संस्कृति
कुश्ती और आजीविका: शाही मैसूर के विलुप्त होते अखाड़े
हर्षा भट - 17th October 2018
कुश्ती और आजीविका

प्रसंग
  • टूर्नामेंट में कम पुरस्कार राशि और नगण्य सरकारी समर्थन के बावजूद मैसूर के पहलवान अभी भी खेल में शामिल हैं।
  • एक 150 वर्ष पुराने अखाड़े की कहानी जिसने सैकड़ों पहलवानों को तैयार किया।

‘फुटबॉल को जो महत्व ब्राजील के लिए है कुश्ती का वही महत्व मैसूर के लिए है’ और मैसूर (अब मैसूरू) के कुश्ती इतिहास का वर्णन करने वाले इसी तरह के अन्य दावों ने मुझसे आग्रह किया कि मैं स्वयं देखूं कि प्राचीन काल का यह ‘कुश्ती केंद्र’ अब कैसा दिखता है। वज्रमुष्टी कालगा या सशस्त्र मुष्टि युद्ध जो खून खराबे से समाप्त होता है और मैसूर पैलेस में दशहरा उत्सव की उद्घोषणा करता है, ऐसा सुनने के बाद मैंने पिछले सप्ताह मैसुरु की यात्रा की, क्योंकि शहर वार्षिक उत्सव के लिए तैयार हो रहा था।

अनपेक्षित बारिश की फुहारों को धन्यवाद, जिसके बाद मिट्टी की सौंधी खुशबू ने उत्सव के आनंद को उतना ही अधिक बढ़ा दिया जितना कि पूरे शहर में सड़क किनारे के दृश्यों ने आनंदित किया था। सड़क किनारे रंगाई-पुताई हो रही थी और लाइटें लगाई जा रही थीं। लेकिन शहर में दो दिन के भ्रमण और कुश्ती की दुनिया के विभिन्न पहलुओं ने मुझे हिला कर रख दिया। कुछ ही दिनों में, देश भर के पहलवान महलों के इस शहर में दशहरा कुश्ती चैम्पियनशिप खिताब जीतने के लिए लड़ेंगे।

लेकिन जिन पहलवानों को मैं मिलने के लिए उत्सुक था, वे गराडियों (पहलवानों के घर) में परंपरागत भारतीय तरीके से तैयार किए गए थे, जो तंग कोमाना अर्थात लंगोटी बांधे हुए थे और अपने शरीर पर मिट्टी रगड़े हुए थे।

मैं चौराहे पर खड़ा था। एक छोर पर महल ढलते सूरज के नीचे जगमगा रहा था और इसके ठीक विपरीत दाहिनी ओर गराड़ी माने (अखाड़ा) था जहाँ से मैं भारी मन के साथ बाहर निकला था।

10 अक्टूबर को की शाम की शुरुआत में शुरू हुई दशहरा कुश्ती प्रतियोगिता में पहलवानों को पारंपरिक कुश्ती प्रतियोगिता या नाडा कुश्ती (स्थानीय कुश्ती) के लिए तैयार होते देखने के लिए मैं पूरी तरह से तैयार था। मैंने मैसुरु में गांधी चौक पर इंतजार किया जहाँ से एक पहलवान मुझे एक कच्चे रास्ते से होकर ले गया। यह रास्ता दोपहर की बारिश की वजह से खराब हो गया था। पारंपरिक अखाड़े के प्रवेश द्वार तक पहुँचने के लिए मुझे बदबूदार सार्वजनिक शौचालय पार करना पड़ा। अखाड़े की चूना पत्थर की बनी हुई दीवारें सफेद पुती हुई थीं और उनपर लाल मिट्टी की लाइनें बनी हुई थीं। मैं पहलवान के पीछे-पीछे गया जिसने मुझे ऊपर संगमरमर का एक बोर्ड दिखाया जिस पर उस अखाड़े का नाम लिखा था जो कि पहले काफी मशहूर था लेकिन अब उतना नहीं रह गया है। इसके बाद उसने सिर झुकाकर एक खाली पड़ी जगह में प्रवेश किया जिसमें लगभग 150 वर्षों से भी अधिक समय से सैकड़ों पहलवानों को प्रशिक्षण दिया गया था।

कुश्ती और आजीविका

कुश्ती और आजीविका

जब मैंने कमरे में प्रवेश किया और अपने जूते उतारे, तब युवा पहलवान जीवन ने मुझे हाथ पैर धोने का निर्देश दिया, उन्होंने भी कमरे में प्रवेश करने से पहले ऐसा ही किया। मैसुरू के महत्वपूर्ण प्रशिक्षण केंद्रों में एक पकीर अहमद सहबरा गराड़ी है जो कुश्ती के दो महत्वपूर्ण प्रशिक्षण केंद्रों में से एक है और अन्य प्रशिक्षण केंद्र इस केंद्र को सम्मान देते हैं।

