संस्कृति
सैकड़ों एकड़ भूमि का स्वामित्व होने के बावजूद कांची के पास ये दो मंदिर बन कर रह गए हैं खंडहर

प्रसंग
  • कांची के निकट मंदिर की भूमि का वाणिज्यिक संस्थाएँ लाभ उठा रही हैं, जबकि इस क्षेत्र में स्थित मंदिर की हालत जर्जर बनी हुई है।
  • स्थानीय पुजारियों को उम्मीद है कि उनको जल्द ही भूमि वापस मिल जाएगी और मंदिर तथा उसके आसपास की भूमि को पहले की तरह फिर से महिमावान बनाने का उनको मौका मिलेगा।

16 जनवरी 2014 को चेन्नई उपनगर में स्थित क्वीन्सलैंड एम्यूजमेंट पार्क में एक विशाल व्हील खराब हो गया था जिससे 18 लोग घायल हो गए थे। घायलों में से एक के पिता ने नज़रथपेट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज की थी, यह एम्यूज़मेंट पार्क इसी पुलिस स्टेशन के क्षेत्र में पड़ता है। पुलिस स्टेशन ने एक सामुदायिक सेवा रजिस्टर जारी किया। उसके बाद इस मामले में न तो ज्यादा कुछ सुनाई दिया और न ही मीडिया ने इस पर ज्यादा तवज्जोह दी।

एक साल बाद, एम्यूज़मेंट पार्क के पूल में एक स्कूल छात्र की डूबकर मौत हो गई। इस घटना में स्कूल के अधिकारियों को ही दोषी ठहराया गया, जो छात्रों को भ्रमण पर ले गए थे। लेकिन यह बात स्पष्ट नहीं है कि एम्यूज़मेंट पार्क के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया गया था या नहीं।

इन दोनों घटनाओं में, एक पहलू पर तो कभी सवाल ही नहीं उठाया गया था कि – जब एम्यूज़मेंट पार्क को हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडॉवमेंट डिपार्टमेंट द्वारा उस जगह को खाली करने के लिए कह दिया गया था जिसपर यह चल रहा है तो उसके बाद भी यह उस जगह पर कैसे चल सकता है?

एम्यूजमेंट पार्क के मालिक ने यह जमीन ली थी जिसपर पार्क द्वारा खेती-बाड़ी की जाती थी। क्वीन्सलैंड के मालिक सेल्वाराज ने, साल 1991 में खेती-बाड़ी करने के लिए कांचीपुरम जिले के पूनामल्ली में पप्पंचत्रम के पास काशी विश्वांतर (शिव) मंदिर और श्री वेणुगोपाल स्वामी (विष्णु) मंदिर की जमीन पट्टे पर ली थी।

खेती-बाड़ी के उद्देश्य से ली गई मंदिर की जमीन पर, बेंगलुरू-चेन्नई राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित क्वीन्सलैंड एम्यूजमेंट पार्क।

मंदिर प्रशासन द्वारा दाखिल की गई याचिका को स्वीकार करते हुए एक स्थानीय अदालत ने साल 2008 में फैसला सुनाया कि पट्टेदार ने वाणिज्यिक गतिविधियों में शामिल होकर पट्टे के समझौते का उल्लंघन किया है। इस आदेश के खिलाफ एक अपील की गई थी जिसे अदालत ने साल 2013 में खारिज कर दिया था।

सेंट जॉन्स इंटरनेशनल रेसिडेंशियल स्कूल क्वीन्सलैंड से एक किलोमीटर की दूरी पर है। एक मुकदमे, जिसमें एम्यूजमेंट पार्क को वाणिज्यिक गतिविधियों को करने से रोक दिया गया था, में विद्यालय प्राधिकरण भी एक पक्ष था और उनको भी ऐसे ही निर्देश दिए गए थे। इन फलते-फूलते एम्यूजमेंट पार्क और स्कूल के साथ समस्या यह है कि इन दोनों ने साल 1991 में यह जमीन खेतीबाड़ी करने के लिए पट्टे पर ली थी – जब श्रीपेरंबुदुर “एशिया का डेट्रॉइट” होने से बहुत दूर था जैसा कि यह आज है।

