भारती
21वीं सदी में अभी तक भारत के 21 पड़ाव

आशुचित्र- 2020 की शुरुआत से पहले देखें 21वीं सदी की उन 21 घटनाओं को जिन्होंने भारत की नियति को प्रभावित किया।

“इतिहास उस बिंदु पर निर्मित होता है जहाँ स्मृति की त्रुटियाँ दस्तावेजों की अप्राप्यता से मेल खा जाती हैं।”, जूलियन बार्न्स नामक अंग्रेज़ी लेखक ने अपनी पुस्तक द सेन्स ऑफ़ एन एंडिंग  में लिखा है जिसे मैन बुकर पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया।

इस कमी को पूरा करने के लिए हम यह कर सकते हैं कि समकालीन इतिहास को दर्ज करें, उन घटनाओं पर लिखें जो शोध के लिए अधिक पुरानी नहीं हैं और ना ही शोक या खुशी मनाने के लिए अधिक नई हैं।

21वीं सदी के बीते पिछले दो दशकों में ऐसी कई घटनाएँ हुई जिन्होंने भारत की नियति पर प्रभाव डाला और उनका स्मरण आवश्यक है। यह भी है कि प्रभावशाली घटनाओं पर नज़र दौड़ाने के लिए दो दशक का समय आदर्श है- न ज़्यादा लंबा, न ज़्यादा छोटा।

प्रस्तुत है 21वीं सदी की उन 21 घटनाओं की सूची जिसने भारत को सबसे ज़्यादा आकार दिया और इसे प्रभावित किया।

1. वाजपेयी-मुशर्रफ आगरा समिट (जुलाई 2001)

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों को सामान्य करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया की शुरुआत वाजपेयी द्वारा पाकिस्तान के तत्कालीन सर्वोपरि नेता जनरल मुशर्रफ को 2 फरवरी को भारत बुलाने से हुई।

24 मई को मुशर्रफ को आधिकारिक रूप से भारत बुलाने का प्रस्ताव भेजा गया जिसे उन्होंने स्वीकार किया और समिट की तिथि 18 जून तय हुई।

14 से 16 जुलाई तक आगरा समिट चली और कश्मीर पर किसी समझौते के बिना ही समाप्त हो गई। जनरल मुशर्रफ के अड़ियल रवैये से भारत निराश रह गया।

क्या नियंत्रण रेखा (एलओसी) को दोनों देश प्रभावी राष्ट्रीय सीमा की तरह स्वीकार करते? भारत ने अपमानित महसूस किया और पाकिस्तान ने वही किया जो वह हमेशा से करता आया है- भारत की धरती पर एक प्रायोजित आतंकी हमला। इस समय उसने श्रीनगर में कई सरकारी कार्यालयों पर हमला किया जिसमें 38 लोगों की जान गई।

कश्मीर मुद्दे को बातों से सुलझाने का सबसे प्रबल और निकट प्रयास विफल हुआ। आतंक को शासन नीति के एक यंत्र की तरह उपयोग करने का पाकिस्तानी कपट एक बार पिर उजागर हुआ।

2. संसद हमले (दिसंबर 2001)

13 दिसंबर को पाँच शस्त्रधारी लोग संसद की दीन सुरक्षा व्यवस्था को पार करके आत्मघाती हमले के प्रयास में घुसे। आतंकी उस वाहन में आए थे जिसपर गृह मंत्रालय और संसद पहुँच लेबल थे।

हालाँकि हमले के समय कई राजनीतिक दलों के कई राजनेता संसद में उपस्थित थे लेकिन उनमें से कोई हताहत नहीं हुआ।

यह सुरक्षा नौ सुरक्षा अधिकारियों के जान का मूल्य चुकाकर मिली। कथित रूप से जैश-ए-मोहम्मद के इन पाँचों आतंकियों को निष्प्रभावी कर दिया गया था। इस हमले के मास्टरमाइंड गाज़ी बाबा को 2003 में कश्मीर में एक मुठभेड़ के दौरान मार गिराया गया।

दूसरी ओर साल भर की सुनवाई के बाद चार जैश आतंकियों को दोषी पाया गया। मुख्य आरोपी अफज़ल गुरु को मृत्युदंड सुनाया गया और एक दीर्घ न्यायिक कार्यवाही के बाद फरवरी 2013 में फाँसी पर चढ़ाया गया।

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर पर हमला हुआ और शासन को मामला खत्म करने में दशक भर का समय लगा। कश्मीर में 5 लाख के सैन्यबल को क्रियाशील करने के बावजूद भारत ने पाकिस्तान पर हमला नहीं किया।

