रक्षा
1971 में भारत की पाकिस्तान पर विजय से आज विश्व क्या सीख सकता है

1971 से मनाया जाने वाला विजय दिवस जिन सैन्य और रणनीतिक सफलताओं को दर्शाता है, उसके समानांतर में हम रणनीतिक विश्व की गतिविधियों को कैसे समझ सकते हैं, यह जानना आवश्यक है।

1989 के शीत युद्ध के बाद से पारंपरिक रूप से जो शक्ति संतुलन अंतर्राष्ट्रीय रणनीतिक वातावरण को स्थिर रखता था, वह अचानक टूट गया। अंदर-अंदर ही सिमटे हुए संजातीय विवाद फूट पड़े। इससे सर्वाधिक अस्थिरता विकासशील विश्व में आई जहाँ ऐसे विवाद पहले से ही थे।

यूएन को अपनी एजेंसियों और शांति बनाए रखने वाली बलों को उपयोग करना पड़ा। कई मामलों में, मानवीय कारणों से भी, यूएन अध्याय 7 के तहत हस्तक्षेप किया गया। कंबोडिया, मोज़ैम्बिक और ऐसे ही एक-दो मिशन को छोड़कर, अधिकांश विफल रहे।

सोमालिय, रवांडा और स्रेब्रेनिका की विफलताएँ प्रमुख रहीं। अफ्रीका के पारंपरिक जनजातीय विवादों को सुलझाने के लिए यूएन ने स्वेच्छा से प्रयास किए लेकिन सफलता मुश्किल से ही हाथ लगी। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से किसी राष्ट्र या राष्ट्र समूह के हितों की रक्षा करने के लिए कई हस्तक्षेप अभियान चलाए गए।

दो खाड़ी युद्ध, अफगानिस्तान और बाल्कन क्षेत्र में लंबे समय तक तनाव चला और अंततः कोई स्थिरता भी नहीं मिल पाई। ऐसा अधिकांश अचानक उठने वाली उत्तेजनाओं, गलत तरीके से विवाद प्रारंभ और उससे भी गलत तरीके से उसके अंत के कारण हुआ।

इराक़ और अफगानिस्तान का उदाहरण हमारे समक्ष है। इराक़ के भविष्य के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण न होना और पहले ही पीछे हट जाने के कारण आज इराक़ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है व अपनी अस्थिरता से पड़ोसी देशों को भी प्रभावित कर रहा है। इस अक्षमता के कारण दाइश या आईएसआईएस जैसे बागी दुष्ट संगठन उभर रहे हैं।

अफगानिस्तान भी अस्थिर है और अधिकांश क्षेत्र ही इसकी अस्थिरता का कारण हैं। सैन्य दमन से विवाद को पूरी तरह सुलझाया नहीं जा सका। मानवीय दृष्टि से भी देखा जाए तो 13 वर्षों से बहु-राष्ट्रीय बलों की उपस्थिति नागरिक सुरक्षा का कोई आश्वासन नहीं दे सकी है।

अफगानिस्तान में युद्ध प्रभावित क्षेत्र

उपरोक्त परिदृश्य के संदर्भ में पूर्ववर्ती पूर्वी पाकिस्तान में दिसंबर 1971 में मानवीय कारणों से भारत का हस्तक्षेप एक मॉडल है जो केंद्रित मिशन व विवाद निपटारे के लिए एक केस अध्ययन का विषय भी बन सकता है। हमें यह बात माननी होगी कि वातावरण काफी भिन्न था लेकिन विश्व के विवादों में कोई भी दो परिस्थितियाँ एक सी हो भी नहीं सकतीं।

उस समय परिस्थिति एक आंतरिक विवाद की थी जब पाकिस्तान की दो इकाइयों के बीच वादों के पूरा न होने, पूर्वी भाग की आकांक्षाओं की पूर्ति न होने व दोनों भागों के बीच राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक असमानताओं के कारण तनाव हो गया था। यह विवाद अपरिहार्य था लेकिन पश्चिमी भाग ने जिस क्रूरता और क्रोध से प्रतिक्रिया दी, उसकी कतई आवश्यकता नहीं थी।

पूरा विश्व आश्चर्यचकित था लेकिन यही विश्व निहत्थे और शोषण का शिकार हो रहे लोगों के लिए हस्तक्षेप नहीं करना चाह रहा था। बौद्धिकों की हत्या व बलात्कार नरसंहार की सीमा तक आ गए और पूर्वोत्तर भारत की सीमा से लाखों की संख्या में शरणार्थी भारत आने लगे।

इसे रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा पश्चिम पाकिस्तान पर बनाया गया दबाव निष्प्रभावी रहा, हालाँकि पूर्वी पाकिस्तान में आंतरिक विद्रोह बढ़ता जा रहा था। अनेक सुरक्षा दलों का सहयोगी होने के कारण पाकिस्तान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। भारत सर्वाधिक प्रभावित देश था क्योंकि विवाद का सीधे प्रभाव इसके सीमा क्षेत्रों पर पड़ रहा था।

