रक्षा
क्वाड में चीन के विरुद्ध खड़े होने में भारत एक महत्त्वपूर्ण कड़ी क्यों

ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और यूनाइटेड स्टेट्स (यूएस) के चतुष्कोणीय समन्वय क्वाड को भारत कितना दे सकता है, उसकी सीमाएँ हैं। लेकिन हाल ही में प्रकाशित फाइनेन्शियल टाइम्स का एक लेख दावा करता है कि कोविड वैश्विक महामारी ने उजागर कर दिया है कि इस समूह में नई दिल्ली एक कमज़ोर कड़ी है।

हालाँकि, साक्ष्य इस बात की पुष्टि नहीं करते हैं। टीकों का निर्यात करने में भारत की “विफलता” ने चीन का सामना करने में क्वाड की अक्षमता को उजागर किया और चीन इस बात का लाभ उठा रहा है, लेख कहता है। लेकिन यह तर्क त्रुटिपूर्ण है।

भारत द्वारा टीका निर्यात में जो रुकावट आई है, वह देश में कोविड की खतरनाक दूसरी लहर के कारण हुआ जिसने सिर्फ कुछ समय के लिए निर्यात बाधा खड़ी की है। भले ही भारत द्वारा टीका निर्यात न कर पाने से चीन के लिए एक स्थान खुला है जिसका लाभ उठाकर वह अपने टीके का निर्यात कर रहा है।

लेकिन उपरोक्त तर्क यह बात भूल जाता है कि भारत द्वारा टीका निर्यात पर रोक लगाए जाने से पहले भी बीजिंग भारी मात्रा में टीकों का निर्यात कर रहा था। माँग और आपूर्ति में जो अंतर था, वह चीन के लिए पहले भी स्थान छोड़ रहा था क्योंकि कोई भी देश अकेले ही माँग पूरा करने में समर्थ नहीं है।

दूसरी लहर के आने से पहले भारत टीकों का निर्यात कर रहा था और कुछ समय बाद यह पुनः आरंभ कर दिया जाएगा। कई देश जो पिछले कुछ महीनों में विकल्प के अभाव में चीनी टीके खरीद रहे थे, वे भारत का विकल्प खुलते ही पुनः उससे टीके खरीदेंगे।

जब चीनी और भारतीय टीके, दोनों बाज़ार में होंगे तो कई देश चीनी टीके की कम प्रभावकारिता, पारदर्शिता की कमी और चीन की आरोपित माँगें, जैसा पैरागुए के मामले में हुआ, के कारण भारतीय टीके को चुनेंगे। क्वाड के लिए नई दिल्ली मोर्चा तानकर खड़ा रहा और विश्व को टीका आपूर्ति करने में चीन को प्रतिस्पर्धा देता रहा।

भारत से टीका निर्यात (जनवरी 2021)

भारत ने ताइवान के साथ भी काम किया, उस समय जब वॉशिंगटन ने निर्यात से मना कर दिया था और आपूर्ति का भंडारण घरेलू उपयोग के लिए कर रहा था, ऐसे में वैश्विक स्तर पर महामारी से लड़ने में यूएस विफल हुआ है। भारत क्वाड की कमज़ोर कड़ी नहीं है, बल्कि इसने चीन की आक्रामकता को उत्तर देने में तत्परता दिखाई है।

पहला, भारत ही क्वाड का एकमात्र ऐसा देश है जो सैन्य स्तर पर भी चीन का सामना कर रहा है। महामारी के बीच पिछले वर्ष मई में शुरू हुआ तनाव अभी तक जारी है और कड़ी ठंड में भी भारतीय सेना पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन के विरुद्ध खड़ी रही।

जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसा में भारतीय जवानों ने अपना रक्त बहाया था जिससे दशकों में किसी युद्ध में पहली बार चीन के सैनिकों ने भी प्राण गवाएँ। उसके कुछ महीनों बाद भारत ने कैलाश पर्वत शृंखला की रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण चोटियों पर भी कब्ज़ा कर लिया था।

इसपर भारतीय सेना की उत्तरी कमांड के कमांडर-इन-चीफ महाधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल वाईके जोशी कहते हैं कि दोनों देश युद्ध के काफी निकट पहुँच गए थे। आज भी टैंक, सशस्त्र बख्तरों और तोपों के साथ लगभग 60,000 भारतीय सैनिक लद्दाख में तैनात हैं।

भारतीय सेना ने यह संकेत भी दे दिया है कि उसे इन सैनिकों को वापस भेजने की कोई जल्दी नहीं है। डोकलाम संकट के समय भी भारत ने इसी प्रकार से उत्तर दिया था। भूटान में स्थित डोकलाम तीनों देशों की सीमा पर स्थित है लेकिन चीन इसपर अपना दावा करता है।

