रक्षा
अटल बिहारी वाजपेयी के प्रेरणीय रणनीतिक नेतृत्व का स्मरण

प्रसंग
  • भारत की रणनीतिक सोच पर अटल बिहारी वाजपेयी का निर्णयात्मक और अपरिवर्तनीय प्रभाव था और उन्होंने देश की कई रणनीतिक जीतों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मैं, हम सब के प्रेरणास्रोत, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन से देश को हुई अपूरणीय क्षति पर हृदय तल की गहराईयों से शोक प्रकट करता हूँ। आइये भारत के रणनीतिक निर्माण में उनके प्रेरणीय योगदान को याद किया जाये। यहाँ जो भी मैं लिख रहा हूँ उसका संदर्भ मैं किसी पुस्तक, दस्तावेज़ या किसी अन्य माध्यम से उद्धृत नहीं करूंगा क्योंकि ऐसा करना अपवित्रीकरण होगा। वाजपेयी की स्मृतियाँ मेरे मन मस्तिष्क में गहराई से समाई हुई हैं क्योंकि मैंने एक नेता के रूप में उनकी प्रगति का उस समय से अनुसरण किया है जब से मुझे रणनीतिक नेतृत्व का ज्ञान हुआ था।

उनके साथ मेरी एकमात्र व्यक्तिगत चर्चा 1982 में हुई थी जब मुझे देहारादून से दिल्ली तक एक यात्रा के दौरान मसूरी एक्सप्रेस के एक चार सीटों वाले कंपार्टमेंट को साझा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। यात्रा के दौरान हम अकेले थे। उस स्मरणीय समय के दौरान जागते हुए जो कुछ घंटे वहाँ बिताए गए उनमें मैं बस उन्हें सुन ही रहा था। शुरुआती वर्षों में, यहाँ तक कि टेलीविज़न के सूचना और समाचार का साधन बनने से भी पहले, उनकी वाक्पटुता की उच्च प्रतिभा के कारण भारतीय राजनीति में उन्होंने अपनी छाप छोड़ दी थी। विश्व के किसी भी राजनेता ने शायद ही ऐसी छाप छोड़ी हो जो वाजपेयी ने अपनी भाषण शैली से छोड़ी थी। उन दिनों में जब भारत के राजनीतिक दृश्य पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गजों का प्रभुत्व था, तब वाजपेयी ने पहले ही संसद में अपनी जगह बना ली थी। तब किसे पता था कि उनके भाग्य में क्या लिखा था। मार्च 1977 में ऑल इंडिया रेडियो की घोषणा, जिसे मैं सुन रहा था, में यह खबर दी गयी कि मोरारजी देसाई के अंतर्गत एक नयी और सबसे पहली गैर-कोंग्रेसी तत्कालीन सरकार का गठन हुआ था जिसमें श्री अटल बिहारी वाजपेयी को विदेश मंत्री (न कि एक्सटर्नल अफेयर्स, जहां तक मुझे याद है) बनाया गया था।

उनकी नियुक्ति से चारों ओर उत्साह था और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मामलों की अधिक अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई थी। वे अशांत दिन थे। जनता सरकार के अस्तित्व में आने के कुछ ही महीनों बाद जनरल ज़िया-उल-हक़ ने जुलाई 1977 में पाकिस्तान में सत्ता पर काबिज होने के लिए ज़ुल्फिकार भुट्टो को उखाड़ फेंका था। यह उस समय से था जब पूर्वी पाकिस्तान के नुकसान के लिए पाकिस्तान द्वारा भारत से बदला लेने की वास्तविक रूप से शुरुआत हुई थी। यह 1979 में वाजपेयी के दौरे के दौरान था जब चीन ने वियतनाम पर, खमेर रूज़ के खिलाफ कंबोडिया में प्रवेश करने के लिए, आक्रमण करने और दंडित करने का निर्णय लिया था। वाजपेयी ने विरोध में दौरे को छोटा कर दिया था यह वह कृत्य था जिसे भारतीय कूटनीति में याद किया जाता है। विदेश मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल छोटा था क्योंकि सत्ता में कॉंग्रेस शासन की वापसी हुई थी। फिर भी सरकार में अल्प समय ने दुनिया के बारे में उनके दिमाग और उनकी समझ को प्रभावित किया जिसने बाद के वर्षों में सत्ता में और सत्ता से बाहर उनकी बड़े पैमाने पर मदद की।

