संस्कृति
क्यों आधुनिक धर्म को ईशा की तरह एक विशाल महाशिवरात्रि उत्सव की आवश्यकता है

आशुचित्र-

  • देशभर से लोग महाशिवरात्रि मनाने के लिए कोयम्बटूर में ईशा योग केंद्र में एकत्रित हुए हैं।
  • भारतीयता को बांधे रखने के लिए इस प्रकार के उत्सव आवश्यक हैं।

जैसे ही 4 मार्च का सूरज ढलेगा, साल की सबसे काली रात का आगमन होगा। देश की बहुत सी जगहों पर भगवान शिव और शक्ति के विवाह की तैयरियाँ शुरू हो चुकी हैं। महाशिवरात्रि, 12 शिवरात्रियों में से सबसे बड़ी शिवरात्रि मानी जाती है, इसको मनाने के पीछे बहुत सी दंतकथाएँ है, लेकिन यह अनिवार्य रूप से जागृति की रात के रूप में मनाया जाता है।

हम मंदिर के पास बड़े हुए और हमारे लिए महाशिवरात्रि का मतलब था बिल्वा के पत्ते, रात-रात भर मंदिर में नाटक और देवताओं का मंदिर के इर्द-गिर्द चक्कर काटना, घर के बूढ़े बुजर्गों का भगवान शिव की कहानियाँ सुनाना और यह बताना कि रात भर जागना क्यों ज़रूरी है। पर हम बच्चे थे तो अंधेरा होने से पहले ही सो जाया करते थे। देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके हैं रात को जागने के, कुछ एक दूसरे के घरों पर पत्थर फेंका करते थे ताकि वे जागते रहें और कुछ लोग नशे का प्रयोग करते थे क्योंकि ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव भी नशा किया करते थे।

अब घरों से बाहर निकलने के बाद शहरी इलाकों में त्यौहार मात्र छुटियाँ बनकर रह गए हैं, जो कि कंपनियों द्वारा दी जाती है, और अगर वह छुट्टी गलती से भी सप्ताहांत पर आ जाए तो हमारे शहरी लोग उसे बड़ी ही मुश्किल से मनाते हैं।

पढ़ाई के लिए मैं खुद मुंबई आ गई और त्यौहार के लिए घर जाने का अवसर मुश्किल से ही मिलता था, और आज यह उन सभी छात्र छात्राओं के लिए सच भी है जो पढ़ाई के कारण घर बाहर रहते हैं, बड़े शहरों में पलायन करना न केवल हमें हमारी संस्कृति से अलग कर देता है बल्कि इन त्यौहारों के कारण हमारा समाज के साथ जो रिश्ता बनता है वह भी कहीं न कहीं टूट सा गया है।

लेकिन कोयम्बटूर में ईशा योग केंद्र (आईवाईसी) में महाशिवरात्रि समारोह का आमंत्रण मेरे दु: खद दुखों की औषधि सिद्ध हुई। जैसा कि मैंने इस सप्ताह के अंत में केंद्र में प्रवेश किया, यह मुझे उन दिनों में वापस ले गया, जहाँ उत्सव वास्तव में एक विशाल समुदाय संबंध थे। केवल यह कि यह एक 2.0 है और एक उच्च-स्तरीय समारोह है।

प्रवेश द्वार पर विशाल पत्थर का सर्प जो सूर्यकुंड नामक बड़े तालाब की ओर जाता है, जिसमें सैकड़ों लोग धोती में एक अनुष्ठानिक डुबकी लगाते हैं, छोटे वॉकओवर ब्रिज के दोनों ओर विशाल कमल तालाब हैं जो बड़े नंदी, शिव के राजसी बैल की ओर जाते हैं। आशा है, कि सांस्कृतिक प्रतीक, जब इस पैमाने पर प्रबलित होते हैं, तो यह सुनिश्चित करेगा कि इंडिक परंपराएँ और प्रथाएँ भुलाए नहीं जातीं। 

