रक्षा
कश्मीर में सुरक्षा दल आवश्यक हैं और उनपर संकट हमेशा एक चुनौती रहा है

आशुचित्र- लोगों को पता होना चाहिए कि रक्षक दल क्या हैं, उनकी आवश्यकता क्यों है, वे क्यों असुरक्षित हैं और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए क्या-क्या किया जाता है।

पुलवामा के निकट केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के काफिले पर हुए कार बम हमले और इसके भयावह परिणामों ने केवल काफिले पर बल्कि कश्मीर में वाहन द्वारा आवाजाही की पूरी अवधारणा पर ध्यान केंद्रित किया है। काफी सारी गलत जानकारियाँ लोगों तक पहुँच रही हैं और इन गलत जानकारियों का खंडन करने हेतु रक्षक दलों को किस तरह सुरक्षित किया जाता है एवं उन्हें किस तरह चलाया जाता है, के अनुभव के आधार पर एक सूचित टिप्पणी के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा सकता है।

लोगों को पता होना चाहिए कि रक्षक दल कौन हैं, उनकी आवश्यकता क्यों है, वे क्यों असुरक्षित हैं और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए क्या-क्या किया जाता है। हालाँकि इससे पहले कि एक विचार को ध्यान में रखना चाहिए। पुलवामा त्रासदी ने एक धारणा को जन्म दिया है कि एक सड़क के हर कोने में एक कार बम है और तात्कालिक विस्फोटक उपकरण (आईईडी) सभी जगह बिखरे हुए हैं।

30 वर्षों के छद्म युद्ध में कार बम के तीन मामले सामने आए और यह चौथा ऐसा मामला है। पुलवामा से पहले आखिरी बार इसका प्रयोग  2004 में श्रीनगर बारामुला रोड पर पट्टन के पास हुआ था। भाग्यवश एक गैस सिलेंडर बम वाली मारुति 800 की टक्कर के प्रभाव से अतिरिक्त आर्मर प्लेटिंग द्वारा मजबूत रखे गए एक सेना की बस पर  केवल मामूली प्रभाव पड़ा हालाँकि यह अफसोस की बात है कि चालक की मौत हो गई थी। बस के कोनों पर अतिरिक्त आर्मर प्लेटिंग चढ़ाना एक तात्कालिक उपाय था जैसा कि बस के फर्श बोर्ड पर पिघले रबर कचरे का चिपकना भी तात्कालिक उपाय था। इसने कई लोगों की जान बचाई और सेना द्वारा चलाए गए सभी बसों को सख्त करने के आदेश जारी किए गए थे जो आज भी मान्य है।

दो अन्य घटनाएँ स्मृति में बनी हुई हैं। पहला हमला बादामी बाग के बड़वारा गेट पर एक मारुति 800 के साथ फिर से प्रयास किया गया था और दूसरा जम्मू-कश्मीर विधानसभा भवन में हुए ये दोनों ही हमले 2001 में हुए थे। अंतिम आईईडी हमला एक सेना की बस के खिलाफ 20 जुलाई 2008 को हुआ था जिसमें काफी जवान हताहत हुए थे। इसके बाद आईईडी और कार बम का खतरा समाप्त हो गया।

हालाँकि पुलवामा घटना से पहले तक के अंतराल में आईईडी और कार बमों के इस्तेमाल को सीरिया, इराक, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में तेज़ी से परिष्कृत किया गया। विश्लेषकों ने कश्मीर में आईईडी और कार बम की वापसी की आशंका व्यक्त की और इन बमों को इन युद्ध क्षेत्रों की विशेषज्ञता द्वारा परिष्कृत किया गया खासकर तब से  जब से आतंकवादियों की ताकत बहुत कम हो गई थी और सुरक्षा बलों को सापेक्ष स्वतंत्रता का आनंद मिल रहा था।