यह स्मरण है जब वह सत्ता में नहीं थे और यह यहाँ सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है एवं इसका उल्लेख भी जरूरी है इससे पहले कि वाजपेयी के उन वर्षों पर चर्चा की जाये जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)/राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की विभिन्न सरकारों का नेतृत्व किया था। 1984 की विनाशकारी हार के बाद, जब निचले सदन में भाजपा मात्र दो सीटें ही अर्जित कर सकी थी, वाजपेयी को भाजपा के राजनीतिक भाग्य को चमकाने का श्रेय दिया गया था। श्रेयपूर्वक, उन्होंने पार्टी को इसके पैरों पर पुनः खड़ा किया और 1989 में सदन में 85 सीटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

1991 से 1996 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के साथ वाजपेई की दोस्ती से भी राष्ट्रीय रणनीतिक कार्यों में कोई सहायता प्राप्त न हुई। भारत जम्मू-कश्मीर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के दबाव में था और क्लिंटन की पहली सत्ता में भी (1993-96) भारत को इससे सहायता के कोई संकेत नहीं दिखाई दिए। राष्ट्र सहायक सचिव, रॉबिन राफेल, बहावलपुर के पास जियाउल हक में हवाई हमले में मारे गए पाकिस्तान के लिए पूर्व अमेरिकी राजदूत की पत्नी, ने जम्मू-कश्मीर नीति को लक्षित किया और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में इसे बुरा दिखने का प्रयास किया। यह वाजपेयी जैसे मौजूदा प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण का समर्थन करते थे, पार्टी के हितों की चिंता किए बिना, की संसद एक साथ मिल सकती है और 22 फरवरी 1994 को संसद के दोनों सदन मिलकर सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास करवा सकते हैं।  संकल्प ने जम्मू-कश्मीर के पूरे क्षेत्र में भारत के अप्रत्याशित दावे को व्यक्त करने के लिए एक समय अंतर्राष्ट्रीय समुदाय पर एक दबाव डाला था। यह भारतीय संसद के इतिहास में एक विभेदक चिह्न था।

चार महाने बाद, भारत जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघन पर पाकिस्तान और रॉबिन राफेल से फिर गहरे दबाव में था और जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (अब परिषद) की पहली बैठक में बहुत कुछ सुनना पड़ा। पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाजपेई के अलावा किसी और ने नहीं किया था और फ़ारूक़ अब्दुल्ला तथा सलमान खुर्शीद ने उनका साथ दिया था। 1994 की संकट अवधि के दौरान वाजपेयी ने राव तक इस समर्थन को विस्तारित कर दिया था, भारत में स्वतंत्रता के इतिहास के बाद यह राजनीतिक परिपक्वता का सबसे बड़ा प्रदर्शन है, और यह सब भारत के राष्ट्रीय रणनीतिक हित के लिए था।

1996 में, राव सरकार के संकेत अनिष्ट थे क्योंकि वाजपेयी सराकर ने भाजपा को एक नई रफ्तार दी थी। अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है लेकिन यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि राव अमेरिका के बड़े दबाव में थे और भारत की परमाणु क्षमता के अत्यधिक परीक्षण के माध्यम से मुक्त होने का उनका इरादा महसूस न किया जा सका। वाजपेयी ने ही अधूरे पड़े व्यापार को पूरा किया, ऐसा उनके प्रधानमंत्री पद के दूसरे कार्यकाल में हुआ था पहले यह 13 दिनों के लिए प्रधानमंत्री बने थे जब उन्होंने चुनाव लड़ने के बजाय सरलता पूर्वक त्याग कर दिया था।

वाजपेयी के नेतृत्व में, 11 से 13 अप्रैल 1998 के बीच, भारतीय परमाणु वैज्ञानिकों ने अमेरिकी निगरानी से छेड़छाड़ की और पोखरण में भूमिगत रूप से पाँच परमाणु हथियारों का परीक्षण किया, जिसने भारत को परमाणु हथियार के मामले में काफी मज़बूती प्रदान की, भारत के पास छठे राष्ट्र के रूप में परमाणु क्षमता है। यह वाजपेई युग की शुरुआत ही थी, जिसमें अगले छह सालों में पाकिस्तान को ऑलिव ब्रान्च का विस्तार करने और फरवरी 1999 में लाहौर बस सेवा जैसे कई प्रमुख रणनीतिक निर्णयों को देखा गया। इसके पीछे की धारणा यह थी पाकिस्तान के साथ संवाद राजनीतिक रूप से मुद्दों को हल करने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास निर्माण सुनिश्चित करेगा और पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में एक विनाशकारी प्रॉक्सी युद्ध न करने के लिए प्रेरित करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में इसी विश्वास के साथ अपना कार्यकाल प्रारंभ किया था तथा उफ़ा और लाहौर जाने जैसे कदम उठाए थे जिसके बाद पाकिस्तान ने इसका अनादर करने का निर्णय लिया। 1999 में, इसी प्रकार शांति के लिए लाहौर घोषणा पत्र पर पाकिस्तान से हस्ताक्षर करवाने के वाजपेयी को परेशानी का सामना करना पड़ा था, क्योंकि यह तीन महीने बाद कारगिल युद्ध की तैयारी कर रहा था।

