संस्कृति
विजयादशमी- रावण दहन क्यों है ज़रूरी

धर्म क्या है? सबसे सरल भाषा में कहा जा सकता है कि धर्म ‘कर्त्तव्य’ है। एक मनुष्य द्वारा किया जाने वाला सबसे उचित ‘कर्म’ कर्त्तव्य होता है। कर्त्तव्य काल, स्थिति, स्थान, व्यक्ति आदि पर निर्भर करता है इसलिए धर्म भी सार्वभौमिक नहीं हो सकता। धर्म का उद्देश्य इस सृष्टि में जीवन को सुखकारी बनाना है। हिंदू धार्मिक ग्रंथ हमें धर्म स्थापना की कई घटनाओं का उदाहरण देते हैं और धर्म की स्थापना करने वाले पात्रों को हम ईश्वरीय व पूजनीय मानते हैं। धर्म हमें जोड़े रखता है व पथभ्रमित होने से बचाता है।

हिंदू धर्म पर कई प्रहार होते आए हैं- आक्रामक से वैचारिक स्तर तक। आधुनिक भारत में इन प्रहारों की शैली उत्कृष्ट होती जा रही है। यह हमें हमारे धर्म से दूर करती है और हम समझ भी नहीं पाते। इसी प्रकार की शैली का उदाहरण है हमारे त्यौहारों की अवमानना। किसी भी त्यौहार का मूल होता है उत्साह। वामपंथी और भारत-विरोधी तत्व ऐसे कथात्मक का प्रचार करते हैं जो हमारे धर्म को नीचा दिखाकर हमारे उल्लास को क्षीण कर देता है।

विजयादशमी के पर्व की बात करते हैं। हमारा उत्साह किसलिए है? कि आज हम रावण का सांकेतिक दहन कर बुराई पर अच्छाई को स्थापित करेंगे। लेकिन हमारे उत्साह को क्षति पहुँचाने के लिए कथात्मक रचा गया है कि ‘रावण एक अच्छा व्यक्ति था, एक अच्छा राजा था, एक विद्वान और सदाचारी लेकिन उसके जीवन की एकमात्र गलती सीता हरण थी।’ इस कथा से क्या हुआ? जिस बुराई पर विजय पाने के लिए हम उत्साहित थे, वह बुराई ‘अब इतनी भी बुरी नहीं रही’ क्योंकि कथात्मक हो गया कि ‘रावण इतना भी बुरा नहीं था।’ और राम-रावण का युद्ध एक धर्म-युद्ध की बजाय एक व्यक्तिगत युद्ध बनकर रह गया। इससे क्या हुआ, अपने धर्म के प्रति हमारा आदर और अपने त्यौहारों के प्रति हमारा उत्साह घट गया।

असल में रावण कैसा व्यक्ति था, यह समझना आवश्यक है। हिंदू धर्म के अनुसार मति के छः दोष माने गए हैं- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य। रावण सभी दोषों से ग्रस्त था।

