संस्कृति
वसंत पंचमी विशेष- राजा भोज के सरस्वती कंठाभरण आज राख और धुएँ की कहानी
आशुचित्र-
  • भोजशालाओं में वसंत पंचमी और विजयादशमी जैसे पर्वों पर राज्य की ओर से महोत्सव मनाए जाते थे।
  • राजा भोज के स्वर्णिम शासन काल की छाप भोपाल, भोजपुर, भोजशालाओं, सब जगह देखने को मिलती है।
यह वाकई राख और धुएँ की कहानी है। सदियों से एक सुलगती एक शानदार दास्तान। राख का ऐसा ढेर, जिसमें सदियों बाद भी धुआँ निकल रहा है और आँखों में बेचैनी पैदा कर रहा है। हम बात कर रहे हैं राजा भोज के धार की और धार में भोजशाला की। यह राजा भोज की बनाई संस्कृत की विद्यापीठ थी, जिसका असल नाम सरस्वती कंठाभरण था। भोज की आराध्य सरस्वती का भव्य मंदिर, जिसकी मूल प्रतिमा आज ब्रिटिश संग्रहालय में है। भोज की वैभवशाली राजधानी धारा नगरी थी, जो आज मध्य प्रदेश का धार शहर है। दिल्ली के सुलतानों-बादशाहों और बाद में मालवा में भोज के राज्य पर काबिज सुलतानों के हाथों धारा का वैभव धूल में मिला दिया गया। मगर जनमानस में भोज अपने शानदार कृतित्व और प्रभावशाली व्यक्तित्व के बूते आज भी जिंदा है। भोज ने ऐसे तीन सरस्वती कंठाभरण बनवाए थे। उज्जैन, धार और मांडू में।
भोज परमार वंश के हैं। सदियाँ गुज़र गईं। वे अब भी अशोक, विक्रमादित्य और हर्ष जैसे महान् राजाओं की कड़ी में बहुत इज्जत से याद किए जाते हैं। भोज अपने अद्वितीय कलाप्रेम, विद्वता और वीरता के अनूठे संगम थे। लेकिन उन्हें आज के दौर में याद किया गया उनकी भोजशाला के कारण। भोजशाला के कारण भी नहीं, उसे लेकर उठे विवादों की वजह से। धार, जो राजा भोज की वैभवशाली धारा नगरी थी। भोजशाला यहीं के एक उजाड़ कोने में खामोश खड़ी एक इमारत है। इसके खंडहर अपनी बुलंद इमारत की खुद गवाही देते हैं।

 भोज की प्रसिद्धि भोपाल के बड़े तालाब से भी जुड़ी है और भोजपुर के विशाल शिव मंदिर से भी। भोजपुर का शिव मंदिर भोज की अधूरी परियोजना है, जो कभी पूरी नहीं हो सकी। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जब मेहमूद गजनवी ने सोमनाथ का मंदिर ध्वस्त किया तो इसके जवाब में भोज ने इस मंदिर का निर्माण शुरू कराया था। इस अधूरे प्रोजेक्ट के अनगिनत आधे-पूरे शिलाखंड मंदिर के सामने विस्तृत चट्टानों पर अब भी देखे जा सकते हैं। कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि पूरा होने के बाद यह मंदिर किस शक्ल में नजर आता? यह भोज के महान् व्यक्तित्व और विलक्षण सोच की एक अधूरी यादगार है।

