भारती
कारगिल विजय के 20 वर्ष- कैसे बदली भारतीय रक्षा नीति की दिशा

प्रसंग- कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) के अवसर पर इस जीत के 20 वर्ष बाद भारतीय सैन्य व्यवस्था को टटोलती हुई रिपोर्ट।

इस साल फरवरी में हुए पुलवामा कांड के ठीक 20 साल पहले पाकिस्तानी सेना कश्मीरी चरमपंथियों की आड़ में कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा जमा रही थी। यह एक अप्रत्याशित प्रयास था, धोखाधड़ी का। भारतीय सेना ने उस प्रयास को विफल किया और कारगिल की पहाड़ियों पर फिर से तिरंगा फहराया, पर इस युद्ध ने भारतीय रक्षा-नीति को आमूल बदलने की प्रेरणा दी। साथ ही यह सीख भी दी कि भविष्य में पाकिस्तान पर किसी भी रूप में विश्वास नहीं करना चाहिए। 

कारगिल के बाद भी भारत ने पाकिस्तान के प्रति काफी लचीली नीति को अपनाया था। परवेज़ मुशर्रफ को बुलाकर आगरा में उनके साथ बात की, पर परिणाम कुछ नहीं निकला। सन 1947 के बाद से पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के कम से कम तीन बड़े प्रयास किए हैं। तीनों में कबायलियों, अफगान मुजाहिदों और कश्मीरी जिहादियों के लश्करों की आड़ में पाकिस्तानी फौज पूरी तरह शामिल थी। कारगिल की परिघटना भी उन्हीं प्रयासों का एक हिस्सा थी। 

बालाकोट में नई लक्ष्मण रेखा

कारगिल के बाद मुंबई, पठानकोट, उड़ी और फिर पुलवामा जैसे कांडों के बाद पहली बार भारत ने 26 फरवरी को बालाकोट की सीधी कार्रवाई की है। यह नीतिगत बदलाव है। बालाकोट के अगले दिन पाकिस्तानी वायुसेना ने नियंत्रण रेखा को पार किया। यह टकराव ज्यादा बड़ा रूप ले सकता था, पर अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और दबाव में भारत ने अपने आप को रोक लिया, पर अब एक नई रेखा खिंच गई है। भारत अब कश्मीर के तथाकथित लश्करों, जैशों और हिज्बों के खिलाफ सीधे कार्रवाई करेगा। 

3 मई, 1999 को पहली बार हमें कारगिल में पाकिस्तानी कब्जे की खबरें मिलीं और 26 जुलाई को पाकिस्तानी सेना आखिरी चोटी से अपना कब्जा छोड़कर वापस लौट गई। करीब 50 दिन की जबर्दस्त लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने इन चोटियों पर कब्जा जमाए बैठी पाकिस्तानी सेना को एक के बाद एक पीछे हटने को मजबूर कर दिया। इसके साथ ऑपरेशन विजय पूरा हुआ।

वॉर मेमोरियल

पाकिस्तानी सेना ने अपने नियमित सैनिकों को नागरिकों के भेस में नियंत्रण रेखा को पार करके इन चोटियों पर पहुँचाया और करीब 10 साल से चले आ रहे भारत-विरोधी छाया युद्ध को एक नया आयाम दिया। ऊँची पहाड़ियों पर यह अपने किस्म का सबसे बड़ा युद्ध हुआ है। इसमें विजय हासिल करने के लिए हमें  युद्ध ने भारतीय रक्षा-प्रतिष्ठान को एक बड़ा सबक दिया। 

इस युद्ध में भारतीय सेना के 500 से ज्यादा सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। चोटी पर बैठे दुश्मन को हटाने के लिए तलहटी से किस तरह वे ऊपर गए होंगे, इसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है। वायुसेना के लड़ाकू विमानों और हेलिकॉप्टरों ने भी इसमें भाग लिया।

सरकार ने 25 मई को इसकी अनुमति दी, पर ऑपरेशन सफेद सागरके पहले ही दिन 26 मई को परिस्थितियों का अनुमान लगाने में गलती हुई और एक मिग-21 विमान दुश्मन की गोलाबारी का शिकार हुआ। एक मिग-27 दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इसके अगले रोज 27 मई को हमारा एक एमआई-17 हेलिकॉप्टर गिराया गया। 

