रक्षा
भारतीय महासागर में चीनी विमानवाहक पोत? जानिए क्या कहा जनरल बिपिन रावत ने

बुधवार (25 अगस्त) को भारत के रक्षाकर्मी प्रमुख (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत और यूनाइटेड स्टेट्स के इंडो-पैसिफिक कमांड के प्रमुख एडमिरल जॉन सी ऐक्विलिनो ने दिल्ली में ऑब्ज़र्वर रीसर्च फाउंडेशन द्वारा आयोजित यूएस-भारत साझेदारी पर एक चर्चा में प्रतिभाग किया।

अफगानिस्तान की परिस्थिति और क्वाड के तहत होने वाले समन्वय पर प्रश्नों के अलावा उनसे यह भी पूछा गया कि क्या संभावना है कि चीन प्रशांत एवं भारतीय महासागरों में विमानवाहक पोतों को तैनात करेगा।

इसपर जनरल रावत ने बताया कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी नौसेना (प्लैन) का घातीय विस्तार हो रहा है और संकेत दिया कि चीन प्रशांत महासागर एवं दक्षिण चीन सागर से आगे भी विमानवाहक पोत तैनात कर सकता है।

“देखिए, निस्संदेह ही चीनी जो विमानवाहक पोत बना रहे हैं, वे सिर्फ प्रशांत या दक्षिण चीन सागर के लिए नहीं हैं। निश्चित रूप से वे उससे आगे धावा बोलेंगे क्योंकि वे वैश्विक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं।”, रावत ने कहा।

उन्होंने आगे बताया कि यदि यही चीन की महत्वाकांक्षा है तो सभी महासागरों में उनके विमानवाहक पोत दिखेंगे, हो सकता है यह अमेरिका के तट के निकट हो या वे अफ्रीकी महाद्वीप जा सकते हैं। रावत ने यह भी कहा कि भारतीय नौसेना को प्रोत्साहन दिया जा रहा है और हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

“निश्चित ही, भारतीय महासागर क्षेत्र में उभरते खतरों को हम देख रहे हैं। हमें इस खतरे से निपटना है और सुनिश्चित करना होगा कि आवश्यकता अनुसार हम आपने नौसैनिक बेड़े को विकसित करें ताकि निश्चित रूप से हम कम-से-कम भारतीय महासागर क्षेत्र को तो नियंत्रित कर सकें।”, सीडीएस रावत ने आगे कहा।

अन्य रणनीतिक साझेदारों के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर भी नियंत्रण की बात उन्होंने कही। एडमिरल ऐक्विलिनो ने कहा कि निर्माणाधीन चीन का फ्लैट-डेक विमानवाहक पोत दर्शाता है कि वे एक बड़ा और सक्षम नौसेना बल खड़ा करना चाहते हैं।

ऐक्विलिनो (बाएँ), रावत (दाएँ)

चीन का “विमानवाहक पोत कार्यक्रम निस्संदेह ही उन कार्यक्रमों में से एक है जिनमें सर्वाधिक वृद्धि देखने को मिली है। शुरू में एक पूर्व रूसी वाहक पोत को खरीदा गया और फिर स्वदेशी रूप से दूसरा पोत बनाया।”, ऐक्विलिनो ने कहा।

उनका मानना है कि तीसरा काफी बड़ा पोत होगा जिसमें कैटापुल्ट (प्रक्षेपण के लिए उपयोग होने वाली एक संरचना) और फ्लैट-डेक होगा जो स्पष्ट रूप से एक बड़ी और अधिक सक्षम विमानवाहक बल बनाने की इच्छा दर्शाता है।

“वे कहीं भी परिचालन कर सकते हैं। मैं नहीं कह सकता वह कहाँ होगा। वह भारत के तट के निकट हो सकता है। वह यूनाइटेड स्टेट्स के तट के निकट हो सकता है। प्रश्न यह नहीं है कि वे उन पोतों को कहाँ लेकर जाएँगे, बल्कि यह कि उनका उद्देश्य क्या है।”, यूएस के इंडो-पैसिफिक कमांड प्रमुख ने कहा।

चीन का निर्माणाधीन विमानवाहक पोत, जो कि तीसरा होगा, वह न सिर्फ अपने पूर्ववर्तियों से बड़ा है, बल्कि तकनीक की दृष्टि से भी चीन की एक बड़ी छलांग दर्शाता है। इसमें एक चपटा विमान डेक (जहाज़ की छत) और कैटापुल्ट से सहायता प्राप्त टेक-ऑफ (उड़ान भरना) परंतु सीमित वापसी (कैटोबार) प्रणाली होगा।

इससे पहले चीन के लायोनिंग व शानदोंग विमानवाहक पोतों पर छोटा टेक-ऑफ परंतु सीमित वापस (स्टोबार) प्रणाली थी जो कि भारत के आईएनएस विक्रमादित्य और आईएसी-1 में भी है परंतु अब विमानवाहक पोत से विमान के उड़ान रने और वापसी प्रणाली को चीन ने उन्नत किया है।

आईएनएस विक्रमादित्य पर मिग29के

स्टोबार प्रणाली में अपनी क्षमता का उपयोग करके विमान पोत से उड़ान भरता है जिसमें पोत की चाप पर स्की-जम्प रैम्प उड़ान भरने में सहायता करता है। वहीं, कैटोबार प्रणाली में पोत के फ्लाइट डेक पर बना कैटापुल्ट विमान को उड़ान भरने में यांत्रिकी सहायता भी प्रदान करता है।

दोनों ही प्रणालियों में अरेस्टर तार होते हैं जो शीघ्रता से लेकिन शांति से विमान को धीमा करते हैं जब वह वापसी कर डेक पर उतरता है। चीन के जिबोटी में स्थित विदेशी नौसेना बेस पर एक नया स्तंभ बना है जो प्लैन के विमानवाहक पोतों को सहयोग देने में सक्षम है।

इस बात की जानकारी यूएस-अफ्रीका कमांड के प्रमुख, यूएस आर्मी जनरल स्टीफन टाउन्सेन्ड ने इस वर्ष के अप्रैल में सैन्य सेवाओं पर यूएस गृह समिति को दी थी जिसने उस बात की पुष्टि कर दी जिसे पिछले वर्ष से ही विशेषज्ञ कहते आ रहे थे।

यह बेस अफ्रीका के सींग क्षेत्र में स्थिति है और बाब अल-मंदब के निकट है। अदन की खाड़ी से लाल सागर के द्वार, इस बेस को 2017 में खोला गया था। चीन की पहली विदेशी सैन्य चौकी, इस बेस ने तब से काफी विस्तार किया है।

यह नया स्तंभ 1,120 फीट ऊँचा है व गहरे पानी में स्थित है जो 2020 में बनकर तैयार हो गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि प्लैन के विमानवाहक पोत को संभालने के लिए इसकी लंबाई पर्याप्त है। रोचक है कि यह चीन की चार परमाणु-चालित हमला पनडुब्बियों को संभालने में भी सक्षम है।