रक्षा
चीन की आक्रामकता के विरुद्ध पर्वतीय भू-भाग में भारतीय सेना अछूते क्षेत्रों में पहुँच रही

विस्तारवादी चीन की थोड़े-थोड़े क्षेत्र में कब्ज़ा करने की रणनीति का सामना करने के लिए सेना पर्वतारोहण अभियानों और उत्तरी सीमाओं के साथ भारत के वैध क्षेत्रीय दावों को सार्वजनिक करने और समेकित करने के लिए अनुसंधान अध्ययनों पर जोर दे रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत में सेना लद्दाख में महत्वपूर्ण काराकोरम दर्रे से उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रा तक एक बड़ा स्कीइंग अभियान शुरू कर रही है, जो 3 मार्च को शुरू होने के बाद करीब 1,500 किमी की दूरी तय करेगा।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “चीन की स्पष्ट रूप से विस्तारवादी नीति का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने की आवश्यकता है। हालाँकि, सेना ने उत्तरी सीमाओं पर अतिरिक्त बलों और गोलीबारी के साथ विद्रोह किया था। फिर भी वहाँ पर्वतारोहण और अन्य अभियानों के माध्यम से एकीकृत क्षेत्रों में हमारी उपस्थिति को दिखाना और चिह्नित करना ज़रूरी है।”

इसी तरह वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) व अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) दोनों के साथ भारत के क्षेत्रीय दावों, विशेषज्ञों द्वारा अनुसंधान अध्ययनों और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में उनके प्रकाशन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। अधिकारी ने कहा, “इसमें कानूनी दस्तावेज़, क्षेत्रीय संबंध और साक्ष्य-निर्माण भी शामिल होगा।”

आरमैक्स-2 स्कीइंग अभियान लद्दाख, हिमाचल, गढ़वाल और कुमाऊँ क्षेत्रों में एलएसी के करीबी हिस्सों के पास से लगभग 80 से 90 दिनों में काराकोरम दर्रे से लिपुलेख दर्रे तक की दूरी तय करेगा। विशेष रूप से प्रशिक्षित कर्मी पहाड़ों की चोटियों, ग्लेशियर और 14,000 फीट से लेकर 19,000 फीट तक की पारंग ला, लमखागा और मलारी जैसी कई पहाड़ियों को तय करेंगे।

इस तरह के अभियानों को भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन और अन्य पर्वतारोहण संस्थानों के समन्वय के साथ एलएसी व आईबी की चोटियों पर सेना, नागरिकों और विदेशी व्यक्तियों की भागीदारी से ले जाने की योजना बनाई जाएगी। एक और अधिकारी ने कहा, “इस तरह के दूरदराज के क्षेत्रों में बढ़े हुए कदम पर्यटन और मुख्यधारा के साथ उनकी आबादी के एकीकरण को बढ़ावा देंगे।”

बता दें कि सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवाणे ने गत सप्ताह कहा था, “चीन को धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाने की आदत है, ताकि एक भी गोली चलाए बिना वह एक नए क्षेत्र को हड़प सके और जानमाल का नुकसान भी न हो। यह परिवर्तन हमेशा काम नहीं आता है। दक्षिण चीन सागर इसका एक शानदार उदाहरण है। हमने जो कुछ भी हासिल किया है, उससे अधिक चीन को यह दिखाना भी है कि यह रणनीति हमारे साथ काम नहीं आएगी और उसके हर कदम से पूरी तरह से निपटा जाएगा।”