रक्षा
भारतीय नौसेना समुद्री निगरानी और पनडुब्बी-रोधी क्षमताएँ कैसे बढ़ा रही है

“शांति काल में पसीना बहाकर युद्ध काल में रक्त बचाया जा सकता है।”- ऐसी कहावत तो आपने बहुत सुनी होगी लेकिन भारतीय नौसेना कुछ ऐसा ही कर रही है। उपग्रह चित्र (सैटेलाइट इमेज) दर्शाते हैं कि संभव है कि ग्रेट निकोबार द्वीप की कैम्पबेल खाड़ी में स्थित नौसैनिक वायु स्टेशन- आईएनएस बाज़ की 3,400 फीट लंबी हवाई पट्टी का विस्तार किया जा रहा हो।

2012 में तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल निर्मल वर्मा ने आईएनएस बाज़ को नियुक्त किया था जो भारतीय सैन्य बलों को सबसे दक्षिण में स्थित वायु स्टेशन हुआ। यह बेस सिक्स-डिग्री चैनल पर दृष्टि रख सकता है जो विश्व के सबसे व्यस्त शिपिंग मार्गों में से एक है।

भारतीय महासागर को दक्षिण चीन सागर और प्रशांत महासागर से जोड़ने वाले समुद्री संकीर्ण मार्ग मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने से यह बेस मात्र 130 समुद्री मील (240 किलोमीटर) दूर स्थित है। चीन का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात दक्षिण चीन सागर में मलक्का जलडमरूमध्य से गुज़रकर आता है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की राजधानी- पोर्ट ब्लेयर से यह बेस 300 समुद्री मील (556 किमी) की दूरी पर स्थित है। ट्विटर पर एक स्वतंत्र खुफिया खाते @detrasfa_ द्वारा साझा किए गए उपग्रह चित्र दर्शाते हैं कि संभवतः इस नौसैनिक वायु स्टेशन का रनवे 900 फीट बढ़ाया गया हो जिससे अब इसकी कुल लंबाई लगभग 4,300 फीट हो गई है।

जब 2012 में इस रनवे को खोला गया था तब इसकी लंबाई लगभग 3,500 फीट (1,060 मीटर) थी और भारतीय नौसेना ने कहा था, “रनवे को प्रगतिशील रूप से लंबा किया जाएगा ताकि भारी विमान सहित हर प्रकार के विमानों को अबाधित परिचालन किया जा सके।”

“इस बेस (आईएनएस बाज़) आधुनिक वायुक्षेत्र उपकरणों और नौपरिवहन सुविधाओं से भी लैस किया जाएगा।”, उस समय भारतीय नौसेना ने कहा था। योजना थी कि अगले ही वर्ष रनवे को 6,000 फीट और उसके अगले वर्ष 10,000 फीट लंबा कर दिया जाएगा।

हालाँकि बेस की नियुक्ति के बाद हाल के वर्षों में रनवे का विस्तार नहीं किया गया। इस कारण से यह नौसैनिक वायु स्टेशन सिर्फ हल्के विमानों का परिचालन कर सकता था जो छोटे क्षेत्र में अभियान चला सकते हैं। कहा जाता है कि भूमि अधिग्रहण व पर्यावरण अनुमति जैसे मुद्दों के कारण रनवे के विस्तार का काम विलंबित हुआ।

2019 में इसकी नियुक्ति के छह वर्षों बाद आई रिपोर्टों में कहा गया कि अभी नौसैनिक वायु स्टेशन के रनवे को 1,000 फीट लंबा किया जाएगा और बाद के चरणों में इसमें 6,000 फीट की लंबाई और जोड़ी जाएगी। अक्टूबर 2019 और फिर नवंबर 2020 में नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने आईएनएस बाज़ का दौरा किया था।

इन दौरों के बाद भारतीय नौसेना ने जारी बयानों में नौसैनिक वायु स्टेशन पर किसी विस्तार का कोई उल्लेख नहीं किया था। यदि आईएनएस बाज़ के रवने की लंबाई 6,000 फीट हो जाती है तो भारतीय नौसेना पी-8आई समुद्री निगरानी और शत्रुओं के निरीक्षण का परिचालन यहाँ से कर सकेगी।

आईएनएस बाज़ से उड़ान भरकर भारतीय नौसेना के पनडुब्बी-शिकारी विमान अनेक समुद्री संकीर्ण मार्गों पर दृष्टि रख सकते हैं जिनका उपयोग भारतीय महासागर में प्रवेश के लिए चीनी पनडुब्बियाँ कर सकती हैं। “रनवे विस्तार का काम पूरा होने के बाद कैम्पबेल खाड़ी में कुछ पी-8आई निगरानी विमानों को रखने की योजना है।”, 2017 में एक रिपोर्ट में कहा गया था।

इसके अलावा भारतीय नौसेना ने पिछले वर्ष जिन 24 लॉकहीड मार्टिन-सिकॉर्स्की एमएच-60आर बहु-उपयोगी हेलीकॉप्टर का आदेश दिया था, उनमें से तीन इस वर्ष के अंत तक मिलने वाले हैं। इसे नौसेना की पनडुब्बी-रोधी और निगरानी क्षमताएँ काफी बढ़ेंगी।

एमएच-60आर हेलीकॉप्टर

24 हेप्टर (हेलीकॉप्टर को सैन्य बोल-चाल में हेप्टर कहा जाता है) की आपूर्ति के लिए सरकार-से-सरकार में अनबंध का नाम ‘डेडली रोमियोज़’ है। 17,500 करोड़ रुपये का यह अनुबंध पिछले वर्ष की फरवरी में नई दिल्ली में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने से पूर्व सुरक्षा कैबिनेट समिति (सीसीएस) द्वारा स्वीकृत किया गया था।

