विचार
मृत्यु से भयभीत होना अज्ञानता है, जानें मृत्योपरांत कैसी होती है आत्मा की यात्रा

हमारे ब्रह्मांड में विद्यमान संसार और मानव जीवन अनेक रहस्यों से भरा पड़ा है। स्वयं विज्ञान का मानना है कि आज मानव जाति मात्र 5-6 प्रतिशत ही इन रहस्यों के बारे में जानती है जिनमें मृत्यु का रहस्य सर्वाधिक क्लिष्ट है। अतः मृत्यु से जुड़े रहस्यों का अन्वेषण आदि काल से होता आया है।

इनमें मृत्योपरांत आत्मा की यात्रा और उससे जुड़ी विभिन्न घटनाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त करना तथा जन्म के पूर्व के जीवन का ज्ञान मानवीय उद्यम का एक आकर्षण रहा है। संभवतः इसीलिए लगभग सभी संस्कृतियों और उनके धर्मशास्त्रों में मृत्यु के बारे में गहन चिंतन हुआ है।

हिंदू धर्म में गरुण पुराण विशेष रूप से एक मनुष्य की आत्मा द्वारा मृत्योपरांत की गई क्रमिक यात्रा तथा कर्मानुसार- दंड या पुरस्कार- अर्थात् स्वर्ग या नर्क में किए गए कर्मों के अनुसार फलों के भोग का क्रमबद्ध वर्णन करता है। ईसाई, पारसी, जोराष्टियन, इस्लाम तथा अन्य संस्कृतियों में भी मृत्यु के बाद शरीर से मुक्त हुई आत्मा की यात्रा का उल्लेख है।

इस भूलोक पर विभिन्न जीव-जंतुओं के समान मानव जीवन भी एक रहस्यपूर्ण ज्ञान है क्योंकि जन्म के पूर्व या मृत्यु के उपरांत एक मनुष्य या कोई भी भूलोकवासी कहाँ और किस रूप में रहता है जिसका निश्चित और प्रमाणिक ज्ञान आज भी अनुपलब्ध है।

अतः ऐसी परिस्थिति में उक्त जानकारी हेतु ज्ञान की विभिन्न शाखाओं-प्रशाखाओं तथा चिंतक एवं दार्शनिकों, प्राचीन ऋषियों एवं मनीषियों के गहन अध्ययन एवं मनन के परिणामस्वरूप उत्पन्न विभिन्न विचारों ने ज्ञान के क्षेत्र में अनेक मत-मतान्तरों को जन्म दिया है जो यदा-कदा भ्रमपूर्ण, विवादास्पद तथा मिथ्या समझे जाते हैं।

यह तो निर्विवाद रूप से प्रमाणित है कि मृत्यु उस अवस्था का नाम है जब एक जीवन अपनी संपूर्ण चेतना खो देता है तथा उसका शरीर निर्जीव होकर शव में परिवर्तित हो जाता है। पुनः यह भी प्रमाणित हो चुका है कि जब एक जीव के भौतिक शरीर में विद्यमान प्राणतत्व या आत्मा बाहर निकल जाती है तब उसकी मृत्यु स्वीकार कर ली जाती है।

स्वाभविक रूप से तब यह प्रश्न उठता है कि मृत शरीर से निकला प्राणतत्व या आत्मा कहाॅं जाती है क्योंकि वह अदृश्य होती है जिसे हम मनुष्य अपनी आखों से न तो देख पाते हैं, न ही सूंघ या सुन पाते या स्पर्श कर पाते हैं।

हाल ही के वर्षों में यद्यपि चिकित्सकों या वैज्ञानिकों-शोधकर्ताओं ने मृत्यु के समीप पहुॅंच रहे व्यक्ति के शरीर से उसकी मृत्यु के ठीक बाद निकलने वाले प्राणतत्व या आत्मा के चित्र को एक सशक्त तथा संवेदनशील कैमरे में रिकार्ड करने का दावा किया जो मृतक के भौतिक शरीर जैसा था तथापि तरल रूप में आकारहीन तैरता हुआ ऊपर की ओर जाता देखा गया है।