वायुसेना का महत्व

इन विमानों के गिरने के बाद ही यह बात समझ में आ गई थी कि शत्रु पूरी तैयारी के साथ है। उसके पास स्टिंगर मिसाइलें हैं। हेलिकॉप्टरों को फौरन कार्रवाई से हटाया गया। वायुसेना ने अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना शुरू किया। 30 मई के बाद वायुसेना ने मिरा-2000 विमानों से लेजर आधारित गाइडेड बमों का प्रयोग शुरू किया। काफी ऊंचाई से ये विमान अचूक निशाना लगाने लगे। 

दुर्भाग्य से मिराज-2000 के साथ आई लेजर बमों की किट कारगिल के ऑपरेशन के लिए उपयुक्त नहीं पाई गई। ऐसे में वायुसेना के तकनीशियनों ने अपने कौशल से उपलब्ध लेजर किटों का इस्तेमाल किया। जून के महीने में इन हवाई हमलों की संख्या बढ़ती गई और भारतीय विमानों ने दूर से न केवल चोटियों पर जमे सैनिकों को निशाना बनाया, साथ ही नियंत्रण रेखा के दूसरी तरफ बनाए गए उनके भंडारागारों को भी ध्वस्त करना शुरू कर दिया।

जुलाई आते-आते स्थितियाँ काफी नियंत्रण में आ गईं। भारत के बहादुर इनफेंट्री सैनिकों ने एक-एक इंच करते हुए पहाड़ियों पर फिर से कब्जा कायम किया, जिसमें उनकी सहायता तोपखाने की जबर्दस्त गोलाबारी ने की। कश्मीरी उग्रवाद की आड़ में इस घुसपैठ को बढ़ावा देने के पीछे पाकिस्तानी सेना का सामरिक उद्देश्य हिंसा को भड़काना था, जिसे वे जेहाद कहते हैं, ताकि दुनिया का ध्यान कश्मीर के विवाद की ओर जाए। 

द्रास, मुश्कोह घाटी और काक्सर सेक्टर में उनका फौजी लक्ष्य था, श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय मार्ग 1ए को कारगिल जिले से अलग करना ताकि भारत को लेह से जोड़ने वाली जीवन-रेखा कट जाए और सियाचिन ग्लेशियर के पश्चिम में स्थित साल्तोरो रिज की रक्षा करने वाली भारतीय सेना को रसद मिलना बंद हो जाए। 

एक और सैनिक लक्ष्य था, कश्मीर घाटी और पीर पंजाल पर्वत माला के दक्षिण के डोडा क्षेत्र में अमरनाथ की पहाड़ियों तक घुसपैठ का एक नया रास्ता खोला जा सके। सियाचिन ग्लेशियरों की पट्टी से लगी बटालिक और तुर्तक घाटी में पाकिस्तानी सेना एक मजबूत बेस बनाना चाहती थी, जिससे कि श्योक नदी घाटी के रास्ते से बढ़ते हुए वह भारत की सियाचिन ब्रिगेड से एकमात्र सम्पर्क को काट दे। 

निशाना था सियाचिन

इन लक्ष्यों के अलावा पाकिस्तानी सेना यह भी चाहती थी कि कारगिल जिले में नियंत्रण रेखा के भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया जाए, ताकि इसके बाद मोल-भाव किया जा सके। खासतौर से सियाचिन क्षेत्र से भारतीय सेना की वापसी सुनिश्चित की जा सके।

कारगिल अभियान के पीछे सबसे बड़ी कामना था सियाचिन को हथियाना, जो 1984 से भारतीय सेना के नियंत्रण में है। तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वेद प्रकाश मलिक ने अपनी पुस्तक कारगिल-एक अभूतपूर्व विजय में लिखा है कि पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का एक प्रमुख कारण और सैन्य उद्देश्य सियाचिन ग्लेशियर पर फिर से कब्जा जमाना था। 

भारतीय सेना मुख्यालय ने महसूस किया कि ऊँची खड़ी चढ़ाई वाली पहाड़ियों पर आक्रमण करना आसान नहीं होगा। यह भी कि इसके लिए बड़े स्तर पर फायर पावर की जरूरत होगी। इसमें तोपखाने और भारतीय वायुसेना दोनों की भूमिका होगी। दोनों के समन्वित प्रयास से भारी बमबारी करके दुश्मन की चौकियों को कमजोर किया जाए और उसका मनोबल तोड़ा जाए। इसके बाद इनफेंट्री बटालियन हमला करें, ताकि पहाड़ियों पर फिर से कब्जा किया जा सके। 