मैं धार की भोजशाला के बारे ज्यादा नहीं जानता था। सिर्फ इतनी जानकारी थी कि अयोध्या, मथुरा और वाराणसी की तरह यह एक विवाद की जगह है। लेकिन विदिशा का बीजा मंंडल कई बार देखा हुआ था। एक ऐसा स्मारक, जिसने भोजशाला की ही तरह इतिहास की कई कातिल करवटों को झेला। इतिहास में दिलचस्पी के चलते भोजशाला को भी करीब से देखने की इच्छा थी, जो अखबारी कवरेज के एक सालाना मौके पर बलवती हुई। इंदौर में गीता भवन के पीछे कैलाश पार्क कॉलोनी में। कोने का एक मकान। यह डॉ शशिकांत भट्ट का घर है। वे भारतीय मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी के निदेशक हैं। अकादमी हर साल इतिहास के विभिन्न पहलुओं पर सेमिनार आयोजित करती थी। नईदुनिया  में रहते हुए मैंने कई साल तक ये सेमिनार कवर किए। एक दफा भोजशाला पर चर्चा हुई तो धार जाकर भोजशाला देखने की ख्वाहिश जोर से जागी।
एक मार्च 2000। इस दिन मैं धार के उसी उजाड़ कोने में मौजूद था। सामने थी पुराने तराशे हुए पत्थरों की एक बदहाल सी इमारत। मुझे दिखाई दिए खंडित और बेतरतीब ढंग से जोड़े गए पत्थर। यहां आकर इतिहास की मामूली जानकारी रखने वाला कोई भी विद्यार्थी भी कह सकता है कि यह मूल संरचना नहीं है। पहले कुछ और रहा होगा, जिसे तोड़कर उसी के मलबे से यह भवन खड़ा किया गया है। प्रवेश द्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मी ने मुझे भीतर कदम रखने से रोका। मैंने अपना परिचय दिया, लेकिन उसने भीतर नहीं जाने दिया गया। सुरक्षा प्रहरी ने सामने की तरफ इशारा करके कहा कि किसी को अंदर आने दिया जाए तो ‘मजहब वाले’ आपत्ति लेते हैं। मैंने देखा कि सामने कुछ बेतरतीब कब्रें थीं। इनके आसपास कुछ मुस्लिम परिवार रह रहे थे, जिनकी तरफ वह लाचार बंदूकधारी इशारा कर रहा था। उसने कहा कि ये लोग बिला वजह बात का बतंगड़ बनाएँगे। बेहतर होगा आप प्रशासन की अनुमति ले आएँ।

पाषाण के कलात्मक स्तंत्रों की कतार

मैं एक पुरातात्विक स्मारक को देखने की गरज से वहाँ गया था। मुझे नहीं मालूम था कि यहाँ प्रवेश की मनाही है और कलेक्टर की खास अनुमति लगेगी। ऐसा भी नहीं था कि यहाँ कभी किसी को जाने नहीं दिया जाता हो। पता चला कि हर शुक्रवार को यहां मुसलमानों को नमाज की इजाजत है और हर साल वसंतपंचमी पर हिंदुओं को पूजा करने की। इतिहास में दिलचस्पी मुझे वहाँतक खींच ले गई थी। मुझे न पूजा करनी थी, न नमाज। सरकारी कायदे के मुताबिक मुझे साल में किसी भी दिन यहाँ आने की अनुमति नहीं थी। या तो मैं शुक्रवार की नमाज़ के फ्रेम में फिट होता या वसंतपंचमी की पूजा के फ्रेम में। एक विद्यार्थी, एक नागरिक, एक पत्रकार के लिए कोई दिन तय नहीं था। मुझे यह बहुत खटका। मैं काफी देर तक भोजशाला के दरवाजे के बाहर से ही अंदर निगाहें गड़ाए रहा। सामने पत्थर के बेजोड़ स्तंभों की कतारें दिख रही थीं। इन्हें बाहर से ही ललचाई नजरों से देखा और खाली हाथ लौटते हुए मैंने महसूस किया कि मेरे देश का महान् लोकतंत्र भोजशाला के दरवाजे पर नपुंसक हो गया है, जो मुझे अपने ही इतिहास से रूबरू होने का मौका देने में घबराता है। मैं मायूस होकर लौटा।
मैं इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में गया। नईदुनिया की लाइब्रेरी में भी कुछ किताबें थीं। इनमें राजा भोज के निर्माण कार्यों के बारे में पढ़ा। मैं रोमांच से भर गया। तबियत खुश हुई। जो कुछ पढ़ा, उसके बाद राजा भोज के व्यक्तित्व में मेरी दिलचस्पी और जागी। अब मैं उनके बनवाए स्मारकों को देखे बगैर रह नहीं सकता था।
आखिरकार वर्ष 2003 में भोजशाला को भीतर से देखने का मौका अचानक मिला। जनवरी के आखिरी हफ्ते में एक दिन पता चला कि बुजुर्ग कांग्रेसी नेता सुरेश सेठ भोजशाला का मुआयना करने जा रहे हैं। वहां वसंत पंचमी के उत्सव की तैयारियाँ चल रही थीं। छह फरवरी को वसंतपंचमी थी। प्रदेश में तब कांग्रेस की सरकार थी। दिग्विजयसिंह मुख्यमंत्री थे। धार में भोजशाला को लेकर स्थानीय संगठनों का पुराना आंदोलन जोर पकड़ रहा था। ये लोग इस स्थान की मुक्ति के पक्ष में माहौल गरमा रहे थे। सरकार से इनकी ठनी थी। ऐसे में एक कांग्रेसी नेता का वहां जाना, एक खबर तो थी ही। मैं सुरेश सेठ के साथ ही गया। जिसके बारे में अब तक काफी कुछ पढ़ा या सुना ही था, उस विरासत को करीब से देखने का मन में रोमांच तो था ही।  मैं एक-एक पत्थर के पास गया। मुझे वह दिन याद आया, जब मुझे बाहर से लौटा दिया गया था। लेकिन अब मैं भोजशाला के असल इतिहास पर एक लेक्चर दे रहा था। कई स्थानीय लोग मुझे गाइड समझकर सवाल करने लगे। उस शाम मैं उन्हें राख और धुएं की कहानी सुना रहा था।