लोगों के झुंड के झुंड शिव के विभिन्न नामों का जाप करते रहते हैं और कई दिनों तक उनके द्वारा की गई साधना को पूरा करते रहते हैं।

जैसै ही मैं एक स्थान से दूर स्थान पर गई, मैंने दो युवकों के बीच बातचीत सुनी। जब पहले वाले ने दूसरे से पूछा (दोनों देश के उत्तरी हिस्से से हैं), अगर वह “दिल्ली” से था, तो थपथपाते हुए जवाब आया, “मैं यहाँ ऐसी कोई चीज नहीं बनना चाहता। जैसे मैंने एक चर्चा में सद्गुरु जग्गी वासुदेव का जिक्र सुना था कि, मैं अपने नाम के साथ, अपने शहर, अपनी गली, अपनी जाति और अपने समुदाय को अपने साथ ले जाने के बजाय सिर्फ खुद के रूप में यहाँ रहने की कोशिश कर रहा हूँ।” 

यह सुनकर मैं प्रभावित हुई या कहें कि प्रसन्न हुई। खुशी इस बात की है कि इस देश में एक बार फिर, जहाँ छोटे-छोटे अंतर, जो मूल रूप से विविधता और रंग जोड़ने के लिए थे, वे सांस्कृतिक बहुलता की इस बनावट के विघटन का कारण बने और इसे मंद कर दिया, लेकिन इस तरह के प्रयासों से भारतीय फिर एक सूत्र में नर्म शक्ति के धागों से बुने जा रहे हैं। 

इसके अलावा, एक ही बस में बैठी हुआ, सभी अंग्रेज़ी बातचीत से बेखबर, एक खुश दादी बैठी हुई थीं। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं यहाँ इस मगाशिवरात्रि  के लिए हूँ (वे इसे तमिल में यह बोलते हैं)। मेरे हामी भरने ने उनके चेहरे पर एक अनमोल मुस्कान ला दी- यह वह मुस्कान थी जिसने उनके झुर्रियों वाले चेहरे पर ये सोचकर चमक ला दी थी कि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहना चाहती है। जैसे कि गणेश चतुर्थी के लिए मोदक बनाना और बाज़ार से कुछ चॉकलेट बादाम मोदक नहीं खरीदना, या वास्तव में पिछले साल के दीयों की सफाई करना और उस पुराने घर में जमा करना, न कि ऑनलाइन मंगवाना, उन मिठाइयों को बनाने में मदद करना। यह पूरी तरह से एक अलग अनुभव है जो अगली पीढ़ी के भाग्य में नहीं है। 

विशेष रूप से ऐसे समय में जहाँ त्यौहारों को आधुनिकता के नाम पर बहुत आसानी से खारिज कर दिया जाता है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हम अपने त्यौहारों को उसी तरह मनाए जिस तरह से वे मनाए जाते हैं।

आईवाईसी के तरफ़ बढ़ते हुए एक नारियल बेचने वाला उसी तरह उत्साहित दिखता है, जिस तरह रात के लिए अंतराष्ट्रीय गाना बजाने वाले तैयारी करते समय होते हैं। कलारिपयट्टु प्रदर्शन के लिए अभ्यास कर रहे बच्चों के चेहरे पर उत्साह संस्कृत मंत्रों का अभ्यास करने वालों की आवाज़ से मेल खाती है। महाशिवरात्रि मनाने के लिए देशभर से लोग पहुच रहे हैं। यह साथ आना ही है जिसे मनाने की ज़रूरत है। भारतीयता को बनाए रखने का यह संकेत है जिसकी सराहना की जानी चाहिए।  

यह एक दिन के बारे में नहीं है। केंद्र के चारों ओर घूमते हुए, हज़ारों युवाओं को शगुन धोती और शॉल पहेने देखा जा सकता है जो महाशिवरात्रि की तैयारी के लिए कुछ अनुष्ठान कर रहे हैं। लगभग सौ अन्य हैं, जो ध्यानलिंगम के सामने स्थित नंद के सामने शिव को नमस्कार कर रहे हैं। यदि बड़े काले बैल के दृष्य से संतुष्ट नहीं होते हैं, तो कई लोग केंद्र में मवेशी मेले का हिस्सा बनने के लिए उतरते हैं।