भारतीय सुरक्षा की कमज़ोरियाँ और विदेश नीति की सीमाएँ पूर्णतः उजागर हुईं।

3. गोधरा ट्रेन आगजनी (फरवरी 2002)

27 फरवरी को गोधरा स्टेशन पर खड़ी साबरमती एक्सप्रेस में 59 लोगों को ज़िंदा जला दिया गया था। 2,000 लोगों की एक भीड़ ने ट्रेन पर यह हमला किया था। मरने वालों में 27 महिलाएँ और 10 बच्चे थे। इनमें से अधिकांश यात्री अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल से कारसेवा करके लौट रहे थे।

गोधरा कांड के बाद गुजरात और भारत के अन्य हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे हुए। इन दंगों ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके प्रमुख मंत्री अमित शाह पर बहुत दबाव डाला। मोदी और शाह पर कई वर्षों तक गुजरात दंगों में हाथ होने का आरोप लगता रहा।

इन दोनों के विरुद्ध कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सख्त न्यायिक प्रक्रिया अपनाई। दोनों में से किसी पर दोष सिद्ध नहीं हो पाया। इस बीच मोदी ने 13 वर्षों में गुजरात का मुख्यमंत्री रहकर राज्य में औद्योगिक और प्रशासनिक सुधारों का स्वप्न साकार किया।

2002 में उनपर लगा दाग ज़्यादा दिनों तक नहीं टिक पाया और उनका मुख्यमंत्री के रूप में किया गया काम उसपर हावी हो गया जिसके फलस्वरूप वे 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने। अमित शाह ने 2014 से भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला और मोदी के दूसरे कार्यकाल में वे गृह मंत्री बने।

4. सड़क क्रांति— मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे (अप्रैल 2002)

पिछली सदी के अंत में भारत ने अंतर-राज्य और अंतर-नगरीय अच्छी सड़कों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। वाजपेयी सरकार ने गोल्डन क्वाड्रिलेटरल की योजना बनाई जिसे 1999 में शुरू किया गया।

2000 में शुरू हुई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की महत्वाकांक्षा थी कि सभी भारतीय गाँवों को वर्ष भर क्रियाशील रहने वाली सड़कों से जोड़ा जाए। यह भारत के लिए अपने आप में नया आरंभ था।

सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर पर इस विशेष ध्यान की उत्पत्ति महाराष्ट्र राज्य से हुई। 2000 में शुरू हुए ट्रायलों के बाद अप्रैल 2002 में मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुआ। 95 किलोमीटर लंबा 6 लेन वाला यह एक्सप्रेसवे अभी भी भारत की सबसे बड़ी और आठवीं सबसे बड़ी नगर अर्थव्यवस्थाओं को जोड़कर व्यापार का सहयोग करता है।

1990 के दशक में योजना बनने के बाद इसका निर्माण मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के कार्यकाल में शुरू हुआ। उस समय लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) का दायित्व नितिन गडकरी के पास था।

गोल्डन क्वाड्रिलेटरल को पूरा होने में एक दशक का समय लगा और इसने भारत के पाँच मेट्रो शहरों- दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और कोलकाता- को जोड़ा। पिछले दो दशकों में सरकार द्वारा सड़क पर खर्च किए गए पैसों पर निगरानी रखी गई है जो कि भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए अच्छा है।

5. मेट्रो रेल क्रांति— दिल्ली (दिसंबर 2002)

पिछले 100 वर्षों के अच्छे काल से विश्व के अधिकांश बड़े शहरों में मेट्रो रेल नेटवर्क अस्तित्व में आया। स्वतंत्रता के बाद से भारतीय शहर इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव से लगातार जूझते आ रहे हैं। सार्वजनिक रैपिड परिवहन का अभाव हमारे लिए सबसे घातक रहा है, विशेषकर तब जब इसमें कोई नया निवेश नहीं हो रहा था।

दिल्ली ने 1998 में महत्वाकांक्षी मेट्रो रेल योजना से इस दिशा में मार्ग खोला। शाहदरा से तीस हज़ारी तक लाल रेखा (रेड लाइन) पर 24 दिसंबर 2002 में पहली बार मेट्रो चली।

वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने और उनके बाद में मनमोहन सिंह ने दिल्ली मेट्रो पर ध्यान दिया। उनका सहयोग तत्कालीन स्थानीय नेतृत्व, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने किया।

अब दिल्ली मेट्रो 391 किलोमीटर लंबा और 285 स्टेशनों वाला एक नेटवर्क है। इसपर प्रतिदिन चलने वाली 310 ट्रेनों में 60 लाख यात्री सफर करते हैं। 1995 से 2012 तक दिल्ली मेट्रो के प्रबंध निदेशक रहकर ई श्रीधरन भारत के मेट्रो मैन के रूप में उभरे।

