रक्षा
गलवान घाटी जहाँ भारत-चीन की भिड़ंत हुई, के बारे में पाँच बातें जो आपको जाननी चाहिए

15 जून की रात को भारतीय और चीनी सेना के बीच पत्थरों और डंडों से पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भिड़ंत हुई जिसके कारण भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। वहीं एएनआई सूत्रों के अनुसार 43 चीनी सैनिक हताहत हुए हैं।

इसपर बयान जारी करते हुए भारतीय सेना ने कहा कि यह घटना तब हुई जब क्षेत्र में ‘तनाव कम करने’ की प्रक्रिया जारी थी। मई के प्रारंभ से ही भारतीय और चीनी सेना का आमना-सामना वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के तीन बिंदुओं पर था- गलवान नदी घाटी, हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र और पैंगोंस सो झील।

इस महीने की शुरुआत में समाचार रिपोर्टों में कहा गया था कि इनमें से दो बिंदुओं पर तनाव का कम होना शुरू हो गया है। सोमवार रात को जो झड़प हुई, वह गलवान घाटी में हुई जो आमने-सामने वाले बिंदुओं में से सबसे उत्तर में स्थित है।

इस स्थान के बारे में पाँच बातें हैं जो आपको जाननी चाहिए-

1. गलवान घाटी उत्तर-पूर्वी लद्दाख में स्थित है जो चीन अधिकृत अकसाई चिन के पश्चिम में है। नीचे दिए गए मानचित्र से लेह और कारगिल जैसे लद्दाख के अन्य स्थानों के संदर्भ में आप गलवान घाटी का स्थान समझ पाएँगे।

लाल चिह्न गलवान नदी के सिंधु नदी की सहयोगी श्योक नदी से संगम स्थल (अकसाई चिन से पश्चिम की ओर आती हुई धारा) को दर्शाता है। इस नदी का नाम लद्दाखी खोजकर्ता गुलाम रसूल गलवान के नाम पर रखा गया है।

2. 255 किलोमीटर लंबी दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी (डीएस-डीबीओ) सड़क इसी क्षेत्र से गुज़रती है। इस सड़क का अधिकांश भाग श्योक नदी के समानांतर पर चलता है।

पूर्वोत्तर लद्दाख (सेना के लिए उत्तरी सब-सेक्टर) की संयोजकता के लिए आवश्यक डीएस-डीबीओ, चीन अधिकृत 38,000 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्रफल के अकसाई चिन से सटे 2013 में भारत-चीन तनाव के साक्षी रहे देपसांग मैदान समेत कई दूरवर्ती क्षेत्रों तक पूरे वर्ष चलने वाली सड़क प्रदान करती है।

यह सड़क पिछले 19 वर्षों से निर्माणाधीन थी जिसके प्रगति कार्य पर सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की नज़र होती थी। 2011 में, जब तक अधिकांश सड़क बन चुकी थी, एक पूछताछ में पाया गया कि सड़क निर्माण श्योक नदी के किनारे मैदान क्षेत्र में हुआ है, न कि पहाड़ी इलाके में।

इसके परिणामस्वरूप हर वर्ष जून से अक्टूबर में जब बर्फ पिघलने से नदी का पानी तटों को पार कर देता था, तब इस सड़क के कुछ भाग क्षतिग्रस्त हो जाते थे।

2011 में जब इस सड़क को सैन्य उपयोग के लिए अनुपयोगी पाया गया था तो तीन-चौथाई सड़क के लिए बीआरओ ने नई मार्गरेखा तैयार की। पूर्वी लद्दाख में भारत के सबसे ऊँचाई पर बने पुल के साथ यह सड़क 2019 की शुरुआत में बनकर तैयार हो गई थी।

भारत का सबसे ऊँचाई पर स्थित श्योक नदी पर बना पुल जिसका नाम ‘लद्दाख के शेर’ कर्नल चेवांग रिनचेन पर रखा गया है

कुछ रिपोर्टों का दावा है कि चीन इस सड़क के निर्माण से क्रुद्ध था और गलवान घाटी पर भारतीय भूभाग में घुसकर इस सड़क पर अपना प्रभुत्व दिखाना चाहता था।

3. पॉइंट 14 पर गश्ती करने के लिए भारत संकड़ी गलवान घाटी में डीएस-डीबीओ सड़क से जुड़ने वाली एक सड़क और एक पुल बना रहा था। इसी से क्रुद्ध होकर इस क्षेत्र में चीन ने भारतीय सेना से आमना-सामना किया, कुछ रिपोर्टों का दावा है। भारत ने पुल के निर्माण को रोकने से मना कर दिया था।