स्वाभाविक रूप से यह ऊपर की ओर जाने वाला प्राणतत्व क्या है और यह कहाॅं जाता है? इस प्रश्न पर सभ्यता के आरंभ से ही चिंतन होता आया है जो आध्यात्मिक-धार्मिक, दार्शनिक या वैचारिक स्तर पर समाधि या सम्मोहन के द्वारा तथा विज्ञान के आगमन के साथ इंद्रियजनित, प्रमाणिक या सत्यापनीय ढंग से भी हो रहा है।

चूँकि यह मुख्य रूप से मानसिक या वैचारिक प्रश्न है, अतः सामाजिक विज्ञानों के विकास के साथ मनोविज्ञान विषय के अंतर्गत वर्णित मनुष्यों के उपचेतन- जो मनोवैज्ञानिकों के अनुसार असीमित मानसिक शक्तियों का भंडार है- के द्वारा इस बह्मांड के विभिन्न रहस्यों का अन्वेषण किया जा सकता है तथा आध्यात्मिक एवं पारलौकिक जगत में होने वाली घटनाओं का भी गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया जा सकता है।

चूँकि मृत्यु के उपरांत भौतिक शरीर से निकलने वाली आत्मा या प्राणशक्ति के उध्र्वाधर गति का उल्लेख लगभग सभी धार्मिक आध्यात्मिक ग्रंथों और सांस्कृतिक परिवेश में हुआ है जो प्रकारांतर से मनोविज्ञान के अंतर्गत पास्ट लाइफ रिग्रेशन तथा सम्मोहन के द्वारा, यद्यपि अप्रत्यक्ष रूप, प्रमाणित होता जा रहा है।

इस दिशा में पश्चिम के कुछ प्रमुख सम्मोहनकर्ता तथा मनोचिकित्सक यथा डॉ माइकेल न्यूटन, डॉ रेमंड मूडी, डॉ ब्रायन वीस, डॉ जेम्स वान प्राघ, डॉ जोसेफ मर्फी जैसे विद्वान महत्वपूर्ण शोध कर रहे हैं जिनसे आत्मा की मृत्योपरांत यात्रा, मृत्योपरांत जीवात्मा जगत की स्थिति, मार्गदर्शक तथा गुरुजन आत्माएँ, आत्मा की निरंतर उन्नति, आकाशीय रिकॉर्ड, आत्मिक ऊर्जा आदि अनेक रहस्यों का सतत् अन्वेषण हो रहा है।

इसी के साथ कुछ अनुभवकर्ताओं यथा डॉ अनीता मुरझानी, खोरशेद भावनगरी आदि के व्यक्तिगत अनुभवों का भी लाभ मिल रहा है। भारत में भी इस दिशा में कई दशकों से कार्य हो रहा है जो व्यक्तिगत तथा संस्थागत दोनों ही स्तरों सक्रिय है।

डॉ तप्ति जैन, शैलजा लामा, नीरजा हांडा जैसे अनेक भारतीय विशेषज्ञ तथा इंडियन पैरानाॅरमल सोसायटी, दिल्ली, इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस, कोजीकोड़ तथा नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस, बेंगलुरु आदि इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।

इन सभी विदेशी या भारतीय विशेषज्ञों के अनुसार मृत्यु से जुड़ा भय रूपी विचार एक मिथक है तथा पूर्वजन्म की यात्रा, सम्मोहन, निकट मृत्यु अनुभव, टेलीपैथी या इस प्रकार की साइकिक प्रविधियों द्वारा इन्होंने विभिन्न आत्माओं से संर्पक स्थापित करके जो जानकारी प्राप्त की है उनमें मृत्योपरांत अधोलिखित समानताएँ देखी जा सकती हैं-

मृत्यु एक सुखद शांति, प्रसन्नता, प्रफुल्लता, हल्कापन तथा आत्मिक लोक में अपने मूल स्थान पर वापस लौट जाने की स्थिति है जहाॅं एक दिवंगत आत्मा अपने सभी आत्मीय प्रियजनों के साथ अपने आत्मिक समूह में निवास करती हैं तथा अपनी आगे की आत्मिक यात्रा की ओर निरंतर बढ़ती हैं।