ऊँची पहाड़ियों पर कब्जा जमाए बैठे दुश्मन को भगाने के लिए भारतीय सेना की इनफेंट्री बटालियनों ने जो हमले किए उन्हें दुनिया के सैनिक इतिहास की सबसे जबर्दस्त लड़ाइयों में दर्ज किया जाता है। तमाम तरह की बाधाओं के बावजूद इन सैनिकों ने दृढ़ निश्चय के साथ एक-एक पाकिस्तानी हमलावर से भारतीय जमीन खाली करा ली। 

दो महत्त्वपूर्ण रिपोर्टें 

कारगिल युद्ध ने भारतीय रक्षा-नीति में आधारभूत बदलाव कर दिए। ये बदलाव दीर्घकालीन हैं और अब भी हो रहे हैं। इनकी रूपरेखा मूलतः दो महत्वपूर्ण रिपोर्टों पर आधारित हैं, जो तमाम दूरी जाँचों और रिपोर्टों का आधार बनीं। इनमें पहली है कारगिल समीक्षा रिपोर्ट, जिसके गठन की घोषणा भारत सरकार ने कारगिल युद्ध खत्म होने के तीन दिन बाद 29 जुलाई को कर दी थी।

प्रसिद्ध रक्षा विशेषज्ञ के सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में गठित समिति की रिपोर्ट 7 जनवरी, 2000 को मिल भी गई। दूसरी महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट इसके एक दशक बाद की नरेश चंद्रा समिति रिपोर्ट है। कारगिल रिपोर्ट के कुछ अंश युद्ध सम्बद्ध संवेदनशीलता के कारण गोपनीय हैं। शेष रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।

दाएँ तरफ नरेश चंद्रा

कारगिल रिपोर्ट ने कारगिल परिघटना के कारणों पर प्रकाश डालने के अलावा देश की रक्षा-व्यवस्था पर गहराई से विचार करने और उसके बाद बदलाव करने का सुझाव दिया। एक अर्थ में भारतीय रक्षा-व्यवस्था को इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का सामना करने लायक बनाने में कारगिल रिपोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका है। 

यों तो सन 1962 के चीन युद्ध के बाद भी देश की रक्षा-व्यवस्था को लेकर विमर्श हुआ, पर उसे आधारभूत परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। कारगिल रिपोर्ट ने आधारभूत परिवर्तन की प्रेरणा दी। उसकी पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण सलाह थी कि राष्ट्रीय सुरक्षा-व्यवस्था की गहराई से पड़ताल होनी चाहिए। इस रिपोर्ट के बाद देश की रक्षा-सम्बद्ध कैबिनेट कमेटी ने एक मंत्रि-समूह का गठन इस उद्देश्य से किया। इस समूह ने इंटेलिजेंस, आंतरिक सुरक्षा, सीमा-प्रबंधन और रक्षा वगैरह से जुड़े कुछ कार्यबलों का गठन किया। 

सैन्य तकनीक में भारी बदलाव

कारगिल समिति ने एक पूर्णकालिक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की नियुक्ति की सलाह दी थी, जो लागू हो चुकी है। समिति ने बेहतर हवाई सर्विलांस का सुझाव दिया था, जिसके लिए रिसैट श्रृंखला के उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में भेजे जा चुके हैं। इसके अलावा भारतीय सेनाएँ कई प्रकार के यूएवी का इस्तेमाल कर रही है। एक सलाह यह भी थी कि केंद्रीय संचार और इलेक्ट्रॉनिक एजेंसी की स्थापना की जाए। सन 2004 में नेशनल टेक्नीकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (एनटीआरओ) को स्थापित किया जा चुका है। 

कारगिल समिति का सुझाव था कि सेना में कम उम्र के अधिकारियों की संख्या बढ़े। हाल में सेना ने अपने पुनर्गठन की जो योजना बनाई है, उसमें इस दिशा में काम हो रहा है। सेना के भीतर अब कम उम्र को कमांडरों की नई अवधारणा को स्थापित किया जा रहा है। इससे सेना का वज़न कम होगा और आकार सही होगा। यह तय किया गया है कि सिफारिशों के सभी ऑपरेशनल पहलुओं, मसलन एक इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप के गठन का परीक्षण युद्धाभ्यास के दौरान किया जाएगा। यह पुनर्गठन चार प्रमुख अध्ययनों का परिणाम है।

