मतदाता पहचान पत्र महत्वपूर्ण बनकर उभरे हैं। 

व्यवस्था को पारदर्शी बनाने और साधनहीन वर्गों तक शासकीय सहायता पहुँचाने के लिए बनाए गए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) कार्यक्रम के लिए भी आधार का सहारा लिया जा रहा है। मोटे तौर छह प्रकार के कार्यों में आधार की सहायता लेने के प्रयास हैं। ये हैं- बैंक खाता, पैन, मतदाता पहचान पत्र, रसोई गैस, राशन कार्ड और मोबाइल फोन। इन सभी को लेकर आपत्तियाँ भी हैं। आपत्ति का बुनियादी आधार व्यक्ति की निजी सूचनाएँ हैं, पर वास्तविक कारण नागरिकों के जीवन पर राज्य की निगहबानी है। 

सुरक्षा और संदेह

मानवाधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि भारतीय राष्ट्र राज्य अपने नागरिकों के जीवन में बहुत ताक-झाँक करता है। पिछले वर्ष देश के कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों के फोन हैक करने की खबरों को भी इससे जोड़ा गया था। दूसरी तरफ सायबर हमलों की घटनाएँ बढ़ीं हैं। देश की सुरक्षा से जुड़े सवाल भी हैं।  

मतदाताओं की पहचान के लिए चुनाव से संबद्ध एजेंसियाँ अभिनव तरीकों का इस्तेमाल भी कर रही हैं। गत 18 जनवरी को तेलंगाना के राज्य चुनाव आयोग ने घोषणा की कि राज्य के स्थानीय निकाय चुनावों में कोम्पल्ली नगरपालिका के 10 मतदान केंद्रों पर चेहरे की पहचान (फेशियल रिकग्निजन) एप का इस्तेमाल किया जाएगा। यह एक पायलट (प्रायोगिक) प्रोजेक्ट है।

फेशियल रिकग्निजन का प्रतिनिधि चित्र

यदि ‘आधार का इस्तेमाल हो, तो ऐसे प्रयोगों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ‘आधार’ की मदद से व्यक्ति की बायोमेट्रिक पहचान आसानी से संभव है। उसका सहारा लेने की माँग राजनीतिक दलों ने भी की है। अगस्त 2018 में हुई एक सर्वदलीय बैठक में ज्यादातर दल इसके पक्ष में थे। 

मतदाता परिचय पत्रों की त्रुटियों को दूर करने की व्यवस्था भ्रम की शिकार भी रही है। पिछले साल सितंबर में चुनाव आयोग ने मतदाता परिचय पत्रों के वैरीफिकेशन का राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। मतदाताओं से कहा गया था कि वे अपने मतदाता पत्र की पुष्टि करा लें। यह काम ऑनलाइन भी किया जा सकता है।

ऐसा ही अभियान 2015 में भी चलाया गया था, जिसका नाम था राष्ट्रीय मतदाता सूची शुद्धि और पुष्टीकरण कार्यक्रम (एनईआरपीएपी)। जब सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि ‘आधार का इस्तेमाल केवल कल्याणकारी सेवाओं के लिए ही किया जा सकता है, तब तक चुनाव आयोग करीब 32 करोड़ मतदाताओं के नाम आधार से जोड़ चुका था। आयोग का तब दावा था कि अगले छह महीने में हम 54 करोड़ और जोड़ लेंगे। 

रास्ता क्या है?

वह प्रक्रिया अचानक रुक गई और भ्रम की स्थिति में तेलंगाना के 22 लाख वोटरों के नाम सूची से कट गए। इसकी जानकारी 2018 में हुई जब वहाँ चुनाव हुए। आंध्र के नाम भी जोड़ लें, तो यह संख्या करीब 55 लाख या उससे भी ज्यादा होती है।

सवाल है कि सब इसके पक्ष में हैं, तो इसका विरोध कौन कर रहा है और क्यों? उसके पहले यह भी समझना होगा कि ‘आधार’ का उपयोग किस रूप में होना है। पिछले साल जब सोशल मीडिया में फ़ेकन्यूज़ की भरमार होने लगी, तो एक माँग यह उठी कि सोशल मीडिया एकाउंटों को ‘आधार’ से जोड़ा जाए, ताकि यह पहचान फौरन हो सके कि कौन झूठी बातें फैला रहा है। यह बात ज्यादा आगे नहीं बढ़ी क्योंकि सरकार ने ही स्पष्ट कर दिया कि उसका ऐसा इरादा नहीं है। 

सवाल है कि देश के नागरिक की पहचान का पत्र कौन-सा है? ‘आधार’ मूलतः नागरिकता की पहचान नहीं है, वह भारत के निवासी का पहचान पत्र है। मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता का पहचान पत्र कह सकते हैं, क्योंकि वोट डालने का अधिकार तो नागरिक का ही है।

आधार’ का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए है कि हाँ यही वह व्यक्ति है। इसकी पुष्टि बायोमेट्रिक्स डाटा यानी उँगलियों के निशान, चेहरे की फोटो और पुतलियों की तस्वीर से होती है। गाँवों में रहने वाला सामान्य मतदाता शासकीय प्रक्रियाओं को जानता भी नहीं और यह भी नहीं जानता कि उसके बारे में जानकारियों का इस्तेमाल कौन और किस तरह कर रहा है।

हम धीरे-धीरे एक जागरूक समाज बन रहे हैं। ऐसे संधिकाल में व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं को निर्धारित करने के पहले सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं। एक बड़ी वजह यह भी है कि डाटा का इस्तेमाल करने वाली और बायोमेट्रिक्स डेटा की सेवा देने वाली तमाम कंपनियाँ विदेशी हैं।

वस्तुतः आज की तमाम व्यवस्थाओं के सूत्र वैश्विक हैं। उनके समाधान भी वैश्विक संदर्भों में ही खोजे जाने चाहिए। फिलहाल सरकार के अगले कदम का इंतज़ार करना चाहिए कि वह किस तरह से एक सुरक्षित व्यवस्था के भीतर रहते हुए मतदाता पत्रों को आधार से जोड़ने का कानून बनाती है। 

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।