यह ऐतिहासिक सचाई है कि राजा भोज ने मध्य प्रदेश में सिर्फ धार में ही भोजशाला का निर्माण नहीं कराया था। दो और स्थानों पर भी ऐसी ही इमारतें खड़ी की गई थीं, जिन्हें एक साथ ध्वस्त किया गया। यह तथ्य बहुत कम लोगों की जानकारी में है। परमार वंश के प्रतापी राजा भोज ने जिन दो अन्य स्थानों पर भोजशालाएँ

सरस्वती कंठाभरण के विशाल प्रांगण में यज्ञवेदी

बनवाई थीं, वे हैं-उज्जैन और मांडू। जिन्हें हम आज भोजशाला के नाम से जानते हैं, भोज के समय उनका नाम था-सरस्वती कंठाभरण। सरस्वती कंठाभरण राजा भोज की एक उपाधि और उन्हीं के लिखे हुए दो ग्रंथों के नाम भी थे।

बाद में मैंने बाकी के दोनों स्मारकों का भी मुआयना किया। मांडू और उज्जैन के सरस्वती कंठाभरण अब भी एक जैसी शक्ल में खड़े हैं। खंडित और खामोश। उज्जैन में मस्जिद बगैर नींव और मांडू में दिलावर खां का मकबरा। प्राचीन भारतीय स्थापत्य शैली इन इमारतों में मौजूद स्तंभों से झांकती है। इनका आकार-प्रकार काफी हद तक धार की भोजशाला से मिलता-जुलता है। तीनों को ही दिलावर खां गौरी ने ध्वस्त कराया और इन्हीं के मलबे से एक जैसी संरचनाएं खड़ी कर दीं। यह 1401 का वाकया है। दिलावर खां मालवा का पहला मुस्लिम सुलतान था। वह 1405 में मरने के पहले राख और धुएं की विरासत छोडक़र गया। परमारों की सभ्यता और संस्कृति की मशाल तभी बुझ चुकी थी।
राजा भोज का राज्याभिषेक 1010 में हुआ। उनके पिता सिंधु राज के वक्त परमार राजाओं की राजधानी उज्जैन थी। धार को तब धारा नगरी के रूप में जाना जाता था। यह शहर परमारों की कुल राजधानी के रूप में द्वितीय राजधानी थी। भोज जब राजा बने तो उन्होंने उज्जयिनी का गौरव धारा को दिया। भोज ने यहां कई अद्भुत निर्माण कार्य कराए। इनमें भोजशाला या सरस्वती कंठाभरण की प्रसिद्धि सबसे ज्यादा है। दूसरा विजय मंदिर, जो किसी युद्ध के जीतने पर बनवाया गया था। सरस्वती कंठाभरण को आज भोजशाला के नाम से पहचाना जाता है और विजय मंदिर लाट मस्जिद के रूप में सामने मौजूद है। राख का एक और बड़ा ढेर।

