रक्षा
जम्मू और कश्मीर: सर्दियों से पहले आया हिंसक मोड़

प्रसंग 
  • यह आम धारणा है कि सर्दियों का समय जम्मू और कश्मीर के लिए शांत अवधि होता है जिसे खत्म किया जाना चाहिए।
  • बल्कि, श्रीनगर में सरकार के ना होने से अलगाववादियों, आतंकवादियों और इनके राज्य के कट्टर समर्थकों को बड़ा मौका मिल रहा है।

जब स्थानीय निकाय चुनाव का पहला चरण मतदाता और व्यापक राजनेताओं की भागीदारी के संबंध में सफल नहीं हुआ, कम से कम हिंसा के स्तर को काबू रखा जा सका। इसलिए यह विरोदभास है कि निकाय चुनावों के परिणामों की घोषणा के दो दिन बाद ही जम्मू और कश्मीर में हिंसक झड़पें हुई। सर्दियाँ आने से पहले का समय ऐसा होता है जब हिंसा के मामले बढ़ जाते हैं, हिंसा के संदर्भ में थोड़ा स्पष्टीकरण जरूरी है जिसमें इसके घाटी में किसी के भी खुश नहीं होने के प्रभाव का आंकलन किया जा सके। कुल सात स्थानीय, तीन आतंकवादी, तीन जवान और एक पुलिस का सिपाही (असपष्ट) को एक ही दिन में कई जगह हुई वारदातों में अपनी जान गवानी पड़ी, लेकिन हर किसी में एक संदर्भ है जिसे समझने की जरूरत है।

कुलगाम जिले के लारू गाँव में, 20 अक्तूबर 2018 को सुरक्षा बालों द्वारा नियमित खुफिया आधारित प्रतिक्रिया में जैश-ए-मुहम्मद के तीन आतंकवादियों को मार गिराया गया। साथ ही सुरक्षा बल जब वापस आ रहे थे, छह स्थानीय लोग एंकाउंटर की जगह पहुंचे तो वहाँ अप्रत्याशित दुश्मनों की वजह उनको भी जान गवानी पड़ी। मिरवाज़ उमर फारूख ने घटना की निंदा करते हुए सुरक्षा बलों को दोषी ठहराते हुए कोई प्रासंगिक स्पष्टीकरण नहीं दिया। अलगाववादी नेता होने के नाते उन्हें यह समझना चाहिये था कि ऐसा नहीं करने और लोगों को आगाह नहीं करने से वह भविष्य में ऐसी और घटनाओं को आपराधिक तरीके से बढ़ावा दे रहे हैं।

यह समझने की ज़रूरत है कि काउंटर टेरर ऑपरेशन में एक समूह के घेरे में संदिग्ध घरों और आतंकवादियों के अड्डों को चिन्हित करना शामिल होता है। इसके बाद किसी के भी प्रवेश के बिना सैन्य निराकरन संभव है लेकिन इसपर भी तब जब स्थानीय और निर्दोष लोगों को हटा दिया गया हो। अनिवार्य रूप से, आतंकवादियों को आत्मसमर्पण करने का एक मौका दिया जाता है, लेकिन वह इस विकल्प को अक्सर नहीं लेते हैं। फिर आतंकवादियों को मार गिराया जाता है जब वह सुरक्षा बलों पर हमला करने की कोशिश करते हैं।

जिस घर में आतंकवादियों ने पनाह ली होती है वो आग पकड़ने की प्रवृति की वजह से जल सकता है, बड़ी तादाद में क्षति होने से रोकने के लिए अग्निशमनकर्मी कभी-कभी इसमे शामिल हो जाते हैं। मामला ठंडा होने के बाद, अवशेषों और विस्फोटकों की खोज शुरू होती है, इस दौरान सुरक्षा बल क्षेत्र को अपने घेरे में ले लेते हैं। यह खोज घातक है क्योंकि आतंकवादियों के पास बहुत बड़ी संख्या में ग्रेनेड्स और दूसरे विष्फोटक होते हैं जो फटते तो नहीं हैं लेकिन अगर घर ने आग पकड़ ली हो तो ज़्यादा गर्मी की वजह से क्रियाशील हो जाते हैं।

जैसा कि ऊपर बताया गया है, वह कॉपी बुक ऑपरेशन का विवरण है। अब सोचिए कि 2015 के बाद से पर्यावरण की अस्थिरता की वजह से क्या स्थिति रही होगी। अलगाववादियों ने स्थानीय लोगों को मुठभेड़ की जगह जाने और सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने और आंदोलन में उलझाने के लिए उकसाया जिससे वह अपना काम नहीं कर सकें और इसका फायदा उठाकर आतंकवादी भाग जाएँ। जब ध्यान में क्षणिक नुकसान होने से बहुत बड़ी तादाद में लोग हताहत होते हैं, तो इससे सुरक्षा बलों का ध्यान भंग हो जाता है।