भारत सरकार ने कुछ निर्णय लिए थे, जिन्हें आज देखो तो विज़नरी लगते हैं। पहला, सभी विकल्पों पर विचार किए बिना इसने विवाद में हस्तक्षेप नहीं किया। दूसरा, इसने सोवियत संघ के साथ 20 वर्षों की द्विपक्षीय मित्रता संधि करके खुद को राजनीतिक रूप से सशक्त किया जिससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसे समर्थन मिलता रहे और मानसिक रूप से पाकिस्तान के आत्मविश्वास को क्षति पहुँचे।

सोवियत संघ संग भारत की मैत्रि संधि

तीसरा, जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) सैम मानेकशॉ ने रणनीतिक सलाह दी थी कि युद्ध को तब तक टाला जाए जब तक भारत पर हमला न हो। इस बीच सैन्य बलों को (सीएएस और सीएनएस के सहयोग से) सशक्त किया गया, उपकरण संबंधी समस्याओं को निपटाया गया और संभावित युद्ध के लिए कमांडरों व सैनिकों को मानसिक रूप से तैयार किया गया।

चीन की पीएलए पाकिस्तान का समर्थन कर सकती है, इसका पूर्वानुमान लगाते हुए उन्होंने युद्ध को सर्दियों तक टाला ताकि हिमालयी क्षेत्र के उत्तरी पास तब तक बंद हो जाएँ। इससे वे कुछ पर्वती सेना को भी समतल क्षेत्रों में युद्ध के लिए ला पाए।

प्रधानमंत्री राजनयिक स्तर की तैयारी कर रही थीं, नेतृत्व प्रतीक्षा में था कि कब पाकिस्तान हमला करे और यह क्षण पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा भारतीय वायु क्षेत्र में छापों के रूप में 3 दिसंबर 1971 को आया। पाकिस्तान को 1965 के अनुभव के बावजूद भारतीय सेना की क्षमता का अनुमान नहीं था और वह अपने विजय के सपने देख रहा था।

पश्चिमी सीमा पर आक्रामक अभियान के बीच फील्ड मार्शल ने गति, पैंतरेबाज़ी, बाई पास और शोषण जैसे सभी तरीके अपनाए। मुक्ति बाहिनी के स्थानीय समर्थन से भारतीय सेना का बल बढ़ गया। नौसेना और वायुसेना ने अपने-अपने क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करके पाकिस्तान को थल युद्ध के विकल्पों तक ही सीमित कर दिया।

14 दिनों का युद्ध शानदार तरीके से समाप्त हुआ। 93,000 युद्ध बंधकों के साथ पाकिस्तानी सेना ने बिना शर्त के समर्पण किया। पराजित से किसी प्रकार का बदला नहीं लिया गया। सभी बंधकों को सुरक्षा के साथ पहुँचाया गया ताकि कोई स्थानीय तत्व बदला लेने का प्रयास न करे।

पाकिस्तान के युद्ध बंधकों की रिहाई

बांग्लादेश की निर्वासित सरकार के साथ मिलकर नागरिक मामलों के लिए एक सेल पहले से काम कर रहा था। सरकार बनने के कुछ दिनों में ही नागरिक प्रशासन कुछ दिनों में ही सुचारु हो गया। यूएन एजेंसियों के साथ मिलकर विस्थापित हो चुके लोगों के पुनर्वास का काम युद्ध स्तर पर हुआ।

नर्म शक्ति जैसे खाद्य या बिजली के क्षेत्र में बांग्लादेश की हर प्रकार से सहायता की गई थी। भारतीय सेना तुरंत वापस लौट गई, केवल कुछ सैनिक रहे जो आवश्यक संचार और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर के पुनर्स्थापन का काम देख रहे थे।

युद्ध समाप्ति के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह हुई कि बांग्लादेश के लोगों को रणनीतिक स्थान और उनका स्वाभिमान दिया गया। यह निर्णय ही संभवतः पूरे अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

अगर हम सैन्य दृष्टि से इन घटनाओं को देखेंगे तो पाएँगे कि अभियान और रणनीतिक स्तर पर विवाद को चालाकी से शुरू करने का फल ही भारत को मिला। युद्ध हम कैसे लड़े, वह बात तो है ही लेकिन इतिहासकारों को जिस बात पर ध्यान देना चाहिए, वह है कि हमारा पूरा ध्यान विवाद खत्म करने पर था जो हमने रणनीतिक कूटनीति और नर्म शक्ति के सही उपयोग से किया।

आग बांग्लादेश एक गौरवशाली राष्ट्र है जिसके खाते में कुछ महान् उपलब्धियाँ भी हैं। मैं आखिरी बार जब ढाका गया था तो मैंने देखा वहाँ के लोगों में नम्रता, आत्म सम्मान और कृतज्ञता है। विश्व में बहुत कम देश ही ऐसे होंगे जिन्होंने भारत की तरह सही तरीके से एक नए राष्ट्र के निर्माण में सहायता की हो।

विजय दिवस के अवसर पर 1971 की उपलब्धियों के लिए भारत को गौरवान्वित होने का पूरा अधिकार है। भारतीय सैन्यबल अभी भी अपना सर ऊँचा किए हुए इस काल को उनके प्रोफेशनल और बुद्धिमान होने की परीक्षा के रूप में देख रहे होंगे। वे दोनों में अव्वल आए। जय हिंद।