यह उनमें से एक है जो समय की परीक्षा में खरे उतरे हैं।

किसी समय यह शहर कुश्ती का एक केन्द्र हुआ करता था। यहाँ पर कुश्ती के करीब 150 अखाड़े और लगभग हर घर में एक पहलवान था। देश की दूसरी जगहों के पहलवान मैसुरू के पहलवानों से मुकाबला करने में डरते थे। अखाड़े के वरिष्ठ पहलवानों का कहना है कि, ऐसा हमारा प्रशिक्षण था और ऐसे हमारे पहलवान थे। कुछ बुजुर्गों ने कहा कि “लेकिन यह सब पुराने समय की कहानियाँ हैं।”

एक वरिष्ठ पहलवान गणेश शेट्टी का कहना है कि “पहले हर घर में एक पहलवान (मानेगोंडू पहलवान) हुआ करता था जो अब हर गाँव में एक (ऊरीगोब्बा पहलवान) ही रह गया है। 150 गराड़ी थे जो अब घटकर करीब 50 ही रह गए हैं। और जो बचे हुए हैं वे बहुत छोटे हो गए हैं और शायद ही सभी पहलवानों को जगह देने में सक्षम हैं। लेकिन फिर भी प्रतिभा कम नहीं हुई है।” शेट्टी, शाम को कसरत शुरू करने से पहले पैर छूकर आशीर्वाद लेने वाले युवा पहलवानों को आशीर्वाद देते हैं।

कर्नाटक रेसलिंग एसोसिएशन के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर के. आर. रंगैया पहलवानों के मौजूदा खराब हालातों को लेकर गुस्से में हैं और चाहते हैं कि अखाड़ों के दाँव पेंच सीखे हुए नाडा कुश्ती पहलवानों को प्वॉइंट कुश्ती सिखाई जाए। रंगाया को शहर के अकेले ऐसे पहलवान होने का गौरव प्राप्त है जिन्होंने पढ़ाई की और फिर कॉलेज में एक प्रोफेसर बन गए। प्रोफेसर कहते हैं कि “केवल नाडा कुश्ती से उनको कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि इसकी न तो कोई मान्यता होती है और न ही इससे उन्हें नौकरी मिलती है, जिससे उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है।” प्रोफेसर रंगाया दशहरा कुश्ती प्रतियोगिता के निदेशक भी हैं।

राज्य के अन्य हिस्सों की तरह ‘कुश्तिगे तवारूरू’ मैसुरू में भी कुश्ती प्रशिक्षण केन्द्र खोलने के लिए सरकार से मदद मांगी जा रही है। दशहरा कुश्ती उप समिति के सचिव डी. रवि कुमार के साथ वह भी पहलवानों को ‘प्वॉइंट कुश्ती’ के लिए प्रशिक्षित करने और अखाड़ों में फिर से दम फूंकने की कोशिश कर रहे हैं।

कुश्ती और आजीविका

प्वॉइंट कुश्ती का जारी सत्र। मिट्टी में खेली जाने वाली नाडा कुश्ती के विपरीत प्वॉइंट कुश्ती को निर्धारित वर्दी और जूते पहनकर मैट पर खेला जाता है

इन दो अखाड़ों की यात्रा के दौरान पहलवानों की संख्याओं में गिरावट को देखते हुए, कुछ वरिष्ठ पहलवानों के साथ दो व्यक्तियों ने एक साल पहले मराली बा गराड़ीगे (गराड़ी में वापस आओ) नामक एक कार्यक्रम शुरू किया था। इस कार्यक्रम के तहत विभिन्न गाँवों में हर महीने कुश्ती का आयोजन किया जाता था, जिसे इस परंपरा के धीरे-धीरे पुनरुत्थान के रूप में देखा गया है। बदलाव की बाट जोहते हुए उनका कहना है कि “ज्यादातर गाँवों में अब कुश्ती के नियमित मुकाबले होते रहते हैं। गाँव के प्रतिष्ठित लोगों के जन्मदिन या ऐसे ही अन्य समारोहों में धीरे-धीरे कुश्ती का आयोजन होने लगा है। 15 सालों से दशहरा कुश्ती समिति के सचिव रहे कुमार कहते हैं कि “इस जुनून को संरक्षणकर्ताओं से समर्थन मिला था क्योंकि पहलवानों की वापसी एक बहुत ही गर्व की बात थी। दर्शकों की संख्या भी बढ़ी थी क्योंकि ग्रामीण इलाकों में यह मनोरंजन का एक बड़ा स्रोत था।”

उन्होंने आगे कहा, “महाराजाओं के समय के बाद भी, कुछ साल पहले वहाँ पर एक मिसाल कायम की गई थी, जब दो बेकरी वालों ने मैसूर में प्रतिस्पर्धा की भावना से विभिन्न पहलवानों को स्पोंसर किया था। किसी व्यक्ति ने इन शीर्ष पहलवानों के लिए दूध स्पोंसर किया था। आज इस तरह की व्यक्तिगत स्पोंसरशिप तो संभव नहीं हैं लेकिन कार्पोरेट निश्चित रूप से इन प्रयासों को वित्त प्रदान कर सकते हैं।”

