राजनीति
दलित राजनीति के नाम पर बस दलितों का एक अभिजात्य वर्ग उठा रहा है लाभ

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार में पूरे कार्यकाल मंत्री के रूप में सत्ता पर बने रहने के बाद तीन विधायकों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को छोड़कर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा) में प्रवेश ले लिया है। तीनों मंत्रियों ने एक ही संरचना और शब्दावली का प्रयोग अपने-अपने त्याग-पत्र में किया है।

यह ना केवल एक तय योजना को परिलक्षित करता है, वरन यह नेताओं में निहित एक आलस्य को भी दर्शाता है कि जिस दलित, वंचित एवं पिछड़ा समाज की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कार्यकाल की समाप्ति के पश्चात वे सरकार और सत्ता छोड़ रहे हैं, उसे देने के लिए उचित संदेश बनाने तक का ना उन्हें धैर्य है, ना ही सामर्थ्य।

सत्ता के इस घूमते दरवाज़े से निकलने वाले पहले मंत्री स्वामीप्रसाद मौर्य थे, जिनके पीछे-पीछे दो अन्य मंत्री धरम सिंह सैनी एवं दारा सिंह चौहान निकले। मौर्य सरकार में श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय देखते थे। उन्होंने अपने त्याग-पत्र में सरकार द्वारा बेरोज़गारों की अनदेखी का आरोप लगाया है।

पाँच वर्ष के कार्यकाल के पश्चात जिस प्रश्न का उन्हें उत्तर देना चाहिए था, वह प्रश्न अधर पर टांग कर वे निकल गए हैं। दलितों के उत्थान के लिए उनका योगदान व्यक्तिगत अभिलाषा से इतर कुछ नहीं रहा है। मौर्य बौद्ध संप्रदाय से आते हैं, और उनकी पुत्री संघमित्र मौर्य भाजपा सांसद हैं।

स्वामीप्रसाद मौर्य के अनुसार दलितों, पिछड़ों की उपेक्षा करने वाला दल उन्हें मंत्री बनाता है और उनकी पुत्री को सांसद। मौर्य पाँच बार के कुशीनगर क्षेत्र के विधायक हैं और उनका क्षेत्र प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में आता है। कुशीनगर क्षेत्र में विमानतल आदि की योजनाएँ योगी आदित्यनाथ की सरकार में ही फलीभूत हुई हैं।

मौर्य ने अपनी राजनीतिक यात्रा राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) से प्रारंभ की, 1996 से वे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में थे और 2016 में उन्होंने पार्टी छोड़कर अपनी लोकतांत्रिक बहुजन मंच पार्टी बनाई। 2017 में वे भाजपा में मंत्री बने और पाँच वर्ष भाजपा की सरकार में रहे।

मौर्य के साथ जाने वाले दूसरे मंत्री धर्म सिंह सैनी हैं जो सहारनपुर की सरसवा विधानसभा से आते हैं, और तीन बार के विधायक हैं। योगी मंत्रिमंडल में इनके अधीन आयुष मंत्रालय था जिसमें महामारी के समय इनके पास बहुत कुछ इनके अधिकार क्षेत्र में था।

परंतु इसी महामारी की विभीषिका में जिस समय मुख्यमंत्री योगी स्वयं संक्रमित होकर व्यक्तिगत एकांतवास में थे, प्रशासन दिशाविहीन सा भटक रहा था, यह इस मंत्रिमंडल की अक्षमता को दिखाता है। ऐसी संभावना हो सकती है कि वापस आने के पश्चात जब मंडलों और ग्रामों में संपर्क करके मुख्यमंत्री ने स्वयं प्रशासन को लुप्त देखा हो तो इसपर प्रश्न किए हों जो इस चुनाव में पार्टी के टिकट वितरण में दिख रहे हों।

