रक्षा
भारत की वह सीमा, जिसकी रक्षा करना किसी साहसिक कार्य, पराक्रम और वीरता से कम नहीं है

 


प्रसंग
  • तिब्बती सीमा के साथ सटा हुआ बीहड़ आबोहवा और उच्च ऊँचाई वाला यह भूभाग रक्षार्थ तैनात भारतीय सेना के लिए एक बड़ी चुनौती है।
  • सुविधाओं और उपकरणों को अपग्रेड करने से इन सैनिकों, जो इन मामलों में चीनी सेना से पीछे हैं, के लिए जीवन बेहतर हो सकता है।

गुरुडोंगमार झील (उत्तर सिक्किम) के पास: समुद्र तल से लगभग 18,000 फीट ऊपर साँस लेना भी दूभर होता है। जमा देने वाला तापमान, तूफानी हवाएं जो गर्मियों में अँधा कर देने वाली धूल साथ लेकर आती हैं और सर्दियों में बर्फीले तूफ़ान, वनस्पतियों की कमी और एक आक्रामक क्षेत्र के रूप में यह जगह सबसे फिट लोगों के लिए भी जीवन की संभावनाओं को जटिल बनाती है। लेकिन यहाँ तैनात भारतीय सैनिक तिब्बत की सीमा के साथ निगरानी के लिए डटे रहते हैं।

यह भू-भाग कठोर है और यही इसकी सुन्दरता है। यहाँ के पहाड़ चट्टानों, रोड़ी-बजरी और मिट्टी से बने हैं जो उनमें मानसून और मध्य अक्टूबर से मार्च की शुरुआत तक हिमपात के दौरान भूस्खलन की संभावनाओं को मजबूत करते हैं। प्रसिद्ध गुरुडोंगमार झील के पास सरहद का यह विशेष भाग मैदानी भूमि और शांत पहाड़ियों का एक विशाल भू-भाग समेटे हुए है, जो कि तिब्बती पठार का एक विस्तार है। सर्दियों के दौरान यह क्षेत्र सफेद चादर सा प्रतीत होता है और मार्च की शुरुआत में जब बर्फ पिघलनी शुरू होती है, तो यह आर्द्र कचरे और गन्दगी के व्यापक क्षेत्र में बदल जाता है जब तक कि तूफ़ान के माफिक शुष्क हवाएं चलनी शुरू नहीं हो जातीं और शुरुआती अप्रैल से बढ़ता हुआ तापमान सारी नमी सोख नहीं लेता।

गुरुडोंगमार झील, सिक्किम

गुरुडोंगमार झील

यहाँ बख्तरबंद, तोपों के साथ भारतीय थल सेना की व्यापक उपस्थिति है। इस सीमा तक पहुँचने की यात्रा न सिर्फ लम्बी और थकाऊ है और बल्कि खतरनाक भी है। उत्तर बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी में अंतिम रेलवे स्टेशन से सैनिकों और सैन्य सामग्री को सड़क मार्ग से सिक्किम की राजधानी गंगटोक तक पहुँचाया जाता है। यह 125 किलोमीटर का सफर तय करने में कम से कम 5 घंटे का समय लगता है और कई बार इससे भी ज्यादा समय लगता है जब भू-स्खलन होता है, जो बरसात के मौसम में अक्सर होता है और यह राजमार्ग को ब्लॉक कर देता है या खिसका कर दूर ले जाता है।

गंगटोक वह जगह है जहाँ सैनिक बौद्ध, हिन्दुओं और सिखों के लिए श्रद्धेय सुन्दर एवं मनोहारी गुरुडोंगमार झील से थोड़ी दूर सैन्य अड्डे की यात्रा जारी रखने से पहले परिस्थिति-अनुकूलन हेतु कुछ दिनों के लिए रुकते हैं। सड़क संकीर्ण और अनिश्चितताओं से भरी हुई है। ट्रकों, बसों और जीपों के टूटे-फूटे जंग लगे अवशेष पहाड़ी रास्ते से नीचे पड़े हुए देखे जा सकते हैं। यह पहाड़ी रास्ता गंगटोक को मंगन, चुंगथांग और लाचेन से गुजरते हुए शानदार थांगू घाटी से जोड़ता है। थांगू घाटी ऊंचे-ऊंचे हिमाच्छादित पर्वतों, जिनकी चोटियाँ अक्सर बादलों से घिरी रहती हैं, के बीच में स्थित है। यह पहाड़ी रास्ता पूर्व में गुरुडोंगमार झील की तरफ मुड़ने से पहले और मिलिट्री स्टेशन वाले क्षेत्र, जिसे स्थानीय लोग केरांग (इस मानचित्र को देखें) कहते हैं, तक पहुँचने से पहले उत्तर दिशा में जारी रहता है।सैन्य स्टेशन चीन के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा से केवल 1.5 किमी दूर है।