सेंट जॉन्स इंटरनेशनल रेसिडेंशियल स्कूल से मंदिर की जमीन खाली करने के लिए कहा जा चुका है।

कांचीपुरम और पूनामल्ली के बीच बेंगलुरू-चेन्नई राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही थोड़ी सी दूरी पर पप्पंचत्रम है, जहाँ काशी विश्वांतर और श्री वेणुगोपाल स्वामी मंदिर अपनी दयनीय दशा पेश करते हैं। दोनों मंदिर एक ही परिसर में हैं जिसमें चारदीवारी तक नहीं है। गाय, बछड़े और बकरियों जैसे मवेशी मंदिर में छुट्टा घुस आते हैं और स्थानीय लोग भी अपने जानवरों को बाँधने के लिए परिसर का उपयोग करते हैं।

मंदिर एक खंडहर में है और इसका ढांचा टूट-टूट कर गिर रहा है। यह भरोसा करना बहुत ही मुश्किल होगा कि उस जमीन सहित जिसपर क्वीन्सलैंड एम्यूजमेंट पार्क और सेंट जॉन्स इंटरनेशनल स्कूल चल रहे हैं, मंदिर 177.7 एकड़ जमीन का मालिक है।

काशी विश्वांतर और श्री वेणुगोपाल स्वामी मंदिरों का एक हवाई दृश्य।

सन् 1974 से काशी विश्वांतर मंदिर के पुजारी रहे दोराईस्वामी गुरुक्कल का कहना है कि विवाह और समारोहों के लिए मंदिर में दो हॉल थे। दोनों क्षतिग्रस्त हो गए और आज तो उनके निशान तक नहीं बचे हैं जिससे पता चले कि किसी समय यहाँ पर हॉल थे।

शिव मंदिर में घुसने की कोशिश कर रही बकरी को भगाते हुए गुरुक्कल अपनी पुरानी यादों से बताते हैं कि “कांची कामकोटी मठ के श्री चंद्रशेखर सरस्वती स्वामीगल हर साल करीब 15 दिन इस मंडप में ठहरा करते थे। मैंने उन्हें साल 1980 में यहाँ आए हुए देखा था। वह मंदिर के कुंड में सुबह जल्दी उठकर स्नान करते थे और फिर पूजाएं और दैनिक अनुष्ठान करते थे।”

किसी समय यह एक हॉल था जिसमें कांची कामकोटी मठ के स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर सरस्वती स्वामीगल हर साल करीब 15 दिन आकर रुका करते थे।

इस मंदिर का निर्माण करीब 1800 ई. में किया गया था, जब वेंकैया नामक एक जमींदार अपनी निजी समस्याओं का हल ढूँढने के लिए वाराणसी गया था। वहाँ पर वह एक पुजारी से मिले जिन्होंने जमींदार को फुटबॉल के आकार का शिवलिंग दिया। पुजारी ने वेंकैया को शिवलिंग स्थापित करने के लिए उस स्थान पर मंदिर बनाने को कहा जहाँ पर उसे सुनहरे रंग की भूमि मिले।

वापस आते समय वेंकैया ने पप्पंचत्रम में जमीन को सुनहरे रंग का पाया। उन्होंने वहीं पर 1750 एकड़ जमीन खरीदी और वहाँ पर एक शिव मंदिर और उसके साथ में ही एक विष्णु मंदिर बनवाया। मंदिर के अलावा, मंदिर के पुजारियों के रहने के लिए आवास और दो बड़े हॉल भी बनवाए।

पप्पंचत्रम के एक बुजुर्ग एस कन्नियप्पन, जो मंदिर की गरिमा वापस लाने के लिए कार्यरत एक भक्त सभा के प्रमुख हैं, कहते हैं कि अपनी मृत्यु से पहले वेंकैया ने अपनी वसीयत में दोनों गाँवों – एक दूसरा गाँव इरुन्कोत्तई – की वह पूरी जमीन लिख दी थी जो उन्होंने मंदिर के लिए खरीदी थी ताकि बिना किसी बाधा के पूजा संपन्न की जा सके और परिसर को सही रखा जा सके।

