संस्कृति
माता को निरपराध समर्पण ही भक्ति मार्ग है

स्वयं का निरपराध समर्पण ही सबसे बड़ी योग्यता है। शंकराचार्य जब महादेव से सिद्धियाँ लेने गए तो माता आदिशक्ति को प्रणाम नहीं किया, ना शिवा के रूप में उन्हें वंदित किया।

उन्हें मनु जन्मीं पार्वती का शिव को पति रूप में प्राप्त करने का पौरुष कम लगा या शायद शक्ति की उनके मन में देव रूप में प्रतिष्ठा ही नहीं थी। क्योंकि वेदों में आदिशक्ति का मूर्त बोध नहीं है।

पर जिनकी वाणी स्वयं वेद है, वह देवी तो अपने संकल्प से योनिज-अयोनिज रूप में प्रवृत्त होती रहती है, यह भी स्वयं वेद कहते हैं। तथापि जब उन्हीं सिद्धियों के प्रतिपादन का समय आया तब न उनको संधान का सामर्थ्य हो रहा था, ना बुद्धि में कोई मार्ग आता था।

कभी उन्हें आलस्य होता था, कभी भूत में की गई गलती सोचकर मन ग्लानि से भरता था, कभी क्षोभ, तो कभी अत्यधिक ममत्व से मन भर जाता था। तो कभी-कभी आचार्य अपने जीवन की उपलब्धियों को सोचकर आलस्य और प्रमाद के ग्रसित हो जाते थे।

निरंतर स्खलन में प्रवृत्त कभी वे अपने इष्ट और अधीश्वर के अनुरक्त अत्यधिक श्रद्धा से वनत हो अपने कर्म मार्ग को बिसरा के चिंतन में तल्लीन हो जाते थे। अपने ऊपर जब ऐसे माया का प्रभाव देखा तो चकित शंकराचार्य द्रवित हो गए।

स्वयं को विष्णुमाया में ऐसा घिरा देख उन्हें देवी की तंत्रोक्त चेतना का बोध हुआ। यह वही देवी है जो सृष्टि के समस्त जीवों में समान विशिष्टता देने के पश्चात् भी किसी को रीढ़ देकर सीधा चलने की प्रेरणा देती है तो कुछ को मोह के गर्त में गिरा उनके परिचय से अव्यक्त रखती है!

समान चक्षुओं के होते हुए भी कुछ दिन में देखते हैं, कुछ रात में। समान सामर्थ्य और संसाधन होने पर भी सृष्टि में सब अलग व्यवहार क्यों करते हैं, अब शंकर को समझ आया। और उनकी भावनाओं से एक निस्पृह, निश्चल विनती प्रकटी।

चेतना और बोध अमर है और वह किसी-न-किसी माध्यम से प्रकट हो जाएँगे और पौरुष रूप में किसी के गौरव को अखंड करेंगे, पर स्वयं जीवन भर के प्रयासों को ऐसे विफल होते और स्वयं को उस पौरुष माध्यम के रूप में अस्वीकार होता देख शंकर को परमार्त्री माया के आत्मदर्शन हुए जो परत-दर-परत सृष्टि के संधान में व्याप्त थीं।

यह वही पराशक्ति रूप थी जो कभी आदिरूपा महिष मर्दिनी, कभी चामुंडा, कभी शिवदूती रूप में तो कभी दुर्गति हारिणी दुर्गा के रूप में अपनी इच्छा से प्रकट होती है, जो आदि वाणी में निम्न श्लोकों द्वारा देवो से वंदित है-

नमो देव्यै महा देव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्।।
~ देवी को नमस्कार है, महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है, प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है, जगदंबा को नियमपूर्वक नमस्कार है।

शंकर को यह बोध तो हुआ, पर मोह में ग्रसित शंकर से देवी का न बोधन हो रहा था, ना उनकी सांस्कृतिक पद्धति से पूजा। तब उनके मुख से सर्वथा निर्मल क्रंदन निकला जो क्षमा प्रार्थना के नाम से सुलभ है।

