रक्षा
‘स्टिकी बम’ कश्मीर घाटी में कैसे बन सकते हैं सुरक्षा बलों के लिए नया खतरा

पिछले वर्ष के 15 दिसंबर को अफगानिस्तान के काबुल प्रांत के उप-राज्यपाल महबूबुल्लाह मोहिबी एक बख्तरबंद (कवच लगी) एसयूवी में अपने घर से कार्यालय की ओर निकले। जब वे काबुल के मैक्रोयान, जिसे आधी शताब्दी पूर्व सोवियत ने सोवियत-समर्थक अफगान संभ्रांत वर्ग के लिए बसाया था,  की संकीर्ण गलियों से गुज़रे तो उनकी कार में एक तेज़ धमाका हो गया। मोहिबी और उनके सचिव की मृत्यु हो गई।

कुछ घंटों बाद केंद्रीय अफगानिस्तान के घोर प्रांत के एक उच्च पदाधिकारी अब्दुल रहमान अतशान की हत्या भी धमाके से ही हुई जब वे अपनी कार में थे। ये धमाके चुंबकीय बमों की सहायता से किए गए थे जिन्हें ‘स्टिकी (चिपकने वाले) बम’ के नाम से भी जाना जाता है।

ये बम प्लास्टिक हाई विस्फोटक और शक्तिशाली चुंबकों के उपयोग से बनाए जाते हैं। मोटरबाइक चलाते हुए या आम पैदलयात्रियों में से सड़क पर चलता हुआ कोई आतंकवादी सरलता से चुंबक की सहायता से स्टिकी बम को को अपने लक्षित वाहन पर चुपके से लगा सकता है जिसपर किसी का ध्यान भी न जाए।

उसके बाद इस बम को वह रेडियो सिग्नल की सहायता से वह दूर से ही या समय आधारित फ्यूज़ की सहायता से फोड़ सकता है। यह बम सस्ता, सटीक और घातक है। इस हथियार का उपयोग अफगानिस्तान में तालिबान व अन्य आतंकी संगठन 2005 से कर रहे हैं और उत्पात मचा रहे हैं। अब यह हथियार कश्मीर घाटी भी पहुँच गया है।

पिछले माह सुरक्षा एजेंसियों ने इस केंद्र शासित प्रदेश में कम से कम 15 स्टिकी बम जब्त किए हैं। ये सभी बम ड्रोन और नियंत्रण रेखा (एलओसी) के आर-पार बनी सुरंगों के माध्यम से कश्मीर घाटी में पहुँचे थे। संभवतः इन्हें पाकिस्तान की लश्कर-ए-तैयबा से संबंधित संगठन द रज़िज़्स्टेन्स फोर्स के लिए लाया गया था।

फरवरी 2019 में एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोटकों से भरी कार लेकर एक सैन्य काफिले को पुलवामा जिले में टक्कर मार दी थी जिसमें 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। एक स्टिकी बम विस्फोटकों से लदी कार, जिसका उपयोगी पुलवामा आतंकी हमले में हुआ था, की तुलना में कम घातक है लेकिन यह आतंकी समूहों की पसंद बन गया है क्योंकि उपयोग और लाने-ले जाने में सहज है।

पुलवामा हमला

इसे बनाने में भी कम संसाधनों की आवश्यकता होती है। हालाँकि, युद्ध-ग्रस्त अफगानिस्तान जितना सरल नहीं होगा कश्मीर में स्टिकी बम का उपयोग लेकिन फिर भी घाटी में सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह हथियार बड़ा खतरा बन सकता है। कश्मीर में सैन्य काफिलों पर निरंतर ग्रनेड, गोलीबारी और पत्थरबाज़ी से हमला होता है।

जब आतंकवादियों को बेअसर करने के लिए सैनिकों को तैनात किया जाता है तो उन्हें घनी आबादी वाले क्षेत्रों से गुज़रकर जाना होता है जहाँ प्रायः उनके वाहन को आतंकवादी-समर्थक भीड़ घेर लेती है और पत्थर बरसाती है। कई बार प्रदर्शनकारी सैन्य वाहनों पर भी चढ़ जाते हैं और पत्थरबाज़ी करते हैं।

इस प्रकार आतंकवादी और उनके समर्थक सरलता से इस कोलाहल को लाभ उठाकर सैन्य वाहन पर चुंबकीय बम लगा सकते हैं। यह मात्र एक उदाहरण है जिसमें कश्मीर घाटी में स्टिकी बम का उपयोग सुरक्षा बलों के विरुद्ध हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी कई परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

“ये छोटे आईईडी (इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) और काफी शक्तिशाली होते हैं।”, कश्मीर के पुलिस इंस्पेक्टर जनकल विजय कुमार बताते हैं। “निस्संदेह ही यह वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करेगा क्योंकि कश्मीर घाटी में पुलिस व सुरक्षा बलों के आवागमन की आवृत्ति और संख्या अधिक है।”, वे आगे हते हैं।

इस खतरे को भाँपते हुए कश्मीर में सुरक्षा बल मानक कार्य प्रक्रियाओं, विशेषकर घाटी में उनके काफिले के आगामन से संबंधित प्रक्रियाओं में परिवर्तन कर रहे हैं। 2012 में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स (एनएसजी) समेत सुरक्षा एजेंसियों को उस वर्ष की 13 फरवरी को इज़रायली दूतावास के बाहर स्टिकी बम से हुए हमले के बाद भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र से जाना पड़ा था।

2012 का हमला

भारत में सबसे सुरक्षित स्थानों में से एक, प्रधानमंत्री निवास से अधिक दूर नहीं, दूतावास के बाहर एक बाइक चलाते हुए आतंकवादी ने उस समय हथेली के आकार का एक स्टिकी बम इज़रायली राजदूत द्वारा उपयोग की जाने वाली कार पर लगा दिया था।

अरबी में “ओबवाह लसिका” कहे जाने वाले स्टिकी बम का 2004 के अंत और 2005 के आरंभ से ईराक़ विवाद में काफी उपयोग हुआ है। 2008 आते-आते उस देश में प्रति सप्ताह स्टिकी बम से पाँच धमाके होने लगे।

स्टिकी या चुंबकीय बम कोई नया आविष्कार या नवाचार नहीं है, बल्कि यह तो उससे काफी दूर है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय व्यापारी जहाज़ों को नष्ट करने के लिए लिम्पेट माइन्स, एक प्रकार की नौसैन्य माइन्स का उपयोग होता था जिसे लक्ष्य पर चुंबक की सहायता से लगाया जाता था। 1942 में नाज़ी-अधिकृत क्षेत्र में जहाज़ नष्ट करने के लिए ब्रिटिश कमांडो इसका काफी उपयोग करते थे।