कारगिल 1999 ने भारत को आश्चर्यचकित कर दिया क्योंकि यह वाजपेयी की लाहौर यात्रा की पहल के शुरू करने के तुरंत बाद हुआ था। यहां तक की जब भारतीय सेना ने कारगिल चोटी को घुसपैठ से आजाद कराने के लिए लड़ रही थी, तब वाजपेयी को युद्ध को और बड़े स्तर पर ले जाने का बहुत अधिक दबाव था। यह जाहिर था कि अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय तब भारत को बढ़ने के लिए दोषी नहीं ठहराएगा, लेकिन यह वाजपेयी की दिमागी रणनीति थी, जिसने युद्ध का स्टार बढ़ाना अनावश्यक समझा। भारतीय वायुसेना सेना लाइन ऑफ कंट्रोलको पार नहीं करने के प्रतिबंधों से नाखुश थी। लेकिन फिर भी एक ऐसा समय था जब भारत और पाकिस्तान दोनों प्रत्यक्ष रूप सेपरमाणु हमले के लिए तैयार थे;सिद्धांत और प्रतिक्रिया दिशानिर्देश अभी तक नहीं थेसिद्धांत और प्रतिक्रिया दिशानिर्देश अभी तक नहीं दिए गए थे और भारतीय सेना के पास खुद से युद्ध प्रारंभ करने की क्षमता की कमी थी। सभी विकल्पों के बीच विवेक सबसे बेहतर विकल्प था क्योंकि उस समय एक युद्ध नियंत्रण से बाहर हो सकता था। ऐसे कई लोग हैं जो इस उनके इस फैसले की आलोचना करते हैं लेकिन एक सैन्य जीत की निश्चितता की पुष्टि के साथ और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों देशों की परमाणु स्थिति पर बेचैन थे, यह स्पष्ट रूप से प्रभावशाली ढंग से अंततः शत्रुता को समाप्त करने के लिए एक उर्जपूर्ण कदम था। लाइन ऑफ कंट्रोल पर सैन्य और राजनयिक प्रयासों के एक कुशल संयोजन से फिर से कब्जा किया गया था। हालांकि युद्ध में खोई गई जानों (527 मारे गए) की कीमत बहुत अधिक थी। यदि अमेरिका पर राजनयिक दबाव और पाकिस्तान पर इस बजह से असफल रहा,यदि हम सिर्फ सेना के दम पर चोटी पर कब्जा करते तो परिणाम स्वरूप विरोधी के बराबर हमारे कई और सैनिकों को अपना बलिदान देना पड़ता।

कारगिल के बाद 2001 में आगरा शिखर सम्मेलन था, जहाँ वाजपेयी नेएक पूरे विफलशिखर सम्मेलन के समापन के साथ पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ पर दबाव कम करने से इनकार कर दिया था। प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल 2001 के दौरान आतंकवादियों की हत्या के मामले मेंजम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ी अशांति देखी गई।इससे कुछ महत्त्वपूर्ण फैसले हुए। जिसमें से एक राष्ट्रीय राइफल्स का विस्तार करना, सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम (एएफएसपीए-90) का विस्तार जम्मू डिवीजन में सेना को उग्रवादियों और आतंकवाद को नियंत्रित करने में सेना की सहायता करने के लिए किया गया था। ऐसा उस समय हुआ था जब कारगिल समीक्षा समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। मंत्रियों के एक दल तुरंत इसका अध्ययन करने के लिए स्थापित किया गया था और राष्ट्रीय सुरक्षा में सुधार के लिए निष्पादित किए जाने वाले उपायों की सिफारिश की गई थी। फिर, कारगिल युद्ध के बाद दो साल से भी कम समय में 2001 में, एकीकृत रक्षा स्टाफ (आईडीएस), सामरिक बल कमान (एसएफसी) और पहली त्रिसेवा कमान, मुख्यालय अंडमान और निकोबार कमान (एएनसी), इन सभी के मुख्यालय स्थापित करने का फैसला लिया गया था। त्रिसेवा के अतिरिक्त शक्तियों का प्रतिनिधिमंडल 15 अगस्त 2001 को लागू कर दिया गया था। सेवाओं में अग्रणी रहने वाले अधिकारियों की आयु सीमा कम करने का भी फैसला लिया गया था। एवी सिंह कमेटी की स्थापना की गई थी और अतिरिक्त चयन रैंक रिक्तियों की रिहाई के साथ एक पूर्ण कैडर समीक्षा की माँग की गई थी, इसे अंततः 2004 में निष्पादित किया गया था जब एनडीए– 1 सरकार सत्ता में नहीं रह गई थी। यह परिवर्तनीय सुधारों की गति थी जो मानसिक रूप से दबाव था।