भारत में वर्तमान में 13 क्रियाशील मेट्रो प्रणालियाँ हैं जो 18 शहरों में सेवा देती हैं। नए शहर भी मेट्रो मानचित्र पर उतर रहे हैं और पूर्वचालित मेट्रो का विस्तार हो रहा है। निजी क्षेत्र मेट्रो कोचों का विश्व भर में निर्यात कर रहे हैं, यह एक ऐसा मोड़ है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी।

6. एथेन्स ओलंपिक्स में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का रजत पदक (अगस्त 2004)

हॉकी में मिले मेडलों को छोड़ दिया जाए तो ओलंपिक्स में भारत का कभी भी अच्छा रिकॉर्ड नहीं रहा। 2004 में जाकर भारत ने पहली बार ओलंपिक्स की किसी एकल प्रतियोगिता में रजत पदक जीता।

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को डबल ट्रैप निशानेबाज़ी प्रतियोगिता में रजत पदक मिला था। इससे पहले उन्होंने 2002 के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए राठौड़ को 2004-05 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार और 2005 में पद्मश्री से पुरस्कृत किया गया। 2006 के कॉमनवेल्थ खेलों और 2008 के ओलंपिक्स में उन्होंने भारतीय ध्वज को संभाला।

राठौड़ की विजय के बाद भारत ओलंपिक्स में लगातार ऊपर चढ़ रहा है। 2008 में अभिनव बिंद्रा ने स्वर्ण पदक जीता। 2012 में विजय कुमार और सुशील कुमार ने रजत पदक जीता। 2016 में पीवी सिंधु ने रजत पदक जीता।

7. टीसीएस की सार्वजनिक लिस्टिंग (अगस्त 2004)

1968 में शुरू हुई टाटा कन्सल्टेन्सी सर्विसेज़ (टीसीएस) भारत की प्रमुख तकनीकी सेवा कंपनियों में से एक रही है। भारत की सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) का नेतृत्व करते हुए टीसीएस सेवा क्रांति लेकर आया और अब यह इस व्यापार में एक बड़ी वैश्विक कंपनी है।

एक तरफ जहाँ भारतीय तकनीकी कंपनियाँ अपनी पूंजी बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं, वहीं बाज़ार का नेतृत्व कर रही टीसीएस की सार्वजनिक लिस्टिंग एक बड़ी घटना थी। 25 अगस्त 2004 को इसके स्टॉक बाज़ार में जारी किए गए।

टीसीएस की स्टॉक व्यापार के प्रथम 10 वर्षों में 27 प्रतिशत चक्रवृद्धि वार्षिक आय हुई। जून 2019 तक टीसीएस ने बाज़ार पूंजीकरण में आईबीएम को पीछे छोड़ दिया। यह महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि जब 1968 में टीसीएस की स्थापना हुई थी, तब आईबीएम बाज़ार का नेतृत्व कर रहा था।

हालाँकि भारतीय मुद्रा के ऊपर-नीचे होने के कारण टीसीएस की बाज़ार पूंजी आईबीएम से लगातार ऊपर नहीं रह पाई। लेकिन अवश्य ही टीसीएस की लिस्टिंग ने भारतीय स्टॉक बाज़ार में एक नए युग की शुरुआत की जहाँ देश में विकसित नई आर्थिक कंपनी ने विश्व की सबसे बड़ी कंपनी पर वित्तीय और संचालन प्रदर्शन के कारण विजय पाई।

एक भारतीय कंपनी द्वारा वैश्विक संपत्ति का सृजन, व्यापार आत्म-विश्वास और आत्म-आश्वासन विकसित करने का संक्रमण बिंदु बना।

8. बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा अभियान (नवंबर 2006)

1999 में पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध के बाद दो बातें सामने आईं- पाकिस्तान की ओर से परमाणु धमकी और नए शस्त्रों को पाने में भारत की सीमाएँ उजागर हुईं। इसके बाद भारत ने स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल का विकास शुरू किया।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य समुद्री और भूमि पर वार करने वाली अवरोधक मिसाइलों का विकास था। ऊपरी और निचले स्तर के लिए द्वि-स्तरीय अवरोधन अभियान चलाया गया। ऊपरी स्तर के लिए पृथ्वी एयर डिफेन्स (पीएडी) और निचले के लिए एडवान्स्ड एयर डिफेन्स (एएडी) था।