चूँकि मृत्यु के बाद आत्माएँ सभी कष्टों, परेशानियों एवं दुखों की अनुभूतियों से मुक्त हो जाती हैं, संभवतः इसीलिए बहुत-सी दिवंगत आत्माएँ इस सुखद स्थिति को छोड़ कर पुनः भूलोक पर शरीर के रूप में वापस लौटना नहीं चाहतीं हैं।

मृत्यु के बाद अधिकतर आत्माएँ एक गहरी सुरंग, जिसके अंत में तीव्र प्रकाश हो, की उपस्थिति का अनुभव करती हैं। तत्पश्चात वे भूलोक के अपने दिवंगत सगे-संबधियों यथा बाबा, नाना, पिता, माता या ऐसे अन्य संबधियों को भी देखती हैं जो उन्हें अपनी ओर बुलाते प्रतीत होते हैं और अपने साथ ले जाने का आग्रह करते हैं।

इन्हीं के साथ उन्हें कुछ मार्गदर्शक आत्माएँ भी दिखाई देती हैं जो उन्हें उनकी अग्रिम यात्रा को सुगम तथा उन्नति के मार्ग पर चलने हेतु प्रेमपूर्वक तथा शालीन तरीके से प्रेरित करती हैं। वस्तुतः मृत्यु के उपरांत आत्मा की यात्रा निरंतर उन्नति की उध्र्वाधर यात्रा है जिसके द्वारा आत्माएँ अपने कार्मिक खाते के बोझ को कम करने का प्रयास करती हैं जिन्हें उन्होंने अपने भूलोकवासी शारीरिक जीवन में मन, क्रम, वचन या विचार द्वारा अर्जित किया था।

साथ ही यह आत्मा को दिए गए दायित्व या कार्यों का पुनः स्मरण कराने की स्थिति है। इस प्रकार आत्मिक यात्रा भूलोक पर जिए गए जीवन के पुनरावलोकन की एक महत्वपूर्ण स्थिति है। आत्माओं के विभिन्न स्तर बताए गए हैं जो हिंदुओं की धार्मिक मान्यता के अनुसार विरोधाभासी है।

परंतु जिस प्रकार भूलोक पर रहने वाले मनुष्यों में परस्पर गुणात्मक-मात्रात्मक भेद होता है, उसी प्रकार आत्माओं के विभिन्न कार्मिक लेखा खाते में भेद होने के कारण उनके आत्मिक लोक में भी अंतर होता है। उपरोक्त सभी विशेषज्ञों के शोध-परिणामस्वरूप आत्मिक लोक के सात स्तर बताये गए हैं जिनमें प्रत्येक के दस लोक या चरण हैं।

जहाँ प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय लोक निम्नस्तरीय बताए गए हैं तथा चौथा स्तर भूलोक जैसा है, वहीं पाँचवाँ लोक स्वर्ग बताया गया है। आगे छठा तथा सातवाँ उच्चस्तर आत्मिक लोक बताया गया है जहाँ पर निवास करने वाली आत्माएँ अत्यंत विकसित तथा श्रेष्ठ होती हैं जिससे उनका आध्यात्मिक स्तर उच्चतम स्थिति में होता है। वे किसी भी प्रकार के बुरे कर्मों में लिप्त नहीं होती।

इन उच्चतर स्तरों पर जीवन बेहद शांतिपूर्ण, प्रेममय, सहयोग एवं ज्ञानपरक तथा शांत है तथा प्राकृतिक वातावरण अत्यंत सुदंर और हम मनुष्यों की कल्पना से परे वर्णित किया गया है। वस्तुतः सभी आत्माएँ अपने स्तर में निरंतर सुधार हेतु उत्तरोत्तर उध्र्वाधर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहती हैं।

उच्च स्तर पर आत्माओं की एक अन्य विशेषता- उनका अत्यधिक जाग्रत अवचेतन मन है जो निम्न स्तर की आत्माओं में मुख्यतः निष्क्रिय तथा सुप्त होता है। इन विशेषज्ञों का मानना है मृत्यु के बाद शिक्षा का कोई मायने नहीं रहता। निकट मृत्यु के अनुभव के बाद आत्माएँ पहले से बेहतर महसूस करती हैं और अधिक प्रफुल्लित जीवन व्यतीत करती देखी गईं हैं।