कारगिल परिघटना के कारण देश ने रक्षा-तकनीक के उन्नयन पर खासतौर से ध्यान दिया है। कारगिल युद्ध में सबसे ज्यादा इस्तेमाल तोपखाने का हुआ। पिछले कुछ वर्षों में स्वदेशी तकनीक का विकास हुआ है। बीएई की तोप एम777 को विदेशी सैन्य खरीद के मार्फत अमेरिका से खरीदा गया है। इसके अलावा लार्सन एंड टूब्रो और कोरिया की हानह्वा-टैक्विन के संयुक्त प्रयास से निर्मित वज्र के-9 तोप गत वर्ष नवम्बर में सेना में शामिल कर ली गई। अब फोकस ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड द्वारा निर्मित धनुष और डीआरडीओ द्वारा डिजाइन की गई और टाटा तथा भारत फोर्ज द्वारा निर्मित एटीएजी पर है। 

मिराज-2000

कारगिल युद्ध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मिराज-2000 विमानों ने हाल में बालाकोट हमले में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसबार भी उन्होंने विशेष गाइडेड बमों का इस्तेमाल किया था। कारगिल युद्ध के बाद सन 2001 में 126 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की तलाश शुरू हुई थी। उस तलाश के तहत ही राफेल विमानों को चुना गया है, पर फिलहाल 36 विमानों का सौदा ही हो पाया है। अब 114 विमान भारत में बनाने का प्रस्ताव है। 

इस प्रस्ताव पर भारतीय निजी क्षेत्र की कम्पनियों और उनके विदेशी सहयोगियों के साथ विमर्श चल रहा है। उम्मीद है कि अब जल्द ही कोई फैसला होगा। कारगिल युद्ध में हेलिकॉप्टरों की ज़रूरत महसूस हुई थी, पर भारत के पास उतनी ऊँचाई पर काम करने वाले हेलिकॉप्टर नहीं थे। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लाइट कॉम्बैट हेलिकॉप्टर तैयार किया है, जो 21,000 हजार फीट की ऊँचाई तक उड़ान भर सकता है। यह हेलिकॉप्टर सियाचिन में भी कारगर है। भारत ने अमेरिका से नई पीढ़ी के अपाचे अटैक हेलिकॉप्टरों को खरीदा है, जो ऊँची पहाड़ियों में कारगर है। ये हेलिकॉप्टर अगले कुछ दिनों में ही आ रहे हैं। 

नरेश चंद्र समिति ने सन 2012 में सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने खड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए स्पेशल ऑपरेशंस, सायबर और स्पेस तीन कमांड बनाई जानी चाहिए। हाल में तीनों सेनाओं से चुनींदा सैनिकों को लेकर मई के महीने में एक विशेष कमांडो यूनिट की रचना की गई है। इस सेना को आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल ऑपरेशंस डिवीजन (एएफएसओडी) का नाम दिया गया है। इसमें थलसेना के कमांडो, नौसेना के मरीन कमांडो (मारकोस) और वायुसेना के गरुड़ कमांडो शामिल हैं। 

इसके अलावा रक्षा सायबर एजेंसी (डीसीए) की स्थापना का फैसला भी किया गया था, जिसके कमांडर नौसेना के समकक्ष अधिकारी (यानी रियर एडमिरल) होंगे। अब डिफेंस स्पेस एजेंसी (डीएसए) भी किसी समय अपना काम शुरू कर देगी। हाल में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठक में डिफेंस स्पेस रिसर्च एजेंसी (डीएसआरए) की स्थापना को स्वीकृति दी गई। इस एजेंसी को स्पेस वॉरफेयर शस्त्र प्रणालियों तथा तकनीकों को विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई है। 

कारगिल कमेटी का एक महत्त्वपूर्ण सुझाव था चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद का। यह काम अभी हुआ नहीं है। तीनों सेनाओं की कमान का एक नया संगठन बनाने की बात आंशिक रूप से मानी गई है और अंडमान-निकोबार कमान बनाई गई है, पर अभी उस सिलसिले में काफी काम होना बाकी है। अलबत्ता हम सेना के आधुनिकीकरण की दिशा को देखें, तो पाएँगे कि अब ज्यादा जोर एकीकरण और समन्वय पर है।

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी संपादक हैं।