रक्षा
1971 के युद्ध में जिसे नष्ट किया था, उस मोंगला बंदरगाह पर पहुँचे दो भारतीय युद्धपोत

स्वर्णिम विजय वर्ष उत्सव में दो भारतीय युद्धपोतों- जंगी जहाज़ आईएनएस कुलीश और गश्ती वाहन आईएनएस सुमेधा ने कल (8 मार्च) को बांग्लादेश के मोंगला स्थित बंदरगाह पर पहली बार कॉल लगाई। 50 वर्ष पहले 1971 के युद्ध के दौरान भारतीय नौसेना और मुक्ति बाहिनी के जानबाज़ ऑपरेशन में इसपर हमला हुआ था।

पसुर नदी पर स्थित और सुंदरबन मैंग्रोव जंगल से घिरा हुआ मोंगला बंदरगाह चट्टोग्राम के बाद पूर्वी पाकिस्तान का सबसे व्यस्त बंदरगाह था। इस समुद्री कंठ पर हमले से पाकिस्तानी सेना को रोका जा सकता था और यही भारतीय नौसेना तथा मुक्ति बाहिनी ने अपने संयुक्त ऑपरेशन “हॉट पैन्ट्स” से किया था।

योजना थी कि पूर्वी पाकिस्तान में युद्ध के लिए तैयारी कर रही पाकिस्तानी बलों को हथियार व रसद आपूर्ति करने वाले व्यापारी जहाज़ों को निशाना बनाया जाए। कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट द्वारा परिचालित दो उपयोगी जहाज़ों- पलाश और पद्मा को सितंबर 1971 में पश्चिम बंगाल सरकार से लेकर पाकिस्तान के विरुद्ध यह गुप्त ऑपरेशन करने के लिए एक इकाई का रूप दिया गया।

“इन जहाज़ों को खुले समुद्र में तैरने के लिए रूपांतरित नहीं किया गया बल्कि बंदरगाह की सीमाओं के बाहर भी इन्हें काम करने की अनुमति नहीं थी। उन्हें संचार प्रणालियों, षष्ठक, राडार और गायरो दिशासूचक यंत्र से वंचित रखा गया था…”, 1971 के युद्ध में एक गुप्त नौसैनिक अभियान का प्रभार संभालने वाले एमएनआर सामंत ने बताया।

सामंत ऑपरेशन “हॉट पैन्ट्स” का भी भाग थे और इंडिया टुडे के कार्यकारी संपादक संदीप उन्नीथन के साथ लिखी पुस्तक ऑपरेशन एक्स- दि अनटोल्ड स्टोरी ऑफ इंडियाज़ कोवर्ट नेवल वॉर इन ईस्ट पाकिस्तान में भी इसका उल्लेख करते हैं।

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कोलकाता के गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजिनीयर्स (जीआरएसई) शिपयार्ड में जहाज़ों को रूपांतरित कर 40 एमएम एल-60 हवा में मार करने वाली बंदूक लगाई गई। पोर्ट ट्रस्ट के काले-पीले रंग को ढकने के लिए युद्ध के ग्रे रंगा से जहाज़ों को रंगा गया और एमवी या मोटर वेस्सल का उपनाम जोड़ा गया।

एमवी पलाश और एमवी पद्मा का संचालन मुक्ति बाहिनी का दल कर रहा था जिसमें पाकिस्तानी नौसेना को छोड़ देने वाले पूर्वी पाकिस्तान के नौसेना अधिकारी थे। “इस प्रकार अक्टूबर के आरंभ में जीआरसीई के मंच पर बांग्लादेश नौसेना का जन्म हुआ।”, सामंत और उन्नीथन पुस्तक में लिखते हैं।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के यूएस के राष्ट्रपति रिचर्च निक्सॉन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किस्सिंगर से वाइट हाउस में मिलने के कुछ दिनों बाद 8 नवंबर 1971 को ऑपरेशन ‘हॉट पैन्ट्स’ चल रहा था। “पलाश और पद्मा के इंजन की गड़गड़ाहत बोफोर्स के आगे-पीछे थी,” पुस्तक में इस ऑपरेशन का उल्लेख है।