कन्नियप्पन और गुरुक्कल कहते हैं कि मंदिर में तीन शिलालेख हैं जिनमें दोनों मंदिरों को जमीन दान में देने का जिक्र किया गया है। कन्नियप्पन कहते हैं कि “मंदिर की हालत तब और ज्यादा खराब हो गई जब मद्रास एस्टेट (रैयतवाड़ी में लोप और रूपान्तरण) अधिनियम 1948 – जिसे आमतौर पर रैयतवाड़ी अधिनियम के नाम से जाना जाता है – को लागू किया गया। इस जमीन को देखने आए सर्वेक्षकों ने इस जमीन को अनाथ (कोई मालिक नहीं) लिख दिया था, इस तरह से कई एकड़ जमीन हाथ से चली गई।”

गुरुक्कल कहते हैं कि “बिडंबना यह है कि वेंकैया ने 1500 एकड़ जमीन खरीदी थी जिसमें से 1000 एकड़ झील के लिए दान दे दी थी जो अब चेम्बरामबक्क्म झील है। बाकी बची जमीन इन मंदिरों को दान कर दी गई थी। लेकिन फिर भी वे इसका लाभ ले पाने में असमर्थ हैं।”

रैयतवाड़ी अधिनियम लागू होने के बाद 1951 में मंदिर की अधिकांश भूमि अलग कर दी गई तब दो बातें हुईं। गुरुक्कल बताते हैं, “पहली, मंदिर के कुछ अधिकारी होशियार और वफादार थे और उन्होंने देवताओं के नाम पर मंदिर की वह भूमि पंजीकृत कराई जहाँ मंदिर स्थित हैं। दूसरी, मंदिर प्रबंधन ने खोई हुई भूमि को पुनः प्राप्त करने के लिए 1956 में तिरुपत्तुर के सहायक सेटलमेंट अधिकारी के समक्ष याचिका प्रस्तुत की लेकिन याचिका खारिज कर दी गई।”

दशप्रकाश समूह द्वारा 1983 में गांव में 10 एकड़ भूमि खरीदने के लिए उठाया गया कदम भगवान की कृपा से लाभदायक साबित हुआ। समूह, जिसने सेंट जॉन्स इंटरनेशनल रेसिडेंशियल स्कूल के पास जो 10 एकड़ जमीन खरीदी थी, उसके पीछे जमीन खरीदना चाहता था। तय हुआ कि यह एचआर एंड सीई विभाग को भुगतान करेगा और जमीन को पट्टे पर लेगा।

मंदिर प्रबंधन ने इस कदम का विरोध किया और मद्रास उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। 1993 में, उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जमीन मंदिर की है और दशप्रकाश समूह के सौदे को नकार दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने समूह की याचिका को खारिज कर दिया। कनियप्पन कहते हैं, “उसके बाद दशप्रकाश समूह ने जमीन बेच दी और जगह छोड़ दी।”

गुरुक्कल कहते हैं, “गाँव में कुछ लोग मंदिर की भूमि का इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन वे तब तक ही ऐसा कर सकते हैं जब तक वे जीवित हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि मंदिरों के लिए समस्या यह है कि एचआर एंड सीई विभाग ने अभी तक इन जमीनों के लिए प्रबंधन तथा पंजीकरण दस्तावेज़ प्रदान नहीं किए हैं।

कनियप्पन भारी मन के साथ कहते हैं, “हम बार-बार एचआर एंड सीई विभाग को स्मरण कराते रहते हैं। हमने क्वींसलैंड और सेंट जॉन्स स्कूल के मामले की ओर इशारा किया है। लेकिन कोई भी सरकारी अधिकारी कार्यवाही करने या जमीन खाली कराने के लिए जरूरी कार्यवाही करने को तैयार नहीं है। वे (अम्यूजमेंट पार्क और स्कूल) फल-फूल रहे हैं, लेकिन मंदिरों पर नजर डालिए।”

गुरुक्कल दुख प्रकट करते हुए कहते हैं, “क्वींसलैंड अम्यूजमेंट पार्क और सेंट जॉन्स स्कूल ने कर-भुगतान से बचने के लिए पहले साल पट्टे का किराया भुगतान किया। उसके बाद, उन्होंने मंदिर में किराए के रूप में एक भी पैसा जमा नहीं किया है।”