‘डेडली रोमियोज़’ के जुड़ जाने से दो दशकों पहले सी-किंग 42/42ए हेलीकॉप्टर को हटाए जाने से जो कमी हुई थी, वह भर सकेगी। तब से भारतीय नौसेना बिना किसी सफलता के पिछले 15 वर्षों से बहु-उपयोगी हेलीकॉप्टरों को जोड़ने का प्रयास कर रही थी जो परिचालन के लिए बहुत आवश्यक होते हैं।

नौसेना के पनडुब्बी-रोधी या जहाज़-रोधी युद्ध का आधार बनेंगे ‘डेडली रोमियोज़’ और सैन्य बल को हवाई खतरों से पहले ही सावधान कर देंगे। दोहरे इंजन वाले ये हेप्टर एजीएम-114 हेलफायर मिसालइल, एके 54 टॉरपीडो और आधुनिक सटक शस्त्रों से लैस होंगे व विमान-रोधी कैरियर, विनाशक और लड़ाकू जहाड़ से परिचालन कर सकेंगे।

2024 के अंत तक 24 हेप्टरों का पूरा झुंड भारत को मिल जाएगा। भारतीय नौसेना का एक कर्मीदल जिसमें 15 अधिकारी हैं, ‘डेडली रोमियोज़’ का परिचालन प्रशिक्षण सोमवार (7 जून) को फ्लोरिडा स्थित लॉकहीड मार्टिन विनिर्माण सुविधा पर आरंभ कर चुके हैं।

वैश्विक महामारी के कारण प्रशिक्षण में देरी हुई लेकिन अब पूरी तत्परता के साथ यह शुरू हो, भारतीय नौसेना के शीर्ष अधिकारियों ने बताया। विदेशी सैन्य खरीद के माध्यम में से हुए इस समझौते में अतिरिक्त पुर्जों की आपूर्ति, वायु से हवा में मार करने वाले शस्त्रों का सहयोग और पाइलट व भूमि दल के प्रशिक्षण का उल्लेख है।

वर्तमान में यूएस में जो भारतीय नौसेना का दल प्रशिक्षण प्राप्त कर रहा है, वह पहले दो हेप्टर अगले माह में लेकर आएगा और तीसरा इस वर्ष के अंत तक पहुँचाया जाएगा। चौथी पीढ़ी के ये एमएच-60आर गहरे पानी में भारतीय नौसेना की क्षमताएँ बढ़ाएँगे और भारतीय महासागर क्षेत्र में उसकी भूमिका और महत्त्वपूर्ण बनाएँगे।

भारतीय नौसेना का पी-8आई

बोइंग के आधुनिक पी-8आई उन्नत समुद्री गश्त और पनडुब्बी-रोधी युद्धक विमान एमएच-60आर हेप्टर पनडुब्बियों को निशाना बनाने की नौसेना की क्षमताओं काफी विस्तार करेंगे। इसके अलावा नौसेना यूएस-आधारित जनरल अटॉमिक्स द्वारा बनाए गए 30 सशस्त्र एमक्यू-9बी सी गार्जियन ड्रोन लेने की प्रक्रिया में भी है।

ये ड्रोन नौसेना के बल में वृद्धि करेंगे और उन्नत शक्तियाँ की नौसेनाओं की श्रेणी में भारत को जोड़ देंगे। पिछले वर्ष नवंबर में भारतीय नौसेना ने यूएस से दो सी गार्जियन ड्रोनों को एक वर्ष की अवधि के लिए लीज़ पर लिया था। साथ ही भारत ने लॉकहीड मार्टिन से भी कहा है कि वे एमएच-60आर हेलीकॉप्टरों को ऐसा बनाएँ जिससे वे कम जगह घेरें।

इस प्रकार भारत को मिलने वाले एमएच-60आर में मुड़ने वाले मुख्य रोटर होंगे और उसकी पूँछ में भी जोड़ होगा। ये सभी परिवर्तन न्यूयॉर्क के ओवेगो और कनेक्टिकट के स्ट्रैटफोर्ड स्थित विनिर्माता की सुविधाओं में किए जाएँगे।

भारतीय नौसेना को जो पहले तीन ‘डेडली रोमियोज़’ मिलने वाले हैं, वे वास्तव में यूएस नौसेना के लिए बनाए गए थे और सिकॉर्स्की यूएच-60 ‘ब्लैक हॉक’ हेप्टरों का नौसैनिक संस्करण हैं व सिकॉर्स्की एस-70 वंश के माने जाते हैं।

माना जाता है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा मंत्रालय को निर्देश दिए थे कि नौसेना उपयोगी हेलीकॉप्टरों (एनयूएच) की प्राप्ति के लिए रणनीतिक साझेदार खोजने की प्रक्रिया को तेज़ किया जाए। रक्षा खरीद परिषद ने अगस्त 2018 में 21,738 करोड़ रुपये की एनयूएच परियोजना को स्वीकृति दे दी थी।

हालाँकि अभी तक रणनीतिक साझेदार को खोजने के कार्य में प्रगति नहीं हुई है जो एक विदेशी मूल उपकरण निर्माता हो से समझौता करके भारत में इन हेप्टरों को बनाए। भारतीय नौसेना को एनयूएच की तत्काल आवश्यकता है ताकि फ्रांसीसी डिज़ाइन के पुराने चेतक हेप्टरों का स्थान लिया जा सके।