संस्कृति
गुजरात से बाहर एक गुजराती के लिए नवरात्रि और गरबा के मायने
गुजरात से बाहर एक गुजराती के लिए नवरात्रि और गरबा के मायने

प्रसंग
  • शक्ति के नौ रूपों को समर्पित, नवरात्रि भक्ति और मनोरंजन का एक उत्कृष्ट मिश्रण है जब भक्त रात्रि के समय तबले की ताल पर गाते हैं और ढोल की थाप पर नाचते हैं।

“जय आद्य शक्ति माँ जय आद्य शक्ति,

अखंड ब्रहमाण्ड दिपाव्या पनावे प्रगत्य माँ,

ॐ जयो जयो माँ जगदम्बे !”

तो इस प्रकार शुरू होता है नवरात्र का पर्व। नवरात्रि में प्रत्येक दिन की जाने वाली अम्बे माँ आरती की रचना सोलहवीं शताब्दी में शिवचंद स्वामी द्वारा की गई थी। आरती और माताजी की पूजाएं पूरी हो जाने के बाद, लोकप्रिय गरबा गीतों की शुरूआती धुन के साथ ढोल की धीमी-धीमी थाप शुरू होती हैं जो रात के आकाश में गूंजने लगती हैं।  फिर हफ्तों या महीनों से तैयारी कर रहे लोग, वृद्ध से युवा तक, जो इस पल का उत्सुकता से इंतजार कर रहे थे, कुछ घंटों के लिए अपने पसंदीदा नृत्य और गायन में खुद को खोने के लिए तैयार हो जाते हैं।

शब्द गरबा, आमतौर पर गुजरात में नवरात्रि के दौरान किए जाने वाले नृत्य और गायन के लिए उपयोग किया जाता है लेकिन असल में गरबा मिट्टी के उस बर्तन को कहा जाता है जिसमें माँ दुर्गा के लिए एक दिया जलाया जाता है। इसी तरह से साल भर में मनाए जाने वाले किसी भी नौ-दिवसीय त्यौहारों में से एक के लिए नवरात्रि शब्द का उपयोग हो सकता है लेकिन यह शारदीय नवरात्रि और महा नवरात्रि के लिए उपयोग किया जाने लगा है। यहाँ तक कि आज भी कई गुजराती घरों में त्यौहार के पहले दिन ही गरबा (घटस्थापन) लाया जाता है, जो माताजी के स्वागत का प्रतीक है।

गरबा, जिसो गरबी भी कहा जाता है, पर क्रमबद्ध छेद होते हैं और इसको सुंदर पारंपरिक डिजाइनों से चित्रित किया जाता है। गरबा को माताजी की मूर्ति या फोटो के सामने गेहूँ के एक छोटे से ढेर के ऊपर रखा जाता है। गरबा के अंदर गेहूँ या मूंग जैसे अनाज रख दिए जाते हैं और उस पर एक दिया रख दिया जाता है। नौ दिन प्रत्येक पूजा के दौरान दिया जलाया जाता है, आखिरी दिन, गरबा को समुद्र या नदी के जल में विसर्जित कर दिया जाता है।

इस विशेष नृत्य को गरबा कहा जाता है शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि माँ दुर्गा के भक्त गरबा के चारों ओर नाचते होंगे जहाँ कई छेदों के माध्यम से दियों की रोशनी की किरणें बाहर आती हैं।

नवरात्रि की मेरी सबसे पुरानी यादें त्रिची के गुजराती समाज में स्थित एक छोटे से रास्ते से हैं, जहाँ हमारा छोटा सा समुदाय इस त्यौहार को उतने ही उत्साह के साथ मनाता था जितना किसी अन्य स्थान पर मनाया जाता है, हाँ ये जरूर था कि पारंपरिक परिधान नहीं पहने होते थे। मेरी दादी गरबा से भरी हुई अपनी डायरी से अपने कुछ उत्साही गायकों के साथ मिलकर पूरे जोश के साथ गरबा गाती थीं और मेरे पिताजी अपने कुछ उत्साहित दोस्तों के साथ मिलकर उतने ही जोश के साथ तबला बजाते थे, जो हॉल में चारों ओर नाचने वाली छोटी सी भीड़ के जोश के साथ मेल खाता था। जिस रात मैंने न चाहते हुए भी पहली बार गरबा नृत्य किया, जब मेरी माँ ने एक शर्मीले बच्चे (मुझे) धक्का देकर घेरे में घकेल दिया था, तभी से मैं गरबा को पसंद करने लगा और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बाद में, जब मैं पहली बार चेन्नई (एक बड़ी गुजराती आबादी वाला शहर) के गरबा में गया तो जिस उत्साह के साथ यहाँ पर गरबा मनाया गया उसको देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया (लेकिन इस बार मैं उचित परिधान में था)।

