भारती / रक्षा
पैंगॉन्ग सो झील के उत्तर व दक्षिण में भारत और चीन की सेनाएँ कैसे हटेंगी पीछे

पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन की सेनाओं का आमना-सामना लगभग नौ माह पहले समाचारों में आया था और तब से विभिन्न उकसावों के बीच तनातनी जारी थी लेकिन अब जाकर दोनों देश पैंगॉन्ग सो झील के उत्तरी और दक्षिणी तट से पीछे हटने के लिए तैयार हुए हैं।

अप्रैल 2020 में पैंगॉन्ग सो झील के उत्तर में फिंगर 4 से लेकर फिंगर 8 के बीच के क्षेत्र पर चीनी सैनिकों ने कब्ज़ा कर लिया था। चीनी सेना अप्रैल से पहले फिंगर 8 के पूर्व में स्थित शिविर (सिरिजाप कॉम्प्लेक्स के निकट) पर रहती थी।

चैंग चेनमो शृंखला से निकलते हुए पर्वत-स्कंध पैंगॉन्ग सो झील के उत्तरी तट तक लंब रूप से जाते हैं जिन्हें भारतीय सेना ने ‘फिंगर’ का नाम दिया हुआ है। नीचे दिए हुए मानचित्र में आप इन फिंगर को 1 से 8 की संख्या में अंकित देख सकते हैं जिस नाम से ये जाने जाते हैं।

भारत का दावा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) फिंगर 8 से होकर गुज़रती है जबकि चीन कहता है कि एलएसी फिंगर 2 के निकट है। 1990 के दशक के अंत में पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने पैंगॉन्ग सो झील के किनारे-किनारे फिंगर 4 तक वाहन-योग्य सड़क बना दी थी।

फिंगर 4 के पश्चिम तक भारत स्थाई रूप से तैनात है, वहीं चीन फिंगर 4 से फिंगर 8 तक के भाग में गश्त करता था लेकिन पैंगॉन्ग सो झील के उत्तर में स्थित इस 8 किलोमीटर लंबे क्षेत्र पर दोनों में से किसी की भी स्थाई उपस्थिति नहीं रहती थी।

लेकिन अप्रैल 2020 के बाद फिंगर 4 से फिगर 8 के बीच चीनी सैनिकों ने काफी संख्या में वहाँ डेरा डाल दिया। भारतीय गश्ती दल जो पहले फिंगर 8 तक जाया करता था, वह अब फिंगर 4 के पार नहीं जा पा रहा था। इस प्रकार फिंगर 4 से फिंगर 8 तक के बीच के क्षेत्र व इससे लगी पहाड़ियों पर चीन का नियंत्रण हो गया।

तब से चीनी सेना फिंगर 4 की चोटी पर डटी थी और भारतीय सेना फिंगर 3 के निकट उनसे थोड़ी ऊँँचाई पर जम गई थी।

आज केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में जो पीछे हटने की बात कही है, उसके तहत भारतीय सेना फिंगर 3 के निकट अपने शिविर, जिसे धन सिंह थापा पोस्टा या भारत-तिब्बत सीमा पुलिस पोस्ट के नाम से भी जाना जाता है, पर रहेगी जो वर्तमान में उनकी तैनाती से अधिक दूर नहीं है।

वहीं, दूसरी ओर पीएलए फिंगर 4 से फिंगर 8 के बीच का क्षेत्र खाली करेगी, पिछले नौ महीनों में इसने वहाँ जो संरचनाएँ बनाई हैं, उन्हें ध्वस्त करेगी और अपनी सेना को फिंगर 8 के पूर्व में तैनात करेगी।

भारत और चीन दोनों ही फिंगर 4 से फिंगर 8 के बीच अपना गश्ती दल तब तक नहीं भेजेंगे जब तक इस मामले पर कोई सहमति नहीं बन जाती है।

भारतीय और चीनी सेनाएँ पैंगॉन्ग सो के दक्षिणी तट (जिसे चुशिल सब-सेक्टर भी कहा जाता है) से भी पीछे हटेंगी। यही वह क्षेत्र है जहाँ भारतीय सेना और स्पेशल फ्रंटियर फोर्स ने मिलकर 29-30 अगस्त की मध्यरात्रि को कैलाश पर्वत शृंखला की सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया था।

इन चोटियों पर तैनात रहने से भारतीय सेना को स्पैंगुर झील के निकट स्थित चीनी शिविर और चीनी बेस समेत पूरे क्षेत्र पर नज़र रखने का लाभ मिला।

इससे न सिर्फ सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्पैंगुर गैप में भारत का नियंत्रण हो गया, जिसका उपयोग चीन कर सकता था लेह की ओर चुशुल बोल में सशस्त्र घुसपैठ करने के लिए, बल्कि इससे स्पैंगुर गैप के आसपास स्थित चीनी शिविर और उनके संचार साधन भी भारत के दायरे में आ गए जहाँ ऊँचाई से भारत उन्हें निशाना बना सकता था।

कैलाश पर्वत शृंखला के पश्चिम में स्थित चुशुल घाटी तक स्पैंगुर गैप से पहुँचा जा सकता है क्योंकि बीच में लगभग 3 किलोमीटर तक पर्वत नहीं हैं। झील के आसपास और चुशुल बोल में समतल भूमि के कारण वहाँ टैंक और सशस्त्र सैनिक कैरियर के साथ तैनाती की जा सकती है।

हालाँकि रक्षा मंत्री ने पैंगॉन्ग सो के दक्षिणी क्षेत्र में कैसे पीछे हटा जाएगा इसका विवरण साझा नहीं किया है लेकिन कई रिपोर्टों का दावा है कि दोनों पक्ष सबसे पहले शस्त्रों की तैनाती पीछे लेकर क्षेत्र में तनाव कम करने की पहल करेंगे।

अगस्त 2020 में भारत ने जिन चोटियों पर कब्ज़ा किया था, उनमें से कुछ पर टैंक तैनात किए गए थे। पैंगॉन्ग सो झील के दक्षिण में कुछ स्थान ऐसे भी थे जहाँ भारतीय और चीनी टैंक एक-दूसरे से मात्र कुछ सौ मीटर की दूरी पर तैनात थे।

पैंगॉन्ग सो झील के उत्तर में चीन ने जिस क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया था, वहाँ से वह पीछे नहीं हट रहा था। ऐसे में अगस्त में भारत ने सैन्य कार्रवाई के तहत चुशुल सब-सेक्टर में अपना प्रभुत्व स्थापित किया और जून में हुई गलवान घटना के बाद से पीएलए पर अविश्वास के कारण भारत ने अपना कब्ज़ा नहीं छोड़ा था।