भोजशाला के अंदरुनी परिसर का चित्र

जब आप भोजशाला के भीतर दाखिल होते हैं तो बरामदे में बाईं तरफ मुड़ते ही दीवारों पर काले पत्थर के दो विशाल शिलालेख आपका रास्ता रोक लेते हैं। इन पर उत्कीर्ण संस्कृत के खूबसूरत अलफाजों पर बारीकी से गौर कीजिए। ये भोज के समय की कुछ जरूरी सूचनाएँ दे रहे हैं। ऐसे अनगिनत शिलालेख मूल भवन की दीवारों पर सजे थे। कई नाटकों की स्क्रिप्टें इन पर खुदी थीं, जिनका मंचन इस परिसर में होता रहा होगा। जैसे भोज की ही एक कृति अवनिकूर्मशतम्। यह 83 पंक्तियों की एक रचना है, जो कांच के फ्रेम में सुरक्षित है। पत्थर के विशाल स्तंभों पर संस्कृत को सरल ढंग से सीखने की विधियाँ खुदी हुई हैं। सरस्वती की जो प्रतिमा यहां मंदिर में प्रतिष्ठित रही होगी, वह अंग्रेजों के हाथों ब्रिटिश म्युजियम जा पहुँची।

सरस्वती कंठाभरण के गर्भगृह के छत का चित्र

धार की भोजशाला के पत्थर उज्जैन और मांडू की तुलना में ज्यादा खंडित नहीं हुए। यहां के स्तंभों पर पुराना स्थापत्य साफ झांकता है। कोई नेत्रहीन व्यक्ति भी इन्हें टटोलकर कह सकता है कि वह किसी प्राचीन मंदिर में मौजूद है। लेकिन उज्जैन और मांडू में पत्थरों को बुरी तरह छील दिया गया। ताकि आने वाली पीढिय़ां अतीत की गौरवशाली असलियत को कभी जान न सकें। इसके बावजूद ये खंडित स्मारक सुनने-समझने वालों को अपनी असल कहानी बयान करते हैंं।
आइए अब मांडू चलते हैं…
परमारों का मंडपदुर्ग, सुलतानों का शादियाबाद और आज का मांडू। शानदार ऐतिहासिक स्मारकों के लिए मशहूर। इतिहास का एक समृद्ध शहर। शाही क्षेत्र में जहाज महल और हिंडोला महल जैसी कई इमारतें कतार से हैं। इसके आखिर में एक कोने पर है दिलावर खां का मकबरा। कम पर्यटक ही यहाँ तक आते हैं। यह है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) का एक संरक्षित स्मारक। इस मकबरे के अंदर आइए। एक-एक स्तंभ को देखिए। दीवार-दरवाजों पर गौर कीजिए। यह राजा भोज के एक और सरस्वती कंठाभरण के अवशेषों से बना है।  पुराने पत्थरों पर छैनी-हथोड़ों के वार अब भी देखे जा सकते हैं। इन्हें किस नफरत और हिकारत से छीलकर नष्ट किया गया। बावजूद इसके कई स्तंभों से पुरानी मूर्तियां, कलश, श्रीफल और घंटियों की बनावट अब भी झांकती है। जैसे अपनी आपबीती सुना रही हो। कानों में चुपचाप। कोई सुन न ले!
इस मकबरे के दाहिनी तरफ है थिएटर। एक हजार साल पुरानी रंगशाला, जहां कभी संस्कृत के नाटकों के संवाद गूंजे हैं। मकबरे के बाहर पुरातत्व वालों का एक साइन बोर्ड बताता है कि दिलावर खां का मकबरा मालवा में इस्लामिक पठानी स्थापत्य कला का भवन है। दिन के उजाले में यह एक सफेद झूठ है। मूल स्मारक के अवशेषों से झांकने वाला स्थापत्य कहीं से इस्लामिक नहीं है। मकबरे की कुलजमा स्थिति है-कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा। अगर आप धार की भोजशाला को देखकर यहाँ आएँगे तो समझने में आसानी होगी। हर साल मांडू आने वाले हज़ारों पर्यटक इन स्मारकों को मुस्लिम सुलतानों की बनवाई इमारतों के रूप में ही जानते-सुनते हैं। जबकि सचाई यह है कि मौजूदा मांडू पुराने मंडपदुर्ग की शानदार इमारतों, महलों, मंदिरों, बावडिय़ों और विद्यापीठों के मलबे पर खड़ा है। जिन सीढिय़ों पर चढक़र आप ङ्क्षहडोला महल के ऊपर पहुंचेंगे, जब नीचे सीढिय़ों को पलटकर देखेंगे तो पाएँगे कि वे हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं, जिन्हें उलट-पलटकर सीढ़ियों की शक्ल दे दी गई। संग्रहालय में जाएंगे तो तस्वीर और साफ हो जाएगी। सुलतानों के महलों-मकबरों के बीच अचानक अनगिनत खंडित मूर्तियाँ आपकी निगाहों में आएँगी।