चरम परिस्थितियों में सुरक्षा बलों के द्वारा और सुरक्षा खतरों को महसूस करते हुए और आत्मसुरक्षा की वजह से कई बार भीड़ पर काबू पाने के लिए गोलीय चलायी गयी जिससे नागरिक हताहत हुए। जब ऐसे ऑपरेशन खत्म हुए तो भीड़ जले हुए घरों में घुसने की कोशिश करती है जिससे वह अवशेषों को अंतिम संस्कार के लिए ले जा सके और चरम भावनाओं को उत्तेजित कर और ज़्यादा स्थानीय युवाओं को अपने साथ मिला सके। ऐसे खतरे के दौरान सुरक्षा बलों को अवशेषों और विस्फोटकों की खोज करने के बजाय कई बार जल्दबाज़ी में पीछे हटना पड़ता है जिससे नागरिक हताहत नहीं हों। अगर बड़ी तादाद में भीड़ सुलगते हुए घर के अहाते में पहुंचने में कामयाब हो जाती है तो वह विष्फोटकों के प्रभाव के कारण हताहत होने के बड़े खतरे में होते हें। इसी तरह से ऐसी घटनाएँ होती हैं।

सीधी-साधी स्थानीय जनता को अलगाववादी कभी भी ऐसे ऑपरेशन से दूर रहने की सलाह नहीं देते; सिर्फ स्थानीय पुलिस ही इस तरह का संवेदीकरण जगाने की कोशिश करती है लेकिन इसका कोई असर नहीं होता है। अलगाववादी नेताओं के द्वारा की गयी अपील को ज़्यादा अहमियत दी जाती है लेकिन उनके इरादों में तो हताहतों की तादाद में इजाफा करना होता है जो उनके उद्देश्य में मदद करे, उनकी राष्ट्र विरोधी धारणाएँ को बल मिले और उनके उग्र आंदोलन ज़्यादा से ज़्यादा युवाओं को आकर्षित करे। इससे उनके इरादे राष्ट्र-द्रोह से भी ज़्यादा घातक हो जाते हैं क्योंकि इसमे जनता की सुरक्षा और जान के साथ खिलवाड़ किया जाता है।

दूसरी हिंसक घटना अशांत तरल तहसील में हुई। यह पूरी तरह से ‘हबड़-तबड़’ ऑपरेशन था, जो निकाय चुनावों से बाद अपने नंबर बढ़ाने के लिए किया गया था। इसमे एक सुरक्षित दूरी से सुरक्षा बल पर सीधी फ़ाइरिंग की गयी जिसमे एक पुलिसकर्मी मारा गया। इस तरह के ऑपरेशन घाटी में अक्सर होते रहते हैं, तरल तो इसके लिए जाना जाता है। इसमे कई सामरिक, भू-संबंधी और जनसंखकीय कारण हैं जो कश्मीर में जाने जाते हैं, लेकिन तरल के मामले को सुलझाना कहीं पर पीछे छूट गया। शायद इसे राष्ट्रीय राइफल्स की उस तरह के ऑपरेशन की ज़रूरत है जिसमे गहन और बहुत ही नई शृंखला शामिल थी जो उन्होने उत्तर कश्मीर के राजवर और हफरुदा के हिंसक और उतने ही अशांत जंगलों में चलाया था।