पिछले कुछ सालों में, मैं इस अनूठे त्यौहार के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करता गया और विभिन्न कहानियों और रीति-रिवाजों के संगम में मंत्रमुग्ध होता गया। मुझे नवरात्रि से जुड़ी सबसे अच्छी वह कथा लगी जिसमें शायद महिषासुर और माँ दुर्गा के बीच नौ-दिन तक युद्ध हुआ था और दसवें दिन असुर का वध कर दिया गया था (जैसा कि हम जानते हैं कि इसको विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसके पीछे एक और कथा है)। फिर भी, नवरात्रि स्वयं शक्ति के नौ रूपों को समर्पित है और उनमें से हर किसी में एक दिलचस्प कथा है, कोई एक विशेष उपस्थिति है, एक चुना हुआ पर्वत है, शक्तियों का एक विशिष्ट समूह है, एक गहरा महत्व है, एक दिव्य प्रतीकात्मकता है, यहाँ तक कि एक या दो पसंदीदा रंग हैं जो हमें आन्तरिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए चित्रपटों के माध्यम से गहरे हिन्दू ज्ञान की ओर ले जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर, शैलपुत्री, जिनकी पहले दिन पूजा की जाती है, और सती की कहानी के साथ-साथ शिव की पत्नी पार्वती के भी विभिन्न रूपों से जुड़ी हुई हैं। हालांकि, शक्ति के रूप में वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव की प्रतीक हैं। पाँचवे दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है, वह इसलिए जानी जाती हैं कि वह छह मुख वाले स्कंद भगवान की माता हैं, जिन्हें कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है और दक्षिण में इन्हें अधिक पूजा जाता है। इन कहानियों को एक धागे में पिरोना बहुत ही दिलचस्प होता है और इन कहानियों के बारे में जानने से पहले तक आपके अंदर एक बहुत ही आश्चर्य की भावना होती है।

दूसरी मिलती-जुलती बात यह है कि नवरात्रि के दौरान डांडिया रास लकड़ी की छड़ों से खेला जाता है। चूंकि गरबा नृत्य धार्मिक आधार पर माताजी से संबंधित है जबकि डांडिया रास कृष्ण जी से ज्यादा संबंधित है – बिल्कुल रासलीला की तरह, जो देश के कई हिस्सों में लोकप्रिय है। इसलिए, नवरात्रि के दौरान बजाए जाने वाले भजन माताजी और कृष्ण दोनों की उपासना और स्तुति के बारे में हैं। बीते हुए कुछ दशकों से गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए जाने वाले और फिल्मों में प्रदर्शित होने वाले गीत डांडिया रास के साथ और प्रेम, लालसा, मनोरंजन तथा शरारत जैसे विषयों के साथ काफी लोकप्रिय हो गए हैं। बॉलीवुड का सर्वव्यापी प्रभाव भी है और यह इस पर निर्भर करता है कि आप किस स्थान पर हैं, आप पायेंगे हिंदी और पंजाबी “पार्टी सांग्स” तथा रीमिक्स गीतों को भी स्थान दिया जाता है।

गीतों में बदलावों की तरह, गरबा के अंतर्गत किए जाने वाले नृत्य के रूप क्षेत्र की भिन्नताओं को देखते हुए कई चरणों और कई शैलियों के साथ विकसित हुए हैं। जबकि हर स्थान पर एक बात जो सबसे आम है वह है बे ताली (दो बार ताली बजाना) और त्रन ताली (तीन बार ताली बजाना)। दोधिया (या दोधियू) जैसी अन्य शैलियाँ वड़ोदरा तथा सूरत से लेकर सौराष्ट्र तथा कच्छ तक के लोगों में लोक गीतों के साथ काफी लोकप्रिय हैं। आठवें दिन कई स्थानों पर महिलाएं एक दिलचस्प शैली मटला गरबो का प्रदर्शन करती हैं, वे अपने सिर पर एक मिट्टी का पात्र गरबी रखती हैं, उनमें से कुछ महिलाएं दोनों हाथों में मिट्टी का दिया पकड़ती हैं।

