रक्षा
चीन-पाकिस्तान से निपटने के लिए भारत को कैसा मज़बूत सिद्धांत अपनाना चाहिए

जाने-माने शैक्षिक कांति बाजपेई की नई पुस्तक इंडिया वर्सस चाइना: वाइ दे आर नॉट फ्रेंड्स में दिखाया गया है कि कितना आवश्यक है कि भारत एक नया भू-राजनीतिक सिद्धांत बनाए। दून स्कूल के पूर्व प्रधानाचार्य बाजपेई, पुराने और अधिकारी संभ्रात-वर्ग के अधिकांश सदस्यों की तरह ही भारत को एक धुंधली दृष्टि से देखते हैं।

24 जून 2021 को द इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख में बाजपेई विषाद-युक्त शैली में लिखते हैं, “अंतर्राष्ट्रीय मामलों, क्षेत्रीय भू-राजनीति, वैश्विक और एशियाई अर्थव्यस्था व तकनीक, एवं समकालीन संस्कृति (कला, संगीत, साहित्य, फैशन) की भी किसी भी बात में ऐसा नहीं होता कि चीन न हो। यही बात भारत के लिए नहीं कही जा सकती है। यदि आप वार्ताओं में भी स्थान नहीं बना पा रहे हैं तो आप नर्म शक्ति नहीं हैं।”

आगे वे लिखते हैं, “चीन भय को जाग्रत करता है; भारत मौन को, विनम्रता से सिर को हिलाना या झुंझलाहट। सम्मान प्राप्त करने में प्राचीन भारत भले ही प्रचीन चीन के समकक्ष था लेकिन समकालीन भारत काफी दूरी से पीछे रह गया है। जब तक हम इसे नहीं समझते, हम इसके लिए अधिक कुछ नहीं कर सकते।”

हमारे रणनीतिक विचारकों के साथ क्या समस्या है, यह बात उसे समाहित कर देती है। बाजपेई, प्रताप भानु मेहता, कौशिक बसु और अन्य भाग्यवादी हर समाधान में एक समस्या देखते हैं, न कि हर समस्या में एक समाधान।

ऐसा ही हमने 1 जुलाई 2021 को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की 100वीं वर्षगाँठ को “मनाते” हुए भारतीय मीडिया में आई लेखों की बाढ़ में देखा जहाँ सीसीपी के मानवाधिकार उल्लंघनों और अतिरिक्त भूभागीय आक्रामकता को चमकदार सतह से ढकने का प्रयास किया गया।

सरकार को भारत की ठोस और नर्म शक्ति का लाभ उठाना चाहिए तथा एक सुसंबद्ध भू-रणनीतिक नीति वास्तुशिल्प का निर्माण करना चाहिए। ठोस शक्तियों की श्रेणी में आर्थिक और सैन्य बल एवं इन दोनों बलों को दिखाने का सामर्थ्य आएगा। पिछली सरकारों ने ऐसा करने में संकोच किया है।

धीमी शुरुआत के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सड़कों, पुलों, सुरंगों और सैन्य बेसों का निर्माण चीन के साथ लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के निकट करके अपनी मानसिकता दिखा दी है।

अटल सुरंग वेबिनार पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

एलएसी पर पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का सामना करने के लिए 50,000 अतिरिक्त बलों की पुनः तैनाती एक और संकेत है। इससे कई युद्ध लड़कर मज़बूत हुए- 32 वर्षों से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और घुसपैठ गतिविधियों से निपटने वाले सैन्य वरिष्ठ- भारत के सैन्य बलों को चीन के साथ संघर्ष में लाभ मिलेगा।

बीजिंग ने सीमा की अपनी तरफ स्थाई सैन्य बेसों समेत महत्त्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया है लेकिन छलपूर्वक कहता है कि भारत को ऐसा नहीं करना चाहिए। चीन को अपेक्षा नहीं थी कि पूर्वी लद्दाख की सीमा पर एक वर्ष से अधिक भारत उसकी आँख-से-आँख मिलाकर खड़ा रहेगा।

साथ ही भारत ने चीनी तकनीकी कंपनी हुआवे को भारत के 5जी से दूर रखा है और चीनी कंपनियों के भारत में निवेश पर कई प्रतिबंध लगाए हैं। संदेश स्पष्ट है- सब कुछ सामान्य नहीं चलने वाला जब तक कि सीमा पर सामान्य स्थिति नहीं लौट जाती।

नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर युद्धविराम के बाद पाकिस्तान के साथ संबंधों में देखी गई शांति का आंशिक कारण है कि पाकिस्तान ने गणना की कि उसे आतंकी गतिविधियों को पुनः शुरू करने से पहले आर्थिक और रणनीतिक रूप से तैयार होने के लिए थोड़ा समय चाहिए।

और अब यह अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया है, जैसा कि हाल में जम्मू एयर बेस पर विफल ड्रोन हमले में देखा गया। एलएसी पर चीन को रोकने की भारतीय सैन्य शक्ति ने इस्लामाबाद को क्षेत्र में बदलते शक्ति संतुलन के प्रति चिंतित कर दिया है।