सैनी स्वयं एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र से जीतकर आते हैं, अतः यह भी संभावना है कि पिछली बार के भयभीत करने वाली 4,000 मतों की बढ़त को सपा की जिन्ना वाली राजनीति से बचाना और बढ़ाना चाहते हों। इस क्षेत्र से उन्होंने कांग्रेस से सपा में आए इमरान मसूद को दो बार पराजित किया था, अब इमरान मसूद के साथ मिलकर दलितों एवं वांछितों के उत्थान के लिए वे कैसे कार्य करते हैं यह टिकट वितरण के बाद ही स्पष्ट होगा।

तीसरे मंत्री दारा सिंह चौहान स्कूल से आगे नहीं पढ़ सके हैं। चौहान उत्तर प्रदेश सरकार में पाँच वर्ष पर्यावरण मंत्री रहे, अब उन्हें अनायास ही यह भान हुआ कि उनकी सरकार उनके कार्यकाल में दलितों, पिछड़ों और बेरोज़गारों की अनदेखी करती रही है।

ये आज़मगढ़ क्षेत्र से आते हैं और राजपूत हैं परंतु अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं। ये पहले बसपा में थे, वहीं से राज्य सभा पहुँचे। 1996 से 2014 तक राज्यसभा के सदस्य रहे, और 2015 में इन्होंने भाजपा का हाथ पकड़ा और 2017 से मंत्रिमंडल में रहे हैं।

भारत में दलित राजनीति के कर्ता-धर्ता अधिकांशतः ऐसे रहे हैं कि प्रतीकात्मकता और पहचान की राजनीति की आड़ में अपने कुनबों के उत्थान में ही व्यस्त रहे। मान्यवर कांशीराम ने जिस विचारधारा की राजनीति की नींव डाली, उसे मायावती ने एक अलग ही रूप दे दिया।

सामाजिक समभाव की राजनीति की परिणति मायावती की व्यक्तिवादी राजनीति और हाथियों के पार्क, मोतियों की माला और हीरे-जड़े बटुए से हुई। व्यक्तिवाद की अति ने इस पार्टी को वह पतन दिखाया जिससे वह आज भी निकल नहीं पा रही है।

देश का दुर्भाग्य यह रहा कि दलित राजनीति ने ऐसे स्वार्थी सत्ता लोलुप वर्ग को राजनीति में प्रवेश दिया जो डॉक्टर अंबेडकर की मूर्तियाँ तो लगाता था परंतु जिसने स्वयं अंबेडकर को ही भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक कर दिया। समाज एक विचित्र-सी वैचारिक तंद्रा में चलता रहा जो यह मानता था कि वह स्वयं निर्धन और निरीह पड़ा हो परंतु उसी के जातिगत वर्ण के सामंतों के उत्थान में उसकी भी मुक्ति छुपी हो।

विचित्र विरोधाभास यह है कि जो राजनीति यह मानती हो कि ब्राह्मण या तथाकथित उच्च वर्ग का सम्मान उनके इतिहास के आधार पर नहीं होना चाहिए, वह यह भी मानती है कि वर्तमान में सक्षम और अभिजात्य वर्ग में पहुँच चुके व्यक्ति भी अपने इतिहास के कारण दलितों का प्रतिनिधित्व सिर्फ जाति के कारण करते हैं।

जो जैसा है उसे छूने का किसी को साहस नहीं है और क्योंकि दलित समाज के भीतर ही एक अभिजात्य वर्ग बन गया है, उनके प्रतिनिधित्व का ठेका लेकर बैठ गया है, वह नीचे रह गए दलितों को ना ऊपर आने देता है और ना ही उन नीतियों को हाथ लगाने देता है जिनका लाभ वह स्वयं घेरे बैठा है।

नीतिगत रूप से दलित उत्थान की सभी संभावनाएँ इस नव-अभिजात्य दलित नेतृत्व ने घेर ली हैं और जातिवादी वैमनस्य के आधार पर अंबेडकर के नाम पर राजनीति करने वाले पहचान की राजनीति और व्यक्तिवाद के माध्यम से अंबेडकर की आत्मा को ही कुचल रहे हैं।

अंबेडकर ने अपने प्रसिद्ध भाषण ‘अराजकता का व्याकरण’ में इस राष्ट्रीय पहचान से इतर जातिगत और धर्म पर आधारित पहचानों के विषय में कहा था-