गरबा और डांडिया रास के आनंद तथा उल्लास के साथ माताजी की प्रतिदिन की पूजा और प्रसाद के पीछे भक्ति की भावना भी होती है। यह प्रसाद मिठाई या घर की बनी लपसी (गेहूं के दलिया, गुड़ और घी से निर्मित) और सिरो (घी, दूध और भुना हुआ गेहूं का आटा, रवा और अन्य सामग्री से निर्मित) का होता है। पहले दिन, घरों में गरबा की घटस्थापना के अलावा कई परिवार गेहूं, तिल और मूंग जैसे नवधान्य (नौ प्रकार के अनाज) के बीज पूजास्थल पर बोते हैं और उन्हें नौ दिनों तक अंकुरित होने देते हैं-जिन्हें ज्वार कहा जाता है।

नौवें दिन, ज्वार को मिट्टी के बर्तन गरबी के साथ नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। कुछ लोग अंकुरित पौधों को अपनी लमारियों, गहने के बक्सों या नकदी के बक्सों में अपनी दुकानों में रखते हैं, क्योंकि वे इसे माताजी का आशीर्वाद मानते हैं। आठवां दिन, विशेष रूप से शुभ माना जाता है और इस दिन सुबह के समय माता जी के लिए हवन किया जाता है। इस दिन या कभी-कभी नौवें दिन कई भक्त छोटी कन्याओं (कुंवारी या शाब्दिक रूप से अविवाहित कन्याओं) को अपने घरों पर आमंत्रित करते हैं और दुर्गा मां का रूप मानकर उनका स्वागत करते हैं। कुंवारिकाओं की पूजा उसी भक्तिभाव से की जाती है और उन्हें चूड़ियां (आमतौर पर लाल या हरी) और बिंदी जैसी श्रंगार की वस्तुएं दान की जाती हैं। तब उन्हें पूरी और खीर या अन्य मीठे व्यंजन जैसे लपसी आदि खिलाए जाते हैं, इसके बाद ही व्रत रखने वाले घर के सदस्य अपना व्रत तोड़ते हैं।

लोगों का नौ दिनों तक व्रत रखने का तरीका अलग अलग है। कुछ लोग दिन में केवल एक बार खाते हैं, जिसे फराली भोजन के रूप में जाना जाता है, कुछ लोग केवल फल खाते हैं (फलाहार), जबकि कुछ लोग किसी भी प्रकार का भोजन नहीं करते हैं वे सिर्फ जल या फलों के रस का सेवन करते हैं। नवरात्रि फराली भोजन का स्वाद लेने का एक अच्छा समय है- फराली विडम्बनापूर्वक एक ऐसा भोजन है जिसका उपवास में उपयोग करने की अनुमति है। फराली भोजन का विचार बूढ़े या कमजोर लोगों के लिए था जो पूरे दिन व्रत नहीं रख सकते थे लेकिन आजकल यह व्यंजन की एक श्रेणी बन गया है। फराली भोजन में रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ जैसे कि गेहूं, चावल और अधिकांश सब्जियां शामिल नहीं हैं, इसमें कुछ रुचिकर व्यंजन जैसे कि साबूदाना से बनी खिचड़ी और बड़ा, राजगिरा (रामदाना) की पूरी और पराठा, आलू या शकरकंद या रतालू से बने व्यंजन और फल तथा सूखे मेवे आदि शामिल हैं। बेशक यह एक रुचिकर व्यंजन है।

गुजरात में और गुजरातियों के लिए नवरात्रि एक ऐसा त्यौहार है जो जीवन के सभी पहलुओं पर भक्ति और उत्सव के वातावरण से संबंधित है। जबकि कुछ लोग नौ दिनों को दैनिक पूजा और उपवास के माध्यम से अधिक आध्यात्मिक होने का तरीका मानते हैं। वहीं बहुत सारे लोग बहुत उत्सुक होकर शाम का इंतजार करते हैं कि कब वे अपने परिवार और मित्रों के साथ इस बात पर चर्चा कर सकें कि क्या पहनना है और रात में नृत्य कैसे करना है। जब संगीत बजना शुरू होता है तब गरबा के स्थान रंगों के एक गतिशील बहुरुपदर्शक में तब्दील हो जाते हैं जो थाप के साथ इधर से उधर जाते हैं, डोलते हैं, झूलते हैं और एक-दूसरे में से होकर गुजरते हुए जाल बनाते हैं।

त्यौहार की आखिरी रात में अंतिम गरबा इतनी धूमधाम से होता है कि लोग पसीना पसीना हो जाते हैं, उत्साहजनक संतुष्टि की भावना दुर्गा मां के पवित्र आभार की भावना के साथ मिल जाती है। अगली सुबह यदि नृत्य में आप के हाथ-पैर पूरी तरह से नहीं खुल पाए हैं, तो शरद पूर्णिमा नजदीक ही है और उसके बाद शादियों का मौसम शुरू हो जायेगा।