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अरुणाचल प्रदेश को चीन ने क्यों बनाया कूटनीतिक मुद्दा और अपनाई नपी-तुली मुद्रा

अरुणाचल प्रदेश की सीमा के निकट चीन ने हाल ही में विश्व की सबसे गहरी मानी जाने वाली ब्रह्मपुत्र घाटी में एक रणनीतिक राजमार्ग बनाया है। 67.22 किलोमीटर लंबा यह राजमार्ग नाइंगची की पैड टाउनशिप को मेडोग काउंटी से जोड़ता है।

ब्रह्मपुत्र को तिब्बत में यरलुंग त्संगपो कहा जाता है। यरलुंग त्संगपो महाघाटी की अधिकतम गहराई 6,009 मीटर की है। इस घाटी के ऊपर चीन की एक बांध बनाने की योजना भी है। 31 करोड़ डॉलर की लागत से बना यह राजमार्ग इस बांध निर्माण में सहायक हो सकता है।

इस मार्ग को पूरा करने के लिए 2,114 मीटर लंबी एक सुरंग भी बनाई गई और इस राजमार्ग के बन जाने से मेडोग पहुँचने के यात्रा समय को आठ घंटे कम किया जा सकता है। मेडोग तिब्बत का अंतिम ग्राम है और फिर अरुणाचल प्रदेश की सीमा आ जाती है।

रोचक है कि चीन अरुणाचल प्रदेश को भारत का एक राज्य नहीं बल्कि दक्षिण तिब्बत का एक भाग मानता है। भारत उसके इस दावे का खंडन करता है लेकिन चीन अरुणाचल प्रदेश में भारतीय नेताओं की आवाजाही का भी विरोध करता है।

इसी कारण जब अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले में चीन के एक गाँव बसाने का समाचार जब इस वर्ष की शुरुआत में आया था तो चीन का यही उत्तर था कि उसने अपने क्षेत्र में निर्माण किया है और यह उसका संप्रभु अधिकार है।

नवंबर 2020 के सैटेलाइट चित्रों में देखा जा सकता है कि इस गाँव में लगभग 100 संरचनाएँ हैं, वहीं अगस्त 2019 के सैटेलाइट चित्र में ऐसी कोई संरचना नहीं दिखती। इसका अर्थ हुआ कि भारत-चीन के वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव के बीच यह निर्माण कार्य हुआ है।

जहाँ यह गाँव बसाया गया है, वह क्षेत्र 1959 से चीन के अधीन है। 1950 के दशक में भारतीय और चीनी बलों के बीच इस क्षेत्र में संघर्ष हुआ था। 1959 में भारतीय राजदूत ने चीन के विदेश कार्यालय को इस अतिक्रमण की शिकायत की थी।

इस क्षेत्र में गाँव भले ही नया हो लेकिन चीन की सैन्य चौकी दशकों से यहाँ है। पिछले दो दशकों में चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने इस क्षेत्र में काफी इंफ्रास्ट्रक्चर विकास किया है और यह गाँव सैन्य चौकी से 1 किलोमीटर उत्तर में स्थित है।

1914 में जब भारत में ब्रिटिश राज था, तब तिब्बत की सरकार के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। ब्रिटिश सरकार के एक प्रशासक- सर हेनरी मैकमोहन तिब्बत सरकार के प्रतिनिधि के साथ समझौता करने वाले व्यक्ति थे।

उन्हीं के नाम पर तिब्बत और भारत की सीमा को मैकमोहन लाइन का नाम दिया। लेकिन, चूँकि चीन तिब्बत को स्वायत्त नहीं मानता है, इसलिए उसने तिब्बत सरकार द्वारा हस्ताक्षर किए इस समझौते को भी कभी नहीं माना।

वहीं, दूसरी ओर भारत में मैकमोहन लाइन को दर्शाता हुआ मानचित्र आधिकारिक रूप से 1938 में प्रकाशित हो गया था और तब ही से मान्य है। 1954 में पूर्वोत्तर सीमांत एजेंसी (नेफा) अस्तित्व में आई। 1962 के युद्ध में चीन ने इस क्षेत्र पर भी अतिक्रमण कर लिया था लेकिन पीछे हट गया।

पीछे हटने का कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि सक्रिय नियंत्रण की बजाय चीन इस क्षेत्र को एक कूटनीतिक मुद्दा बनाना चाहता है। सक्रिय नियंत्रण से चीन अब तक इसलिए बचता रहा है क्योंकि अरुणाचल के लोगों का समर्थन इसे प्राप्त नहीं है।

उल्टा 1962 के युद्ध के बाद अरुणाचल प्रदेश शेष भारत के और निकट हो गया। युद्ध के लिए सुरक्षाबल अरुणाचल के सीमांत क्षेत्रों में गए। उस समय तक उनके लिए पर्याप्त सुविधाएँ विकसित नहीं थीं इसलिए सुरक्षाबलों को ग्रामीणों की सहायता लेनी पड़ी।