2017 में जब इस क्षेत्र में पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने सड़क बनाने का प्रयास किया तो भारतीय सैनिकों ने भूटान में घुसकर हस्तक्षेप किया और चीनी निर्माण गतिविधि को रोककर कड़ा संदेश दे दिया।

दक्षिण चीन सागर में कृत्रिम द्वीपों पर बीजिंग सैन्य बेस बना रहा है लेकिन पूर्वी एशिया में यूएस सहयोगियों ने कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी है, वहीं नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि चीनी आक्रामकता और सीमा पर यथास्थिति बदलने के उसके प्रयासों को चुनौती दी जाएगी।

दक्षिण चीन सागर में एक कृत्रिम द्वीप पर सैन्य बेस

दूसरा, चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का विरोध करने वाला पहला देश भारत था जिसने इस परियोजना में पारदर्शिता की कमी और दूसरे देशों को ऋण के जाल में फँसाने के चीनी उद्देश्य पर प्रश्न खड़े किए थे। वॉशिंगटन और ब्रुसेल्स के इसके प्रति सजग होने से काफी समय पहले भारत यह कर चुका था।

2017 में चीन द्वारा आयोजित बीआरआई सम्मेलन में प्रतिभाग न करने वाला एकमात्र बड़ा देश भी भारत ही था। यहाँ तक कि यूएस ने भी एक उच्च-स्तर के प्रतिनिधि-दल को आयोजन में भेजा था जिसका नेतृत्व राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में एशिया के तत्कालीन वरिष्ठ निदेशक मैथ्यू पॉटिंगर कर रहे थे।

कुछ वर्ष पहले तक जहाँ यूएस, ऑस्ट्रेलिया और जापान बीआरआई के मुद्दे पर मौन साधे हुए थे, वहीं भारत ने इसके विपरीत कड़ी आलोचना दर्ज की थी। मई 2017 में भारत ने वैश्विक संयोजकता को अपना समर्थन देते हुए चीन से सही तरीके अपनाने के लिए कह दिया था लेकिन सकारात्मक उत्तर के अभाव में भारत सम्मिलित नहीं हुआ।

तीसरा, चीनी ऐपों पर वार करने में भारत ही प्रणेता रहा था। माना जाता है कि ये चीनी ऐप ग्राहकों का डाटा इकट्ठा करके चीनी प्राधिकरणों को सौंपते हैं जो उनका किसी भी तरह से लाभ उठा सकते हैं। इस प्रकार के साक्ष्यों को देखते हुए भारत ने इन ऐपों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना।

टिकटॉक समेत 170 से अधिक चीनी ऐपों पर प्रतिबंध लगाया गया। इन ऐपों पर भारत में 20 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपभोक्ता थे दो चीन के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। भारत की इस कार्रवाई के बाद अन्य देश भी इन ऐपों की जाँच कर रहे हैं व प्रतिबंध लगा रहे हैं।

चौथा, 2020 में भारत ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी को छोड़ दिया। कई वर्षों तक भारत ने इस साझेदारी पर चर्चा की थी जिसमें चीन पर निर्भरता को कम किया जा सके। भारत को चीन से काफी बड़ा व्यापार घाटा होता है और चीन की शर्तों को न मानने का भारत का निर्णय सही लगता है।

पाँचवा, भारत ने सुरक्षा चुनौतियों पर क्वाड साझेदारों के साथ मिलकर काम करने पर तत्परता दिखाई है। इसमें भारतीय महासागर में समुद्री सुरक्षा भी सम्मिलित है जहाँ बाहरी कारकों से प्रभावित हुए बिना पिछले कुछ वर्षों में भारत ने यूएस, ऑस्ट्रेलिया, जापान और फ्रांस के साथ कई गतिविधियाँ आयोजित की हैं।

अन्य देशों के साथ मिलकर आवश्यक रसद के सहयोग एवं समुद्री जागरूकता को बढ़ाना और नियमित रणनीतिक वार्ताएँ भी भारत ने की हैं। मालाबर नौसैनिक अभ्यास में पिछले वर्ष यूएस और जापान के साथ ऑस्ट्रेलिया भी सम्मिलित हुआ था।

चार दशकों में चीन के साथ सबसे बड़े सैन्य गतिरोध के बीच भारत ने चतुष्कोणीय रूप से युद्ध की तैयारी की। संसाधनों में चीन से पीछे होने के बावजूद भारत चीनी आक्रामकता को उत्तर देने से पीछे नहीं हटा और बीजिंग के समक्ष खड़ा होकर अपने हितों की रक्षा कीं।