  • काम- कहा जाता है कि रावण एक सभ्य पुरुष था क्योंकि उसने सीता का हरण कर उसकी अनुमति के बिना उसे छुआ तक नहीं। पहली बात तो कि छुआ नहीं तो हरण कैसे किया और दूसरा सीता के साथ दुष्कर्म न करने का कारण था कि पुंजीस्थला से दुष्कर्म करने पर उसे ब्रह्मा से श्राप मिला था कि यदि वह किसी स्त्री को बिना अनुमति के छुएगा तो उसकी मृत्य हो जाएगी। कई स्त्रियों को प्रताड़ित करने के अलावा वाल्मिकि रामायण के उत्तर कांड में उसके द्वारा तीन स्त्रियों के बलात्कार का उल्लेख मिलता है- कुशध्वज की पुत्री वेदवती, पुंजीस्थला और नल कुबेर की पत्नी रंभा।
  • क्रोध- रावण के क्रोध के विषय में तो सब जानते हैं, विभीषण द्वारा मना करने पर भी हनुमान की पूँछ में आग लगाकर उसने राजा की मर्यादा का उल्लंघन किया। खैर, राजा के कर्त्तव्य की अपेक्षा रावण से करना मूर्खता है। स्वयं एक ऋषि का पुत्र होते हुए उसने यज्ञों का विध्वंस करके ब्राह्मणों की हत्या की। साथ ही ऋषियों को भी प्रताड़ित करता था। रामायण में उल्लेख भी मिलता है कि श्रीराम को रावण द्वारा मारे गए ऋषि-मुनियों के कंकालों का ढेर मिला था।
  • लोभ- रावण इतना लोभी था कि उसने अपने भ्राता कुबेर को भी नहीं छोड़ा। लंका असल में कुबेर का राज्य था जिसे रावण ने बल से छीना था।
  • मोह- रावण पुत्र मोह से ग्रसित था। मेघनाद की मृत्यु से वो ऐसा बौखलाया कि सीता की हत्या करने के लिए तलवार लेकर दौड़ पड़ा परंतु मंत्री के समझाने पर वह रुका।
  • मद- रावण अहंकार के मद में चूर था। उसे लगता था उससे बड़ा पराक्रमी और विद्वान कोई नहीं है। अपने इस अहंकार के कारण न उसने कभी अपनी पत्नी और अपने भाई विभीषण से सही व्यवहार किया और न ही कभी अपनी प्रजा को आदर दिया।
  • मात्सर्य- रावण के मन में बचपन से ही कुबेर के प्रति ईर्ष्या थी जिसकी तुष्टि उसने कुबेर की संपत्ति लूटकर की। उसे राम के पराक्रम से ईर्ष्या थी इसलिए वह राम को युद्ध में हराकर अपने अहंकार की तुष्टि करना चाहता था।

विजयादशमी के पर्व ने अपनी महत्ता घटने की प्रक्रिया में दो चरण देखे। पहला यह कि यह पर्व धर्मनिरपेक्ष बना, लोगों ने कहा कि हम रावण को क्यों जलाएँ, इससे बेहतर हम अपने भीतर की बुराई को जलाएँ। अपने भीतर की बुराई मिटाना बिल्कुल सही बात है पर इस क्रम में हमने हिंदू धर्म की विशेषता खो दी जो सांकेतिक साधनों से अपने साध्य की प्राप्ति करता है। रावण मात्र इन सभी बुराइयों का प्रतीक है और इसका दहन हमें केवल खुद की नहीं बल्कि सामाजिक बुराइयों को मिटाने की भी प्रेरणा देता है।

दूसरा चरण यह हुआ कि लोग रावण के प्रति सद्भाव महसूस करने लगे। उन्हें आत्म-ग्लानि और रावण की दुष्टता के अज्ञान ने इतना घेर लिया कि वे स्वयं से बेहतर रावण को समझने लगे और उन्हें यह लगने लगा कि यदि उन्हें जीने का हक़ है तो रावण को कैसे जलाया जाए। उनके इस रवैये ने सामाजिक बुराइयों से निपटने की प्रेरणा को नष्ट तो किया ही बल्कि सामाजिक स्तर पर बुराइयों की स्वीकार्यता भी बढ़ा दी। इस प्रकार इस पर्व ने अपना पूरा उल्लास खो दिया।

अब स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि कुछ स्थानों पर रावण पूजनीय पात्र बन गया है। गोंडों के बीच यह बात फैल रही है कि वे रावणवंशी हैं। हाल ही में यह देखा गया कि आदिवासी समाज और बहुजन भी रावण को अपना नायक मानते हैं। पुणे की भीम आर्मी ने रावण दहन का विरोध भी किया। उनका मानना है कि रावण एक न्यायप्रिय राजा था पर इतिहास ने उसके साथ अन्याय कर उसे एक दुष्ट के रूप में प्रस्तुत किया है इसलिए वे नहीं चाहते कि रावण दहन मनाया जाए।

बात यह है कि भारत एक विशाल राष्ट्र है और इसकी हज़ारों साल पुरानी संस्कृति है और समय के साथ-साथ अलग-अलग समुदायों में धार्मिक ग्रंथों के अलग-अलग संस्करण बन गए हैं। कई बार ग्रंथों की भाषा अमूर्त होती है, जिसका प्रयोग भारत विरोधी तत्व अपना कथात्मक स्थापित करने के लिए करते हैं और ऐसी बात का प्रचार करते हैं जिसमें समाज को वे बाँट सकें। हमें आवश्यकता है ऐसे व्यक्तियों की जो अध्ययन कर इस भ्रांति को मिटा सकें।