रक्षा
भारतीय नौसेना की फाइटर जेट खरीद और पनडुब्बी-रोधी युद्ध के लिए क्या हैं योजनाएँ

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा प्रस्तावित स्वदेशी विकास प्रस्ताव पर भारतीय नौसेना ने कदम उठाने का निर्णय ले लिया है। बहु-भूमिका कैरियर-आधारित फाइटर जेट की खरीद के टेंडर को नौसेना भारतीय  वायुसेना (आईएएफ) के प्रगतिशील 114 फाइटर जेट के टेंडर के साथ जोड़ेगी।

“हमारे पास मिग-29के है जो विक्रमादित्य से परिचालित है और उसका परिचालन इंडिजीनियस एयरक्राफ्ट कैरियर (आईएसी)-आई से भी होगा। इनके स्थान पर मल्टी-रोल कैरियर बॉर्न फाइटर (एमआरसीबीएफ) लाने पर काम हो रहा है जो हम भारतीय वायुसेना के साथ मिलकर कर रहे हैं।”, नेवी चीफ एडमिरल करमबीर सिंह ने पिछले सप्ताह कहा था।

इसके अलावा एक और नौसेना अधिकारी ने द हिंदू को बताया था कि आईएएफ से उन्होंने बात कर ली है और अब इस मुद्दे पर उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में हैं। नए जेट्स पर विकास कार्य जारी है और वित्तीय सीमाओं के कारण नौसेना ने आवश्यक फाइटर जेट की संख्या 57 से घटाकर 36 कर दी है।

बोइंग और डसॉ एविएशन ने नौसेना की आवश्यकताओं पर क्रमशः एफ-18 सुपर हॉर्नेट और रफाल जेट्स का प्रस्ताव दिया था। कंपनियों का दावा है कि उनके विमान विक्रमादित्य और भविष्य में आईएसी-आई विक्रांत के ऑफ स्काई-जंप पर परिचालन में सक्षम हैं।

एडमिरल सिंह ने यह भी बताया कि एयरोनॉटिकल विकास एजेंसी (अडा) के साथ मिलकर डीआरडीओ ने ट्विन इंजन कैरियर आधारित डेक फाइटर (टेबडीएफ) का प्रस्ताव भी दिया था जिसे खरीदने के लिए भी नौसेना कार्यरत है।

ट्विन इंजन कैरियर आधारित डेक फाइटर

इसके अलावा पिछले सप्ताह नौसेना दिवस के आयोजन के समय रक्षा खरीद की कुछ और जानकारियाँ भी उजागर हुई थीं। इसमें भारतीय नौसेना द्वारा दो एमक्यू-9 सी गार्जियन (समुद्री सुरक्षा) ड्रोन की प्राप्ति की बात थी। त्वरित कार्रवाई के तहत इन दो ड्रोन को प्राप्त किया गया था और खरीद की लंबी प्रक्रिया की बजाय इन उपकरणों को लीज़ पर लिया गया था।

ऐसा भी माना जा रहा है कि आने वाले कुछ महीनों में सेना की तीनों इकाइयाँ 30 एमक्यू-9 ड्रोन खरीदेंगी जिसमें हर इकाई को 10 सी गार्जियन पद्धति वाले ड्रोन मिलेंगे। इन ड्रोन की जो एकल योग्यताएँ बताई जा रही हैं, वे काफी प्रभावित करने वाली हैं लेकिन इस खरीद से पनडुब्बी-रोधी युद्ध पद्धति के लिए नौसेना को नेटवर्क विकसित करने में भी सहायता मिलेगी।

इस नेटवर्क का पहला टुकड़ा तब जुड़ गया जब पी-8आई पोसाइडन समुद्री निगरानी एयरक्राफ्ट को प्राप्त किया गया था। ये एयर्कराफ्ट यूएस की नौसेना में वर्तमान में सेवारत पी-8आई से उन्नत और अधिक विशिष्टताओं वाले हैं।