तीसरी घटना में पहले की घटनाओं की तरह कोई हताहत नही हुआ लेकिन यह उतनी ही गंभीर है। इसमे पुलवामा में आर्मी की गाड़ी (माइन प्रोटेकटेड डिवाइस, एमवीपी) को आईडी विस्फोटक से उड़ा दिया गया था। इसमे चिंता की बात यह थी कि कश्मीर में आईडी लंबे समय से नहीं मिला था। 2008 के बाद से कुछ विचित्र लेकिन अव्यवसायिक प्रयास हुए। हालांकि एमवीपी को आईडी से उड़ाना आतंकवादियों में इसके विशेषज्ञों की वापसी का संकेत देता है और ऐसा कुछ नहीं है जो हाल-फिलहाल के भविष्य के ललिए अच्छा है। अभी भी कश्मीर को वहाँ आत्मघाती दस्ते नहीं होने के लिए आभारी होना चाहिए। इस तरह के बम्ब विस्फोट अपने लक्ष्य को देखते हुए पश्याताप से परे हो सकते हैं। जनता ही इस तरह की घटना से और कट्टरपंथी धर्म के जुनून में शामिल होने से बचाव कर सकती है। साथ ही सुरक्षा बलों की ज़िम्मेदारी है कि जनता के संवेदीकरण की रक्षा करे, जो सुरक्षा बलों को खुद को सबसे ज़्यादा प्रभावित करेगी।आखिरी घटना उतनी ही महत्वपूर्ण है और ऐसी जगह से संबन्धित है जो घाटी से दूर है; अखनूर सैक्टर के सुंदरबानी क्षेत्र के पीर पंजाल में। हालांकि इसका विवरण अभी मौजूद नहीं है, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जेके लाइट इन्फेंट्री के तीन भारतीय सैनिक गश्त के समय लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल पर पाकिस्तानी बॉर्डर एक्शन टीम की एक और कार्यवाही के दौरान मरे गएI विरोदाभासी रिपोर्टों के अनुसार यह एक काउंटर घुसपैठ का ऑपरेशन था जो गलत दिशा में कार्यरत होने से खुद ही के सैनिक हताहत हुएI किसी भी तरह और गलत कारणों की वजह से एलओसी समाचारों में वापस बनती हुई नज़र आ रही हैI पाकिस्तान इस बात से आश्वस्त नही है कि हाल के नगरपालिका चुनावों में घाटी के निचले इलाकों में शांति के संकेत भेजने के लिए पर्याप्त अशान्ति थीI इसी वजह से कश्मीर में अपनी दिलचस्पी को दिखाने के लिए घाटी में किसी भी बड़ी हिंसक घटना नहीं होने के दौरान ऑपरेशन कियाI

सुरक्षा बलों द्वारा बचाव सञ्चालन जिसके परिणामस्वरूप आतंकवादी तटस्थता को आतंकवाद की शुरुआत की घटनाओं के रूप में नहीं माना जाता है I पंचायत चुनावों में दबाव बनाये रखने का सोचा-समझा प्रयास लगता है I इससे एक बात तो साफ़ हो गयी है कि पकिस्तान में वित्तीय किल्लत का प्रभाव और इमरान खान की सरकार के आने से देश की अवस्था के दृष्टिकोर्ण में कोई फर्क नहीं पड़ा हैI भारत को एलओसी में घटना की प्रकृति का पता लगाने के लिए मारे गये पाकिस्तानियों के शवों की पहचान करना आवश्यक है I सर्दियों में एलओसी पर गतिविधियाँ बाद जाती हैं और अगर स्थितियां  बनती हैं तो सेना की एलओसी क्षमता को फिर से इम्तेहान देना पड़ता है; इसमें राजनितिक रंग नही होना चाहिए I आम धरना के अनुसार जैसे ही सर्दियाँ शुरू होती हैं ठण्ड में जम्मू और कश्मीर में शांति हो जाती है, ये दिमाग से निकाल देना चाहिए I मेरा अनुभव हमेशा यही रहा है कि श्रीनगर में सरकार की अनुपस्थिति में अलगाववादियों, आतंकवादियों, और उनके कट्टर समर्थकों को एलओसी/सीमा के उस पार भी बहुत अवसर मिल जाते हैं I इसपर रोक लगाने के लिए तीरों से भरे तरकश की आवश्यकता हैI

हालाँकि, जहाँ बढती हिंसा की व्यवहार्यता के लिए सुरक्षा बलों को सजग रहना चाहिए, वहीँ यह राज्यपाल के प्रशासन को अपनी क्षमता दिखाने का और जम्मू और कश्मीर में सर्दियों में शांत माहौल बनाने का अवसर प्रदान करता है I जबकि संचार व्यवस्था खराब है, फिर भी तीन उप क्षेत्रों के लोगों के बीच कुछ भौतिक ‘मन मिलाने’ की गुंजाईश है I इसके लिए तकनीक को इस्तेमाल करना चाहिए जिसमे नित्य विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग मीटिंग के ज़रिये आपसी डर को खत्म करना शुरू किया जा सके I यह समय जब परिवार लम्बी रातों में घरों होते हैं टीवी पर पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए, जो यह बताने में मदद करे कि कैसे एक भारतीय होने के नाते कश्मीरियों ने सबकुछ पाया है I

लेखक भारत के श्रीनगर स्थित 15 कोर्प्स के पूर्व गिओसी हैं, और विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन और थे इंस्टिट्यूट ऑफ़ पीस एंड कनफ्लिक्ट स्टडीज से सम्बद्ध हैं I