मंदिर में रसोई के लिए खोदी गई जमीन। हालाँकि, इसके लिए चंदा उपलब्ध नहीं।

श्री वेणुगोपाल स्वामी मंदिर के पुजारी राजगोपाल खेद प्रकट करते हुए कहते हैं, “करीब एक महीना हो गया तबसे हमने भगवान को पके हुए चावल का भोग नहीं लगाया है।” रसोई या मदपल्ली निर्माणाधीन है। कन्नियप्पन कहते हैं, “हम मदपल्ली बनाने के लिए चंदा मांग रहे हैं, लेकिन चंदा आता ही नहीं है।”

गुरुक्कल के अनुसार, समस्या यह है कि ग्रामीण मंदिर को इसके पूर्व भव्य रूप में लाना नहीं चाहते। वह कहते हैं, “उन्हें डर है कि अगर यह पूर्वरूप में लाया गया तो उन्हें मंदिर की जमीन खाली करने के लिए कहा जाएगा। इसलिए वे इसके लिए पैसा देने से कतराते हैं।”

कन्नियप्पन कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि लोग मंदिर में नहीं आते हैं या परिसर में त्यौहार नहीं मनाते। प्रदोष (जो पूर्णिमा और अमावस्या के दो दिन पहले होता है) और विलक्कु (दीपक) पूजा के दिन यहां भक्तों की भीड़ उमड़ती है। इसके बावजूद भी मंदिर जूझ रहा है।”

मंदिर की आमदनी पूछे जाने पर दोराईस्वामी गुरुक्कल हथेली और कलाई हिलाते हुए न की ओर इशारा करते हैं। उन्होंने कहा, “यही कारण है कि 177.7 एकड़ जमीन पुनः प्राप्त करने के लिए और यह सुनिश्चित करने, कि मंदिर में पूजा और रखरखाव के लिए अच्छी आय होगी, के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।”

गुरुक्कल स्वयं एचआर एंड सीई विभाग से प्रति माह 300 रुपये का मामूली वेतन पाते हैं। यह कहते हुए, कि जब वह मंदिर में नहीं होते हैं तो एक ज्योतिषी का काम करके अपना गुजारा करते हैं, वह दावा करते हैं, “मुझे अपना वेतन वार्षिक आधार पर मिलता है, और पांच साल का बकाया है।”

वहीं दूसरी ओर, राजगोपाल भाग्यशाली हैं क्योंकि भक्त सभा द्वारा वेतन के रूप में उन्हें 6,000 रुपये प्रति माह का भुगतान किया जाता है। उन्हें तिरुवल्लूर में अपने घर से 30 किलोमीटर दूरी पर स्थित श्री वेणुगोपाल स्वामी मंदिर तक आने जाने के लिए 1000 रुपए प्रतिमाह का यात्रा-भत्ता भी मिलता है।

मंदिर में उचित रखरखाव की कमी दृष्टिगोचर होती है। मंदिर की दीवारें टूट रही हैं और उन पर घास उग आई है। मंदिरों में उचित प्रकाश की कमी है और दोनों मंदिरों में उजाले की कमी के कारण अंधेरा रहता है।

धन की कमी ने मंदिर संरक्षण को प्रभावित किया है।

जिन जमीनों पर क्वींसलैंड अम्यूजमेंट पार्क और सेंट जॉन्स इंटरनेशनल रेसिडेंशियल स्कूल मौजूद हैं वे जमीनें मंदिर को वापस मिलेंगी, यह उम्मीद करते हुए गुरुक्कुल कहते हैं, “मंदिर की किस्मत खराब है। लोग मंदिर के किसी भी कार्यक्रम के लिए मामूली मुद्दों पर संघर्ष करते रहते हैं लेकिन जब भी कार्यक्रम का दिन आता है तो वे आपसी बैर भुलाकर सबसे पहले उपस्थित होते हैं। हमें उम्मीद है कि इससे मंदिर की पुनर्स्थापना होगी और इसे जमीन वापस मिलेगी।”

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