न मत्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥

~ हे माँ! मैं न मंत्र जनता हूँ, न यंत्र, अहो! मुझे स्तुति का भी ज्ञान नहीं है। न आवाहन का पता है, न ध्यान का। स्तोत्र और कथाओं का कभी ज्ञान नहीं है। न तो मैं तुम्हारी मुद्राएँ जानता हूँ, और न मुझे व्याकुल होकर विलाप ही करना आता है– परंतु एक बात जानता हूँ कि तुम्हारा अनुसरण करना, तुम्हारी शरण में आना सब क्लेशों, को सब विपत्तियों को हरने वाला है।

इस संदर्भ में वे आगे कहते हैं कि शिव के शव समान शून्य हृदय को परदुख और परपीड़ा समझने वाला बनाने में जगन्माता अन्नपूर्णा की प्रेरणा है, नहीं तो शिव मोह से विरत अडभंगी ही तो थे।

अपने चपल स्वभाव को पराशक्ति का अंश बताते हुए शंकर और कहते हैं, “मैं तुम्हारे और बालकों जैसा सीधा नहीं माता, बल्कि तर्क शक्ति के संपन्न अति गूढ़ व्यक्ति हूँ। इसी के कारण मुझे शुद्ध हृदय से तुम्हारी प्रार्थना नहीं आती, जैसा दूसरे सीधे लोग आपको एकमात्र मानकर अपना सर्वस्व अर्पित करते हैं।”

गणेश और स्कंद की माता के रूप में शक्ति का उल्लेख करते हुए शंकर उनसे उत्पादनार्थ सारे श्रेय माँगते हैं जिनके लिए उन्होंने देवों की जीवन भर पूजा की क्योंकि हर देव की आत्मशक्ति स्वयं परा शक्ति हैं और अब आचार्य से पृथक्-पृथक् सब देवों की पूजा नहीं हो पाती।

अनन्य ज्ञान युक्त शंकर अब तक यह समझ गए हैं कि त्रिपुर के समस्त लालित्य लक्षण युक्त देवी भावाग्राही हैं, क्रियाग्राही नहीं। तब अपने श्रेष्ठ कर्मों से महादेव को साधने वाली अपर्णा को अपने सारे कर्म अर्पित करते हैं और ददाती प्रतिगृह्णाति के रूप में स्वयं को उनका ही अंश जतलाते, क्रदन करते हुए कहते हैं,

“माँ अब तक तो तुमने इतना प्रेम किया जब मैं तुम्हारे सामने उद्दंड बालक के भांति विभिन्न अपराध कर रहा था, अब इस वृद्धावस्था में त्याग करोगी तो मैं कहाँ जाऊँगा।
तुम प्रेम से देखो तो चांडाल जो इस संसार की रिक्तता में आनंद पा रहा है, वह भी विद्वत वाणी में वेद पाठ करे
पर तुम क्रुद्ध हो जाओ तो कोई कहाँ जाए?”

देवी के अद्वैत रूप को स्थापित करते हुए शंकर आगे उन्हीं के दिव्य लक्षणों को व्यक्त करते हैं, पर अंत में निस्साहय बालक की तरह सती का आंचल पकड़ कर कहते हैं,

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु॥
~ हे महादेवी! मेरे समान कोई पातकी नहीं और तुम्हारे समान कोई पाप हरिणी नहीं, ऐसा जानकर जो उचित पड़े वह करो।

कहना अति ना होगा कि आगे शंकराचार्य सनातन की प्रशस्ती बनकर प्रगल्भ हुए। माता के लिए हर पुत्र प्रिय होता है, परंतु जो माता ही को गुरु और सखा मान उनका आँचल पकड़ कर रोता रहता है, माता उसे अपने गोदी में बैठा ही लेती हैं।

जो स्वयं को अज्ञानी मानकर स्वयं के समस्त उत्कृष्ट-निकृष्ट कर्मों को माता द्वारा प्रणित मान, फल को उन्हीं को समर्पित कर देता है, वह अपनी माता का प्रिय हो ही जाता है, श्रीराम के समान

यही निरपराध समर्पण है।
यही भक्ति मार्ग है।
यही श्रद्धा का मार्ग है।

जगदंबा वैसे तो हर स्वरूप में ब्रह्मा, नारायणी हैं और रुद्रा भी।
पर हमारे लिए वे सूर्य के शौर्य और चंद्रमा के अमृता शक्ति से युक्त माता हैं जो हमारे लिए सबसे उपयुक्त चुनाव करती हैं।