इधर उज्जैन आइए…
अनंतपेठ मोहल्ले की गली का एक कोना। यहाँ है एक पुरानी सफेद चूने से पुती इमारत। इसके बाहर मुख्य द्वार पर एक साइन बोर्ड लटका देखिए। यह इंतजामिया कमेटी का साइन बोर्ड है। भीतर आइए। यह धार की भोजशाला और मांडू के मकबरे की तुलना में आकार में कुछ छोटा परिसर है। बनावट एक जैसी है। यहाँ भी मांडू के मकबरे की तर्ज पर घिस-घिसकर जोड़े गए पुराने स्तंभों की कतारें हैं। हाल ही के सालों में इन्हें हरे रंग के ऑइल पेंट से पोत दिया गया है। महाकाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर फासले पर है यह जगह। इतिहासकार डॉ. शशिकांत भट्ट बताते हैं कि पहले यह पुरातत्व विभाग के अंतर्गत एक लावारिस सी इमारत थी। लेकिन सरकारी लापरवाही के चलते एक दिन अचानक यहां साइन बोर्ड लटक गया और इस पर कब्जा हो गया। मोहल्ले के लोग इतिहास पढ़े बगैर जानते हैं कि इस मस्जिद की जगह पर पहले कोई प्राचीन मंदिर रहा होगा। ज्यादातर लोग मानते हैं कि औरंगजेब ने मंदिर तोडक़र मस्जिद बनाई। जबकि मुस्लिम तबके के लोगों का भरोसा है कि यह मस्जिद बगैर नींव के खड़ी है, जो कहीं से उडक़र आई थी। मैं जब यहां गया, उसके कुछ साल पहले ही नगर पालिका ने इसके पास एक कम्युनिटी हॉल बनवाया था। इसकी खुदाई में कई प्रतिमाएं, शंख, कलश और पद चिन्ह युक्त एक तराशा हुआ शिलाखंड मिला था। पत्थरों के ये टुकड़े कहीं वीरानों में पड़े हैं, किसी मंदिर में रखे हैं या संग्रहालयों में सजे होंगे।
अब किताबों की सैर करते हैं…
मैंने पुरातत्व संग्रहालय और नईदुनिया की लाइब्रेरी में परमार राजाओं के कृतित्व पर उपलब्ध कुछ किताबें पढ़ीं। एक किताब थी 1912 की। यह किसी मेजर सीई लुआर्ड की लिखी किताब थी। अंग्रेजी की इस किताब का शीर्षक था-धार एंड मांडू। मेजर लुआर्ड ने मांडू में दिलावर खां के मकबरे का जिक्र भी अपनी किताब में किया है। उसने भी इस इमारत को एक मुस्लिम या इस्लामिक स्थापत्य कला के एक स्मारक के रूप में स्वीकार नहीं किया है। हैरत की बात है कि एक विदेशी को तो मकबरे की निर्माण सामग्री देखकर यह साफ हो गया कि यह मकबरा नहीं है, लेकिन हमारे सरकारी पुरातत्व मनीषियों को इसका जरा भी इल्म नहीं है। भगवतीलाल राजपुरोहित की 417 पेज की एक किताब मिली-राजा भोज का रचना विश्व। यह एक शोध ग्रंथ है। भोज के बहुआयामी व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए वे बताते हैं कि राजा भोज स्वयं एक कवि थे। उन्होंने विभिन्न विषयों पर करीब 60 ग्रंथ लिखे थे। उनके विद्वानों की परिषद में करीब पांच सौ विभूतियां थीं। यह परिषद सरस्वती कंठाभरण में ही बैठती थी। धार की इसी इमारत में भोज ने 1034 में सरस्वती की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई थी।
