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रक्षा बजट 2019- क्यों आधुनिकीकरण के लिए सेना के पास पूंजी नहीं है

आशुचित्र- पेंशन पर खर्च रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा है जो आधुनिकीकरण के लिए आवंटित पूंजी के हिस्से को कम कर देता है।

2019-20 के लिए अंतरिम बजट में रक्षा के लिए आवंटन की काफी आलोचना की गई है। कई लोगों का दावा है कि यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 1.52 प्रतिशत है और अपर्याप्त है। यह पिछले साल प्राप्त प्रतिक्रिया से अलग नहीं है, जब यह दावा किया गया था कि रक्षा के लिए आवंटन देश की जीडीपी का केवल 1.58 प्रतिशत था। वास्तव में, टिप्पणीकारों की यह शिकायत वर्षों पुरानी है।

किंतु क्या वास्तव में यही मामला है? और यदि नहीं, तो सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए पर्याप्त पैसे क्यों नहीं है?

उत्तर प्राप्त करने के लिए पहले रक्षा बजट में क्या चीज़ें सम्मिलित हैं, यह जानना आवश्यक है। औपचारिक परिभाषा के अभाव में, रक्षा मंत्रालय (रक्षा मंत्रालय) का रक्षा सेवा अनुमान केवल तीन सशस्त्र बलों (सेना, नौसेना और वायु सेना), आयुध कारखानों, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, राष्ट्रीय राइफल्स और राष्ट्रीय कैडेट कोर के राजस्व और पूंजीगत व्यय से संबंधित को ज्यादातर भारत कारक्षा बजटमाना जाता है। हालाँकि, यह परिभाषा अन्य तत्वों जैसे कि सीमा सड़क संगठन, तटरक्षक, रक्षा संपदा संगठन और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, पूर्व-सेवा कर्मियों और सेवानिवृत्त नागरिक कर्मचारियों के पेंशन पर रक्षा मंत्रालय द्वारा किए गए खर्च को ध्यान में नहीं रखती है।

3.2 लाख करोड़ रुपये का आँकड़ा (जीडीपी का लगभग 1.52 प्रतिशत) जिसे व्यापक रूप से रक्षा बजट के रूप में रिपोर्ट किया गया है, केवल रक्षा मंत्रालय के राजस्व और पूंजीगत व्यय की जानकारी देता है। पेंशन के लिए इस साल 1.12 लाख करोड़ रुपये के आवंटन के बाद रक्षा मंत्रालय का बजट 2019-20 के लिए 4.3 लाख करोड़ रुपये है, जो कि GDP का 2.05 प्रतिशत है।

यह देखते हुए कि पेंशन पर खर्च रक्षा मंत्रालय  के कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा है इसलिए इसे रक्षा व्यय पर किसी भी चर्चा से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

2011-12 में रक्षा मंत्रालय ने अपने कुल बजट में लगभग 35,570 करोड़ रुपये या पेंशन पर कुल बजट का 17.6 प्रतिशत खर्च किया। यह 2019-20 में 1,12,079 करोड़ रुपये हो गया है। इसमें लगभग 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह कुल बजट का 26 प्रतिशत है।

रक्षा मंत्रालय के बजट में पेंशन, वेतन व भत्ते की भागीदारी
पेंशन के अलावा वेतन और भत्ते के लिए आवंटन, जो रक्षा मंत्रालय के डिफेंस सर्विसेज एस्टिमेट्स का हिस्सा है और रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा भी है। 1,24,821 करोड़ रुपये में वेतन और भत्ते का आबंटन  2019-20 के लिए कुल रक्षा बजट के 30 प्रतिशत के करीब है, जो 2011-12 में 13.2 प्रतिशत से बढ़ाया गया है।

अगर  पेंशन और वेतन एवं भत्ते के लिए किये गए आवंटन को एक साथ मिलकर देखा जाए तो मंत्रालय के कुल बजट का 55 प्रतिशत हिस्सा 4.3 लाख करोड़ रुपये है। 2011-12 के बजट में पेंशन और वेतन एवं भत्ते के लिए आवंटन कुल बजट का 43.5 प्रतिशत था।

रक्षा मंत्रालय के बजट में प्रतिशत के रूप में पेशन व वेतन
हालाँकि, पूंजी आवंटन का हिस्सा जो नए उपकरणों की खरीदी एवं आधुनिकीकरण के लिए किया गया है  2019-20 में 24.5 प्रतिशत पर आ गया है जो कि 2011-12 में 32.5 प्रतिशत था वो भी तब जब इस बजट में पूंजी आवंटन में करीबन 68,000 करोड़ रुपये से 1.08 लाख करोड़ रुपये तक वृद्धि हुई है।