यह एक व्यस्त स्टेशन है जहाँ छोटे और बड़े दोनों तरह के वाहन धूल के गुबार उड़ाते हुए आते-जाते रहते हैं। अधिकारियों और सैनिकों के लिए कार्यालय और आवास अधिकांशतः फाइबरग्लास से बनाये गये हैं, हालाँकि कुछ पुराने भवन, जो अभी भी सही सलामत हैं, कोरोगेटेड आयरन (CI) शीटों से बनाये गए हैं।जेननरेटरों के इंजन शोर मचाते रहते हैं क्योंकि केरांग में विद्युत् आपूर्ति नहीं है और इसलिए ये जेनरेटर कार्यालयों और आवासों को गर्मी और रोशनी देने के लिए लगभग चौबीसों घंटे चलते रहते हैं। बहुत सारी सुविधाएँ भूमिगत हैं अतः बहुत अच्छी तरफ से गुप्त रखी गयी हैं। दरअसल, संचालन कक्ष और अधिकांश कार्यालय, शस्त्रागार, गोला बारूद एवं अन्य भंडार और यहाँ तक कि बैरक और अधिकारियों के लिए केबिन भी भूमिगत हैं। इसलिए वाहनों की आवाजाही के अलावा जमीन के ऊपर किसी अन्य प्रकार की हलचल नहीं दिखती। सेना का अधिकांश सामान, जैसे- टैंक, कर्मियों के बख्तरबंद वाहन और मैदानी तोपों, को छुपा कर रखा जाता है और यदि कोई बहुत गौर से देखे तो टैंक के ऊपरी हिस्से या मैदानी तोप के नोजल को कभी-कभी बाहर आते हुए देख सकता है और सावधानीपूर्वक उनकी छलावरण वाली संरचना को समझ सकता है।

हालाँकि, पूरी अचिह्नित सीमा के साथ-साथ दोनों तरफ से सैनिकों द्वारा लगातार गश्त होती रहती है। आसान इलाकों में सैनिक वाहनों से गश्त करते हैं जबकि बहुत सारे ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ पैदल गश्त होती है। यहाँ तैनात एक पैदल सेना इकाई के कम्पनी कमांडर (मेजर रैंक का एक अधिकारी) ने कहा, “यह सबसे कठिन हिस्सा है। ऑक्सीजन की कमी के कारण, सांस लेने में बड़ी समस्या होती है। जमा देने वाले तापमान के कारण सैनिकों को भारी इंसुलेटेड (गर्मी रोकने वाली) जैकेट पहननी पड़ती हैं साथ ही भारी बैकपैक और हथियारों को भी ले जाना होता है जो इस भारी वजन के साथ चलने को एक कठोर कसरत बना देता है। 20 से 30 मिनट से ज्यादा देर तक लगातार चलना असंभव है।”

हड्डी तक सुन्न कर देने वाली भयंकर और जमा देने वाली हवाओं द्वारा पैदा होने वाली सर्द सिहरन यहाँ अन्य उच्च उंचाई वाले क्षेत्रों, जैसे-लेह की सीमा, से कहीं ज्यादा है। दूर तक दिखाई न देना भी एक बड़ी समस्या है। धूल और बर्फ के तूफ़ानों, जो भयंकर हवाओं से पैदा होते हैं, के कारण सुनाई देना मुश्किल हो जाता है दूर तक देखना भी कठिन होता है। और यहाँ बार-बार बर्फ़बारी भी देखने की समस्या को और बढ़ा देती है। पैदल सेना के डिप्टी कमांडर ने बताया, “कई बार दृश्यता इतनी कम हो जाती है कि गश्त करने वाला दल चीनी क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि हम हमेशा अपने क्षेत्र में जानबूझकर किये गये चीनी उल्लंघन का पता नहीं लगा पाते, भले ही ऐसी घटनाएँ हालिया वर्षों में काफी कम हो गयी हैं।”