नवंबर 2006 में पीएडी अभ्यास किया गया जहाँ 50 किलोमीटर की ऊँचाई पर पृथ्वी-2 मिसाइल का अवरोधन एक प्रणाली ने किया। इसके बाद यह कार्यक्रम और शक्तिशाली होता चला गया। मार्च 2019 में हुआ सैटेलाइट-रोधी मिसाइल (एसैट) का परीक्षण हमारे बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा अभियान की सफल कहानी दर्शाता है।

9. इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की शुरुआत (अप्रैल 2008)

भारत हमेशा से एक बड़ी क्रिकेट अर्थव्यवस्था रहा है लेकिन टी20 के आगमन से खेल का और बाज़ारीकरण हुआ व इससे मिलने वाला वित्तीय लाभ खेल तंत्र के साथ-साथ नए और छोटे खिलाड़ियों को भी मिला और वह भी उच्चतर स्तर पर।

भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) ने अप्रैल 2008 में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की शुरुआत उन लीगों की प्रतिक्रिया में की जो बीसीसीआई के क्रिकेट प्रबंधन को चुनौती दे रही थीं।

भरपूर पूंजी के साथ इन आठ टीमों ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कैलेंडर में अपनी जगह बना ली। कई अप्रसिद्ध खिलाड़ियों, जो राष्ट्रीय टीम में जगह नहीं बना पाते थे, को दो महीने तक क्रिकेट के बड़े नामों के साथ भारत में खेलने का अवसर मिला।

12 संस्करणों के बाद आईपीएल अभी भी उतना ही मज़बूत है। कई राज्य-स्तरीय क्रिकेट लीगें भी उसके बाद उभरकर आई हैं। इस अवधारणा पर आधारित लीगों का आयोजन हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन, टेनिस, टेबल टेनिस और कबड्डी जैसे खेलों में भी हुआ है।

अब मेधाओं को खोजने का आईपीएल एक मंच बन गया है। कई भारतीय खिलाड़ी इन लीगों के कारण वित्तीय रूप से अधिक सुरक्षित हो गए हैं।

10. चंद्रयान-1 का प्रक्षेपण (अक्टूबर 2008)

भारतीय अंतरिक्ष अभियान को बल देने और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) को विश्व में स्थान दिलाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री वाजपेयी ने 2003 के स्वतंत्रता दिवस पर चंद्र मिशन की घोषणा की थी। मई 2004 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस मिशन पर कार्य जारी रखा।

इसरो ने 386 करोड़ रुपये की लागत से चंद्रयान-1 नामक अंतरिक्ष यान तैयार किया। राष्ट्रीय चंद्रीय (लुनार) टास्क फोर्स 2000 से ही ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रही थी जो भारत को चांद पर पहुँचा सके।

सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से यान का चार-स्तरीय पीएसएलवी सी11 द्वारा प्रक्षेपण हुआ। चांद की सतह से 100 किलोमीटर ऊपर चंद्रीय कक्षा में यान 12 नवंबर 2008 को पहुँचा। 28 अगस्त 2009 तक यह यान क्रियाशील रहा- 132 दिन जबकि पहले दो वर्ष की योजना थी।

यान के भूखंड मैपिंग कैमरा ने इस काल में चांद के 70,000 तीन-डाइमेंशनल चित्र भेजे। इस मिशन ने चांद पर स्थित पानी और चांद की गुफाओं की भी खोज की।

चंद्रयान-1 चांद पर भारत के एक मानवीय मिशन योजना की ओर पहला कदम था। इसके बाद भारत अंतरिक्ष शोध के क्षेत्र में एक गंभीर खिलाड़ी की तरह उभरा।

11. मुंबई हमले (नवंबर 2008)

हथियारों और जिहादी दिमाग के साथ 10 पाकिस्तानी आतंकी मुंबई में घुसे और कई घंटों तक अपने पाकिस्तानी हैंडलरों के इशारे पर काम करके शहर को अपने घुटनों पर झुकने में मजबूर कर दिया।

लगभग 166 लोगों ने अपने प्राण गवाएँ। पाँच सितारा होटलों, एक व्यस्त रेलवे स्टेशन, सुप्रसिद्ध कैफे और एक यहूदी प्रार्थना गृह को निशाना बनाया गया। दुनिया में कहीं भी हुए हमलों में से यह सबसे ढीठ प्रयास था।

एक आतंकवादी- अजमल कसाब को जीवित पकड़ने में मुंबई पुलिस के अधिकारी तुकाराम ओंबले सफल हुए। उन्होंने कसाब की बंदूक से 40 गोलियाँ खाईं लेकिन उसे अपनी गिरफ्त से तब तक नहीं छोड़ा जब तक अन्य सुरक्षा अधिकारियों ने आकर उसे गिरफ्तार नहीं कर लिया।

छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पर रेलवे घोषणाकार विष्णु ज़ेंडे ने सैकड़ों यात्रियों को सुरक्षित परिवहन की ओर दिशा दिखाई। ताज होटल में बंदी बनाए गए लोगों की रक्षा करते हुए मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की आतंकवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

भारत और भारतीय सम्मान की दृष्टि से एक बुरे दिन पर ये आम नागरिक नायक बने। भारतीय शासन ने हमले की निंदा की और पाकिस्तान को फाइलें भेजीं लेकिन अधिक कुछ नहीं हुआ। न्यायिक प्रक्रिया के बाद कसाब को पुणे में फाँसी पर चढ़ा दिया गया।

12. आधार की शुरुआत (जनवरी 2009)

बायोमेट्रिक पहचान के साथ एक 12 अंकों वाला अद्वितीय पहचान क्रमांक- क्या कारण रहा होगा कि एक विकासशील देश ने ऐसी महत्वाकांक्षी तकनीकी परियोजना शुरू की??

इंफोसिस के पूर्व प्रमुख नंदन निलेकनी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह कार्य सौंपा। विश्व का सबसे बड़ा बायोमेट्रिक पहचान अभियान आधार ही है।

तब से आधार का उपयोग सरकारी लाभों को सीधे पहुँचाने और कई कार्यक्रमों में सीधा लाभ इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने में हुआ है। कई निजी और सरकारी सेवाओं से तुरंत जुड़ने में भी आधार सहायक है।

2017 में जाकर आधार को वैधानिक सुरक्षा मिली। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि आधार वैध है। इसकी शुरुआत के एक दशक बाद इसमें लगभग हर भारतीय शामिल हो चुका है और आधार उपयोग की बाधाओं को भी दूर किया गया है।

वर्ल्ड बैंक से बिल गेट्स तक आधार को कई लोगों ने सराहा है।

13. कथित 2जी घोटाला (नवंबर 2010)

तत्कालीन कॉम्पट्रॉलर और ऑडिटर जनरल (कैग) विनोद राय ने 8 नवंबर को भारत के राष्ट्रपति को रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया था कि कांग्रेस सरकार ने 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी कम मूल्य पर की। सामान्य से 1.76 लाख करोड़ रुपये कम मूल्य पर यह नीलामी की गई थी।

इस कैग रिपोर्ट ने हलचल मचा दी और न्यायिक जाँचें शुरू हुईं। सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा की निगरानी में दिए गए सभी 122 लाइसेंसों को रद्द कर दिया।

मनमोहन सिंह सरकार के द्वितीय कार्यकाल में यह पहला सबसे बड़ा भ्रष्टाचार आरोप था। कथित 2जी घोटाले के नाम पर सरकार के विरुद्ध कई रैलियाँ होने लगीं और इन्हें कोयला नीलामी, आदर्श हाउसिंग सोसाइटी और कॉमनवेल्थ खेलों के अनुबंध में अनियमितताओं से बल मिला।

दोषमुक्त होने के बाद जश्न मनाते ए राजा

2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) के दो नेताओं और मुख्य आरोपियों, ए राजा और कनीमोजी को दोषमुक्त घोषित किया। जाँच एजेंसियों ने इसके बाद याचिकाएँ दायर कीं। हालाँकि न्यायिक प्रक्रिया आज भी चल रही है लेकिन इस आरोपित घोटाले का राजनीति पर काफी प्रभाव पड़ा।

14. अन्ना आंदोलन (अप्रैल 2011)

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे द्वारा 2011 में जन लोकपाल आंदोलन शुरू किया गया जो देश भर के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलनों का केंद्र-बिंदु बना। कई हफ्तों तक यह विरोध चला।

महाराष्ट्र के रालेगाँव-सिद्धि से शुरू हुआ यह आंदोलन जंगल की आग की तरह देश भर में फैला। हर व्यवसाय के लोगों ने अपने-अपने शहर में कई घंटों तक धरना देकर विरोध किया।

राजनीति के नए चेहरे, अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और कुमार विश्वास अन्ना हज़ारे के प्रमुख सहयोगियों के रूप में देखे जाने लगे। इसके बाद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी (आप) की शुरुआत की जो 2013 में दिल्ली में सत्ता में आ गई और 2015 में राज्य चुनावों में बाज़ी मार गई।

1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में हुए मंडल और मंदिर आंदोलनों के बाद यह भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन था। इसका आयोजन किसी विशेष दल ने नहीं किया था और इसी दृष्टि से यह अधिक महत्त्वपूर्ण है।