“एलएसी से 7-7.5 किलोमीटर दूरी पर स्थित पुल का निर्माण काफी पहले शुरू हो गया था। हालाँकि 10 मई के आसपास चीन ने इसका विरोध किया। इसके बावजूद पुल पर काम जारी रहा। हाल के तनाव को देखते हुए हमने पुल के प्रगति कार्य को तेज़ ही किया है।”, द प्रिंट ने एक सूत्र के हवाले से कहा।

पिछले सप्ताह से भारत लद्दाख समेत सीमा क्षेत्रों में श्रमिकों को भी ले जा रहा था ताकि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर कार्य हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इंफ्रास्ट्रक्टर विकास पर भारत का यह चीन को संदेश है।

4. 1962 में यहीं भारतीय और चीनी टुकड़ियों की भिड़ंत हुई थी। जब जुलाई 1962 में चीन के साथ तनाव बढ़ रहा था तो भारत ने निश्चय किया था कि गलवान घाटी में एक सेना की चौकी बनाई जाए ताकि श्योक घाटी से लेह तक चीन की पहुँच को रोका जा सके।

पश्चिमी कमांड ने इसे अनावश्यक माना और इसे चीन को उकसावा देने वाला उपाय बताकर विरोध किया। हालाँकि सेना मुख्यालय का निर्णय बरकरार रहा।

फलस्वरूप 8 गोरखा राइफल्स की पहला बटालियन ने 4 से 6 जुलाई के बीच प्लाटून के आकार की चौकी स्थापित कर दी। इसके कुछ दिनों बाद ही 10 जुलाई को पीएलए की लगभग 100 टुकड़ियों ने इस चौकी को घेर लिया लेकिन हमला नहीं किया।

12 जुलाई को भारत ने चीन से कहा कि गलवान के सैन्यबल ने “क्षेत्र में उपस्थित भारतीय चौकियों में खतरनाक संतुलन बनाया” लेकिन “उनका निरंतर उकसावा किसी भी क्षण विवाद खड़ा कर सकता है।”

इससे तनाव थोड़ा कम हुआ लेकिन चौकी को चीनी टुकड़ियाँ महीनों तक घेरे रहीं और वायुमार्ग से उन्हें आवश्यक सामग्री पहुँचाई जाती थी। जब 20 अक्टूबर को चीन ने आक्रमण किया तब यह चौकी सशक्त होकर जाट रेजीमेन्ट की पाँचवी बटालियन की कंपनी बन गई थी।

फलस्वरूप भारतीय पक्ष में दो अधिकारी, तीन जेसीओ और 63 अन्य सैनिक थे। घंटों में चीनी सेना ने चौकी को रौंद डाला जिसमें रेजीमेन्ट मेडियल (मध्यवर्ती) अधिकारी, दो जेसीओ और 30 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए। मेजर (बाद में लेफ्टिनेन्ट कर्नल) श्रीकांत हसबनिस, 5 जाट के कंपनी कमांडर और कुछ अन्य सैनिकों को युद्ध का बंदी बना लिया गया।

“जब हम उस चौकी पर गए थे, हम जानते थे हम मौत के कुएँ में जा रहे हैं। 2,000 चीनियों के आगे हम 60 बहुत कम थे, वो भी तब जब वे हमें घेरकर ट्रेन्चर (फावड़ा), मोर्चास और संचार हथियारों के साथ थे। वे अपने हथियारों का प्रदर्शन किया करते थे।”, लेफ्टिनेन्ट कर्नल हसबनिस ने कुछ वर्षों पहले बताया था।

“…जवान कहा करते थे कि साहब ये तो हाथ बांधकर भी आएँगे तो हम इनको कहीं नहीं ले जा सकते। हमारे जवान भी इस परिस्थिति पर उपहास करते थे।”, 2012 में उन्होंने कहा था।

5. भारत और चीन सैन्य स्तर पर गलवान घाटी और पूर्वी लद्दाख के अन्य क्षेत्रों में तनाव कम करने के लिए वार्ता कर रहे थे। कम से कम एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि गलवान घाटी में अपनी ‘घुसपैठ’ पर चीन चर्चा करने के लिए तैयार नहीं था बल्कि वह तो “पूरे क्षेत्र में अपना स्वामित्व जमा रहा था।”