“क्या हम भारतीय राष्ट्र को संप्रदाय या पंथ से ऊपर रखेंगे या पंथ को राष्ट्र से ऊपर रखेंगे? मैं नहीं जानता। परंतु यह तय है कि यदि राजनीतिक दल पंथ को देश से ऊपर रखेंगे, तो हमारी स्वतंत्रता पुनः संकट में आ पड़ेगी और संभवतः सदा के लिए चली जाए। इस संभावना के प्रति हमें दृढ़ता से सजग रहना होगा। हमें अपने रक्त की अंतिम बूंद तक अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी।”

प्रतीकात्मक मूर्तियों के रूप में डॉ अंबेडकर को लगाकर छोड़ देने से अधिक महत्वपूर्ण है कि उनके विचारों को दलित समझें और यह भी समझें कि दलित कोई स्थाई वर्ग नहीं है। जब तक दलित समाज में भीतर से मंथन नहीं होगा और सक्षम हुआ वर्ग राष्ट्रीय योजनाओं के लाभों को मुट्ठियों में भींचे रखेगा, भारत के जिस विकास की परिकल्पना गांधी और सावरकर ने की थी, वह नहीं हो सकेगा।

दलितों की राजनीति के नाम पर छल होता रहेगा और प्रतीकात्मक राजनीति प्रगतिशील राजनीति को पीछे धकेलती रहेगी। विचारशून्य नेता सामाजिक वैमनस्य पर सत्ता खड़ी करते रहेंगे और समाज का विघटन अनवरत चलता रहेगा। आरक्षण के दायरे से पुराने लाभार्थी निकलते नहीं रहेंगे तो नीचे के तल पर सामाजिक समन्वय एक स्वप्न ही रह जाएगा, और दलितों के मध्य एक विचारधारा से रिक्त नेतृत्व बना रहेगा जो उनके नाम पर सत्ता के समीकरण बिठाता रहेगा।

बहरहाल, जिन दलितों, पिछड़ों और बेरोज़गारों के नाम पर ये नेता पंक्तिबद्ध होकर सपा की ओर गए हैं, उसने अपनी पहली प्रत्याशी सूची निकाल दी है, जिसमें उसकी ओर से रालोद के साथ समीकरण में 10 प्रत्याशी हैं, जिनमें से एक ही अल्पसंख्यक संप्रदाय का है, दो ब्राह्मण हैं और दो जाट हैं।

गठबंधन की दूसरी पार्टी के भी समीकरण कुछ भिन्न नहीं हैं। सांप्रदायिक सम्मान के नाम पर नेताओं ने बहुत समय राजनीति की है। पिछले सप्ताह एक साक्षात्कार में कांग्रेस के नवजोत सिद्धू बता रहे थे कि किसी बात पर कैसे पंडित नेहरू ने पंजाब के प्रथम सिख मुख्यमंत्री को धक्का दे दिया था और उनकी पगड़ी भी गिर गई थी, परंतु कैरो ने यह कहकर सहन कर लिया था कि इस अपमान के एवज़ में उन्हें हज़ारों सिखों पर शासन करने का अधिकार मिलता है।

उत्तर प्रदेश में दलित नेताओं ने भी संभवतः व्यक्तिगत राजनीति के आगे दलित हितों को वैसे ही तिलांजलि दे दी है। संभवतः मौर्य के कुनबे को स्थान मिल जाए परंतु वृहद् दलित वर्ग को इसका क्या लाभ होगा यह स्वयं उन्हें ही सोचना होगा, और बाबा साहब की चेतावनी के प्रति चौकन्ना भी रहना होगा।

उन्हें ही देखना होगा कि अगला रोज़गार मंत्री, पर्यावरण मंत्री अधिक योग्य हो, दलित हो या ना हो, और दलित हो तो जातिगत रूप से दलित हो या ना हो। दलितों का उत्थान उनकी जाति के नेता की कोठियों के निरंतर बड़े होते जाने से नहीं होगा, बल्कि उनके आवासों की उपलब्धता से होगा।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।