रक्षा
राफेल विमान पर राहुल गांधी के 36 विमानों और रिलायंस से संबंध जैसे प्रश्नों का उत्तर

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने राफेल के भारत आने के बाद फिर से वही प्रश्न दोहराए हैं जो वे कई बार पूछ चुके हैं व जिनके उत्तर अलग-अलग रूपों में दिए भी जा चुके हैं। फिर भी इस भ्रम को दूर करने के लिए बिंदुवार उत्तर-

1. प्रत्येक राफेल विमान की कीमत 526 करोड़ रुपये की बजाय 1,670 करोड़ रुपये क्यों?

526 करोड़ रुपये का आँकड़ा किस समय का और किन शर्तों के साथ का है, यह स्पष्ट है। सामान्य रूप से बीतते वर्षों के साथ कीमत बढ़ती है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यदि 2012 में भी सौदा होता तो भी भारत को हर विमान के लगभग 1,500 करोड़ रुपये देने होते। इसके बाद के वर्षों में कीमत कुछ और बढ़ी जिससे 2016 में 1,670 करोड़ रुपये पर यह सौदा हुआ।

यदि मूल्य की तुलना करनी है कि भारत ने विमान महंगे खरीदे या सस्ते तो इसके लिए अन्य देशों की समकालीन खरीद देखनी चाहिए जैसे कतर और इजीप्ट जिन्होंने क्रमशः प्रति विमान के लिए 29.2 करोड़ डॉलर और 24.6 करोड़ डॉलर दिए जबकि भारत ने 24.3 करोड़ डॉलर।

इसके अलावा यूपीए की तुलना में समझौते की शर्तें अलग भी हैं जो भारतीय वायुसेना के हित में हैं जैसे हथिार, रख-रखाव और प्रशिक्षण के साथ विमान में भारत-विशेष अद्यतन भी होंगे। साथ ही 50 प्रतिशत ऑफसेट का प्रावधान है, यानी डसॉ इससे जितना कमाएगा उसका आधा भारत में स्थानीय रूप से रक्षा विनिर्माण में निवेश करना होगा।

2. दूसरा प्रश्न है कि 126 की बजाय 36 विमान ही क्यों खरीदे?

पहले यह स्पष्ट हो कि यूपीए के समय जो 126 विमान खरीदे जाने वाले थे, उनमें से 18 ही फ्रांस से बनकर आते और शेष 108 एचएएल में बनाए जाते। इस प्रकार भारत को 18 ही नए विमान तुरंत मिल पाते क्योंकि शेष को बनने में समय लगता।

जब मोदी सरकार सत्ता में आई तब विमानों की स्क्वाड्रन संख्या आवश्यक से कम हो चुकी थी, ऐसे में आवश्यकता थी कि जल्द से जल्द नए विमान जोड़े जाएँ इसलिए 36 विमानों की खरीद का निर्णय लिया गया, दूसरी ओर भारतीय वायुसेना ने भारत में निर्माण किए जाने वाले विमानों की खरीद की भी तैयारी शुरू कर दी है।

अगर प्रश्न यह है कि पूरे 126 ही फ्रांस से क्यों नहीं ले लिए गए तो इसका उत्तर है कि भारत सरकार के पास इतनी राशि उपलब्ध नहीं है जैसा स्वयं यूपीए काल के रक्षा मंत्री एके एन्टनी कह चुके हैं।

3. एचएएल की बजाय दिवालिया अनिल को 30,000 करोड़ रुपये का अनुबंध क्यों दिया गया?

एचएएल का अनुबंध में नाम तब था जब भारत में राफेल बनाए जाने का सौदा किया जा रहा था लेकिन वर्तमान सौदे में सभी 36 विमान सीधे फ्रांस से आए हैं। इसके अलावा डसॉ की ऑफसेट डील में डीआरडीओ और एचएएल जैसी सरकारी कंपनियों के अलावा कई निजी कंपनियों को चुना गया है जिसमें से रिलायंस एक है।

डसॉ भारत में अपने साझेदार चुनने के लिए स्वतंत्र था व रिलायंस समेत कुल 25 कंपनियाँ चुनी गई हैं। इससे पहले 2012 में भी डसॉ मुकेश अंबानी की रिलायंस के साथ एक समझौता कर चुका है और तब यूपीए का ही शासन था।