इस किताब में भी यह जिक्र कई बार आया है कि भोज ने उज्जैन में भी सरस्वती कंठाभरण के नाम से एक प्रासाद निर्मित कराया था। उज्जैन के इस भवन का गर्भगृह प्रशस्ति के शिलाखंडों से भरा हुआ था। इस भवन के पुस्तकालय में गुजरात के राजा जयसिंह सिद्धराज 1132 में आए थे।  उन्होंने विविध विषयों पर भोज के लिखे कई उपयोगी ग्रंथ देखे थे। ये ग्रंथ व्याकरण, शब्द शास्त्र, शब्द अलंकार, ज्योतिष, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, राजसिद्धांत, वास्तु, अंक और अध्यात्म जैसे विषयों पर थे। सरस्वती कंठाभरण नाम से उनके दो ग्रंथ थे। एक काव्यशास्त्र और दूसरा व्याकरण का। राजा भोज सरस्वती के उपासक थे। इसलिए धार, उज्जैन और मांडू में अपनी बेहतरीन रचनाओं को उन्होंने यही नाम दिए-सरस्वती कंठाभरण। राजपुरोहित की ही एक और किताब है-भोजराज। इससे पता चलता है कि धार में भोजशाला के समान ही मांडू और उज्जैन में भी राजा भोज ने संस्कृत की विद्यापीठें स्थापित की थीं। उज्जैन में यह क्षिप्रा नदी के पूर्वी तट पर था, जो मौजूदा मस्जिद बगैर नींव की शक्ल में खड़ा है।
विक्रम स्मृति ग्रंथ में मांडव के प्राचीन अवशेष अध्याय में कहा गया है कि दिलावर खां के मकबरे के पूर्वी दरवाजे पर फारसी शिलालेख से स्पष्ट है कि इसे 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। लेकिन मकबरे की दक्षिणी दीवार गिर जाने से इसके मलबे में देवियों के कई चित्र और नाम वाला एक काला शिलालेख मिला था। शिव के तांडव नृत्य की मूर्ति भी यहीं मिली। परमारों के समय मांडू इतना आबाद था कि राजा भोज को यहां संस्कृत की विद्यापीठ स्थापित करने की जरूरत महसूस हुई। मौजूदा जामी मस्जिद के सामने अशरफी महल को आज भी मदरसा यानी विद्यालय कहा जाता है। यहां भी संस्कृत का एक शिलालेख मिला, जिस पर सरस्वती की स्तुति का कुछ हिस्सा अंकित था। संभव है जिस तरह धार में सरस्वती की प्रतिमा स्थापित थी, वैसे ही मांडू के विद्यालय में भी स्थापित की गई होगी। एक जगह मांडू के संस्कृत स्कूल के छात्रावास के प्रभारी का नाम गोविंदचंद्र भट्ट लिखा आता है।
उज्जैन विश्वविद्यालय में डॉ. भट्ट परमारों की इन तीनों भोजशालाओं पर एक शोधपत्र पढ़ चुके हैं। वे बताते हैं, भोजशालाओं में वसंत पंचमी और विजयादशमी जैसे पर्वों पर राज्य की ओर से महोत्सव मनाए जाते थे। यहाँ नए राजाओं के राज्याभिषेक भी होते थे। यहीं भोज के विद्वानों की परिषद बैठती थी। दिलावर खां 1392 में यहां आया। तब वह दिल्ली सल्तनत का वित्त अधिकारी बनकर आया था। 1401 में उसने खुद को सुलतान घोषित कर दिया। अपने राज्याभिषेक के लिए ही दिलावर खां ने इन तीनों संस्कृत विद्यापीठों को मस्जिदों की शक्ल में खड़ा कर दिया। भला सरस्वती के एक मंदिर में एक मुस्लिम सुलतान कैसे अपना राज्याभिषेक करा सकता था?
इतिहास कभी ठहरता नहीं। वैभव की गाथाएँ शाश्वत नहीं होतीं। दिन के बाद रात आती है। धार का वैभव भी वक्त के साथ अंधेरे में खोने के लिए पीछे छूट गया। भोज को एक अवसर मिला था सत्ता संभालने का। वे एक लंबी चमकदार लकीर खींच गए। आप भोपाल में हों, भोजपुर में या भोजशाला में। उस लकीर की चमक हर जगह हज़ार साल बाद भी आँखों को चौंधियाती है। कभी-कभी सोचता हूँ कि हमने इस बेशकीमती विरासत में क्या बेहतर जोड़ा है, सिवाय राख और चिंगारियों के! वर्ना यह बेचैनी क्यों हो रही है?
विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com
छायांकन श्रेय- संगीत वर्मा