पाकिस्तानी उन तरीकों की तलाश में रहते हैं जिनके द्वारा भारत और सुरक्षा बलों के खिलाफ स्थानीय आबादी का अलगाव बढ़ सकता है। पथरक्षकों को लक्षित करके प्रॉक्सी युद्ध के प्रायोजक चाहते हैं कि सुरक्षा बल आबादी पर नियंत्रण को और कड़ा करें; इसका मतलब है कि अधिक चौकियों के साथ दैनिक जीवन में अधिक हस्तक्षेप होगा और इससे सामाजिक वातावरण में निराशा फैलेगी और लोग हताश होंगे।

सरल शब्दों में कहें तो एक काफिला एक साथ यात्रा करने वाले वाहनों का एक संग्रह है। हालाँकि, एक सैन्य काफिला कुछ अलग होता है। इसमें विनियमित गति, सुरक्षा और कमान और नियंत्रण की एक प्रणाली होती है। आदर्श रूप से काफिले को वाहनों के छोटे प्रबंधनीय समूहों के रूप में चलाया जाना चाहिए लेकिन परिचालन क्षेत्रों में घनी सुरक्षा के लिए समर्पित सुरक्षा संसाधनों की कमी के कारण यह बड़े आकार के होते हैं; काफिले की सुरक्षा के लिए जितनी अधिक तैनाती होगी, सक्रिय आतंकवाद-रोधी अभियानों के लिए पुरुषों की संख्या उतनी ही कम होगी।

काफिले में यात्री वाहनों और लॉजिस्टिक लॉरी का मिश्रण है। कश्मीर में 10-12 बड़ी सेना के काफिले गर्मियों में हर दिन चलते हैं क्योंकि सर्दियों में स्टॉकिंग की वजह से लॉजिस्टिक्स की बड़ी ज़रूरत होती है। इनमें से कुछ के पास 20-30 वाहन हो सकते हैं और कुछ में 100 वाहन या उससे अधिक वाहन हो सकते हैं।

सीआरपीएफ और सीमा सुरक्षा बल भी जम्मू से श्रीनगर तक एक-एक पथरक्षक चलाते हैं और घाटी के भीतर छोटे पथरक्षक सेना के पथरक्षकों में शामिल होते हैं। सर्दियों में पथरक्षकों का आकार और उनकी संख्या कम हो जाती है लेकिन कुछ दिनों के सड़क ब्लॉक बड़े पथरक्षकों को पारगमन शिविरों को खाली करने के लिए चलाया जाता है जो उनकी सीमा तक भर जाते हैं। 14 फरवरी को सीआरपीएफ का रक्षक दल सामान्य से बड़ा एक ऐसा ही रक्षक दल था, हालाँकि सेना के रक्षक दल ज्यादातर बड़े ही होते हैं।

रक्षक दल की सुरक्षा वर्गीकृत दायरे में है लेकिन वैचारिक रूप से कहीं भी किसी भी संघर्ष क्षेत्र में यह द्वैत रूपी है। सबसे पहले सड़क को सड़क के उद्घाटन दलों द्वारा आईईडी चेक के माध्यम से साफ किया जाता है। इसके बाद सड़क के चारों ओर एक स्थिर तत्व और सड़क की गहराई में कुछ तत्वों को एक सुरक्षित गलियारा बनाने के लिए तैनात किया जाता है। यहाँ चुनौती राजमार्ग के साथ सैकड़ों निर्मित क्षेत्रों से है जहाँ से काफिला गुजरता है। जबकि अलर्ट हर वक़्त जारी होता है मगर तब अधिक हो जाता है जब एक काफिला एक निर्मित क्षेत्र से गुजर रहा हो।

आम निगरानी या किसी भी संदिग्ध रूप से चलने वाले वाहनों को पहचानने के लिए ड्रोन सुरक्षा हमेशा एक अध्यारोपित पहलू होगा हालाँकि किसी भी निरंतर आधार पर इसे वहन करने के लिए वर्तमान में कुछ संसाधन हैं। दूसरा सुरक्षा उपाय काफिले के भीतर समर्पित सुरक्षा तत्व है। आमतौर पर एक उप इकाई को एक निर्दिष्ट अवधि के लिए यह कार्य सौंपा जाता है। इस तत्व को पथरक्षक के माध्यम से वितरित किया जाता है, जो अपने स्वयं के वाहनों में स्थानांतरित टुकड़ियों को समर्पित काफिले के खंडों के साथ होता है और यह असुरक्षित वाहनों के द्वारा किए जाने वाले  किसी भी खतरे के प्रति हमेशा सतर्क रहता है। आतंकवादियों के साथ संपर्क की स्थिति में आत्मरक्षा के लिए यात्रियों के बीच कुछ हथियारों के वितरण जैसी प्रथाएँ हैं जो वाहनों को लक्षित करने का प्रयास कर सकते हैं।