खेल कोटा के तहत पहलवानों को नौकरी देने या उनकी मदद करने के लिए सरकार के पास कुछ भी नहीं है। एक पहलवान के पिता, जिन्होंने कई पदक जीते हैं लेकिन पुरस्कार राशि (कुछ राज्य वित्त पोषण) अभी तक नहीं मिली है, ने अपने विचार व्यक्त किए, “अगर सरकार पुलिस सेवाओं में इनके लिए कम से कम कोई निम्न स्तर की नौकरी का प्रावधान कर सके तो इससे युवाओं को प्रोत्साहन मिलेगा जो आजीविका कमाने के बारे में चिंतित हैं, वहीं दूसरी ओर उनके प्रशिक्षण का उपयोग भी किया जा सकता है।”

इतनी कठिन मेहनत करने वाले पहलवानों को दी जाने वाली पुरस्कार राशि शहर के जिम में पहने जाने वाले एक जोड़ी जांघिए की कीमत से भी कम है। अधिकतर टूर्नामेंटों में उन्हें रजत गदा, एक बेल्ट (फीता) और कुछ नकद रूपए दिए दिए जाते हैं जो कभी कभी कुछ सौ रूपए ही होते हैं।

दशहरा की प्रतियोगिताओं के लिए सबसे उत्कृष्ट पुरस्कार 10,000 रूपए से 15,000 रूपए का होता है जिसे पहलवानों तक पहुंचने में महीनों का समय लगता है। लगभग इतनी ही रकम कुछ पहलवानों के अभिभावक उनके भोजन, प्रशिक्षण और देश में कहीं भी प्रशिक्षण केंद्रों की यात्राओं के लिए हर महीने खर्च कर रहे हैं। आजीविका के लिए जूझने वाले पहलवानों के बहुत सारे किस्से सामने आते रहते हैं।

कुश्ती को कैसे जीवंत रखा जाए

पहलवानों का कहना है कि उन्हें केवल राष्ट्रीय खेल संस्थान (एनआईएस) से प्रशिक्षण प्राप्त एक कोच की जरूरत है, जिसकी मदद से वे प्रारंभिक प्रशिक्षण ले सकें। कुमार कहते हैं कि कुश्ती के लिए कॉर्पोरेट स्पोंसरशिप और संरक्षण पहलवानों की स्थिति को बदलने में एक महत्वपूर्ण सहायक सिद्ध होगा।

कॉर्पोरेटों, जो पहलवानों को उनके अनुकूल नौकरियों पर भी रख सकते हैं, द्वारा समर्थित एक प्रशिक्षित कोच के साथ एक कुश्ती स्कूल और सरकार द्वारा अन्य खिलाडियों के समान मान्यता इस पारंपरिक भारतीय खेल को नया आयाम देगी।

कुश्ती और आजीविका

दशहरा कुश्ती में युवा पहलवान

ये पहलवान कहते हैं कि तब तक वे स्वयं पर मट्टी मन्नू फेंकना जारी रखेंगे और अपने शरीरों को पत्थर की तरह मजबूत बनाते रहेंगे।

और ये इसे कैसे करते हैं, यहां पर उसकी एक हल्की सी झलक दिखाई गई हैः

पहलवान लोग कुश्ती परिधान या कोमाना पहनते हैं जिसे एक वरिष्ठ पहलवान द्वारा आशीर्वाद स्वरूप पहलवानों को सौंपा जाता है। फिर ये पहलवान ‘वास्तविक पहलवान’ हनुमान जी की मूर्ति की पूजा करते हैं। यह हर अखाड़े की परंपरा है।

कुश्ती और आजीविका

संरक्षकों और बुजुर्गों द्वारा सम्मान प्राप्त करता हुआ एक विजयी पहलवान

फिर वे आसपास मौजूद सभी बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं और पारंपरिक उपकरणों के साथ अपनी कसरत शुरू करते हैं। उनमें से एक पहलवान फावड़े से मिट्टी को महीन करता है जबकि दूसरा पैरों से इसे समतल करता है।

इस मिट्टी में हल्दी, सिंदूर या बंदन, घी और अन्य निर्धारित सामग्री, जो कि शरीर के लिए फायदेमंद होती हैं, आदि मिलाया जाता है और इस पर अभ्यास शुरू करने से पहले इस अखाड़े की पूजा की जाती है। पहलवान अपने प्रतिद्वंदी को जमीन पर गिराने, जो भारतीय कुश्ती के इस रूप में जीत का सूचक है, के लिए विभिन्न दांव-पेचों का अभ्यास करते हैं।