रक्षा बजट में पूंजी व्यय का भाग
इसलिए वर्षों से रक्षा बजट में पूंजी आवंटन का हिस्सा कम हो गया है, जबकि पेंशन और वेतन एवं भत्ते में वृद्धि हुई है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार 30 लाख सेवानिवृत्त सुरक्षाकर्मियों और असैनिक कर्मचारियों को पेंशन देने से इंकार नहीं कर सकती है और लाखों लोगों को वेतन और भत्ता दे रही है जो वर्तमान में सेवा कर रहे हैं और इस कारणवश उपकरणों की खरीदी हेतु सरकार इंतज़ार कर सकती है और आवंटन को धन की उपलब्धता निर्धारित करती है।

उदाहरण के लिए सेना के लिए पूंजी आवंटन को अगर देखा जाए तो यह 2019-20 के बजट में 29,447 करोड़ रुपये है। लगभग 1.82 लाख करोड़ रुपये का पूंजी आवंटन वेतन और पेंशन के लिए सेना के बजट का एक छठा हिस्सा है जो कुल रक्षा बजट का 42 प्रतिशत है। यह तथ्य है कि सरकार सेना के पूंजीगत बजट को बढ़ाने में विफल रही है। सेना के द्वारा यह दावा किया गया है कि उसके 68 प्रतिशत उपकरण अब ‘विंटेज’ श्रेणी में आते हैं। इससे पता चलता है कि सरकार वेतन और पेंशन पर खर्च एवं आधुनिकीकरण के बीच किसी एक को चुनने के लिए किस हद तक मजबूर है? परिणामस्वरूप कुछ खाते सुझाव देते हैं कि 2019-20 के लिए सेना का बजट 29,033 करोड़ रुपये चल रही प्रतिबद्धताओं के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है।

हाल ही में वन रैंक वन पेंशन योजना लागू होने की वजह से सुरक्षाकर्मियों की लंबे समय से चली आ रही मांग और सातवें वेतन आयोग के कार्यान्वयन के कारण पेंशन और वेतन एवं भत्ते के लिए आबंटन बढ़ा। सोमनाथ मुख़र्जी संछेप में वन रैंक वन पेंशन योजना के बारे में बताते हैं कि यह तथ्य है कि भारत में 2003 से सभी सिविल सेवकों के लिए प्रत्यक्ष अंशदान पेंशन योजना में स्थानांतरित होने के बावजूद सैन्य पेंशन प्रत्यक्ष लाभ के ढांचे में रहते हैं और इससे कोई मदद भी नहीं मिलती है।

“प्रत्यक्ष लाभ (डीबी) मॉडल के तहत एक रिटायर्ड व्यक्ति को पेंशन दिया जाता है जो कि एक गारंटीकृत, मुद्रास्फीति-अनुक्रमित संख्या है और यह अंतिम वेतन के बराबर होता है, जिसे मृत्यु तक भुगतान किया जाता है। मृत्यु दर में सुधार के साथ, डीबी पेंशन देनदारियां तेजी से बढ़ी हैं और वर्षों से जारी हैं। ये देनदारियां आमतौर पर सरकारों के खजाने में बड़ी दरारें पैदा कर देती हैं क्योंकि राज्य हर साल भुगतान के रूप में  पेंशन देनदारियों की सेवा करते हैं भविष्य के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराने की बजाय। डीबी पेंशन की पहचान दुनिया के कई हिस्सों में विशेष रूप से यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका में राजकोषीय तनाव के सबसे बड़े स्रोतों के रूप में की गई है।”

बढ़ती जीवन-प्रत्याशा और हर साल लगभग 85,000 कर्मियों की सेवानिवृत्ति के कारण, आने वाले वर्षों में पेंशन के लिए आवंटन बढ़ता रहेगा।

इसके अलावा, यह देखते हुए कि सेना तीन सेवाओं में से सबसे बड़ी है और उसके जल्द ही दुर्बल होने की संभावना नहीं है इसलिए वेतन और भत्ते का बजट भी बढ़ेगा।

और इसमें से अधिकांश वृद्धि पूंजी आवंटन की कीमत पर की जाएगी।

प्रखर स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @prakhar4991 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।