अन्ना आंदोलन को शांत करने के लिए भारतीय संसद ने जल्दबाज़ी में भले ही लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम पारित कर दिया लेकिन मनमोहन सरकार की इससे हुई राजनीतिक क्षति की पूर्ति नहीं की जा सकी।

सरकार की खराब छवि के कारण नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने में अधिक समस्या नहीं हुई।

15. ट्विटर घेराबंदी (अगस्त 2012)

भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया का प्रवेश 2012 में हुआ। यह पहली बार था जब भारत मोबाइल के प्रसार का साक्षी बना। ट्विटर और फ़ेसबुक तेज़ी से अपने पंख फैला रहे थे।

2012 में भारत सरकार ने कई व्यक्तिगत ट्विटर अकाउंटों को प्रतिबंधित करने का निर्देश दिया। इन अकाउंटों पर आरोप लगाया गया कि वे पूर्वोत्तर भारतीयों के विरुद्ध हिंसा को भड़का रहे हैं।

इससे पहली बार अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य और तकनीक के विस्तार में सोशल मीडिया पर अभियव्यक्ति के अधिकार पर गंभीर वाद-विवाद हुआ। ट्विटर पर #GOIBlocks कई दिनों तक ट्रेंड हुआ।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में तेज़ी से उठते नरेंद्र मोदी ने काली ट्विटर डीपी लगाकर इस विरोध का नेतृत्व किया। इसके बाद सरकार ने आईटी अधिनियम लागू किया। हालाँकि इसके कुछ भाग ऐसे थे जो कड़ी निगरानी रखते थे एवं बाद में उन्हें निष्क्रिय किया गया।

इसके बाद से राजनीति में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव भारत के पहले ट्विटर प्रभावित चुनाव बने।

16. मोदी लहर (मई 2014)

1989 के बाद भारत में केंद्र में गठबंधन सरकारों का युग शुरू हो गया था। ऐसा मान लिया गया था कि कोई पार्टी अपने दम पर बहुमत प्राप्त नहीं कर सकती। यह 2014 में बदला जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने लोकसभा में जीत दर्ज की।

282 सीटों पर भाजपा पहली बार जीती थी और मोदी ने 1984 के बाद सबसे बड़ी जीत अपनी पार्टी को दिलाई। उनके ऊर्जावान 24X7 राजनीतिक अभियान ने कांग्रेस को हिलाकर रख दिया व वह मात्र 44 सीटें जीत पाई।

मोदी ने सोशल मीडिया से मतदाताओं तक अपनी पहुँच बनाई और वे वादे करने, मुद्दे समझाने और विपक्षी दलों में निशाना साधने में हमेशा दूसरी पार्टियों से आगे रहे। विपक्ष ने प्रतिक्रिया देने में काफी देरी दिखाई।

मोदी ने स्वयं सनातन धर्म के पवित्र और प्रमुख स्थल वाराणसी से चुनाव लड़कर राष्ट्रवाद, विकास और आत्मगौरव पर आधारित नई राजनीति की शुरुआत की।

मई 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते नरेंद्र मोदी

2014 में दिल्ली की राजनीति बदली। 2019 में मोदी की 303 सीटों के साथ और बड़ी वापसी से यह परिवर्तन और गतिवान हो गया है।

17. भारत की पाकिस्तान के विरुद्ध बदली विदेश नीति- सर्जिकल स्ट्राइक (सितंबर 2016)

18 सितंबर को चार पाकिस्तान समर्थित जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने भारतीय सेना शिविर पर जम्मू और कश्मीर के उरी में एक फिदायीन हमला किया जिसमें 19जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

यह नया नहीं था, पाकिस्तान ने वर्षों में भारत को कई घाव दिए हैं। भारत ने उसे कई बार धमकाया लेकिन अंततः वार्ता और विश्वास-सद्भाव बढ़ाने के ही प्रयास होते थे। यह 29 सितंबर 2016 में बदला।

इस दिन भारत ने पाकिस्तान समर्थित संदिग्ध आतंक शिविरों पर पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) में निशाना साधा। चार अलग-अलग छापों में भारत ने लगभग 100 आतंकवादियों को मार गिराया। आक्रमण करने वाले ये सैन्यबल पीओजेके के 3-4 किलोमीटर भीतर तक घुस गए थे।

भारत ने इन छापों की घोषणा सेना के माध्यम से टेलीविज़न पर की। विदेश मंत्रालय ने चतुराई से वैश्विक संचार को संभाला। भारत ने पाकिस्तान के कुकर्मों पर प्रतिक्रिया देने का सिर्फ तरीका ही नहीं बदला, बल्कि परिमाण भी बदला। भारत ने पाकिस्तान की परमाणु हमले की खोखली धमकी को भी उजागर कर दिया।