अरुणाचल प्रदेश में जसवंतगढ़ युद्ध स्मारक

इस प्रकार उनके संबंध विकसित हुए और असमी की बजाय हिंदी भाषा वहाँ प्रचलित होती चली गई। हिंदीतर-भाषी राज्यों में से शायद अरुणाचल ही ऐसा राज्य है जहाँ की विधान सभा में हिंदी बोली जाती है, विभिन्न जनजातियाँ भी आपस में बातचीत के लिए हिंदी का उपयोग करते हैं।

वहीं, दूसरी ओर 1986 से चीन ने फिर इस क्षेत्र में आक्रामक मुद्रा अपनाना शुरू कर दिया। अरुणाचल प्रदेश के निकट चीनी सेना की स्थाई संरचनाएँ दिखने लगीं। 2000 से चीन की अग्रिम चौकी बनी हुई है। बदले में भारतीय सेना ने भी सीमा के निकट कुछ संरचनाएँ बनाईं।

बात गाँव बसाने की हो तो सिर्फ अरुणाचल प्रदेश नहीं, बल्कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश तक भी भारत-तिब्बत सीमा के निकट चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) की “ज़ियाओकांग ग्राम” परियोजना चला रही है जिसके तहत 628 गाँव विकसित किए जा रहे हैं।

21 हिमालयी सीमा क्षेत्रों में बसे इन सीमांत गाँवों में 62,160 परिवार व कुल 2,41,850 लोग रहते हैं। इन गाँवों के बसाने के पीछे चीन का उद्देश्य है कि भारत सीमा पर एक बफर का निर्माण हो सके और सीसीपी के प्रति निष्ठावान ये लोग बीजिंग के बेहतर नियंत्रण में सहायक हों।

वहीं, चिंता की बात है कि भारत के सीमावर्ती गाँवों से लोग पलायन कर रहे हैं और जनसंख्या कम हो रही है। चीन की सीमा से लगे उत्तराखंड के तीन जिलों- उत्तरकाशी, चमोली और पिथौरागढ़ा- के 180 गाँवों का अस्तित्व समाप्त हो गया है।

इनमें से कम-से-कम नौ गाँव सीमा से 5 किलोमीटर के दायरे में थे। स्थानीय लोगों के न रहने से चीन को अतिक्रमण की और छूट मिल जाती है। भारत के सीमांत गाँव जहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं चीन इन गाँवों में बेहतर सुविधाओं के लिए खर्च कर रहा है।

उत्तराखंड का खाली गाँव

2017 में नए घरों, परिवहन, ऊर्जा, बिजली व संचार इंफ्रास्ट्रक्टर एवं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए 4.6 अरब डॉलर आवंटित किए गए थे। इन गाँवों को बसाने में चीन जनसांख्यिकी का भी ध्यान रख रहा है ताकि वह सीसीपी के प्रति ग्रमीणों को निष्ठा को लेकर आश्वस्त रह सके।

अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले में भी हाल में बना गाँव ज़ियाओकांग योजना के तहत बना है। अगस्त 2020 में एलएसी तनाव के बीच चीन के विदेश मंत्री वांग यी तिब्बत के सीमा क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और ग्राम निर्माण का निरीक्षण भी करने गए थे।

ज़ियाओकांग गाँवों में से एक पंगदा गाँव भी है जो भूटानी सीमा के 2.5 किलोमीटर भीतर डोकलाम के निकट बसाया गया है। इन गाँव में चीन तिब्बती मूल के लोगों की बजाय हान चीनी लोगों को बसा रहा है ताकि तिब्बती संस्कृति को भी धीरे-धीरे मिलाया जा सके।

इस प्रकार चीन सक्रिय अधिकार स्थापित करने के प्रयास से पहले अरुणाचल से निकटता बढ़ाने और सीमांत लोगों को विश्वास जीतने के लिए एक दूसरी रणनीति अपना रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 2006 से ही चीन ने अरुणाचल प्रदेश को दक्षिण तिब्बत का भाग कहना शुरू किया।

साथ ही, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास जारी है। हाल में जो राजमार्ग बना है, वह पहले नाइंगची की पैड टाउनशिप और मेडोग की बाइबंग टाउनशिप के बीच का हाइकिंग मार्ग था। इससे पहले मेडोग को बॉम्बी काउंटी के झमोग टाउनशिप से जोड़ने के लिए सड़क बन चुकी है।

2021-25 में चीन की पंचवर्षीय योजना में अरुणाचल के निकट बांध बनाने को अनुमति दे दी गई जिसपर पनबिजली परियोजना भी होगी। हालाँकि, विशेषज्ञों को इस परियोजना से भूस्खलन की समस्या होने की चिंता है। स्वयं चीनी अभियंता भी चुनौती का सामना कर रहे हैं।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।