रक्षा
गलवान घाटी संघर्ष के एक वर्ष बाद एलएसी की नई सामरिक वास्तविकता क्या है

15 जून को गलवान घाटी में हुई झड़प भारत-चीन सीमा पर 1967 के बाद हुई सबसे खूनी झड़प थी। एक वर्ष बीत जाने के बाद भी पूर्वी लद्दाख में इस सुरक्षा संकट का अंत होता नहीं दिखा रहा है।

भले ही पैन्गॉन्ग सो झील के उत्तरी तट और कैलाश पर्वत शृंखला पर तैनात भारतीय और चीनी बल पीछे हट गए हैं लेकिन गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स और देपसांग प्लेन्स में तनातनी जारी है।

हालाँकि, पिछले कुछ महीनों में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तुलनात्मक रूप से शांति रही है लेकिन लगता नहीं कि निकट भविष्य में सेनाएँ पीछे नहीं हटेंगीं।

एलएसी की दोनों ओर सैन्य बल डटकर तैनात हैं और सैनिकों एवं हथियारों की इस अभूतपूर्व तैनाती को बरकरार रखने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकास भी किया गया है।

भीतरी क्षेत्रों में चीन अपनी स्थिति मज़बूत कर रहा है

एलएसी के निकट भीतरी क्षेत्रों में चीन चुपचाप अपनी उपस्थिति मज़बूत कर रहा है ताकि अग्रिम मोर्चों पर तैनात अपने सैनिकों का सहयोग कर सके।

चीन ने अक्साई चिन के उत्तर में स्थित ज़िनजियांग-तिब्बत (जी219) राजमार्ग पर स्थित कांग्सीवार और पैन्गॉन्ग झील के पूर्वी छोर के दक्षिण में तिब्बत में स्थित एक नगर रुदोक के बीच स्थाई संरचनाएँ बनाई हैं।

काराकोरम दर्रे से 94 किलोमीटर (किमी) दूर जी219 राजमार्ग पर स्थित एक नगर ज़इदुला और हॉट स्प्रिंग्स व गोगरा से लगी एलएसी के निकट किरमगो त्रग्गार में स्थिति मज़बूत की गई है।

काराकोरम राजमार्ग

लद्दाख की चिप चाप घाटी के सामने एलएसी के पार प्यूई में रडार स्थल को भी चीनियों ने मज़बूत किया है। कांग्सीवार और रुदोक में पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने 10,000 अतिरिक्त अस्थाई सैनिकों की तैनाती की है।

इन स्थानों पर 10,000 स्थाई चीनी सैनिकों के सहयोग के लिए ये सैनिक तैनात किए गए हैं, खुफिया एजेंसियों का अनुमान है। चीन ने स्पैन्गुर झील के निकट भी भीतरी क्षेत्रों में अपनी स्थिति को मज़बूत किया है।

यह झील पैन्गॉन्ग सो के दक्षिण और चुशुल के पूर्व में स्थित है। जिस कैलाश पर्वत शृंखला पर भारतीय सैनिकों ने पिछले वर्ष अगस्त में रणनीतिक चोटियों पर कब्ज़ा कर लिया था, वह स्पैन्गुर झील के पश्चिम में स्थित है।

पीएलए वायुसेना ने तिब्बत के पठार पर स्थित अपने बेसों को इंफ्रास्ट्रक्चर को उन्नत किया है। उदाहरण स्वरूप, लद्दाख के निकट पैन्गॉन्ग झील से 200 किमी दूर स्थित न्गारी गुनसा एयरबेस पर चीन मज़बूत विमान आश्रय बना रहा है जिससे लड़ाकू जेट को शत्रु की मिसाइलों और बमों से बचाया जा सके।

तिब्बत के पठार पर पीएलएएएफ के लिए महत्त्वपूर्ण बेस के रूप में काम करने वाले ल्हासा गोंग्गर हवाई अड्डे के निकट चीन ने प्रमुख सतह से वायु में मार करने वाली मिसाइल (सैम) के लिए स्थल का उन्नतीकरण किया है।

यह एयरबेस अरुणाचल प्रदेश से 200 किमी और सिक्कीम से 300 किमी दूर स्थित है। हाल ही में चीनी वायुसेन ने तिब्बत में एक बड़ा अभ्यास किया था जिसमें जे-11 और जे-16 समेत एक स्क्वाड्रन से अधिक लड़ाकू जेटों ने भाग लिया था।

पिछले एक वर्ष में पीएलएएएफ ने तिब्बत के एयरबेसों में जो इंफ्रास्ट्रक्चर जोड़ा है, उसी की सहायता से यह अभ्यास हुआ था। एलएसी पर तैनात सैनिकों को भी चीन समय-समय पर परिवर्तित कर रहा है।

ल्हासा में एयरबेस

इस वर्ष के प्रारंभ में चीन ने दो बड़े समूहों के स्थान पर दो नए समूहों की तैनाती की थी। अक्साई चिन पर तैनात पीएलए के ज़िनजियांग सैन्य मंडल के चौथे और छठे समूह के स्थान पर आठवें और 11वें समूह को लाया गया।

ये विकास दर्शाते हैं कि गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स जैसे तनाव बिंदुओं से चीन शीघ्र पीछे नहीं हटने वाला है। चीन के साथ अप्रैल में हुई 11वें दौर की वार्ता से भारतीय पक्ष को भी यही संदेश मिला था।

लद्दाख में भारतीय सैनिकों की तैनाती का स्तर उतना ही जितना तनाव के शिखर में था

भारत के 50-60,000 सैनिक लद्दाख में तैनात हैं, इतने ही पिछले वर्ष संकट के शीर्ष समय पर तैनात थे। टैंक, सशस्त्र सैन्य बख्तर और तोपों जैसे भारी उपकरण भी तैनात हैं।

भारतीय वायुसेना ने भी लड़ाकू विमानों के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज की हुई है जिसमें मिग-29, सु-30 और हाल में जुड़े रफाल एवं अपाचे हमला हेलीकॉप्टर तैनात हैं।

पिछले माह सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवाणे ने कहा था कि चीन के साथ तनाव शीघ्र समाप्त नहीं होने वाला है और सैनिकों को दीर्घ अवधि की तैनाती के लिए तैयार रहना चाहिए।

“सैनिक पीछे हटे हैं लेकिन तनाव कम नहीं हुआ है। इसी कारण उत्तरी मोर्चे के पूरे क्षेत्र में इतनी भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती है। जब मैं उत्तरी मोर्चा कह रहा हूँ तो इसमें सिर्फ पूर्वी लद्दाख नहीं आता है, बल्कि लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक पूरा मोर्चा। यह तैनाती तब तक रहेगी जब तक वार्ता जारी है और तनाव कम नहीं हो जाता।”, सेना प्रमुख ने कहा।

भारत और चीन, दोनों को नई सामरिक वास्तविकता को स्वीकार करना होगा जिसमें एलएसी का सैन्यकरण हुआ है। चीन पर अविश्वास के कारण भारत को लद्दाख में मज़बूत सैन्य स्थिति और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए ताकि एलएसी तक सैनिकों की द्रुत आवाजाही हो सके।