तोपों, टैंकों और बीएमपी (पैदल सेना से लड़ने के लिए मशीनीकृत पैदल सेना द्वारा उपयोग किये जाने वाले वाहन), एसयूवी, ट्रकों और अन्य वाहनों के साथ युद्ध सामग्री जैसे सैन्य समान का रख-रखाव एक बड़ा सिरदर्द है।यहाँ एक ईएमई (इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजिनियर्स) इकाई में नियुक्त एक बड़े अधिकारी ने बताया, “अधिक ऊंचाई और कठोर मौसम यहाँ सभी मशीनों के रखरखाव का खर्च बढ़ाते हैं और इस ऊँचाई तथा जीवन के लिए इन प्रतिकूल परिस्थितियों में हमारे लोग अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पाते। हमारे लोगों और मशीनों से सर्वश्रेष्ठ परिणाम प्राप्त करना एक चुनौती है।”

सेना द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले महत्वपूर्ण संचार यंत्रों को भी इस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है और अक्सर उन्हें बदलना पड़ता है। यहाँ संचार दल के एक अधिकारी ने बताया, “जलवायु की कठोर परिस्थितियां यहाँ संचार उपकरणों के नियमित रखरखाव को भी एक बड़ी चुनौती बनाती हैं। सॉफ्टवेयर यहाँ यदाकदा ख़राब होते हैं और हमें हमेशा बैकअप तैयार रखना पड़ता है। और यहाँ मालवेयर की भी समस्या है।” बर्फ, ओलावृष्टि, भू-स्खलन, हिमपात और धूल भरी आंधी संचार लाइनों और केबलों को बाधित करते हैं और अक्सर उनकी मरम्मत करनी पड़ती है या फिर बदलना पड़ता है।

अधिकांशतः पर्वत की चोटी पर स्थित अंतर्राष्ट्रीय सरहद भारतीय सैनिकों को चीन की तरफ देखने का एक अनुकूल और प्रभावशाली दृश्य प्रदान करती है। पैदल सैन्य इकाई के उप-कमांडर (सैन्य बोलचाल में सेकेंड-इऩ-कमांड) ने कहा “हम उनकी सभी चालों और गतिविधियों की निगरानी कर सकते हैं। लेकिन हमारे सैनिकों को ऊंचे पहाड़ों की सबसे ऊंची चोटियों पर स्थित बंकरों में जाना पड़ता है। यह बहुत ही कठिन और जोखिम भरा होता है।” ज्यादातर बंकर भूमिगत होते हैं। लेकिन वे बहुत ही तंग होते हैं और कई तो अच्छी तरह से इन्सुलेटेड भी नहीं होते हैं। उनमें हिलने-डुलने के लिए बहुत ज्यादा जगह नहीं होती है और उनमें तीन दिनों तक समय बिताना बहुत ही परेशान करने वाला हो सकता है। पैदल सेना के सैनिकों को बारी-बारी से पीछे के स्थानों से मोर्चे की रेखा पर तैनात किया जाता है और वे बंकरों में तीन या उससे ज्यादा दिनों के बाद वापस लौटते हैं।

केरांग

रास्ते की ऊंचाई और इलाके का एक खौफनाक मंजर

इन सीमाओं में ज्यादातर स्थानों में, वाहन सीधे सीमा तक नहीं जा सकते हैं इसलिए वहाँ पर स्थित चौकियों तक आपूर्ति के लिए खच्चरों (सेना आपूर्ति कोर की पशु परिवहन इकाई) का इस्तेमाल किया जाता है। केरांग में भी, मेहनती और वफादार खच्चर, जो अंतिम व्यक्ति तक आपूर्ति पहुँचाने में अहम भूमिका निभाते हैं और भोजन, गोला बारूद और अन्य उपकरणों को सीधे पहाड़ों की चोटियों तक पहुँचा देते हैं। यहाँ की एएसआई इकाई के एक जेसीओ ने कहा,“इन खच्चरों के बिना, सैन्य चौकियों को आपूर्ति भेजना असंभव होगा। लेकिन यहाँ का मौसम, ऊंचाई और इलाका इन जानवरों के लिए भी बहुत ही जोखिमभरा होता है।” खच्चरों ने आपात स्थिति में बहुत ही महत्वपूर्ण सेवा प्रदान की है और ये देश के युद्ध तंत्र में एक अहम भूमिका निभाते हैं।