ऐसा महसूस करने वाले व्यक्ति दोनों ही अवस्थाओं- सुषुप्त या जाग्रत- देखे गए हैं और उन्होंने निकट मृत्यु अनुभव के दौरान अपने लौकिक शरीर के बाहर निकल कर हवा में तैरते हुए इस संसार को स्पष्ट रूप में अवश्य ही देखा और वैसा ही बयान किया।

इसका यह अर्थ हुआ कि किन्हीं भी कारणों से लौकिक शरीर से निकलने वाली आत्माएँ कुछ मामलों में अपने शरीर के समीप ही तैरती हैं तथा अपने शरीर के आसपास के वातावरण को भली-भाँति देखती और अनुभव करती हैं तथा अपने शरीर में पुनः लौट आने पर पूर्ण चेतनावस्था में निकट मृत्यु अनुभव का स्पष्ट वर्णन भी कर पाती हैं।

साथ ही आत्माएँ स्वयं को दो हिस्सों में बाँट सकती हैं अर्थात् समानांतर आत्माएँ जो एक ही समय पर दो स्तरों पर कार्य कर सकती हैं। संभवतः भारत समेत विश्व की सभी सभ्यताओं में मानसिक बीमारियों को ठीक करने के लिए मनोविज्ञान का सहारा लिया जाता है जिनमें मेडिटेशन तथा सम्मोहन आदि कुछ प्रमुख माध्यम हैं।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन के दौरान आत्माओं ने भूलोक से भिन्न अलग-अलग आयामों के अस्तित्व को भी स्वीकार किया है। यहाँ आयाम से आशय ग्रहों से है, अर्थात् इस ब्रह्मांड में भूलोक के अलावा कई अन्य ग्रह हैं जहाॅं पर जीवन के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है परंतु उन ग्रहों पर जीव की रचना मनुष्यों जैसी बताई नहीं गई है।

संभवतः इसीलिए एलियन्स या अन्य ग्रहों से भूलोक के वायुमंडल में आने वाले विमानों या उड़नतश्तरियों को देखने का दावा प्रायः किया गया है जिनमें अमेरिकी वायुसेना तथा नासा के साथ ही अन्य कई देशों की सुरक्षा एजेंसियों भी शमिल हैं।

वस्तुतः आत्मा ऊर्जा का ही एक रूप है जो ऊर्जा के कभी क्षरण न होने वाले विज्ञान के नियम के अनुरूप ही सदैव क्रियान्वित होता है। जिस प्रकार ऊर्जा अविनाशी है, उसी प्रकार आत्मा भी अविनाशी है। जिस प्रकार ऊर्जा का केवल रूप बदलता है, उसी प्रकार आत्मा भी अपना भौतिक शरीर मात्र ही बदलती हुई समझी जाती है परंतु उसका नाश कभी नहीं होता।

यह ऊर्जा उसके द्वारा चिंतन, मनन या किसी भी कर्म से निर्मित होती है तथा एक कार्मिक खाते का निर्माण करता है। इस कार्मिक खाते द्वारा ही वह निरंतर कर्म बंधन में बंधकर बारम्बार जन्म या मृत्यु को प्राप्त होती है अर्थात जन्म या मृत्यु के चक्र में अज्ञानतावश उलझी रहती हैं – ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम’।

इस प्रकार मृत्यु इस भूलोक पर मात्र शरीर बदलने का ही दूसरा नाम है जिससे भयभीत होना वस्तुतः एक अज्ञानता है। इस अज्ञानता से उबरने के लिए आध्यात्म या मनोचिकित्सा या साइकिक हीलिंग या उपचार के अतिरिक्त संभवतः अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः इस प्रक्रिया को गंभीरता से समझने और समझाने की आवश्यकता है जो विभिन्न दैविक, दैहिक या भौतिक कष्टों से शोकग्रस्त मानवता के समग्र कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक है।

सुधांशु त्रिपाठी  मु द महाविद्यालय, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक हैं।