रक्षा / राजनीति
क्यों नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल रक्षा सौदों और क्रय की दृष्टि से यू.पी.ए. सरकार से बेहतर रहा

राफेल सौदे पर अब भी कोलाहल मचा हुआ है और विपक्ष ने आने वाले चुनावों को मद्देनज़र रखकर मुद्दे का पूर्णतः राजनीतीकरण कर दिया है। लेकिन तथाकथित राजनीतिक पंडित इस तथ्य की उपेक्षा कर रहे हैं कि पिछले पाँच वर्षों में भारत एक सशक्त रक्षा राज्य के रूप में उभरा है।
इस लेख के माध्यम से ना मैं ‘मेक इन इंडिया’ जैसी सरकारी पहलों का प्रचार कर रहा हूँ, ना ही आलोचकों पर प्रहार कर रहा हूँ। मेरा प्रयास है, एक सैनिक के सकारात्मक दृष्टिकोण से देखना और यह महसूस करना कि वर्तमान सरकार के क्रांतिकारी प्रयासों से एक सैनिक को क्या अनुभव होता होगा और कैसे एक आम आदमी इन रक्षा सौदों को देख सकता है। इस लेख के लिए मेरा संदर्भ गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जेम) पोर्टल https://gem.gov.in/ और https://eprocure.gov.in/cppp/ हैं। ये पोर्टल रक्षा व अन्य क्रयों का ब्यौरा प्रस्तुत करते हैं। यदि कोई ध्यान से देखे तो पाएगा कि सरकार के द्वारा जारी की गई क्रय सूचनाओं की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई है जो यह दर्शाती है कि यह सरकार जवानों की सुरक्षा के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं कर सकती और सुरक्षा की दृष्टि से भारत को सशक्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।
कैपिटल प्रोक्योर्मेंट रूट के माध्यम से 1,86,138 बुलेटप्रूफ जैकेट के क्रय के अनुबंध पर मुहर लगाई गई है और सेना की ज़रूरतों का मूल्यांकन एक कसे हुए मैदानी सर्वे द्वारा हुआ था। इस प्राप्ति को 2009 तक रोककर रखा गया था और यू.पी.ए. की दूसरी सरकार ने भी इसके लिए कोई शीघ्रता नहीं दिखाई। मुंबई में 26/11 के हमलों के दौरान पुलिस अधिकारी करकरे, कामटे और सालासकर की मौत भी एक्सपायर्ड बुलेटप्रूफ जैकेट के कारण हुई थी लेकिन इससे पिछली सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा।
केवल बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं बल्कि सरकार ने रक्षा उपकरण विनिर्माण उपक्रमों की स्थापना में भी तेज़ी दिखाई है जो गोलियों, हथियारों और गोला-बारूद का निर्माण करती है। इससे विशिष्ट आर्थिक ज़ोन की स्थापना को भी प्रोत्साहन मिला है। जो सरकार रक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता बढ़ाना चाहती है उसे निजी कंपनियों को न्यौता देना ही होगा जिससे हम अंतर्राष्ट्रीय तकनीकों का उपयोग कर पाएँ और साथ ही पूंजी को भी आमंत्रित कर सकें क्योंकि रक्षा एक पूंजी-आधारित विषय है। बोली लगाने के लिए एक खुला मंच स्थापित किया गया है जिससे निजी कंपनियाँ इस प्रकार बोली लगा सकें जो सरकार और उनके, दोनों के लिए ही लाभकारी हो। चर्चा और विस्तार का क्षेत्र खुला है जो हमारे लिए एक अच्छा संकेत है और रक्षा संस्थाओं के पैरवीकर्ताओं का सफाया कर दिया गया है। अब मंत्रालय सीधे तौर पर निर्माता कंपनियों से ही वार्ता करता है जो सबसे अच्छी बात है।
पैदल सेना टुकड़ी के आधुनिकीकरण के लिए प्राप्ति योजना हाल ही में बनाई गई है जिसके अंतर्गत हम विशाल संख्या में हल्की मशीन गन, युद्ध कार्बाईन और हमलावर राइफल चालीस हज़ार करोड़ रुपए की लागत पर खरीदकर पुराने हथियारों की जगह प्रतिस्थापित करेंगे। एक आम दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है कि जिन कंपनियों का उत्पाद उन्नत है, उन्हें अवसर दिया जा रहा है जिससे सेना की ज़रूरतों के हिसाब से निविदा को अनुकूलित किया जा सके, ना कि सेना को उत्पादों के अनुसार स्वयं को ढालना पड़े। सात लाख राइफल, 44 हज़ार हल्की मशीन गन और लगभग 44,600 कार्बाईन की व्यापक क्रय प्रक्रिया का निर्णय लिया जा चुका है और इस प्राप्ति में सेना और रक्षा मंत्रालय एक साथ हैं।
आज तक रक्षा व्यापार को अंतरंग, अतिनियंत्रित और कठोर शर्तों पर आधारित उद्यम माना जाता था इसलिए भागीदारों की कमी रहती थी लेकिन वर्तमान सरकार के प्रयासों के कारण वैज्ञानिक और शोधकर्ता उद्यमियों के साथ मिलकर आगे आ रहे हैं और सरकार का अपनी पूरी क्षमता से समर्थन कर निविदा प्रक्रिया में भाग ले रहे हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विकसित बुंदेलखंड रक्षा गलियारा रक्षा गतिविधियों के लिए पाँच हज़ार हेक्टेअर की भूमि उपलब्ध कराएगा। इसकी विशेष बात है कि यह कानपुर और अलीगढ़ के निकट है और साथ ही दिल्ली से इसकी अच्छी संयोजकता है।
कानूनी तौर पर बात करें तो वाणिज्य मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर लाइसेंस और अनुज्ञा-पत्रों की संख्या में भी कटौती की है जिससे उद्यम स्थापित करना आसान हो गया है। रक्षा प्राप्ति नियमावली और सामान्य वित्तीय नियम, 2017 जो इन क्रयों का आधार हैं, वे पहले के नियमों से अधिक आसान हैं।
जब हम उत्तरोत्तर सरकारों की उपलब्धियाँ देखते हैं तो नरसिम्हा राव सरकार (1991-1996) को इस देश के आर्थिक सुधार का अग्रदूत मानते हैं। यदि सदृश रूप में देखा जाए तो मैं कहूँगा कि वर्तमान सरकार के कारण हथियारों के लिए आयात निर्भरता बहुत ही कम हो गई है और विशुद्ध आर्थिक समझ से यह बात मानी जा सकती है कि यह सरकार इतिहास में रक्षा सुधार के अग्रदूत के रूप में अपना नाम अंकित करेगी।