देवी मंदिर में गर्व से सिंदूर लगाया जाता है। यहाँ माथे पर विभूति भी उतने ही गर्व के साथ लगाी जाती है जितने प्यार से। ये रोज़ मंदिर जाने वाले धार्मिक लोग नहीं है जो प्रायः ऐसा करते हैं। उनमें से कई अपने जीवन में पहली बार कुछ ऐसी प्रकृति का प्रयास कर रहे हैं। शास्त्रीय संगीत और नृत्य के एक भव्य प्रदर्शन यास्क के साथ पिछली तीन संध्याओं से सूर्योदय है रहा है और यह एक अनुष्ठान बन गया है। 

वर्ष के इस समय में मैं पहली बार केंद्र पर आई हूँ और मुझे यह अहसास हुआ कि यदि एक भूमि के रूप में हमें अपनी भारतीयता बनाए रखनी है तो इस प्रकार के उत्सव अति आवश्यक हैं। वे ऐसा कुछ कर रहे हैं जिसे वे लोग जो चाहते हैं कि हमारी परंपराएँ खत्म हो जाएँ, हमारे संकेत और धार्मिक क्रियकलाप मिटा दिए जाएँ, कभी होने नहीं देना चाहेंगे। किसी भी समय जब बड़े स्तर पर उत्सव मनाया जाता है तो ‘विशेषज्ञ’ इसपर प्रशन खड़ा करते हैं, कोई त्रुटि निकाली जाती है, किसी अन्याय का प्रश्न उठता है। क्या यह अजीब नहीं है कि जो हमारी नर्म शक्ति में वृद्धि की बात करते हैं, वे इस आलोचना को स्वीकार करते हैं?

महा अन्नदानम के लिए विशाल सामूहिक रसाईघर तैयार हुए हैं। भोजन परोसने के लिए हज़ारों लोग सेवा देने के लिए तत्पर हैं। मूल्य चुकाकर पास लेकर बहुत कम लोग ही आए हैं लेकिन सभी को सबकुछ मिल रहा है। और हमारे सामूहिक उत्सव पारंपरि रूप से ऐसे ही रहे हैं। यही धर्म है। जो सक्षम हैं, वे संसाधन उपलब्ध करवाते हैं और बाकि सब बिना किसी परेशानी के इस उत्सव में भाग लेते हैं।

स्थानीय सिलाईवाले के पास काम का ढेर लगा है क्योंकि इस रात को सभी अपने सर्वश्रेष्ठ वस्त्र में जाना चाहते हैं। ईशा के भीतर रुद्राक्ष की दुकान, पुस्तक केंद्र पर उतनी ही भीड़ है जितना की बाहर दोसा, चाय के ठेले, कैन्टीन और आई-स्क्रीम बेचने वाले के पास।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो वर्ष पहले 112-फीट लंबे आदि योगी की मूर्ति का अनावरण किया था जो अब एक आकर्षक प्रयटन केंद्र बन चुका है। यहाँ के उत्सव की 25वीं वर्षगाँठ पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी इसमें सम्मिलित होंगे। लेकिन सबसे सराहनीय बात यह नहीं है कि लाखों लोग यहाँ आकर इसमें भाग लेते हैं बल्कि वे करोड़ों लोग भी जो टीवी या वेब-स्ट्रीमिंग के माध्यम से रात भर जगकर कार्यक्रम के साक्षी बनेंगे।

चाहे डोलु कुनीता  के ढोल के डंके हों, अमित त्रिवेदी का संगीत या मनमोहक कालारी प्रदर्शन, यहाँ मनोरंजन के लिए बहुत कुछ है और इस दिन मोक्ष की प्रार्थना करना गलत नहीं होगा। जय शंभु!