पी-8आई पोसाइडन

भारतीय परिदृश्य के अनुकूल विशिष्टताओं, जैसे पिछला रडार, चुंबकीय विसंगति संसूचक और कस्टम डाटा जो भारतीय नौसेना की अन्य इकाइयों से एयरक्राफ्ट का संपर्क स्थापित करता है, को इसमें जोड़ा गया था। रिकॉन मिशन के दौरान ऊँचाई से टॉरपीडो गिराने में भी यह एयरक्राफ्ट सक्षम है।

इस नेटवर्क का दूसरा टुकड़ा एमएच-60आर रोमियो हेलिकॉप्टरों के रूप में जुड़ा। भारत ने ऐसे 24 हेलिकॉप्टर खरीदे और पुराने व अप्रचलित हो चुके सी किंग हेलिकॉप्टरों के स्थान पर इन्हें तैनात कर दिया। एमएच-60आर हेलिकॉप्टर में अत्याधुनिक पनडुब्बी-रोधी युद्ध प्रणालियाँ जैसे हवा से छोड़े जाने वाला सोनोब्वाय (पानी के नीचे उपस्थित वस्तुओं का सोनार के माध्यम से पता लगाने वाला यंत्र) और टॉरपीडो लॉन्चर है।

पारंपरिक सोनार प्रणाली का छोटा और नष्ट होने योग्य रूप सोनोब्वाय है। इसे एयरक्राफ्ट के माध्यम से नीचे गिरा दिया जाता है, पानी की सतह पर तैरता हुआ यह पानी के नीचे की स्थिति (जैसे कोई पनडुब्बी) की जानकारी एयरक्राफ्ट को भेजता है।

इस समाधान का तीसरा भाग एमक्यू-9 सी गार्जियन ड्रोन है जो हाल ही में नौसेना को मिला है। यह न सिर्फ लंबे समय (30 घंटे से अधिक) तक नज़र रख सकता है, बल्कि अन्य सेंसर मंचों से संवाद भी कर सकता है।

एमक्यू-9 सी गार्जियन ड्रोन

इस ड्रोन की पनडुब्बी-रोधी युद्धक क्षमताओं पर एक रिपोर्ट का कहना है, “सभी तीन मंच एक-दूसरे से बात कर सकते हैं, एक जैसे सोनोब्वाय लेकर चल सकते हैं और जब इन्हें गिराकर पानी पर छोड़ दिया जाता है तो शत्रु पनडुब्बियों की परख भी कर सकते हैं। इनमें से एक मंच को मिली जानकारी के आधार पर दूसरा मंच टॉरपीडो और गहराई चार्ज के माध्यम से हमला कर सकता है।”

अगले दो वर्षों में ही भारतीय नौसेना के पास 18 पी-8आई पोसाइडन एयरक्राफ्ट, 10 एममक्यू-9 सी गार्जियन ड्रोन और 24 एमएच-60आर रोमियो हेलिकॉप्टर जैसे मंच होंगे जो कि एक सम्मानीय संख्या होगी।

सभी मंच सोनोब्वाय तैनात कर सकते हैं, आपस में और अन्य मंचों से डाटा साझा कर सकते हैं, जिससे नौसेना पनडुब्बी-रोधी निगरानी ग्रिड चला सकती है। इसमें लंबे समय तक चलने वाले मंच चोक बिंदुओं के स्टेशन पर रह सकते हैं और बड़े मंचों को जानकारी दे सकते हैं कि कब हथियारों को क्रियान्वित करने की आवश्यकता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रति घंटे की परिचालन लागत के अनुसार ये ड्रोन अधिक महंगे नहीं हैं। जनरल एटॉमिक्स के डाटा के अनुसार, “सी गार्जियन की प्रति घंटा परिचालन लागत 5,000 डॉलर (3.7 लाख रुपये), प-8आई की परिचालन लागत 35,000 डॉलर (26 लाख रुपये) की मात्र 15 प्रतिशत है।”