अंततः भारत भी उपभोक्ता बाज़ार में अपनी शक्ति का लाभ उठाने लगा है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की भारत में बाढ़-सी आ गई है और रिकॉर्ड गति पर निवेश जारी है। अपेक्षा है कि सऊदी अरमको रिलायंस उद्योग के तेल से रसायन (ओटूसी) व्यापार में 15 अरब डॉलर (यानी 1.15 लाख करोड़ रुपये) का निवेश करेगा जिससे एफडीआई की गति बढ़ेगी।

भारतीय नीति निर्माताओं ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों में लंबे समय से संकोची प्रवृत्ति अपनाई है। अब इसे बदलना ही होगा। भारतीय नेताओं को अधिक-से-अधिक मुखर होकर जी3 विश्व व्यवस्था के लिए तैयारी करनी चाहिए जिसमें विश्व की तीन सबसे बड़ी भावी अर्थव्यवस्थाएँ होंगे- यूनाइटेड स्टेट्स, चीन और भारत।

चीन चाहता है कि सिर्फ वह और यूएस रहें जी2 सत्ता संरचना में लेकिन बीजिंग और वाशिंगटन दोनों जानते हैं कि भारत एक बढ़ती हुई आर्थिक और सैन्य शक्ति है जिसके पास 1 अरब उपभोक्ताओं के बाज़ार की संभावना भी है जो उसे एक अपरिहार्य सहयोगी और एक खतरनाक शत्रु बनाता है।

सितंबर 2014 में अहमदाबाद के साबरमती रिवरफ्रंट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जो अपने पक्ष में करने का प्रयास किया था, वह बहुत पहले धूमिल हो चुका है। बीजिंग ने भारत को अमेरिका की भू-राजनीतिक कक्षा से बाहर रखने के लिए धमकाना, दबाव बनाना और कभी-कभी कूटनीति जैसे हथकंडे अपनाए हैं।

लेकिन पूर्वी लद्दाख की गतिविधियाँ दर्शाती हैं कि यह योजना विफल रही है। यूएस और पश्चिमी विश्व एवं पूर्वी एशिया में कई लोकतत्रों का गठबंधन मानता है कि कम्युनिस्ट चीन की युद्ध-प्रेमी प्रवृत्ति को उत्तर देने के लिए भारत अंतर्राष्ट्रीय तंत्र का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

अरब सागर, भारतीय महासागर और दक्षिण प्रशांत महासागर के वृत्त-चाप में एक महत्त्वपूर्ण बिंदु पर भारत स्थित है। यूएस और चीन के बीच संतुलन की धुरी की तरह भारत के पास एक भू-राजनीतिक बढ़त है जिसका लाभ अभी तक इसने पूर्ण रूप से नहीं उठाया है।

महत्त्वपूर्ण है कि पद संभालने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइन ने अपनी कुछ शुरुआती वर्चुअल बैठकों में से एक क्वाड समूह के नेताओं के साथ की थी जिसमें भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूएस भागीदार हैं। इसके अलावा ब्रिटेन ने अपना सबसे बड़ा विमान कैरियर एचएमएस क्वीन एलिज़ाबेथ भारतीय नौसेना और क्षेत्र के अन्य समुद्री राज्यों को समर्थन दिखाने के लिए भारतीय महासागर में भेज दिया है।

भारत को अब जी3 मानसिकता के साथ एक दशक आगे का सोचना होगा। इसके पास महत्त्वपूर्ण आर्थिक, सैन्य और वित्तीय शक्तियाँ हैं जिनका उपयोग नीति निर्माताओं ने अभी तक नहीं किया है। भारत की संदेश प्रणाली भी अल्पविकसित है।

चीन नैरेटिव पर नियंत्रण रखता है। भारतीय पत्रकारों को पूर्व में नियमित यात्राओं के तहत चीन ले जाया गया है और बीजिंग के तकनीकी साज-समान पर लिखने को कहा गया है जिसमें शिनज़ियांग में अत्याचारों और हॉन्ग कॉन्ग व तिब्बत में विरोध को दबाने के क्रूर प्रयासों को अनदेखा कर दिया जाता है।

एक मज़बूत चीन-पाकिस्तान सिद्धांत बनाने में भारतीय नीति निर्माताओं को एक उभरती हुई शक्ति की तरह संवाद करना चाहिए यानी प्रतिक्रियात्मक रवैये की जगह सक्रियता अपनानी होगी। लंबे समय से पश्चिमी मीडिया ही वैश्विक नैरेटिव गढ़ रहा है। वहीं चीन ने कई पश्चिमी मीडिया संस्थानों और नीति थिंक टैंकों के वित्तपोषण से बीजिंग के विरूपित नैरेटिव को बढ़ावा दिया है।

एक उभरती हुई शक्ति बनने के लिए भारत को व्यवहार और वाणी में भी यही दिखाना होगा।

मिनहाज़ मर्चेंट लेखक एवं प्रकाशक हैं।