“…मिशन का कोड था- ‘अनवर के निकट कछुए अंडे देंगे।’- इसमें समुद्री जीव-विज्ञान की बात नहीं थी”, ऑपरेशन ‘हॉट पैन्ट्स’ के विषय में लेखक बताते हैं। पेट्याश्रेणी कके जंगी जहाज़ आईएनएस कवरत्ती ब्रिटिश 175 किलोग्राम वजनी ए-मार्क7 प्रभावी माइन्स लेकर चल रहा था। इन्हें सबसे घातक माइन्स माना जाता था।

“ऊपर से गुज़रते जहाज़ का बड़ा चुंबकीय क्षेत्र लगभग 100 किलोग्राम के उच्च विस्फोटकों को ट्रिगर कर सकता था जिससे निकला गैस का गुब्बार ऊपर स्थित जहाज़ को ध्वस्त कर देता।”, लेखक बताते हैं।  पद्मा का पोर्ट इंजन जब खराब हो गया, तब भी यह मिशन नहीं रुका। पाँच घंटे के ऑपरेशन में आईएनएस कवरत्ती में सवार अभियंताओं ने इसे ठीक कर दिया।

अगले दिन कार्य दल ने 090 डिग्री पूर्व देशांतर को पार कर लिया जो पूर्वी पाकिस्तान के क्षेत्र के पानी में प्रवेश का द्योतक था। “जैसे ही जहाज़ शत्रु क्षेत्र में घुसे, सैनिकों में उत्साह आ गया। गन बोट दल ने बांग्लादेशी झंडा निकाला जिसमें हरे के बीच एक लाल गोला था और नारंगी रंग से उस गोले में उनके देश का झंडा बना हुआ था।”, लेखक बताते हैं।

अनवर फेयरवे समुद्री निशान तक गनबोट्स पहुँच गईं और अपना काम करने लगीं, वहीं आईएनएस कवरत्ती कुछ दूरी पर रहकर शांति से यह दृश्य देख रहा था। “रात 9.30 बजे दोनों जहाज़ फेयरवे लाइट निशान पर पहुँचे और दो समुद्री मील दूर स्थित कवरत्ती ने दो बार लाल बत्ती को निमिष भर के लिए जलाया। यह संकेत था कि कछुओं को अंडे दे देने हैं।”, दस्तावेज़ कहता है।

घोर अंधकार में राडार के बिना यात्रा करते हुए पोत पूर्वी पाकिसतान के दूसरे सबसे बड़े बंदरगाह पर पहुँच गए और उसके मुहाने पर विस्फोटकों से आड़ी-तिरछी दो लकीरें खींच दी, जबकि आईएनएस कवरत्ती भारतीय पानी में ही था।

लेकिन मध्यरात्रि में आईएनएस कवरत्ती को एक राडार संकेत मिला जो कि ब्रिटिश व्यापारी जहाज़ एमवी सिटी ऑफ सेंट अलबन्स का था। वह कार्य दल से 15 समुद्री मील दूरी पर स्थित था लेकिन 15 मिनट बाद वह और निकट आ गया। कार्य दल ने चार एल-40 बंदूकों से निशाना साधकर जहाज़ को दिशा परिवर्तित करने के लिए विवश कर दिया।

मुक्ति बाहिनी समुद्री इकाई का यह पला आमना-सामना था जिसने कुछ देर पहले ही मोंगला बंदरगाह पर माइन्स बिछाई थी। कुछ घंटों बाद, “खुलना चैनल से विस्फोट की आवाज़ सुनाई दी। पानी का गुब्बार उठा। कछुए का पहला अंडा फूट चुका था।”, सामंत और उन्नीथन लिखते हैं।

पद्मा और पलाश ने बांग्लादेशी झंडे को नीचे किया, अपनी बंदूकों को ढका और बंगाल की खाड़ी की ओर वापस चल दिए। ऑपरेशन ‘हॉट पैन्ट्स’ का पहला चरण पूरा हो चुका था।