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राफेल विवाद की छः अनसुलझी गुत्थियां
राफेल विवाद की छः अनसुलझी गुत्थियां

प्रसंग
  • यह छह बातें सुलझा सकती हैं राफेल की गुत्थी।

अप्रैल 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए तब फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत करने के बाद उन्होंने 36 राफेल विमान खरीदने की घोषणा की थी। फिर जनवरी 2016 में गणतंत्र दिवस समारोह में भाग लेने के लिए ओलांद के दिल्ली पहुँचने पर इस सौदे को अंतिम रूप दिया गया।

जब कांग्रेस की अगुवाई वाली एनडीए सरकार सत्ता में थी तब यह 126 राफेल विमानों की खरीद के लिए डसॉल्ट एविएशन के साथ बातचीत कर रही थी। इसमें 18 बिलकुल तैयार विमानों की आपूर्ति की जानी थी जबकि 108 विमानों को हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ भारत में ही बनाया जाना था। हालांकि राफेल निर्माता कंपनी डसॉल्ट के साथ मतभेदों के चलते यूपीए यह सौदा न कर सकी थी।

कांग्रेस पिछले एक साल से, विमानों की तादाद कम करने और सरकारी स्वामित्व वाली एचएएल के बजाय अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस को इस सौदे में शामिल करने के लिए मोदी सरकार को देश की सुरक्षा के साथ समझौता करने का दोषी ठहरा रही है। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के नये खुलासे के बाद से इस सौदे को लेकर विवाद और गहरा गया है।

यहाँ पर छह सवाल दिए गए हैं जिनके जवाब इस गुत्थी को सुलझा सकते हैं –

  • मोदी सरकार ने केवल 36 विमान क्यों खरीदे जबकि यूपीए ने तो 126 विमानों का सौदा किया था?

जब मोदी सरकार सत्ता में आई तब तक भारत में राफेल की आपूर्ति को लेकर विमान निर्माता कंपनी डसॉल्ट और एचएएल के बीच होने वाली असहमति के कारण बातचीत ठंडे बस्ते में जा चुकी थी। दूसरी तरफ, भारतीय वायुसेना को दो तरफ से खतरों से निपटने के लिए 42 स्क्वाड्रन की जरूरत थी जबकि इसके पास केवल 33 स्क्वाड्रन ही थे। अब यह संख्या घटकर 31 हो गई है। इसलिए, भारतीय वायु सेना को विमानों की कम संख्या के चलते अपनी क्षमता को पूरा करने के लिए तत्काल लड़ाकू विमानों की जरूरत थी। भारत में तकनीक के हस्तांतरण और विमान आपूर्ति के लिए एक समझौते पर बातचीत करने के लिए काफी लंबा समय लगा।

इसके अलावा, अगर इस सौदे पर बातचीत हो गई होती तब भी एचएएल को भारत में विमान निर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचा विकसित करना होता। इसमें भी कुछ समय लगता जिससे आपूर्ति में और देरी हो जाती।

इस तरह से सरकार ने केवल 36 विमान ही खरीदने का फैसला लिया।

तथ्य यह है कि भारतीय वायुसेना ने पहले से ही अतिरिक्त विमान खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिनमें से ज्यादातर भारत में ही बनाए जाएंगे। इससे सरकार के उस दावे को बल मिलता है कि 36 राफेल खरीदना एक आपातकालीन उपाय था।

विमानों की उच्च लागत की वजह से 126 राफेल खरीदने की सरकार की क्षमता पर भी अक्सर सवाल उठते रहे हैं। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री रहे ए.के. एंटनी ने कहा था कि सरकार के पास 126 राफेल खरीदने के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं थी।  

2) एचएएल को सौदे का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया?

पहला कारण, जैसा कि सौदे में ‘मेक इन इंडिया’ को दरकिनार कर दिया गया था इसलिए एचएएल को सौदे का हिस्सा नहीं बनाया गया। सरकार ने ऑफ-द-शेल्फ लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला किया है क्योंकि ऐसे कम विमानों का निर्माण करना फायदेमंद नहीं होगा। जब एचएएल इस सौदे का भागीदार नहीं है, तो यह रिलायंस, अन्य निजी फर्मों और राज्य के स्वामित्व वाली फर्मों के साथ ऑफ़सेट क्लॉज के क्रियान्वयन के लिए डसॉल्ट का साथ देगा।

दूसरा, जैसा कि ‘लाइवफर्स्ट’ ने बताया है कि यूपीए शासन के समय डसाल्ट के साथ सौदेबाजी का नेतृत्व करने वाले एक भारतीय वायु सेना अधिकारी ने कहा है कि एचएएल और डेसॉल्ट के बीच ‘पेचीदा’ मतभेदों के कारण सौदा न हो सका।

3) क्या राफेल की ऊंची कीमत तर्कसंगत नहीं है?