जबकि कागज़ पर उपरोक्त सभी चीजें अच्छी हैं मगर याद रखें सड़क सुरक्षा कर्मी सुबह से शाम तक लंबे समय तक ड्यूटी पर होते हैं और इस वजह से शिथिल हो जाते हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि एक आधिकारिक वाहन के रूप में एक असुरक्षित वाहन काफिले को निशाना बनाने के लिए तैयार सड़क के किनारे हो सकता है। ऐसे सभी वाहनों को हटाया जाना चाहिए।

यदि आम नागरिक के वाहनों को किसी विशेष स्थान या खंड के माध्यम से एक काफिले के पारित होने की अवधि के लिए रोक दिया जाता है तो उन्हें हटाने और उन्हें सड़क की निकटता से दूर करना मुश्किल हो सकता है। ऐसी सैकड़ों आकस्मिकताएँ हैं जो उत्पन्न हो सकती हैं और बहुत कुछ सड़क सुरक्षा या काफिला सुरक्षा प्रदान करने वाले सैनिकों के प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर निर्भर करेगा। यही वह जगह है जहाँ सुरक्षा में गड़बड़ियाँ पैदा होती हैं।

2011 में कश्मीर में यातायात की स्थिति ऐसी थी कि जब बड़े काफिले सुबह अपने गंतव्यों के लिए चले जाते थे और शाम को जब आने वाले काफिले वहाँ आते थे, तो श्रीनगर शहर के दो छोर निर्बल हो जाते थे जिससे यह ऑफिस जाने वालों और लौटने वालों के लिए अपने घर या अपने गंतव्य तक पहुँचना असुविधाजनक हो जाता था। नागरिक प्रशासन ने सेना से काफिले की गतिविधि को समन्वित करने का अनुरोध किया जिससे नागरिक यातायात की आवाजाही के लिए स्थान चरम यातायात के घंटों में उपलब्ध रहे और ये पथरक्षक सड़कों पर नागरिक यातायात को बाधित न करे और न ही उन वाहनों से टकराए। सेना ने परीक्षण किया और बिना सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव किए अपने पथरक्षक चलने के समय बदल दिए।

गृह मंत्रालय द्वारा दिए गए दिशा-निर्देश के अनुसार सारे यात्री वाहनों को उस वक़्त रोक दिया जाए जब काफिले रास्ते से गुजर रहे हों और यह निर्देश सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यधिक वांछनीय है विशेष रूप से तब जब आईईडी और कार बमों से पुराने खतरे का आगमन वापस हो चुका हो। हालाँकि इसे कब तक लागू किया जाएगा यह एक सवाल बना हुआ है क्योंकि राज्य सरकार बाद में दबाव डालेगी क्योंकि आम लोग याचिकाएँ दायर करेंगे और उनमे अपनी परेशानियों का उल्लेख भी करेंगे कि किस तरह पुलिस ने उनपर अत्याचार किया और काफिलों की गतिविधि ने किस तरह उनको हताश किया। जैसे ही गर्मियों का आगमन होता है इस निर्देश को समाप्त करने की मांग बढ़ जाएगी। यही कारण है कि पिछली बार भी कुछ समय तक इस बात पर ज़ोर नहीं डाला गया।

लेखक भारत के श्रीनगर आधारित 15 कॉर्पस से संबंधित थे। वर्तमान में वे विवेकानंद अतर्राष्ट्रीय संस्था और शांति एवं संघर्ष अध्ययन संस्थान से जुड़े हैं।