केरांग में, हिमालय की गगन चुम्बी सरहदों से सटे कई अन्य स्थानों की तरह, हर मानव गतिविधि एक संघर्ष है। साँस लेना, चलना-फिरना, सोना, काम पे ध्यान केन्द्रित करना, खाना-पीना और यहाँ तक कि नियमित स्नान के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है।सैन्य ठिकाने के बेस चिकित्सालय के एक सैनिक चिकित्सक ने बताया, “ऑक्सीजन का स्तर बहुत ही कम है और अक्सर लोग ऊंचाई से होने वाली बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। इतनी ऊंचाई पर सूर्य की पराबैंगनी किरणें बहुत ही हानिकारक होती है और लोगों को बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। ज्यादातर महीनों में पानी की बहुत ही किल्लत रहती है। हर मौसम के साथ अपनी समस्याएं जुड़ी हुई हैं – अगर सर्दियों के दौरान शून्य से भी कम तापमान जिंदगी को बहुत मुश्किल बना देता है तो मानसून के दौरान लगातार बारिश और ओलावृष्टि जिंदगी को अस्त-व्यस्त कर देती है। ऊंचाई के कारण होने वाली बीमारियाँ और उनके परिणामस्वरूप होने वाली बीमारियों के अलावा, उनमें से कुछ और भी गंभीर बीमारियाँ हैं जिनसे लोग अक्सर पीड़ित होते हैं, जैसे त्वचा और हृदय की समस्याएं, नजर का कमजोर होना, गैस्ट्रोएंटेरिक, नेफ्रोलॉजिकल, न्यूरोलॉजिकल, और मानसिकबीमारियाँ इत्यादि।ये बीमारियाँ ऊंचाई, क्रूर मौसम और ड्यूटी की प्रकृति की वजह से होती हैं जो सैनिकों के शरीर पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालती हैं।”

निश्चित रूप से सैनिकों के लिए सरहदों पर एक दशक पहले की तुलना में अब हालातों में बहुत बेहतरी आई है। केरांग में कर्नल रैंक के अधिकारी ने कहा, “जीवन की परिस्थितियों, कपड़ों, विशेष उपकरणों, भोजन और अन्य सुविधाओं में काफी सुधार हुआ है, हालांकि अभी भी हम चीन से बहुत पीछे हैं। हमारे सैनिक अब गरम बैरकों में रहते हैं लेकिन पैदल गश्त करते समय उनको कुदरत की अनियमितताओं से दो-चार होना पड़ता है। सीमा रेखा पर स्थित ज्यादातर बंकर अभी भी गैर-इन्सुलेटेड और पुराने चलन के हैं। पीएलए (चायनीज पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) ने अपने सैनिकों की सुविधा के लिए गर्म वातानुकूलन वाले वाहन प्रदान किये हैं। उनके पास सभी मौसमों में लगभग सभी सैन्य चौकियों को जोड़ने वाली सड़के हैं और उनकी आधारभूत संरचना हमारे मुकाबले में काफी बेहतर है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, सुविधाओं और उपकरणों का उन्नयन एक सतत प्रक्रिया है और हम लोग इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन चीनी लोग इसे बहुत ही तेजी से कर रहे हैं और हमेशा हमसे कुछ कदम आगे रहे हैं।”

उनके और अन्य अधिकारियों के लिए, तसल्ली की बात यह है कि भारतीय सैनिकों के पास चीनी सैनिकों के मुकाबले निगरानी के लिए बेहतर ठिकाने हैं। लेकिन चीनी भी इस मामले में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं और अपनी इस कमी को दूर करने के लिए उनके पास भी उपकरण हैं और जबरदस्त रणनीतियाँ हैं।

इसी वजह से, सेना के दृढ अधिकारी सरहद, जैसे केरांग पर तैनात हैं, भारतीय रक्षा तंत्र के लिए चीन के साथ बराबरी करना मुश्किल हैI