अर्थव्यवस्था
डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता बढ़ाना नोटबंदी की वास्तविक सफलता है

एक दिन मुझे आश्चर्य हुआ जब एक ऑटोरिक्शा चालक ने मुझसे नकद लेने से मना कर दिया और वह जीपे से भुगतान चाहता था। छोटी दूरी की ही यात्रा थी और मीटर मात्र 21 रुपये दर्शा रहा था इसलिए मैंने सोचा वह नकद क्यों नहीं ले रहा। उसने बताया कि उसे दूसरे राज्य में रहने वाले अपने परिवार को पैसे भेजने हैं जिसके लिए वह ऑनलाइन माध्यम का ही उपयोग करता है क्योंकि इससे तुरंत लेन-देन हो जाता है।

यह एकमात्र ऐसी घटना नहीं है। बेंगलुरु, जहाँ मैंने अपना आधा जीवन बिताया है, और ठाणे, जहाँ मेरा शेष आधा जीवन बीता है, में क्यूआर कोड और यूपीआई भुगतान बहुत प्रचलित हैं। मेरे आसपास कोई ऐसी दुकान नहीं है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार न करती हो।

ठेला लेकर चलने वाले रेहड़ी-पटरी वाले भी पेटीएम क्यूआर कोड का कार्ड रखते हैं और डिजिटल भुगतान स्वीकारते हैं। डिजिटल भुगतान प्रणाली विस्तृत और गहरी हो चुकी है। हालाँकि डाटा के सामने ये कहानी और व्यक्तिगत अनुभव कुछ भी नहीं हैं लेकिन डिजिटल भुगतान का डाटा भी दर्शाता है कि किस तरह से इस माध्यम की स्वीकार्यता बढ़ी है।

जुलाई में जब राज्य कोविड पाबंदियों को कम करने लगे और लोग घर से बाहर निकलने लगे, तब मासिक यूपीआई लेन-देन की संख्या 3 अरब को पार करके 3.24 अरब पहुँच गई और कुल 6 लाख करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ। इस वर्ष के मार्च में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) का डिजिटल भुगतान सूचकांक (डीपीआई) 270 के नए उच्च स्तर पर पहुँचा था।

मार्च 2018 से मार्च 2020 के बीच यह सूचकांक दोगुना हो गया था और आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि मार्च 2022 का सूचकांक मार्च 2020 का दोगुना हो। इस वर्ष जनवरी में एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि डिजिटल भुगतान की गहरी होती पैठ को मापने के लिए आरबीआई-डीपीआई पाँच आधारों को उपयोग कjता है-

(1) भुगतान माध्यम (25 प्रतिशत भारांश), (2) भुगतान इंफ्रास्ट्रक्चर- माँग पक्ष के कारक (10 प्रतिशत भारांश), (3) भुगतान इंफ्रास्ट्रक्चर- आपूर्ति पक्ष के कारक (15 प्रतिशत भारांश), (4) भुगतान प्रदर्शन (45 प्रतिशत भारांश) और (5) उपभोक्ता केंद्रीयता (5 प्रतिशत भारांश)।

इन सभी आधारों के उप-आधार भी हैं जिनमें कई सारे मापने-योग्य सूचक हैं। उदाहरण स्वरूप, भुगतान माध्यम आधार में छह उप-आधार हैं जैसे डेबिट और क्रेडिट कार्ड, मोबाइल वॉलेट, इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग के लिए पंजीकृत उपभोक्ता तथा टोल भुगतान के लिए फास्टैग।

आपूर्ति पक्ष के इंफ्रास्ट्रक्चर में अपेक्षानुसार बैंक ब्रांचों, व्यापार संवाददाताओं, एटीएम, बिक्री बिंदु टर्मिनल, क्यूआर कोड और मध्यस्थतों को देखा जाता है। अन्य उप-आधारों को जानने के लिए नीचे दिया गया चार्ट देखें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इनमें से अधिकांश उप-आधार नीतियों के कारण ही बढ़ पाए हैं और सरकार के विनियमन ज़ोर के बिना यह संभव नहीं हो पाता।

उदाहरण स्वरूप, जन धन और आधार तथा एटीएम से नकद निकालने को छोड़कर अधिकांश डिजिटल भुगतान सेवाओं से सेवा शुल्क हटाया गया। 2016 के दो बड़े विघटनों की भूमिका समझे बिना हम इस प्रगति की पूर्ण सराहना नहीं कर सकते हैं- पहली है सबसे अधिक आलोचना झेलने वाली नोटबंदी।

और दूसरा है रिलायंस जियो जिसने डाटा दरों को विश्व के न्यूनतम स्तर पर ला दिया और डिजिटल उपयोग एवं भुगतानों का दायरा बढ़ा दिया। आज हम अनुभव से कह सकते हैं कि काला धन पर प्रहार करने के लिए नोटबंदी एक विफल प्रयास रहा था। साथ ही इसने अनावश्यक रूप से नकद-आधारित व्यापारों को संकट में डाला जिससे उनकी वृद्धि गति कई वर्षों तक धीमी पड़ गई।

लेकिन डिजिटल भुगतान की वृद्धि में नोटबंदी की भूमिका को न सराहना भी गलती होगी। आलोचक कहेंगे कि इस उद्देश्य को दीर्घ अवधि के प्रोत्साहनों और अर्थदंडों से भी प्राप्त किया जा सकता था लेकिन सत्य यह है कि इसमें दशक भर का समय लगता और इतनी लंबी प्रतीक्षा करना समझदारी नहीं होती।

इस विघटन ने लोगों को विवश किया कि नकद के अलावा वित्तीय लेन-देन के लिए वे अन्य माध्यमों का उपयोग करें। जब हम लोगों का व्यवहार परिवर्तित करना चाहते हैं तो प्रोत्साहन से कई अधिक कारगर आवश्यकता होती है। यदि नोटबंदी के विघटन के कारण डिजिटल भुगतान सफल हुए हैं तो यह भी एक तथ्य है कि इसी की सहायता से भारत कोविड लॉकडाउन व आपूर्ति बाधाओं से उबर पाया।

वहीं एक विपरीत परिस्थिति देखिए- यदि लेन-देन भौतिक माध्यमों से ही होता जैसे चेक और नकद तो क्या कोविड के कारण हुआ आर्थिक नुकसान और अधिक होता? सोचिए अरबों भुगतान यदि नकद से किए जाते तो वायरस संक्रमण का खतरा और कितना बढ़ता।

सोचिए यदि घर लौटे प्रवासी श्रमिकों की आर्थिक सहायता के लिए जो मनरेगा रोजगार दिया गया, उसका भुगतान नकद में किया जाता तो क्या होता। इसमें कोई दोराय नहीं है कि नोटबंदी ने डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर भारत को कम पीड़ा देकर अग्रसर किया है। संपर्क-रहित भुगतानों से संभवतः इसने कोविड संक्रमण के खतरे को भी न्यूनतम किया है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।