2008 में गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी ने मुंबई हमलों को संभालने के मनमोहन सरकार के तरीके की आलोचना की थी। 2016 में मोदी ने प्रधानमंत्री के पद से उदाहरण प्रस्तुत किया।

18. नोटबंदी (नवंबर 2016)

8 नवंबर 2016 को रात 8 बजे पूरा देश टेलीविज़न और मोबाइल स्क्रीनों से चिपका हुआ था क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विशेष घोषणा करने वाले थे। भारत उच्च मूल्य के नोटों को बाज़ारों से हटा रहा था- प्रवाहित नकद का 86 प्रतिशत सरकार द्वारा प्रतिबंधित किया जा रहा था।

नोटबंदी एक लाभदायक घटना थी जिसका उद्देश्य काले धन को नियंत्रित करना था। सरकार को बाज़ार में पुनः नकद का प्रवाह बनाने में समस्या हुई और इसमें कई संचालनात्मक चुनौतियाँ थीं।

भारत की अर्थव्यवस्था में नकद का काफी बड़ा हिस्सा था जिसके कारण आर्थिक गतिविधियों को एक झटका लगा था। लेकिन फिर भी कई लोगों ने इसे सराहा क्योंकि अंततः काले धर पर काबू पाने के लिए कुछ किया जा रहा था।

दिनचर्या में कई परेशानियों का सामना करने के बावजूद आमजन में यह प्रयास लोकप्रिय रहा। भाजपा मार्च 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जीती।

नोटबंदी से प्रवाहित हो रहा सारा नकद बैंकों में पुनः चला गया, हालाँकि पहले अपेक्षा थी कि भारतीय रिज़र्व बैंक कुछ राशि को बाज़ार से बाहर कर देगी।

सरकार ने डिजिटल लेन-देन को दोगुना कर दिया और तब से यूपीआई प्रणाली व भीम ऐप का उपयोग कई गुना बढ़ गया है।

19. वस्तु एवं सेवा कर की शुरुआत (जुलाई 2017)

केंद्र और राज्य अधिकारों की अलग-अलग सूची होने के कारण भारतीय शासन तंत्र काफी जटिल है। अप्रत्यक्ष कर ऐसा ही एक क्षेत्र था जहाँ केंद्र और राज्य सरकारें दर्जनों कर, उप-कर आदि लगाते थे।

1 जुलाई 2017 की मध्यरात्रि को मोदी सरकार ने संसद में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत की। भारत एक कर संघ बन गया जहाँ राज्य सीमाओं के पार भी वस्तु और सेवाएँ आसानी से आ-जा सकें।

कई राज्यों में सीमा चौकियाँ होती थीं जहाँ लाए जा रहे सामान पर कर वसूला जाता था। जीएसटी के आने के बाद यह प्रक्रिया बंद हो गई।व्यापार की आवश्यकताएँ अधिक केंद्रीकृत हो गईं जहाँ कर से बचने के लिए कई राज्यों में गोदाम बनाने की ज़रूरत न रही।

जीएसटी की संरचना और इसकी सहायता करने वाला आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रश्नों के घेरे में भी आया। सरकार इन दोनों पर लगातार काम कर रही है। जीएसटी स्तरों और संरचना से जुड़े सभी निर्णय राज्यों के एक संयुक्त परिषद में लिए जाते हैं जिसकी समय-समय पर बैठक होती है।

जीएसटी परिषद की एक बैठक

अब जीएसटी को छोटे व्यापार भी स्वीकार कर रहे हैं। इसके तंत्र के माध्यम से डाटा संग्रहण और स्वायत्त रूप से बिलों की जाँच ऐसे वादे हैं जो आने वाले वर्षों में पूरे किए जाने हैं।

इस प्रणाली से न सिर्फ सरकार के राजस्व से रिसाव को रोका जा सकेगा, बल्कि व्यापार के लिए बेहतर और सस्ता तरल ऋण भी उपलब्ध होगा।

20. जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे का उन्मूलन (अगस्त 2019)

“एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान, नहीं चलेंगे”, भारतीय जन संघ के सबसे बड़े नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1953 में हुए पहले कानपुर सम्मेलन में कहा था।

1948 में जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में हुआ था। लेकिन पाकिस्तान प्रायोजित आदिवासियों की सेना ने राज्य के कुछ भाग का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था जो अभी तक पीओजेके के रूप में पाकिस्तान के नियंत्रण में है।