सुरक्षा विशेषज्ञ और समीक्षक अभिजीत अय्यर-मित्रा ने स्पष्ट किया है कि कतर ने ये राफेल 292 मिलियन डॉलर प्रति विमान की दर से,  मिश्र ने 246 मिलियन डॉलर प्रति विमान की दर से खरीदे तथा भारत ने प्रति विमान के लिए 243 मिलियन डॉलर खर्च किए। सभी देशों ने इस तरह की कीमतों का भुगतान करके एक जैसे राफेल खरीदे।

इसके साथ ही जिस सौदे पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं उसमें न केवल रखरखाव समर्थन, हथियार और उनका प्रशिक्षण शामिल है बल्कि लड़ाके  विमानों में कुछ विशेष सुधार करना भी शामिल है। जिनकी मांग आईएएफ ने की उन सुधारों के कारण राफेल की कीमत बढ़ी है। जिन राफेल को कतर और मिस्र में बेचा गया है उनमें इतने संसोधन भले ही न किए गए हों लेकिन जो भारत में बेचे जाने हैं उनमें पर्याप्त संसोधन अवश्य किए गए हैं।

इस सौदे में 50 प्रतिशत ऑफसेट भी शामिल हैं। इसका मतलब है कि इस सौदे से डसॉल्ट को जिस 50 प्रतिशत का लाभ हो रहा है (59,000 करोड़ रुपये का 50 प्रतिशत) वह निवेश स्थानीय रक्षा निर्माण को बढ़ावा देने के माध्यम से भारत को वापस किया जाएगा।

अनुचित कीमत पर राफेल की खरीद का कांग्रेस का दावा पूरी तरह से निराधार है क्योंकि पार्टी ने वर्ष 2000 के अंत में पेश किए गए सिर्फ विमान की कीमत का उद्धरण जारी रखा और जब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मुद्रास्फीति तथा अंतर्निहित लागत वृद्धि की व्याख्या को स्पष्ट किया तो इस पर कांग्रेस ने ध्यान नहीं दिया।

4)  क्या मोदी ने सौदे पर हस्ताक्षर करते समय सुरक्षा और अन्य रक्षा खरीद से संबंधित निकायों पर मंत्रिमंडल समिति का समर्थन नहीं लिया?

इस समझौते पर यूपीए सरकार द्वारा स्थापित 2013 की रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) के आधार पर  हस्ताक्षर किए गए थे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दस्तावेज़ के अनुसार, सरकारों के बीच के समझौतों को रक्षा खरीद बोर्ड, रक्षा अधिग्रहण परिषद और सुरक्षा पर कैबिनेट समिति से अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है। सरकारों के बीच अनुबंधों के साथ समझौते के दस्तावेज़ों के हिस्से अनुच्छेद 71 और 72 में दिये गए हैं।  

5) रिलायंस इस सौदे का हिस्सा कैसे बन गया? क्या मोदी सरकार सहचर पूंजीवाद’ और अनिल अंबानी की रिलायंस के पक्ष में लिप्त थी?

रिलायंस, कांग्रेस के दावों के विपरीत, ने इस सौदे में एचएएल की जगह नहीं ली है। उसे डसॉल्ट द्वारा चुना गया था, जो ऑफसेट क्लॉज के निष्पादन के लिए भारत में अपना सहयोगी चुनने के लिए स्वतंत्र था। इसके अतिरिक्त, यह एकमात्र ऐसी कंपनी नहीं है जिसे राफेल निर्माता ने ऑफसेट के लिए चुना है। रिपोर्टों के मुताबिक, रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और एचएएल जैसी कई सरकारी कंपनियों और साथ ही कई अन्य निजी फर्म डसॉल्ट के साथ ऑफसेट निष्पादन का हिस्सा भी होंगी।

इस समझौते में मोदी सरकार द्वारा ‘सहचर पूंजीवाद’ अनिल अंबानी की रिलायंस के ‘पक्ष’ में  थी, के कांग्रेस के दावे पर भी गंभीर सवाल उठते हैं।

जैसा कि इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस की डिफेंस आर्म मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले ही डसॉल्ट से जुड़ी हुई थी। हालांकि, 2014 के बाद मुकेश अंबानी की रिलायंस ने अपने रक्षा कारोबार पर ध्यान नहीं दिया और उनके भाई अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस एयरोस्पेस टेक्नोलॉजीज ने समझौते के बाद ऑफसेट क्लॉज के निष्पादन के लिए डसॉल्ट के साथ करार किया। हालांकि, अगर सौदा 2012 में हुआ होता और मुकेश अंबानी की रिलायंस डसॉल्ट के साथ करार करती तो क्या कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए पर भी सहचर पूंजीवाद का आरोप लगाया जा सकता था?

ठोस सबूतों की गैर मौजूदगी में यह दावा बेबुनियाद है।

6) पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने मोदी सरकार को क्यों दोषी ठहराया है?

इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट (शीर्षक, राफेल वार्ता तब हुई जब रिलायंस ने फ्रांस्वा ओलांद के साथी की फिल्म बनाने में मदद की) ने इस साल अगस्त में आरोप लगाया था कि अनिल अंबानी की रिलायंस एंटरटेनमेंट ने पूर्व फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में नई दिल्ली आने और 36 राफले विमानों के लिए भारत के साथ समझौता के ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के दो दिन बाद, उनकी साथी और अभिनेत्री जूली गायेट के साथ एक फिल्म बनाने के लिए एक सौदा किया।

इस रिपोर्ट, जिसने भारत में सुर्खियां बनाई, ने फ्रांस में भी सवाल उठाए। उसी प्रकार, फ्रांसीसी राष्ट्रपति के दावे के अनुसार, उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से भारत सरकार ने (रिलायंस को) ऑफसेट पार्टनर के रूप में सुझाया। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ओलांदे ने रिलायंस के साथ किसी भी तरह के लाभ को नकारते हुए मोदी सरकार पर आरोप लगाया था। फ्रांसीसी सरकार और डसॉल्ट ने अपने दावों को खारिज कर दिया है। होलंडे ने भी बाद में स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि केवल डसॉल्ट इस मुद्दे पर टिप्पणी कर सकता है।

प्रखर गुप्ता स्वराज में एक वरिष्ठ उप-संपादक हैं।