मेरी राय में पाकिस्तान के राष्ट्रपति मुशर्रफ का अस्थायी रूप से हृदय परिवर्तन वाजपेयी रणनीति की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक था। शायद उनके स्वर्गवास से पहले,  सन 2003 में जब उनकी सरकार थी, बड़ी विकट समस्या खड़ी हो गई थी। उस वर्ष 18 अप्रैल को कश्मीर की यात्रा के दौरान, वाजपेयी ने पाकिस्तान और लोगों के साथ संवाद के माध्यम से जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को हल करने के अपने प्रसिद्ध सिद्धान्त को रेखांकित किया था। शब्द “इंसानियत के दायरे में” तेजी से और स्पष्ट रूप से गूंज उठे, जिनसे उन्हें जम्मू-कश्मीर के लोगों का भरपूर प्रेम मिला, यह एक ऐसा स्तर था जिस पर शायद ही कोई भारतीय प्रधानमंत्री कभी पहुँच सके। इससे एक अति भावकु सिंहनाद गूंजा- ‘इंसानियत, जम्हूरियत, कश्मीरियत’, तीन सिद्धांत जिनके द्वारा भारतीय राज्य जम्मू-कश्मीर में शांति की मांग की गई। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस 2018 पर लाल किले की प्राचीर से अपने भाषण में भी इसे दोहराया।

26 नवंबर 2003 का युद्धविराम हमेशा से एकपक्षीय माना जाता है, लेकिन अगर वाजपेयी की तरफ से पर्याप्त सकारात्मक संकेत नहीं दिया गया होता तो मुशर्रफ द्वारा यह कभी भी प्रस्तुत नहीं किया गया होता। यह भारत के लिए उनके जीवन से भी बड़ी बात थी कि उन्होंने मुशर्रफ को आश्वस्त किया कि भारत शांति को लेकर अपने प्रयासों में ईमानदार रहेगा। उन्होंने अपने समकक्षों, जिन्होंने दुश्मन को ललकारने के लिए इनकार कर दिया था, के अनुभवी नेतृत्व का अनुभव किया था। वाजपेयी के व्यक्तित्व में छिपे कवि और दार्शनिक ने इन्हें स्वयं को भड़काऊ तथा महान प्रदर्शित करने की इजाजत नहीं दी। बीते हुए वर्षों में जैसे जैसे उनकी अभिव्यक्ति और जोड़बंदी मौन में बदलती चली गई, वैसे वैसे उनकी निर्णय लेने की क्षमता की स्थिरता बढ़ती गई, यह वास्तव में एक महान नेता का प्रतीक है। अंतिम भूमिका- सीमा परिवर्तन के बिना शांति-स्थापना के लिए पाकिस्तान के साथ एक संवाद प्रक्रिया प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के साथ कुछ समय तक चल सकती है। यह संभवतः एक काल्पनिक विचार था जो इनके समय से पहले भी प्रचलित था। एक बार मुंबई आतंकी हमला होने के बाद चार साल की गुप्त कूटनीति के बाद यह विचार समाप्त हो गया।

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी को कालक्रम के अनुसार एक रणनीतिक नेता के रूप में मील का पत्थर प्रदर्शित करने का मेरा इरादा कभी न था। फिर भी, एक बार शुरू होने के बाद ये विचार स्थिर नहीं रहे क्योंकि ये दिमाग में चल रहे थे। प्रतिष्ठित पूर्व प्रधान मंत्री अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन अपने पीछे कई यादें छोड़ गए हैं कि रणनीतिक नेतृत्व का वास्तव में क्या अर्थ होता है। उनकी उपलब्धियों के श्रेय के लिए अभी तक उचित न्याय नहीं किया गया है। शायद इसलिए, जैसा कि हमेशा अधिकांश मनुष्यों के साथ होता है, यह तो समय ही बताएगा कि क्या एक कवि, दार्शनिक, राजनेता और मानववादी – सभी एक साथ, प्राप्त कर सकता है यदि उनका देश उन्हें प्रधानमंत्री के पद के लिए चुनता है।

ईश्वर भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की आत्मा को शांति प्रदान करें। आपकी यादगारें आपके आभारी राष्ट्र के लिए ‘अमर’ बनी रहें।

लेखक भारत के श्रीनगर आधारित 15 सैन्य दलों के जनरल ऑफिसर कमांडिंग हैं और वर्तमान में विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन और इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज में शामिल हैं।