भारत ने अनुच्छेद 370 को लाने पर सहमति जताई जो जम्मू और कश्मीर को विशेष अधिकार देता था जिसमें राज्य का अपना संविधान, ध्वज और विधायी तंत्र शामिल था।

यह अनुच्छेद 35ए के लागू होने से और जटिल हो गया था जो 1947 के विभाजन के बाद आए प्रवासियों और राज्य से बाहर ब्याही गई महिलाओं के साथ भेद-भाव करता था।

अनुच्छेद 370 का उन्मूलन और इसके साथ ही अनुच्छेद 35ए का उन्मूलन इसके लागू होने से ही जन संघ की शीर्ष मांगों में से एक रहा है। यहाँ तक कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने राज्य में भारतीय संविधान को लागू करने की मांग करते हुए श्रीनगर में अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।

भाजपा ने इस मांग को 1980 में अपनी स्थापना से जारी रखा। भाजपा का मानना रहा कि सरदार पटेल का भारत को एक करने का अतुलनीय योगदान हमेशा अधूरा रहेगा जब तक कि जम्मू और कश्मीर पर ये अनुच्छेद लगे रहेंगे।

5 अगस्त 2019 को गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन विधेयक प्रस्तुत किया। इससे ये दोनों अनुच्छेद हटाए गए। इसके अलावा राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में विभाजित किया गया जिसने लद्दाख के लोगों के सपनों को पंख दिया। भारत का सबसे पुराना राजनीतिक मुद्दा समाप्त कर दिया गया।

21. राम जन्मभूमि निर्णय (नवंबर 2019)

1980 के दशक के अंत से अयोध्या में एक भव्य राम मंदिर का निर्माण भी भाजपा की प्रमुख मांगों में से एक रहा है। दरअसल, इसके शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी की भारत भर में रथ यात्रा पार्टी को राजनीतिक संदर्भ में लेकर आई।

हालाँकि राजनीति से पहले भी राम जन्मभूमि के लिए कानूनी और भावनात्मक लड़ाई कई सदी पुरानी है। अयोध्या को हमेशा से भगवान राम की जन्मस्थली माना गया है। कहा जाता है कि 1528 में बाबर के जनरल मीर बाकी ने मंदिर तोड़कर वहाँ मस्जिद का निर्माण करवाया।

1520 के दशक से 1870 के दशक तक कई ऐतिहासिक दस्तावेजों में वहाँ मंदिर के होने का उल्लेख मिलता है। स्थल को प्राप्त करने की पहली याचिका 1885 में दायर की गई थी।

1949 में भगवान राम और माता सीता की मूर्तियाँ वहाँ स्थापित की गई थीं। 1988 में राजीव गांधी सरकार ने मंदिर स्थल पर शिलान्यास की अनुमति दी। विश्व हिंदू परिषद और भाजपा द्वारा चलाए गए आंदोलन के अंत के रूप में 1992 में बाबरी मस्जिद गिराई गई।

2019 में जाकर सर्वोच्च न्यायालय की पाँच जजों की पीठ ने वह स्थल हिंदू पक्ष को देने का निर्णय लिया और वहाँ केंद्र सरकार द्वारा स्थापित न्यास मंदिर का निर्माण करवाएगा। 491 वर्षों की इस लंबी लड़ाई का एक तार्किक अंत हुआ।


दो दशक का समय इतिहास और किसी देश की नियति के लिए बड़ा समय नहीं होता है। विशेषकर भारत जैसी सभ्यता के लिए जहाँ वर्तमान स्वरूप में पहुँचने की इसकी यात्रा अभी भी 72 वर्षों के आधुनिक राष्ट्र से मेल की प्रक्रिया में है।

हालाँकि जैसा कि रोमन राजनेता और दार्शनिक सिसरो ने कहा है, “पहले क्या हुआ, इसकी जानकारी न होना आपको हमेशा बच्चा बनाए रखता है। यदि हमारी पिछली पीढ़ियों के श्रम का कोई उपयोग न किया जाए तो विश्व हमेशा जानकारी के बाल्यकाल में ही रह जाएगा।”

समकालीन इतिहास की पहचान और प्रभाव दोनों ही आसान और अधिक स्वीकार्य है।

21वीं सदी की 21 महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हर व्यक्ति के लिए अगल हो सकती हैं लेकिन यहाँ प्रयास था कि कुछ ऐसा हो जिसपर हम साथ मिलकर गर्व, गंभीरता, व्याकुलता और आशा से विचार कर सकें।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति और सम-सामयिक विषयों पर लिखते हैं। वे @c_aashish द्वारा ट्वीट करते हैं।