रक्षा
भारत को कैसे मिले वो लड़ाकू जहाज़ जो रूस अपनी नौसेना के लिए बना रहा था

आशुचित्र- कैसे भारतीय नौसेना में निकट भविष्य में 11 नए लड़ाकू जहाज़ सम्मिलित हो सकते हैं।

रविवार (20 नवंबर) को भारत और रूस ने 50 करोड़ डॉलर की एक संधि पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार गोवा शिपयार्ड में गुप्त रूप से दो लड़ाकू जहाज़ों का निर्माण होगा। इस वर्ष अक्टूबर में रूस में बने दो लड़ाकू जहाज़ों के निर्यात की 100 करोड़ डॉलर के सौदे पर हस्ताक्षर किए गए थे। चार सप्ताहों के अंतराल में हुए ये दो सौदे 2016 में दिल्ली और मोस्को के बीच हुए चार ग्रिगोरोविच-वर्ग के लड़ाकू जहाज़ों के समझौते के अधीन हुए हैं।

तीन ग्रिगोरोविच-वर्ग के लड़ाकू जहाज़ (परियोजना 11356) पहले से ही रूस के ब्लैक सी नौका समुदाय का भाग हैं। रूसी रक्षा मंत्रालय ने 2010 और 2011 में परियोजना 11356 के छः विमानों के निर्माण के लिए दो समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। इस श्रृंखला के पहले जहाज़ की शुरुआत दिसंबर 2010 में एडमिरल ग्रिगोरोविच ने की थी और मार्च 2014 में ड्राई-डॉक से पहला वाहन निकाला गया था। बचे हुए पाँच जहाज़ों में से दो को 2015 में प्रक्षेपित किया गया। अन्य तीन जहाज़ रूस के कलिनिनग्राड यांतर शिपयार्ड में रखे हुए हैं।

क्यों? संचालक यंत्र के अभाव के कारण।

ग्रिगोरोविच-वर्ग के लड़ाकू जहाज़, रूसी नौसेना के अन्य वाहनों की तरह एम90एफ आर गैस टरबाइन से संचालित होते हैं। यह ज़ोर्या-माशप्रोएक्ट में निर्मित होते हैं, जो सोवियत संघ के गैस टरबाइन उत्पादन का मुख्य केंद्र है। यह द्वितीय विश्व युद्ध में स्थापित हुआ था। जब 1991 में सोवियत संघ का विभाजन हुआ, तब रक्षा उद्योग का यह केंद्र यूक्रेन में चला गया।

यांतर शिपयार्ड

2013 में राजनीतिक संकट के शुरू होने के बाद रूस और यूक्रेन के संबंधों में कड़वाहट आ गई जिसके फल स्वरूप मोस्को ने 2014 में क्रिमिया में कीव के स्वायत्त राज्य पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद यूक्रेन ने रूस को इंजन व अन्य यंत्र भेजना बंद कर दिया।

प्रतिबंध से पहले रूस ने यूक्रेन से सिर्फ तीन ही एम90एफ आर गैस टरबाइन ही लिए थे। यह पहले तीन ग्रिगोरोविच-वर्ग के लड़ाकू जहाज़ों पर लगा दिए गए थे। अन्य तीन तब बन रहे थे जब संकट शुरू हुआ था और गैस टरबाइन न पाने के कारण ड्राई-डॉक पर ही रह गए थे।

यहाँ पर भारत दृश्य में आता है। 2016 में यूक्रेन भारत को एम90एफ आर को “12 अतिरिक्त उपकरण और सहायक सामग्री” के रूप में देने के लिए तैयार हो गया तब भारत ने इनमें से दो को तीन अपूर्ण ग्रिगोरोविच-वर्ग के लड़ाकू जहाज़ों के लिए प्रयोग करने का सोचा।

भारत ने यूक्रेन से पहले भी इंजन खरीदे हैं। यूक्रेन की राज्य शासित हथियार निर्यात संस्था यूक्रोबोरोनप्रोम के अनुसार, “भारतीय नौसेना के तीन जहाज़ ज़ोर्या-माशप्रोएक्ट में निर्मित इंजनों का प्रयोग कर रहे हैं।”

रूस से यह जहाज़ खरीदने का नई दिल्ली का निर्णय सही है क्योंकि वर्तमान में भारतीय नौसेना छः तलवार-वर्ग के लड़ाकू जहाज़ का प्रयोग कर रही है जो 2003 और 2013 के बीच दो जत्थों में रूस में बनाए गए थे। 3,620 टन वजनी एडमिरल ग्रिगोरोविच-वर्ग तलवार-वर्ग के जहाज़ों का बेहतर संस्करण है। चार ग्रिगोरोविच-वर्ग के लड़ाकू जहाज़ों के जुड़ने से भारत के पास क्रिवाक-वर्ग से लिए हुए लड़ाकू जहाज़ों की संख्या 10 हो जाएगी। ये चार जहाज़ 2022 से 2027 के बीच भारत को सौंपे जाएँगे और इसी के आस-पास सात पी17ए लड़ाकू जहाज़ माज़ागॉन डॉकयार्ड और गार्डन रिच जहाज़-निर्माताओं व अभियंताओं से 2022 से 2025 के बीच भारत को प्राप्त होंगे।

अगर इन जहाज़ों के निर्माता समय सीमा का पालन करेंगे तो भारतीय नौसेना के पास निकट भविष्य में 11 नए लड़ाकू जहाज़ आ जाएँगे।

प्रखर गुप्ता स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @prakhar4991 द्वारा ट्वीट करते हैं।